Tuesday, February 17, 2026

पितृ कैसे रक्षक से भक्षक कैसे बनते है*

*पितृ कैसे रक्षक से भक्षक कैसे बनते है* 

जब किसी व्यक्ति के कुल-पितर किसी तांत्रिक क्रिया द्वारा बंधन में डाल दिए जाते हैं, तो वे न तो स्वयं मुक्त हो पाते हैं और न ही अपने वंशजों की रक्षा कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को स्वप्न में अजीब-अजीब दृश्य दिखाई देते हैं, स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, बार-बार दुर्घटनाएँ होती हैं और घर में अशांति बनी रहती है। जब इन लक्षणों से यह स्पष्ट हो जाए कि कुल-पितर बंधन में हैं, तो सबसे पहले कुल-भैरव का सहयोग लेना चाहिए। कुल-भैरव प्रत्येक बंधन को काटने में सर्वथा समर्थ होते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रत्येक शक्तिपीठ के भैरव वहाँ के रक्षक होते हैं।

इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बिना पूरी जानकारी के पितरों के मंत्रों का जाप न करें, क्योंकि जब पितर बंधन में होते हैं तो उनके साथ कोई नकारात्मक शक्ति भी जुड़ी हो सकती है, जो अधूरे मंत्र-जाप से और अधिक सक्रिय हो जाती है। 

सबसे पहले यह समझना होगा कि पितरों का स्थान कहाँ होता है और उनकी स्थिति क्या होती है।

1. प्रवेश द्वार पर स्थान: पितरों का प्रमुख स्थान घर के प्रवेश द्वार के पास ही होता है। कुलदेवता (कुल की भगवती) और कुल-भैरव के साथ ही कुल के पितर भी वहीं निवास करते हैं।

2. अधिकार क्षेत्र: प्रवेश द्वार पर सर्वप्रथम पितरों का ही अधिकार होता है। घर में होने वाले सभी मांगलिक कार्यों पर पितरों का पूर्ण अधिकार होता है। उन्हीं की कृपा और आशीर्वाद से मांगलिक कार्य सफल होते हैं।

3. विशिष्ट साधक: यदि कुल में कोई बहुत अच्छा और विशिष्ट साधक हो, तो उन्हें भगवती की कृपा से मृत्यु के पश्चात कुल-भैरव का स्थान भी प्राप्त हो सकता है। विशेषकर वे लोग जो तांत्रिक साधना और महाविद्या की कृपा से दिव्य स्थिति प्राप्त कर लेते हैं, वे इस प्रकार के विषयों को सही प्रकार से समझ सकते हैं।

पितर अशुद्ध कैसे होते हैं?

पितरों की अशुद्धि का सीधा संबंध घर के प्रवेश द्वार से है। जब कोई व्यक्ति किसी परिवार को हानि पहुँचाना चाहता है, तो वह सर्वप्रथम प्रवेश द्वार को अशुद्ध करने का प्रयास करता है। यही पितरों की अशुद्धि का मुख्य कारण है।

प्रवेश द्वार का बंधन: जब कोई शत्रु या ईर्ष्यालु व्यक्ति तांत्रिक क्रिया द्वारा किसी परिवार को क्षति पहुँचाना चाहता है, तो उसे सर्वप्रथम उस घर की चौखट (प्रवेश द्वार) का बंधन करना पड़ता है। वह चौखट को अशुद्ध करता है, और जैसे ही प्रवेश द्वार अशुद्ध होता है, 99% पितर उसी क्षण अशुद्ध हो जाते हैं।

अशुद्धि का तात्पर्य: पितरों के अशुद्ध होने का तात्पर्य यह है कि अब वे किसी भी शुभ या मांगलिक कार्य में अपने वंशजों का साथ देने में सक्षम नहीं रहते। उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है और वे स्वयं भी बंधन में जकड़ जाते हैं।

 

No comments: