Wednesday, February 25, 2026

बदलेगी कुंडली, बनेगा विवाह योग

बदलेगी कुंडली, बनेगा विवाह योग


 मैं आपको एक ऐसा अद्भुत और सिद्ध प्रयोग बताने जा रहा हूँ जो शीघ्र विवाह के लिए अत्यंत प्रभावी है। यह प्रयोग मात्र 21 दिनों में विवाह के योग बना सकता है। इसे कई साधकों ने किया है और चमत्कारिक परिणाम मिले हैं।

क्या है यह प्रयोग?

यह प्रयोग 21 हल्दी की गांठों पर आधारित है। हल्दी को सुहाग का प्रतीक माना जाता है। माँ पार्वती को पीला रंग अतिप्रिय है। इस प्रयोग में रोज एक हल्दी की गांठ माँ पार्वती को अर्पित की जाती है और 21 दिनों तक विशेष मंत्र का जाप किया जाता है।

शक्तिशाली मंत्र:


पत्नी मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
तारिणीं दुर्गसंसार सागरस्य कुलोध्वाम् ॥


 हे माँ! मुझे मनोहर पत्नी (या पति) प्रदान करो, जो मेरे मन के अनुसार चलने वाली हो, जो इस दुर्गम संसार सागर से पार लगाने वाली हो और कुल को ऊंचा उठाने वाली हो।


पूरी साधना विधि (21 दिन):



21 हल्दी की गांठें (साबुत, बिना पिसी)
पीले फूल (गेंदा या पीले गुलाब)
पीले बेसन के लड्डू (या पीली मिठाई)
पीली चुनरी (एक बार अर्पित करनी है)
पीला आसन
पीले वस्त्र

विधि - चरणबद्ध:

चरण 1: संकल्प (पहले दिन)

सुबह स्नान करके पीले वस्त्र पहनें। पीले आसन पर बैठें। हाथ में जल लेकर संकल्प करें:

"मैं (अपना नाम, गोत्र) शीघ्र विवाह की कामना से 21 दिनों तक यह साधना करूंगा/करूंगी। हे माँ पार्वती! मेरी साधना स्वीकार करें और मुझे योग्य वर/वधू प्रदान करें।"

जल को जमीन पर छोड़ दें।

चरण 2: शिव मंदिर में जाएँ

यह प्रयोग शिव मंदिर में करना सबसे उत्तम है। अगर मंदिर न जा सकें तो घर पर ही शिव-पार्वती की तस्वीर के सामने कर सकते हैं।

चरण 3: 2 माला मंत्र जाप

शिवलिंग या माँ पार्वती की मूर्ति के सामने बैठकर 2 माला (216 बार) इस मंत्र का जाप करें:

"पत्नी मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् । तारिणीं दुर्गसंसार सागरस्य कुलोध्वाम् ॥"

माला घुमाते समय ध्यान रखें - एक माला 108 मंत्र की होती है। दो माला यानी 216 बार।

चरण 4: हल्दी गांठ अर्पित करें

जाप पूरा होने के बाद, एक हल्दी की गांठ माँ पार्वती को अर्पित करें। हल्दी की गांठ को पीले फूल के साथ चढ़ाएँ।

चरण 5: भोग लगाएँ

पीले बेसन के लड्डू या पीली मिठाई का भोग लगाएँ। अगर संभव हो तो पीले फूल भी चढ़ाएँ।

चरण 6: प्रार्थना

हाथ जोड़कर प्रार्थना करें:

"हे माँ पार्वती! हे भोलेनाथ! मेरी यह साधना स्वीकार करो। मुझे शीघ्र ही योग्य वर/वधू प्रदान करो। मेरे विवाह में आ रही सभी बाधाओं को दूर करो।"

 पहले दिन विशेष:

पहले दिन पीली चुनरी जरूर अर्पित करें। यह एक बार ही करना है। पीली चुनरी माँ पार्वती को चढ़ाएँ और प्रार्थना करें कि वे आपको सुहाग की रक्षा का आशीर्वाद दें।

इसी तरह 21 दिन करें:

रोज यही प्रक्रिया दोहराएँ:

· 2 माला मंत्र जाप
· 1 हल्दी गांठ अर्पित
· पीली मिठाई का भोग
· पीले फूल चढ़ाना (रोज नए फूल)

21वें दिन के बाद:

21 दिन की साधना पूरी होने पर, सभी 21 हल्दी की गांठों को इकट्ठा करें। उन्हें किसी बहते पानी (नदी, समुद्र) में प्रवाहित कर दें। ना मिले तो. पीपल के पेड़ पर रख आये पीले कपडे मे बाँधकर 

प्रवाहित करते समय यह प्रार्थना करें:

"हे माँ गंगे! हे माँ पार्वती! ये हल्दी की गांठें आपको अर्पित हैं। मेरी मनोकामना पूर्ण करें। मुझे शीघ्र ही योग्य वर/वधू का साथ मिले।"

कब करें यह साधना?

· समय: सुबह का समय सबसे उत्तम
· दिन: कोई भी दिन शुरू कर सकते हैं, लेकिन सोमवार, शुक्रवार विशेष फलदायी
· नवरात्रि में यह साधना करना सबसे शक्तिशाली होता है

 विशेष सुझाव:

पीले वस्त्र पहनें पूरे 21 दिन (हो सके तो)
पीला आसन का ही प्रयोग करें
सात्विक भोजन करें, प्याज-लहसुन का त्याग करें
ब्रह्मचर्य का पालन करें
सोमवार और शुक्रवार का विशेष महत्व है, इन दिनों और भी श्रद्धा से करें


क्या न करें:

साधना के दिनों में नॉन-वेज न खाएँ
प्याज-लहसुन से परहेज करें
किसी से झगड़ा न करें
नकारात्मक विचार न लाएँ
बीच में साधना न छोड़ें

दोस्तों, इस साधना को करते समय थोड़ा सा होश रखिए। देखिए कि कैसे आपके मन का डर दूर हो रहा है, कैसे आत्मविश्वास बढ़ रहा है। मंत्र जाप करते समय महसूस करें कि माँ पार्वती आपके सामने बैठी हैं, आपकी सुन रही हैं। बस देखते रहिए। साक्षी बने रहिए। जब साक्षी भाव आएगा, तो यह साधना और भी गहरा असर दिखाएगी।



21 दिन की इस साधना के बाद आप खुद महसूस करेंगे कि जीवन में सकारात्मकता आ गई, विवाह की बाधाएँ दूर हो गईं और माँ की कृपा बरसने लगी।

अथ चतुःषष्टि भैरव नामावलिः

अथ चतुःषष्टि भैरव नामावलिः 

64 भैरवों के नामों का अत्यंत शक्तिशाली संग्रह



 मैं आपको एक ऐसा अद्भुत और शक्तिशाली नाम संग्रह बताने जा रहा हूँ जो श्रीरुद्रयामल तंत्र में वर्णित है। यह है चतुःषष्टि भैरव नामावलिः - भगवान भैरव के 64 स्वरूपों के नामों का अद्भुत संकलन।

 क्या है चतुःषष्टि भैरव नामावलि?

भैरव भगवान शिव के ही एक स्वरूप हैं, जो रक्षक, संहारक और तंत्र के अधिपति माने जाते हैं। भैरव के अनेक स्वरूप हैं और इस नामावली में उनके 64 प्रमुख स्वरूपों के नाम दिए गए हैं।

यह नामावली केवल नामों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उन 64 शक्तियों का आह्वान है जो भैरव के विभिन्न रूपों में विद्यमान हैं।

 इस नामावली के अद्भुत लाभ:

सभी भयों से मुक्ति - भैरव भयहरण करने वाले हैं
शत्रु नाश - शत्रुओं का संहार होता है
तंत्र बाधा से रक्षा - नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा
ग्रह बाधा निवारण - कुंडली के दोष दूर होते हैं
आध्यात्मिक उन्नति - साधना में सफलता मिलती है
मोक्ष की प्राप्ति - आध्यात्मिक मुक्ति
धन-समृद्धि में वृद्धि - आर्थिक स्थिति सुधरती है

 यह है संपूर्ण चतुःषष्टि भैरव नामावलि:

```
॥ अथ चतुःषष्टिभैरवनामावलिः ॥

असिताङ्गो विशालाक्षो मार्तण्डो मोदकप्रियः ।
स्वच्छन्दो विघ्नसन्तुष्टः खेचरः सचराचरः ॥ १॥

रुरुश्च क्रोड-दंष्ट्रश्च तथैव च जटाधरः ।
विश्वरूपो विरूपाक्षो नानारूपधरः परः ॥ २॥

वज्रहस्तो महाकायश्चण्डश्च प्रलयान्तकः ।
भूमिकम्पो नीलकण्ठो विष्णुश्च कुलपालकः॥ ३॥

मुण्डमालः कामपालः क्रोधो वै पिङ्गलेक्षणः ।
उग्ररूपो धरापालः कुटिलो मन्त्रनायकः ॥ ४॥

रुद्रः पितामहाख्यश्च व्युन्मत्तो बटुनायकः ।
शङ्करो भूत-वेतालस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तकः ॥ ५॥

वरदः पर्वतावासः कपालः शशिभूषणः ।
हस्तिचर्माम्बरधरो योगीशो ब्रह्मराक्षसः ॥ ६॥

सर्वज्ञः सर्वदेवेशः सर्वभूतहृदिस्थितः ।
भीषणाख्यो भयहरः सर्वज्ञाख्यस्तथैव च ॥ ७॥

कालाग्निश्च महारौद्रौ दक्षिणो मुखरोऽस्थिरः ।
संहारश्चातिरिक्ताङ्गो कालाग्निश्च प्रियङ्करः ॥ ८॥

घोरनादो विशालाङ्गो योगीशो दक्षसंस्थितः ।
चतुःषष्टीरूपधृग्देवो भैरवः स सदाऽवतु ॥ ९॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे 
चतुःषष्टिभैरवनामावलिः सम्पूर्णा ॥
```

सरल अर्थ - 64 भैरवों के नाम:

प्रथम श्लोक के 8 नाम:

1. असिताङ्गः - काले शरीर वाले
2. विशालाक्षः - विशाल नेत्रों वाले
3. मार्तण्डः - सूर्य के समान तेजस्वी
4. मोदकप्रियः - मोदक प्रिय (लड्डू पसंद)
5. स्वच्छन्दः - स्वतंत्र विचरण करने वाले
6. विघ्नसन्तुष्टः - विघ्नों से संतुष्ट होने वाले
7. खेचरः - आकाश में विचरण करने वाले
8. सचराचरः - चर-अचर सबमें व्याप्त

द्वितीय श्लोक के 8 नाम:

1. रुरुः - रुरु नामक भैरव
2. क्रोडदंष्ट्रः - विशाल दाढ़ों वाले
3. जटाधरः - जटा धारण करने वाले
4. विश्वरूपः - विश्व रूप धारण करने वाले
5. विरूपाक्षः - विकृत नेत्रों वाले
6. नानारूपधरः - अनेक रूप धारण करने वाले
7. परः - परम श्रेष्

तृतीय श्लोक के 8 नाम:

1. वज्रहस्तः - हाथों में वज्र धारण करने वाले
2. महाकायः - विशाल शरीर वाले
3. चण्डः - उग्र स्वभाव वाले
4. प्रलयान्तकः - प्रलय का अंत करने वाले
5. भूमिकम्पः - भूकंप उत्पन्न करने वाले
6. नीलकण्ठः - नीले कंठ वाले (शिव स्वरूप)
7. विष्णुः - विष्णु स्वरूप
8. कुलपालकः - कुल की रक्षा करने वाले

चतुर्थ श्लोक के 8 नाम:

1. मुण्डमालः - मुण्डों की माला पहनने वाले
2. कामपालः - कामनाओं की पूर्ति करने वाले
3. क्रोधः - क्रोध स्वरूप
4. पिङ्गलेक्षणः - पिंगल नेत्रों वाले
5. उग्ररूपः - उग्र रूप वाले
6. धरापालः - पृथ्वी की रक्षा करने वाले
7. कुटिलः - कुटिल (रहस्यमय) स्वरूप
8. मन्त्रनायकः - मंत्रों के स्वामी

पंचम श्लोक के 8 नाम:

1. रुद्रः - रुद्र स्वरूप
2. पितामहः - ब्रह्मा स्वरूप
3. व्युन्मत्तः - मस्त (उन्मत्त) स्वरूप
4. बटुनायकः - बटुकों के स्वामी
5. शङ्करः - कल्याण करने वाले
6. भूतवेतालः - भूत-प्रेतों के स्वामी
7. त्रिनेत्रः - तीन नेत्रों वाले
8. त्रिपुरान्तकः - त्रिपुर का नाश करने वाले

षष्ठ श्लोक के 8 नाम:

1. वरदः - वरदान देने वाले
2. पर्वतावासः - पर्वतों पर निवास करने वाले
3. कपालः - कपाल धारण करने वाले
4. शशिभूषणः - चन्द्रमा से अलंकृत
5. हस्तिचर्माम्बरधरः - हाथी की खाल पहनने वाले
6. योगीशः - योगियों के स्वामी
7. ब्रह्मराक्षसः - ब्रह्मराक्षस स्वरूप

सप्तम श्लोक के 7 नाम:

1. सर्वज्ञः - सब कुछ जानने वाले
2. सर्वदेवेशः - सभी देवताओं के स्वामी
3. सर्वभूतहृदिस्थितः - सभी प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले
4. भीषणः - भयानक स्वरूप
5. भयहरः - भय का हरण करने वाले
6. सर्वज्ञः (पुनः) - सर्वज्ञ (बल देने के लिए)
7. तथैव च - इसी प्रकार

अष्टम श्लोक के 8 नाम:

1. कालाग्निः - कालाग्नि स्वरूप
2. महारौद्रः - महारौद्र स्वरूप
3. दक्षिणः - दक्षिण मुखी भैरव
4. मुखरः - मुखर (बोलने वाले)
5. अस्थिरः - अस्थिर (गतिशील)
6. संहारः - संहार करने वाले
7. अतिरिक्ताङ्गः - अतिरिक्त अंगों वाले
8. प्रियङ्करः - प्रिय करने वाले
नवम श्लोक के 3 नाम:

1. घोरनादः - भयंकर नाद करने वाले
2. विशालाङ्गः - विशाल अंगों वाले
3. दक्षसंस्थितः - दक्षिण दिशा में स्थित

तथा: चतुःषष्टी रूपधृक् देवः - 64 रूप धारण करने वाले देव
तथा: भैरवः - भैरव

 पूरी साधना विधि:

आसन और वस्त्र:

लाल आसन बिछाएँ (भैरव को लाल रंग प्रिय है)
 लाल वस्त्र पहनें (यदि संभव हो)
 काले वस्त्र भी पहन सकते हैं

समय:

प्रातःकाल - सूर्योदय से पहले
रात्रि - विशेष रूप से रात्रि में भैरव साधना उत्तम
अष्टमी और चतुर्दशी का विशेष महत्व
 मंगलवार और शनिवार - भैरव के दिन
कालरात्रि - दीपावली की रात विशेष

📝 विधि:

चरण 1: स्नान करें - स्वच्छ होकर लाल या काले वस्त्र पहनें

चरण 2: लाल आसन पर बैठें - दक्षिण दिशा की ओर मुख करें

चरण 3: संकल्प लें - हाथ में जल लेकर कहें:
"मैं (अपना नाम, गोत्र) भैरव भगवान की कृपा से सभी भयों से मुक्ति एवं शत्रु नाश हेतु इस चतुःषष्टि भैरव नामावली का पाठ करूंगा/करूंगी।"

चरण 4: भैरव का ध्यान करें - काले रंग, त्रिशूल, डमरू, खड़ग धारण किए, भयंकर दाढ़ों वाले, ज्वालाओं से युक्त भैरव का ध्यान करें

चरण 5: नामावली का पाठ करें - 1, 3, 5, 7 या 11 बार पाठ करें

चरण 6: भोग लगाएँ - लाल फूल, लाल चंदन, लाल मिठाई (बेसन के लड्डू), शराब (यदि तांत्रिक साधना है), उड़द की दाल, तेल का दीपक

चरण 7: आरती करें - भैरव जी की आरती करें

चरण 8: क्षमा प्रार्थना - अंत में क्षमा प्रार्थना करें

दोस्तों, इस नामावली का पाठ करते समय थोड़ा सा होश रखिए। देखिए कि कैसे भैरव की भयंकर शक्ति आपके चारों ओर एक सुरक्षा कवच बना रही है। हर नाम के साथ महसूस करें कि उस विशेष शक्ति का आह्वान हो रहा है।

बस देखते रहिए। साक्षी बने रहिए। जब साक्षी भाव आएगा, तो यह साधना और भी गहरा असर दिखाएगी।

अंतिम बात:

दोस्तों, भैरव भगवान शिव के ही स्वरूप हैं और वे भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं। यह चतुःषष्टि भैरव नामावली उनके 64 स्वरूपों का आह्वान है। इसके नियमित पाठ से जहाँ एक ओर सभी भय दूर होते हैं, वहीं दूसरी ओर शत्रुओं का भी नाश होता है।

यह नामावली उन सभी के लिए वरदान है जो जीवन में सुरक्षा, संरक्षण और सफलता चाहते हैं।


रामायण की चौपाई से मिली बंधे हुए पितृ को मुक्ति

रामायण की चौपाई से मिली बंधे हुए पितृ को मुक्ति

  रियल स्टोरी

दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसी रियल स्टोरी बताने जा रहा हूँ जिसे सुनकर आपको रामायण की चौपाइयों की शक्ति पर विश्वास हो जाएगा। यह कहानी है हमारे फॉलोअर अमन शर्मा की, जो गाजियाबाद के रहने वाले हैं।

🌑 कैसे शुरू हुई समस्या?

अमन बताते हैं कि उनके परिवार में पिछले 10 सालों से लगातार परेशानियाँ चल रही थीं।

व्यापार में घाटा, परिवार में कलह, संतान सुख में बाधा, नौकरी में तरक्की न होना... हर तरफ से घेराव था।

कई ज्योतिषियों को दिखाया, कई उपाय किए, कई बाबाओं के चक्कर लगाए। कोई फायदा नहीं हुआ।

कुछ लोग कहने लगे कि आपके यहाँ कोई बहुत बड़ा तांत्रिक प्रभाव है। कोई बहुत बड़ी बाधा है।

अमन परिवार समेत बहुत परेशान हो चुके थे। पूरा जीवन अंधकारमय हो गया था।

कभी सोचा नहीं था कि जीवन में ऐसे दिन भी देखने होंगे। घर में लड़ाई-झगड़े रोज के हो गए थे।

बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा था। अमन का व्यापार ठप्प पड़ गया था।

लाखों का कर्ज हो गया था। ससुराल वालों से भी अनबन हो गई थी। जिंदगी नरक बन चुकी थी।

🕯️ कैसे मिला सच का पता?

एक दिन अमन जी अपने एक मित्र के साथ बैठे थे। बातों-बातों में उन्होंने अपनी परेशानी बताई।

उनके मित्र ने कहा - "एक बार किसी सच्चे संत से मिलकर देखो।"

अमन जी काशी गए। वहाँ एक संत से मिले। संत ने उनकी कुंडली देखी और बोले -

"बेटा, तुम पर कोई तांत्रिक प्रभाव नहीं है। कोई श्राप नहीं है। कोई ग्रह दोष नहीं है।"

"एक और चीज है - पितृ बंधन। तुम्हारे पितर बंधे हुए हैं। इसलिए वे तुम्हारी सहायता नहीं कर पा रहे।"

अमन जी ने पूछा - "ये पितृ बंधन क्या होता है?"

संत ने समझाया - "पितर बंधन का मतलब है कि तुम्हारे पितर किसी तांत्रिक क्रिया से बंधन में डाल दिए गए हैं।"

"वे तुम्हारे घर में प्रवेश नहीं कर पा रहे। वे तुम्हारी रक्षा नहीं कर पा रहे।"

"इसलिए तुम्हारे जीवन में लगातार बाधाएं आ रही हैं।"

अमन जी चौंक गए। उन्होंने पूछा - "इसका उपाय क्या है?"

संत ने कहा - "इसका उपाय सिर्फ रामायण की चौपाइयों में है।"

📿 वह शक्तिशाली चौपाई जिसने बंधन काटा

संत ने अमन जी को दो अद्भुत चौपाइयाँ बताईं -

पहली चौपाई:

"जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥"

अर्थ - हे भवानी! जिस (राम) के नाम का जप करके ज्ञानी पुरुष इस संसार के बंधनों को काट देते हैं।

दूसरी चौपाई:

"तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥"

अर्थ - उसी प्रभु के दूत (हनुमान) को क्या कोई बांध सकता है? पर प्रभु के कार्य के लिए उन्होंने खुद को बंधवा लिया।

संत ने समझाया - "ये दो चौपाइयाँ बहुत शक्तिशाली हैं। पहली चौपाई बताती है कि राम नाम में हर बंधन काटने की शक्ति है।"

"दूसरी चौपाई बताती है कि हनुमान जी को भी जब प्रभु के कार्य के लिए बंधना पड़ा, तो वे बंध गए।"

"लेकिन वह बंधन भी उनकी मर्जी से था। असली में कोई उन्हें बांध नहीं सकता।"

"इसी तरह तुम्हारे पितर भले ही बंधे हों, लेकिन राम नाम की शक्ति से वे मुक्त हो सकते हैं।"

🚩 रामायण की चौपाई ने बदल दी जिंदगी

संत ने अमन जी को सरल उपाय बताया -

"रोज सुबह स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठो।"

"हनुमान जी का ध्यान करो। फिर इन दोनों चौपाइयों का 108 बार जाप करो।"

"पीले आसन पर बैठो। पीले फूल चढ़ाओ। तिल के तेल का दीपक जलाओ।"

"21 दिन लगातार यह जाप करो। 21 दिन बाद किसी गरीब ब्राह्मण को पीले वस्त्र दान करो।"

अमन जी ने पूरा विश्वास और श्रद्धा से यह उपाय किया।

🌟 क्या हुआ 21 दिन बाद?

अमन जी बताते हैं - "पहले 5-6 दिन कुछ खास असर नहीं लगा। मन में संशय होने लगा।"

"लेकिन 7वें दिन से अजीब सी शांति महसूस होने लगी। घर का माहौल थोड़ा सुधरने लगा।"

"10वें दिन मुझे सपना आया। सपने में मेरे दादा जी मुझसे बोले - बेटा, हम आजाद हो गए।"

"उन्होंने कहा - जासु नाम जपि सुनहु भवानी... इस चौपाई ने हमारे बंधन काट दिए।"

"मैं चौंक कर उठ गया। उस दिन से लगा जैसे घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो गई।"

"21 दिन बाद जैसे मानो घर में नई रोशनी आ गई। व्यापार ठीक होने लगा।"

"घर का कलह खत्म हो गया। आज मैं शांति से हूँ। रामायण की चौपाई ने मेरी जिंदगी बदल दी।"

🙏 अमन जी की सलाह

अमन जी कहते हैं - "जिन्हें भी लगता है कि जीवन में कोई बाधा है, कोई रुकावट है, कोई बंधन है - वे इन चौपाइयों का जाप जरूर करें।"

"पितर बंधन हो या कोई और बंधन - रामायण की चौपाई में वो शक्ति है जो हर बंधन को काट सकती है।"

"जासु नाम जपि सुनहु भवानी... यह चौपाई सिद्ध है। इसे अपनाकर देखो।"

"सिर्फ विश्वास चाहिए। राम का नाम ही सबसे बड़ा तंत्र है। सबसे बड़ा यंत्र है। सबसे बड़ा मंत्र है।"

🔥 अगले भाग में जानेंगे -

पितृ बंधन मुक्ति की संपूर्ण साधना विधि

✅ इन चौपाइयों का जाप कैसे करें
✅ कितने दिन करना है जाप
✅ किस दिन से शुरू करें
✅ कौन सी सामग्री चाहिए
✅ कैसे करें हवन
✅ क्या खास सावधानियाँ हैं
 अगला पार्ट मिस न करे 

Wednesday, February 18, 2026

मानव लिंग शरीर में सुषुम्णा नाड़ी के सहारे 32 पद्मों की स्थिति है।


मानव लिंग शरीर में सुषुम्णा नाड़ी के सहारे 32 पद्मों की स्थिति है।

सबसे नीचे और सबसे ऊपर दो सहस्त्रार पद्म अवस्थित हैं। नीचे अकुल स्थान स्थित अरुण वर्ण का सहस्रार पद्म ऊर्ध्वमुख तथा ऊपर ब्रह्मरन्ध्र स्थित श्वेतवर्ण सहस्रार पद्म अधोमुख है। इनमें से अधःसहस्रार को कुल कुण्डलिनी तथा ऊर्ध्व सहस्रार को अकुल कुण्डलिनी कहा गया है। अकुल कुण्डलिनी प्रकाशात्मक अकार स्वरूपा है।

अकुल शब्द का अर्थ शिव तथा कुल शब्द का अर्थ शक्ति  है। और उसकी व्याख्या में भी यही विषय प्रतिपादित है। किन्तु यहाँ शक्ति को कौलिकी कहा गया है। जिस परम तत्त्व से विविध विचित्रताओं से परिपूर्ण यह सारा जगत उत्पन्न होता है और उसी में लीन भी हो जाता है, वह परम तत्त्व शिव और शक्ति से परे है। उसी परम तत्त्व से अकुल शिव और कुल शक्ति की सृष्टि होती है। इस कौलिकी शक्ति से अकुल शिव कभी अलग नहीं रहता। 

