पितरों को शक्तिशाली कैसे बनाएं
सरल लेकिन अत्यंत प्रभावी उपाय
ॐ पितृभ्यः नमः। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा।
दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसा विषय बताने जा रहा हूँ जो हर किसी के जीवन में बेहद महत्वपूर्ण है - पितरों को शक्तिशाली कैसे बनाया जाए। पितरों का हमारे जीवन में बहुत बड़ा योगदान होता है। जब पितर शक्तिशाली होते हैं, तो वे हमारी रक्षा करते हैं, हमें सही रास्ता दिखाते हैं और जीवन की हर बाधा को दूर करते हैं। लेकिन अगर पितर कमजोर हो जाएं या किसी बाहरी शक्ति से प्रभावित हो जाएं, तो जीवन में तरह-तरह की परेशानियां आने लगती हैं।
सबसे शक्तिशाली उपाय - स्वधादेवी मंत्र
पितरों को शक्तिशाली बनाने के लिए सबसे सरल और प्रभावी उपाय है "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा" मंत्र का जाप। यह मंत्र स्वधादेवी को समर्पित है जो पितरों की अधिष्ठात्री देवी हैं। स्वधादेवी की कृपा से पितरों को शक्ति मिलती है, उनकी ऊर्जा बढ़ती है और वे अधिक सक्षम होकर हमारी रक्षा कर पाते हैं।
इस मंत्र का जाप नित्य करना चाहिए। कम से कम 5 माला यानि 540 बार "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा" का जाप रोज करें। इससे पितरों में नई ऊर्जा का संचार होता है, उनकी शक्ति बढ़ती है और वे अधिक सक्षम होकर हमारी रक्षा कर पाते हैं। यह जाप सुबह के समय करना सबसे उत्तम है। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें, सफेद आसन बिछाएं और इस मंत्र का जाप करें। जाप करते समय पितरों का ध्यान करें और स्वधादेवी से प्रार्थना करें कि वे हमारे पितरों को शक्तिशाली बनाएं और उनकी रक्षा करें।
अपराजिता का पौधा - पितरों का रक्षक
इसके अलावा एक और बहुत ही खास उपाय है - अपराजिता का सफेद पुष्प वाला पेड़। अपराजिता का पौधा बहुत शुभ माना जाता है। सफेद फूल वाली अपराजिता विशेष रूप से पितरों को प्रिय है। अगर आपको यह पौधा मिल जाए तो उसे घर में लगाएं और रोज इसे जल दें। जल देते समय प्रार्थना करें - "हे माँ अपराजिता! हमारे पितर कभी भी किसी बाहरी शक्ति से पराजित न हों। उनकी रक्षा करें, उन्हें शक्तिशाली बनाएं।" यह पौधा न केवल पितरों को बल्कि पूरे घर को नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है।
घर के बुजुर्ग - जीवित पितर
अब बात करते हैं सबसे महत्वपूर्ण उपाय की - घर में उपस्थित बुजुर्गों का सम्मान। हम अक्सर भूल जाते हैं कि हमारे घर के बुजुर्ग ही हमारे जीवित पितर हैं। जो हमारे घर में बुजुर्ग हैं, बूढ़े माता-पिता हैं, दादा-दादी हैं, वे साक्षात पितर स्वरूप होते हैं। उनका सम्मान करना, उनकी सेवा करना, उनकी बात मानना - यही सबसे बड़ा पितर उपाय है। जब हम अपने बुजुर्गों को प्रसन्न रखते हैं, तो पितर स्वतः प्रसन्न होते हैं और उनकी शक्ति बढ़ती है।
घर की महिलाओं का सम्मान
घर की महिलाओं का सम्मान करना भी बहुत जरूरी है। घर की मुख्य महिला, चाहे वो माँ हो, पत्नी हो या बहू, उसका सम्मान करने से पितर प्रसन्न होते हैं। कहा गया है कि जहां स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता निवास करते हैं और पितर भी प्रसन्न होते हैं। महिलाओं का तिरस्कार करने से पितर नाराज हो जाते हैं और उनकी शक्ति क्षीण होती है।
अमावस्या का दान
अमावस्या का दिन पितरों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हर महीने की अमावस्या को यथाशक्ति दान करना चाहिए। कोई भी दान हो सकता है - भोजन का दान, वस्त्र का दान, या फिर पैसों का दान। दान हमेशा सुपात्र को देना चाहिए। गरीबों को, ब्राह्मणों को, जरूरतमंदों को दान देने से पितर प्रसन्न होते हैं। पितर प्रसन्न होते हैं तो उनकी शक्ति अपने आप बढ़ती है।
संक्षेप में 5 मुख्य उपाय
पहला - रोज 5 माला "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा" का जाप करें।
दूसरा - अपराजिता के सफेद फूल वाले पौधे को लगाएं और उसकी पूजा करें।
तीसरा - घर के बुजुर्गों का भरपूर सम्मान करें, उनकी सेवा करें।
चौथा - घर की महिलाओं का सम्मान करें, उनकी भावनाओं की कद्र करें।
पांचवां - हर अमावस्या को यथाशक्ति दान करें।
पितरों के आशीर्वाद से जीवन सफल
इन उपायों को करने से पितर शक्तिशाली बनते हैं, उनकी ऊर्जा बढ़ती है, और वे हमें हर मुसीबत से बचाते हैं। जब पितर शक्तिशाली होते हैं, तो उनका आशीर्वाद हमारे साथ हर पल रहता है। व्यापार में लाभ होता है, संतान सुख मिलता है, पारिवारिक कलह दूर होती है, और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।
पितरों का आशीर्वाद ही सबसे बड़ा आशीर्वाद है। उन्हें शक्तिशाली बनाकर हम न केवल उनकी आत्मा की शांति का कारण बनते हैं, बल्कि अपने जीवन को भी सफल बनाते हैं।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा
🙏स्वधास्तोत्रम् - पितरों की एकमात्र देवी स्वधा 🙏
श्राद्ध पक्ष विशेष - पितरों की प्रसन्नता और तृप्ति हेतु नित्य पाठ करें या श्रवण करें
ॐ स्वधादेव्यै नमः। ॐ पितृभ्यः नमः। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसा अद्भुत और शक्तिशाली स्तोत्र बताने जा रहा हूँ जो श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण के प्रकृतिखण्ड में वर्णित है। यह है स्वधास्तोत्रम् - पितरों की एकमात्र देवी स्वधा को समर्पित यह स्तोत्र अत्यंत पुण्यदायी और फलदायी है। खासकर श्राद्ध पक्ष के दिनों में इस स्तोत्र का पाठ या श्रवण करने से पितरों की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
स्वधादेवी कौन हैं?
स्वधादेवी पितरों की एकमात्र देवी हैं। वे पितरों के लिए प्राणतुल्या हैं और ब्राह्मणों के लिए जीवनस्वरूपिणी हैं। उन्हें श्राद्ध की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। उन्हीं की कृपा से श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान आदि का फल पितरों तक पहुँचता है। स्वधादेवी के बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, स्वधादेवी पहले गोलोक में 'स्वधा' नामक गोपी थीं और राधिका की सखी थीं। भगवान कृष्ण ने अपने वक्षःस्थल पर उन्हें धारण किया, इसी कारण वे 'स्वधा' नाम से जानी गईं। वे ॐ, नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा एवं दक्षिणा के रूप में भी विद्यमान हैं। चारों वेदों द्वारा इन छः स्वरूपों का निरूपण किया गया है और कर्मकाण्डी लोगों में इन छहों की बड़ी मान्यता है।
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स्वधास्तोत्रम् की महिमा
स्वधास्तोत्रम् की महिमा अपार है। ब्रह्माजी स्वयं कहते हैं -
