केवल भैरव-काली प्रधान क्रम (श्मशान / वाम-कौल)”
यह आन्तरिक-भाव, साक्षी-स्थिति और मौन-स्मरण पर आधारित है—कोई बाह्य/जोखिमपूर्ण क्रिया नहीं।
प्रधानता: काली = बंधन-भक्षण | भैरव = सीमा-भेदन
रीति: जप-संख्या नहीं, लय; वाणी न्यून, दृष्टि स्थिर
रक्षा: गोपनीयता; अनुभव साझा न करें
सील: 27वें दिन के बाद नवीन प्रयोग न करें
दिन 1–9 : काली-प्रधान (अहं-मृत्यु)
उद्देश्य: भय, स्मृति, आसक्ति का क्षय---
1. अश्विनी — प्रारम्भिक छेदन
भाव: निर्भय साक्षी | स्मरण: क्रीं (मौन)
2. भरणी — सहन-शक्ति
भाव: धारण | स्मरण: क्रीं–हूं (लय)
3. कृत्तिका — अग्नि-शुद्धि
भाव: त्याग | स्मरण: क्रीं
4. रोहिणी — आकर्षण-भंग
भाव: असक्ति-त्याग | स्मरण: ह्रीं
5. मृगशिरा — चंचल-मन-विलय
भाव: स्थिरता | स्मरण: क्रीं
6. आर्द्रा — रुद्र-क्षोभ
भाव: स्वीकृति | स्मरण: हूं
7. पुनर्वसु — पुनर्जन्म-बोध
भाव: आशा-त्याग | स्मरण: ह्रीं
8. पुष्य — पोषण-संहार
भाव: वैराग्य | स्मरण: क्रीं
9. आश्लेषा — बंधन-छेदन
भाव: मुक्त-संकल्प | स्मरण: हूं
संकेत: भय-स्वप्न/हृदय-कंपन आए—रोकें नहीं; साक्षी रहें।
दिन 10–18 : भैरव-प्रधान (सीमा-भेदन)
उद्देश्य: नियम-आसक्ति का क्षय, दृष्टि-तीक्ष्णता----
10. मघा — पितृ-सीमा-विलय
भाव: निर्लेपता | स्मरण: हूं
11. पूर्व फाल्गुनी — भोग-संयम
भाव: मर्यादा | स्मरण: हूं
12. उत्तर फाल्गुनी — धर्म-परीक्षा
भाव: सत्य-साक्षी | स्मरण: हूं
13. हस्त — कर्म-भेदन
भाव: दक्ष साक्षी | स्मरण: हूं
14. चित्रा — रूप-विलय
भाव: निराकार | स्मरण: हूं
15. स्वाती — वायु-स्वातंत्र्य
भाव: निर्भरता-त्याग | स्मरण: हूं
16. विशाखा — लक्ष्य-भेदन
भाव: एकनिष्ठ | स्मरण: हूं
17. अनुराधा — निष्ठा-स्थैर्य
भाव: समर्पण | स्मरण: हूं
18. ज्येष्ठा — वरिष्ठ-संयम
भाव: प्रभुत्व-त्याग | स्मरण: हूं
संकेत: एकान्त-प्रियता, मृत्यु-विचार से निर्भयता—सामान्य है।
दिन 19–24 : काली-भैरव संयुक्त (मूल-उत्खनन)
उद्देश्य: सूक्ष्म-बंधन का समूल क्षय---
19. मूल — मूलाधार-स्थैर्य
भाव: निर्भय-स्थिर | स्मरण: हूं
20. पूर्वाषाढ़ा — संकल्प-उत्क्रमण
भाव: दृढ़ता | स्मरण: क्रीं
21. उत्तराषाढ़ा — धर्म-स्थिरता
भाव: संतुलन | स्मरण: हूं
22. श्रवण — श्रुति-मौन
भाव: सुनना (नाद) | स्मरण: हूं
23. धनिष्ठा — ताल-लय
भाव: अनुशासन | स्मरण: हूं
24. शतभिषा — गूढ़-रक्षा
भाव: गोपन | स्मरण: क्ष्रौं (अल्प)
दिन 25–27 : सील-खण्ड (उग्र से शान्त)
उद्देश्य: उग्रता का शमन, सिद्धि-स्थैर्य------
25. पूर्व भाद्रपद — उग्र-तप
भाव: सहन-शक्ति | स्मरण: क्रीं
26. उत्तर भाद्रपद — शान्त-समाधि
भाव: शीतलता | स्मरण: ह्रीं
27. रेवती — द्वार-बन्धन (सील)
भाव: कृतार्थता | स्मरण: गं (अल्प)
(तीन पंक्तियाँ/दिन)
आज कौन-सा बंधन ढीला हुआ
देह/श्वास/दृष्टि का संकेत
साक्षी-स्थिति (स्थिर/डगमग)
संतुलन-संकेत--
यदि अत्यधिक भय/अनिद्रा बढ़े—
26वें दिन का शान्त-भाव (ह्रीं) बढ़ाएँ, 1–2 दिन उग्रता विराम दें।
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