शिव को शाक्त दर्शन में अनुत्तर तत्त्व माना गया है। अनुत्तर शब्द अकार का भी नाम है। यह अकार ऐतरेय आरण्यक (2/3/6) के अनुसार समस्त वाङ्मय का जनक है। भगवद्गीता (10/32) में अपनी उत्कृष्ट विभूतियों का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि अक्षरों में मैं अकार हूँ। इसीलिये अकार को अकुल अक्षर भी कहा जाता है। अनेक ग्रंथों में उद्धृत, किन्तु अद्यावधि अनुपलब्ध ग्रंथ संकेतपद्धति में अकार को प्रकाश और परम शिव का स्वरूप कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि प्रकाशात्मक अकुल शिव अकुल अकार के रूप में अभिव्यक्त होकर इस विविध विचित्रतामय जगत की सृष्टि करता है। महार्थमंजरी की परिमल व्याख्या (पृ. 89) में महेश्वरानंद ने कुल, कौल और अकुल विभाग की चर्चा की है। नित्याषोडशिकार्णव की अर्थरत्नावली टीका के लेखक विद्यानन्द ने अकुल, कुल और कुलाकुल (पृ. 67) तथा अकुल, कुल, कुलाकुल, कौल और शुद्धकौल (पृ. 74) नामक भेदों का उल्लेख किया है। ‘कौल मत’ शब्द के विवरण में इनकी चर्चा की गई है।

कर्म कुशल और अकुशल दो प्रकार के हैं। योगानुकूल कर्म कुशल हैं तथा संसार में बाँधने वाले कर्म अकुशल हैं। धर्मकर्म कुशल हैं, अधर्मकर्म अकुशल हैं – यह भी कहा जा सकता है।

अक्रोध दस यमों में से एक प्रकार है। क्रोध चार प्रकार का कहा गया है – भावलक्षणक्रोध, कर्मलक्षणक्रोध, वैकल्यकर क्रोध तथा उद्‍वेगकर क्रोध। 

भावलक्षण क्रोध में असूया, द्‍वेष, मद, मान, मात्सर्य आदि मानसिक भाव उत्थित होते हैं। 

कर्मलक्षणक्रोध में कलह, वैर, झगड़ा आदि कलहपूर्ण कर्म उत्पन्‍न होते हैं। 

वैकल्यकारक क्रोध में हाथ, पैर आदि अंगों पर प्रहार होने से उनकी क्षति हेती है। 

तथा उद्‍वेगकारक क्रोध में अपनी अथवा शत्रु की प्राणहानि होती है जो उद्‍वेग को जन्म देती है। 

पाशुपत दर्शन में इस चार प्रकार के क्रोध का पूर्णत: निषेध किया गया है। क्रोध को मनुष्य का बहुत बड़ा शत्रु माना गया है। जिसके कारण व्यक्‍ति की हर एक बात तथा हर एक कृत्य निष्फल हो जाते हैं। अतः अक्रोध नामक यम को पाशुपत दर्शन में अवश्य पालनीय माना गया है। (पा. सू. कौ. भा. पृ 25-27)

अक्लिष्टवृत्ति चित्त की वृत्ति (चित्त-सत्त्व का परिणाम) जब अविद्यादि-क्लेशपूर्वक उदित नहीं होती, तब वह अक्लिष्टा कहलाती है। जब कोई वृत्ति क्लेशपूर्वक उदित नहीं होती, तब वह क्लेशमय वृत्ति को उत्पन्न भी नहीं करती, अतः उससे क्लेशमूलक कर्माशय का निर्माण भी नहीं होता। 

यह सत्त्वप्रधान अक्लिष्टवृत्ति अपवर्ग की सहायक होती है।

Tuesday, February 17, 2026

पितृ कैसे रक्षक से भक्षक कैसे बनते है*

*पितृ कैसे रक्षक से भक्षक कैसे बनते है* 

जब किसी व्यक्ति के कुल-पितर किसी तांत्रिक क्रिया द्वारा बंधन में डाल दिए जाते हैं, तो वे न तो स्वयं मुक्त हो पाते हैं और न ही अपने वंशजों की रक्षा कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को स्वप्न में अजीब-अजीब दृश्य दिखाई देते हैं, स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, बार-बार दुर्घटनाएँ होती हैं और घर में अशांति बनी रहती है। जब इन लक्षणों से यह स्पष्ट हो जाए कि कुल-पितर बंधन में हैं, तो सबसे पहले कुल-भैरव का सहयोग लेना चाहिए। कुल-भैरव प्रत्येक बंधन को काटने में सर्वथा समर्थ होते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रत्येक शक्तिपीठ के भैरव वहाँ के रक्षक होते हैं।

इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बिना पूरी जानकारी के पितरों के मंत्रों का जाप न करें, क्योंकि जब पितर बंधन में होते हैं तो उनके साथ कोई नकारात्मक शक्ति भी जुड़ी हो सकती है, जो अधूरे मंत्र-जाप से और अधिक सक्रिय हो जाती है। 

सबसे पहले यह समझना होगा कि पितरों का स्थान कहाँ होता है और उनकी स्थिति क्या होती है।

1. प्रवेश द्वार पर स्थान: पितरों का प्रमुख स्थान घर के प्रवेश द्वार के पास ही होता है। कुलदेवता (कुल की भगवती) और कुल-भैरव के साथ ही कुल के पितर भी वहीं निवास करते हैं।