"स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नरः। मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत्॥"
अर्थात 'स्वधा' शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य तीर्थस्नायी हो जाता है। वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वाजपेय यज्ञ के फल का अधिकारी हो जाता है।
"स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्। श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालतर्पणयोस्तथा॥"
'स्वधा, स्वधा, स्वधा' - इस प्रकार यदि तीन बार स्मरण किया जाए तो श्राद्ध, काल और तर्पण के फल पुरुष को प्राप्त हो जाते हैं।
"श्राद्धकाले स्वधास्तोत्रं यः शृणोति समाहितः। लभेच्छ्राद्धशतानाञ्च पुण्यमेव न संशयः॥"
श्राद्ध के अवसर पर जो पुरुष सावधान होकर स्वधादेवी के स्तोत्र का श्रवण करता है, वह सौ श्राद्धों का पुण्य पा लेता है - इसमें कोई संदेह नहीं है।
"स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः। प्रियां विनीतां स लभेत्साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्॥"
जो मनुष्य स्वधा, स्वधा, स्वधा इस पवित्र नाम का त्रिकाल संध्या के समय पाठ करता है, उसे विनीत, पतिव्रता एवं प्रिय पत्नी प्राप्त होती है तथा सद्गुणसम्पन्न पुत्र का लाभ होता है।
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यह है संपूर्ण स्वधास्तोत्रम्
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॥ स्वधास्तोत्रम् ॥
ब्रह्मोवाच -
स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नरः।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत्॥१॥
स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्।
श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालतर्पणयोस्तथा॥२॥
श्राद्धकाले स्वधास्तोत्रं यः शृणोति समाहितः।
लभेच्छ्राद्धशतानाञ्च पुण्यमेव न संशयः॥३॥
स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
प्रियां विनीतां स लभेत्साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्॥४॥
पितॄणां प्राणतुल्या त्वं द्विजजीवनरूपिणी।
श्राद्धाधिष्ठातृदेवी च श्राद्धादीनां फलप्रदा॥५॥
बहिर्मन्मनसो गच्छ पितॄणां तुष्टिहेतवे ।
सम्प्रीतये द्विजातीनां गृहिणां वृद्धिहेतवे॥६॥
नित्यानित्यस्वरूपासि गुणरूपासि सुव्रते।
आविर्भावस्तिरोभावः सृष्टौ च प्रलये तव॥७॥
ॐ स्वस्ति च नमः स्वाहा स्वधा त्वं दक्षिणा तथा।
निरूपिताश्चतुर्वेदे षट्प्रशस्ताश्च कर्मिणाम्॥८॥
पुरासीत्त्वं स्वधागोपी गोलोके राधिकासखी।
धृतोरसि स्वधात्मानं कृतं तेन स्वधा स्मृता॥९॥
धृतास्वोरसि कृष्णेन यतस्तेन स्वधा स्मृता
ध्वस्ता त्वं राधिकाशापाद्गोलोकाद्विश्वमागता
कृष्णाश्लिष्टा तया दृष्टा पुरा वृन्दा वने वने।
कृष्णालिङ्गनपुण्येन भूता मे मानसीसुता।
अतृप्त सुरते तेन चतुर्णां स्वामिनां प्रिया॥
स्वाहा सा सुन्दरी गोपी पुरासीद् राधिकासखी।
रतौ स्वयं कृष्णमाह तेन स्वाहा प्रकीर्तिता॥
कृष्णेन सार्धं सुचिरं वसन्ते रासमण्डले।
प्रमत्ता सुर ते श्लिष्टा दृष्टा सा राधया पुरा॥
तस्याः शापेन सा ध्वस्ता गोलोकाद्विश्वमागता।
कृष्णालिङ्गनपुण्येन समभूद्वह्निकामिनी॥
पवित्ररूपा परमा देवाद्यैर्वन्दितानृभिः।
यन्नामोच्चारणेनैव नरो मुच्येत पातकात्॥
या सुशीलाभिधागोपी पुरासीद्राधिकासखी।
उवास दक्षिणेक्रोडे कृष्णस्य च महात्मनः॥
प्रध्वस्ता सा च तच्छापाद्गोलोकाद्विश्वमागता।
कृष्णालिङ्गनपुण्येन सा बभूव च दक्षिणा॥
सा प्रेयसीरतौ दक्षा प्रशस्ता सर्वकर्मसु।
उवास दक्षिणे भर्तुर्दक्षिणा तेन कीर्तिता॥
गोप्यो बभूवुस्तिस्रो वै स्वधा स्वाहा च दक्षिणा।
कर्मिणां कर्मपूर्णार्थं पुरा चैवेश्वरेच्छया॥
इत्येवमुक्त्वा स ब्रह्मा ब्रह्मलोके च संसदि।
तस्थौ च सहसा सद्यः स्वधा साविर्बभूव ह॥१०॥
तदा पितृभ्यः प्रददौ तामेव कमलाननाम्।
तां संप्राप्य ययुस्ते च पितरश्च प्रहर्षिताः॥११॥
स्वधा स्तोत्रमिदं पुण्यं यः शृणोति समाहितः।
स स्नातः सर्वतीर्थेषु वेदपाठफलं लभेत्॥१२॥
॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्त्ते महापुराणे द्वितीये
प्रकृतिखण्डे नारदनारायणसण्वादे स्वधोपाख्याने
स्वधोत्पत्ति तत्पूजादिकं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः॥
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स्वधास्तोत्रम् का हिंदी अर्थ
ब्रह्माजी बोले - 'स्वधा' शब्द के उच्चारण मात्र से मानव तीर्थस्नायी हो जाता है। वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वाजपेय यज्ञ के फल का अधिकारी हो जाता है ॥१॥
स्वधा, स्वधा, स्वधा - इस प्रकार यदि तीन बार स्मरण किया जाए तो श्राद्ध, काल और तर्पण के फल पुरुष को प्राप्त हो जाते हैं ॥२॥
श्राद्ध के अवसर पर जो पुरुष सावधान होकर स्वधादेवी के स्तोत्र का श्रवण करता है, वह सौ श्राद्धों का पुण्य पा लेता है - इसमें संशय नहीं है ॥३॥
जो मानव स्वधा, स्वधा, स्वधा इस पवित्र नाम का त्रिकाल संध्या के समय पाठ करता है, उसे विनीत, पतिव्रता एवं प्रिय पत्नी प्राप्त होती है तथा सद्गुणसम्पन्न पुत्र का लाभ होता है॥४॥
देवि! तुम पितरों के लिए प्राणतुल्या और ब्राह्मणों के लिए जीवनस्वरूपिणी हो। तुम्हें श्राद्ध की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। तुम्हारी ही कृपा से श्राद्ध और तर्पण आदि के फल मिलते हैं॥५॥
तुम पितरों की तुष्टि, द्विजातियों की प्रीति तथा गृहस्थों की अभिवृद्धि के लिए मुझ ब्रह्मा के मन से निकलकर बाहर जाओ॥६॥
सुव्रते! तुम नित्य हो, तुम्हारा विग्रह नित्य और गुणमय है। तुम सृष्टि के समय प्रकट होती हो और प्रलय काल में तुम्हारा तिरोभाव हो जाता है ॥७॥
तुम ॐ, नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा एवं दक्षिणा हो। चारों वेदों द्वारा तुम्हारे इन छः स्वरूपों का निरूपण किया गया है, कर्मकाण्डी लोगों में इन छहों की बड़ी मान्यता है॥८॥
हे देवि! तुम पहले गोलोक में 'स्वधा' नामक गोपी थी और राधिका की सखी थी, भगवान कृष्ण ने अपने वक्षःस्थल पर तुम्हें धारण किया, इसी कारण तुम 'स्वधा' नाम से जानी गयी॥९॥
इस प्रकार देवी स्वधा की महिमा गाकर ब्रह्माजी अपनी सभा में विराजमान हो गये। इतने में सहसा भगवती स्वधा उनके सामने प्रकट हो गयीं ॥१०॥
तब पितामह ने उन कमलनयनी देवी को पितरों के प्रति समर्पण कर दिया। उन देवी की प्राप्ति से पितर अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने लोक को चले गये॥११॥
यह भगवती स्वधा का पुनीत स्तोत्र है। जो पुरुष समाहित चित्त से इस स्तोत्र का श्रवण करता है, उसने मानो सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान कर लिया और वह वेदपाठ का फल प्राप्त कर लेता है॥१२॥