2. अधिकार क्षेत्र: प्रवेश द्वार पर सर्वप्रथम पितरों का ही अधिकार होता है। घर में होने वाले सभी मांगलिक कार्यों पर पितरों का पूर्ण अधिकार होता है। उन्हीं की कृपा और आशीर्वाद से मांगलिक कार्य सफल होते हैं।

3. विशिष्ट साधक: यदि कुल में कोई बहुत अच्छा और विशिष्ट साधक हो, तो उन्हें भगवती की कृपा से मृत्यु के पश्चात कुल-भैरव का स्थान भी प्राप्त हो सकता है। विशेषकर वे लोग जो तांत्रिक साधना और महाविद्या की कृपा से दिव्य स्थिति प्राप्त कर लेते हैं, वे इस प्रकार के विषयों को सही प्रकार से समझ सकते हैं।

पितर अशुद्ध कैसे होते हैं?

पितरों की अशुद्धि का सीधा संबंध घर के प्रवेश द्वार से है। जब कोई व्यक्ति किसी परिवार को हानि पहुँचाना चाहता है, तो वह सर्वप्रथम प्रवेश द्वार को अशुद्ध करने का प्रयास करता है। यही पितरों की अशुद्धि का मुख्य कारण है।

प्रवेश द्वार का बंधन: जब कोई शत्रु या ईर्ष्यालु व्यक्ति तांत्रिक क्रिया द्वारा किसी परिवार को क्षति पहुँचाना चाहता है, तो उसे सर्वप्रथम उस घर की चौखट (प्रवेश द्वार) का बंधन करना पड़ता है। वह चौखट को अशुद्ध करता है, और जैसे ही प्रवेश द्वार अशुद्ध होता है, 99% पितर उसी क्षण अशुद्ध हो जाते हैं।

अशुद्धि का तात्पर्य: पितरों के अशुद्ध होने का तात्पर्य यह है कि अब वे किसी भी शुभ या मांगलिक कार्य में अपने वंशजों का साथ देने में सक्षम नहीं रहते। उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है और वे स्वयं भी बंधन में जकड़ जाते हैं।

 

Sunday, February 15, 2026

7 ચક્ર

7 चक्र 

(1) मूलाधार चक्र - गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला 'आधार चक्र' है । आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। इसके बिगड़ने से वीरता,धन ,समृधि ,आत्मबल ,शारीरिक बल ,रोजगार ,कर्मशीलता,घाटा,असफलता रक्त एवं हड्डी के रोग ,कमर व पीठ में दर्द ,आत्महत्या के बिचार ,डिप्रेशन ,केंसर अदि होता है।
(2) स्वाधिष्ठान चक्र - इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है । उसकी छ: पंखुरियाँ हैं । इसके बिगड़ने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, नपुंसकता ,बाँझपन ,मंद्बुधिता ,मूत्राशय और गर्भाशय के रोग ,अध्यात्मिक सिद्धी में बाधा बैभव के आनंद में कमी अदि होता है।
(3) मणिपूर चक्र - नाभि में दस दल वाला मणिचूर चक्र है । इसके इसके बिगड़ने पर तृष्णा, ईष्र्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, अधूरी सफलता ,गुस्सा ,चिंचिरापन, नशाखोरी,तनाव ,शंकलुप्रबिती,कई तरह की बिमारिया ,दवावो का काम न करना ,अज्ञात भय ,चहरे का तेज गायब ,धोखाधड़ी,डिप्रेशन,उग्रता ,हिंशा,दुश्मनी ,अपयश ,अपमान ,आलोचना ,बदले की भावना ,एसिडिटी ,ब्लडप्रेशर,शुगर,थाईरायेड,सिरएवं शारीर के दर्द,किडनी ,लीवर ,केलोस्ट्राल,खून का रोग आदि इसके बिगड़ने का मतलब जिंदगी का बिगड़ जाना ।
(4) अनाहत चक्र - हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है । इसके बिगड़ने पर लिप्सा, कपट, तोड़ -फोड़, कुतर्क, चिन्ता,नफरत ,प्रेम में असफलता ,प्यार में धोखा ,अकेलापन ,अपमान, मोह, दम्भ, अपनेपन में कमी ,मन में उदासी , जीवन में बिरानगी ,सबकुछ होते हुए भी बेचनी,छाती में दर्द ,साँस लेने में दिक्कत ,सुख का अभाव,ह्रदय व फेफड़े के रोग,केलोस्ट्राल में बढ़ोतरी अदि ।
(5) विशुद्धख्य चक्र - कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुरियों वाला है। यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है, इसके बिगड़ने पर वाणी दोष ,अभिब्यक्ति में कमी ,गले ,नाक,कान,दात, थाई रायेड,आत्मजागरण में बाधा आती है।
(6) आज्ञाचक्र - भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ '?' उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है । इसके बिगड़ने पर एकाग्रता ,जीने की चाह,निर्णय की सक्ति, मानसिक सक्ति,सफलता की राह आदि इसके बिगड़ने मतलब सबकुछ बिगड़ जाने का खतरा ।
(7) सहस्रार चक्र - सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है । शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।इसके बिगड़ने पर मानसिक बीमारी, अध्यात्मिकता का आभाव ,भाग्य का साथ न देना आदि ।