⚡ स्वधादेवी की पूजा साधना विधि
कब करें
✅ श्राद्ध पक्ष में यह स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत फलदायी है
✅ अमावस्या के दिन विशेष रूप से करें
✅ प्रतिदिन भी कर सकते हैं
आसन और वस्त्र
✅ सफेद आसन बिछाएं
✅ सफेद वस्त्र पहनें
✅ स्वच्छ रहें
⏰ समय
✅ सुबह - ब्रह्म मुहूर्त में सबसे उत्तम
✅ शाम - सूर्यास्त के समय भी कर सकते हैं
✅ त्रिकाल संध्या - सुबह, दोपहर और शाम तीनों समय
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पूजा साधना विधि
चरण 1: स्नान और संकल्प
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। हाथ में जल लेकर संकल्प करें -
"मैं (अपना नाम, गोत्र) अपने पितरों की प्रसन्नता और तृप्ति के लिए इस स्वधास्तोत्र का पाठ करूंगा/करूंगी। हे स्वधादेवी! मेरी साधना स्वीकार करें।"
जल को जमीन पर छोड़ दें।
चरण 2: ध्यान
स्वधादेवी का ध्यान करें। उन्हें कमलनयनी, दिव्य स्वरूपा, पितरों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में ध्यान करें।
चरण 3: स्तोत्र का पाठ
अब इस स्तोत्र का 1, 3, 5, 7 या 11 बार पाठ करें। श्राद्ध पक्ष में 11 बार पाठ करना विशेष फलदायी है।
चरण 4: भोग लगाना
पाठ के बाद स्वधादेवी और पितरों को भोग लगाएं -
✅ सफेद मिठाई - खीर, मलाई, सफेद लड्डू
✅ जल - शुद्ध जल
✅ तिल - काले तिल
✅ जौ
✅ चावल
चरण 5: क्षमा प्रार्थना
अंत में क्षमा प्रार्थना करें -
"हे स्वधादेवी! इस पाठ में कोई कमी रह गई हो, कोई गलती हो गई हो, तो क्षमा करें। मेरे पितरों को तृप्त करें।"
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स्वधास्तोत्र के अद्भुत लाभ
✅ पितरों की प्रसन्नता - इस स्तोत्र के पाठ से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं
✅ श्राद्ध का पूर्ण फल - सौ श्राद्धों का पुण्य मिलता है
✅ पापों से मुक्ति - सम्पूर्ण पापों से मुक्ति मिलती है
✅ तीर्थ स्नान का फल - समस्त तीर्थों में स्नान का फल मिलता है
✅ वेद पाठ का फल - वेदपाठ का फल प्राप्त होता है
✅ सुयोग्य पत्नी की प्राप्ति - विनीत, पतिव्रता पत्नी मिलती है
✅ सद्गुणी पुत्र - गुणवान पुत्र की प्राप्ति होती है
✅ पितरों से आशीर्वाद - पितरों का आशीर्वाद मिलता है
✅ कुल की वृद्धि - कुल की अभिवृद्धि होती है
✅ गृहस्थ जीवन में सुख-शांति - घर में सुख-शांति आती है
🌿 पितर और कुलदेवी का संबंध
पितर और कुलदेवी का गहरा संबंध है। कुलदेवी पूरे कुल की अधिष्ठात्री हैं और पितर उसी कुल के पूर्वज हैं। स्वधादेवी पितरों की एकमात्र देवी हैं। इसलिए जब हम स्वधादेवी को प्रसन्न करते हैं, तो पितर स्वतः प्रसन्न होते हैं। और जब पितर प्रसन्न होते हैं, तो कुलदेवी भी प्रसन्न होती हैं। इसलिए स्वधास्तोत्र का पाठ पितरों और कुलदेवी दोनों को प्रसन्न करने का सबसे सरल उपाय है।
🙏 श्राद्ध पक्ष में विशेष सुझाव
श्राद्ध पक्ष के दिनों में इस स्तोत्र का नियमित पाठ करें। साथ ही इन बातों का भी ध्यान रखें -
✅ पितरों का तर्पण करें
✅ ब्राह्मण भोजन कराएं
✅ गरीबों को दान करें
✅ कौओं को भोजन कराएं
✅ सात्विक भोजन करें
✅ तामसिक चीजों से दूर रहें
🔥 अगली पोस्ट में जानेंगे
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✅ पितृ दोष निवारण की संपूर्ण विधि