Monday, February 2, 2026

नक्षत्र-आधारित-साधना

नक्षत्र-आधारित-साधना

 केवल भैरव-काली प्रधान क्रम (श्मशान / वाम-कौल)” 
यह आन्तरिक-भाव, साक्षी-स्थिति और मौन-स्मरण पर आधारित है—कोई बाह्य/जोखिमपूर्ण क्रिया नहीं।

प्रधानता: काली = बंधन-भक्षण | भैरव = सीमा-भेदन
रीति: जप-संख्या नहीं, लय; वाणी न्यून, दृष्टि स्थिर
रक्षा: गोपनीयता; अनुभव साझा न करें
सील: 27वें दिन के बाद नवीन प्रयोग न करें

दिन 1–9 : काली-प्रधान (अहं-मृत्यु)
उद्देश्य: भय, स्मृति, आसक्ति का क्षय---

1. अश्विनी — प्रारम्भिक छेदन
भाव: निर्भय साक्षी | स्मरण: क्रीं (मौन)

2. भरणी — सहन-शक्ति
भाव: धारण | स्मरण: क्रीं–हूं (लय)

3. कृत्तिका — अग्नि-शुद्धि
भाव: त्याग | स्मरण: क्रीं

4. रोहिणी — आकर्षण-भंग
भाव: असक्ति-त्याग | स्मरण: ह्रीं

5. मृगशिरा — चंचल-मन-विलय
भाव: स्थिरता | स्मरण: क्रीं

6. आर्द्रा — रुद्र-क्षोभ
भाव: स्वीकृति | स्मरण: हूं

7. पुनर्वसु — पुनर्जन्म-बोध
भाव: आशा-त्याग | स्मरण: ह्रीं

8. पुष्य — पोषण-संहार
भाव: वैराग्य | स्मरण: क्रीं

9. आश्लेषा — बंधन-छेदन
भाव: मुक्त-संकल्प | स्मरण: हूं
संकेत: भय-स्वप्न/हृदय-कंपन आए—रोकें नहीं; साक्षी रहें।

दिन 10–18 : भैरव-प्रधान (सीमा-भेदन)
उद्देश्य: नियम-आसक्ति का क्षय, दृष्टि-तीक्ष्णता----

10. मघा — पितृ-सीमा-विलय
भाव: निर्लेपता | स्मरण: हूं

11. पूर्व फाल्गुनी — भोग-संयम
भाव: मर्यादा | स्मरण: हूं

12. उत्तर फाल्गुनी — धर्म-परीक्षा
भाव: सत्य-साक्षी | स्मरण: हूं

13. हस्त — कर्म-भेदन
भाव: दक्ष साक्षी | स्मरण: हूं

14. चित्रा — रूप-विलय
भाव: निराकार | स्मरण: हूं

15. स्वाती — वायु-स्वातंत्र्य
भाव: निर्भरता-त्याग | स्मरण: हूं

16. विशाखा — लक्ष्य-भेदन
भाव: एकनिष्ठ | स्मरण: हूं

17. अनुराधा — निष्ठा-स्थैर्य
भाव: समर्पण | स्मरण: हूं

18. ज्येष्ठा — वरिष्ठ-संयम
भाव: प्रभुत्व-त्याग | स्मरण: हूं
संकेत: एकान्त-प्रियता, मृत्यु-विचार से निर्भयता—सामान्य है।

 दिन 19–24 : काली-भैरव संयुक्त (मूल-उत्खनन)
उद्देश्य: सूक्ष्म-बंधन का समूल क्षय---

19. मूल — मूलाधार-स्थैर्य
भाव: निर्भय-स्थिर | स्मरण: हूं

20. पूर्वाषाढ़ा — संकल्प-उत्क्रमण
भाव: दृढ़ता | स्मरण: क्रीं

21. उत्तराषाढ़ा — धर्म-स्थिरता
भाव: संतुलन | स्मरण: हूं

22. श्रवण — श्रुति-मौन
भाव: सुनना (नाद) | स्मरण: हूं

23. धनिष्ठा — ताल-लय
भाव: अनुशासन | स्मरण: हूं

24. शतभिषा — गूढ़-रक्षा
भाव: गोपन | स्मरण: क्ष्रौं (अल्प)

 दिन 25–27 : सील-खण्ड (उग्र से शान्त)
उद्देश्य: उग्रता का शमन, सिद्धि-स्थैर्य------

25. पूर्व भाद्रपद — उग्र-तप
भाव: सहन-शक्ति | स्मरण: क्रीं

26. उत्तर भाद्रपद — शान्त-समाधि
भाव: शीतलता | स्मरण: ह्रीं

27. रेवती — द्वार-बन्धन (सील)
भाव: कृतार्थता | स्मरण: गं (अल्प)
(तीन पंक्तियाँ/दिन)
आज कौन-सा बंधन ढीला हुआ
देह/श्वास/दृष्टि का संकेत
साक्षी-स्थिति (स्थिर/डगमग)

संतुलन-संकेत--
यदि अत्यधिक भय/अनिद्रा बढ़े—
26वें दिन का शान्त-भाव (ह्रीं) बढ़ाएँ, 1–2 दिन उग्रता विराम दें।