Thursday, February 26, 2026

पितरों को शक्तिशाली कैसे बनाएं

 पितरों को शक्तिशाली कैसे बनाएं 

सरल लेकिन अत्यंत प्रभावी उपाय

 ॐ पितृभ्यः नमः। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा।

दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसा विषय बताने जा रहा हूँ जो हर किसी के जीवन में बेहद महत्वपूर्ण है - पितरों को शक्तिशाली कैसे बनाया जाए। पितरों का हमारे जीवन में बहुत बड़ा योगदान होता है। जब पितर शक्तिशाली होते हैं, तो वे हमारी रक्षा करते हैं, हमें सही रास्ता दिखाते हैं और जीवन की हर बाधा को दूर करते हैं। लेकिन अगर पितर कमजोर हो जाएं या किसी बाहरी शक्ति से प्रभावित हो जाएं, तो जीवन में तरह-तरह की परेशानियां आने लगती हैं।

 सबसे शक्तिशाली उपाय - स्वधादेवी मंत्र

पितरों को शक्तिशाली बनाने के लिए सबसे सरल और प्रभावी उपाय है "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा" मंत्र का जाप। यह मंत्र स्वधादेवी को समर्पित है जो पितरों की अधिष्ठात्री देवी हैं। स्वधादेवी की कृपा से पितरों को शक्ति मिलती है, उनकी ऊर्जा बढ़ती है और वे अधिक सक्षम होकर हमारी रक्षा कर पाते हैं।

इस मंत्र का जाप नित्य करना चाहिए। कम से कम 5 माला यानि 540 बार "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा" का जाप रोज करें। इससे पितरों में नई ऊर्जा का संचार होता है, उनकी शक्ति बढ़ती है और वे अधिक सक्षम होकर हमारी रक्षा कर पाते हैं। यह जाप सुबह के समय करना सबसे उत्तम है। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें, सफेद आसन बिछाएं और इस मंत्र का जाप करें। जाप करते समय पितरों का ध्यान करें और स्वधादेवी से प्रार्थना करें कि वे हमारे पितरों को शक्तिशाली बनाएं और उनकी रक्षा करें।

अपराजिता का पौधा - पितरों का रक्षक

इसके अलावा एक और बहुत ही खास उपाय है - अपराजिता का सफेद पुष्प वाला पेड़। अपराजिता का पौधा बहुत शुभ माना जाता है। सफेद फूल वाली अपराजिता विशेष रूप से पितरों को प्रिय है। अगर आपको यह पौधा मिल जाए तो उसे घर में लगाएं और रोज इसे जल दें। जल देते समय प्रार्थना करें - "हे माँ अपराजिता! हमारे पितर कभी भी किसी बाहरी शक्ति से पराजित न हों। उनकी रक्षा करें, उन्हें शक्तिशाली बनाएं।" यह पौधा न केवल पितरों को बल्कि पूरे घर को नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है।

घर के बुजुर्ग - जीवित पितर

अब बात करते हैं सबसे महत्वपूर्ण उपाय की - घर में उपस्थित बुजुर्गों का सम्मान। हम अक्सर भूल जाते हैं कि हमारे घर के बुजुर्ग ही हमारे जीवित पितर हैं। जो हमारे घर में बुजुर्ग हैं, बूढ़े माता-पिता हैं, दादा-दादी हैं, वे साक्षात पितर स्वरूप होते हैं। उनका सम्मान करना, उनकी सेवा करना, उनकी बात मानना - यही सबसे बड़ा पितर उपाय है। जब हम अपने बुजुर्गों को प्रसन्न रखते हैं, तो पितर स्वतः प्रसन्न होते हैं और उनकी शक्ति बढ़ती है।

घर की महिलाओं का सम्मान

घर की महिलाओं का सम्मान करना भी बहुत जरूरी है। घर की मुख्य महिला, चाहे वो माँ हो, पत्नी हो या बहू, उसका सम्मान करने से पितर प्रसन्न होते हैं। कहा गया है कि जहां स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता निवास करते हैं और पितर भी प्रसन्न होते हैं। महिलाओं का तिरस्कार करने से पितर नाराज हो जाते हैं और उनकी शक्ति क्षीण होती है।

अमावस्या का दान

अमावस्या का दिन पितरों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हर महीने की अमावस्या को यथाशक्ति दान करना चाहिए। कोई भी दान हो सकता है - भोजन का दान, वस्त्र का दान, या फिर पैसों का दान। दान हमेशा सुपात्र को देना चाहिए। गरीबों को, ब्राह्मणों को, जरूरतमंदों को दान देने से पितर प्रसन्न होते हैं। पितर प्रसन्न होते हैं तो उनकी शक्ति अपने आप बढ़ती है।

 संक्षेप में 5 मुख्य उपाय

पहला - रोज 5 माला "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा" का जाप करें।

दूसरा - अपराजिता के सफेद फूल वाले पौधे को लगाएं और उसकी पूजा करें।

तीसरा - घर के बुजुर्गों का भरपूर सम्मान करें, उनकी सेवा करें।

चौथा - घर की महिलाओं का सम्मान करें, उनकी भावनाओं की कद्र करें।

पांचवां - हर अमावस्या को यथाशक्ति दान करें।

पितरों के आशीर्वाद से जीवन सफल

इन उपायों को करने से पितर शक्तिशाली बनते हैं, उनकी ऊर्जा बढ़ती है, और वे हमें हर मुसीबत से बचाते हैं। जब पितर शक्तिशाली होते हैं, तो उनका आशीर्वाद हमारे साथ हर पल रहता है। व्यापार में लाभ होता है, संतान सुख मिलता है, पारिवारिक कलह दूर होती है, और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

पितरों का आशीर्वाद ही सबसे बड़ा आशीर्वाद है। उन्हें शक्तिशाली बनाकर हम न केवल उनकी आत्मा की शांति का कारण बनते हैं, बल्कि अपने जीवन को भी सफल बनाते हैं।




 ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा 

🙏स्वधास्तोत्रम् - पितरों की एकमात्र देवी स्वधा 🙏

श्राद्ध पक्ष विशेष - पितरों की प्रसन्नता और तृप्ति हेतु नित्य पाठ करें या श्रवण करें

 ॐ स्वधादेव्यै नमः। ॐ पितृभ्यः नमः। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसा अद्भुत और शक्तिशाली स्तोत्र बताने जा रहा हूँ जो श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण के प्रकृतिखण्ड में वर्णित है। यह है स्वधास्तोत्रम् - पितरों की एकमात्र देवी स्वधा को समर्पित यह स्तोत्र अत्यंत पुण्यदायी और फलदायी है। खासकर श्राद्ध पक्ष के दिनों में इस स्तोत्र का पाठ या श्रवण करने से पितरों की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

 स्वधादेवी कौन हैं?

स्वधादेवी पितरों की एकमात्र देवी हैं। वे पितरों के लिए प्राणतुल्या हैं और ब्राह्मणों के लिए जीवनस्वरूपिणी हैं। उन्हें श्राद्ध की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। उन्हीं की कृपा से श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान आदि का फल पितरों तक पहुँचता है। स्वधादेवी के बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, स्वधादेवी पहले गोलोक में 'स्वधा' नामक गोपी थीं और राधिका की सखी थीं। भगवान कृष्ण ने अपने वक्षःस्थल पर उन्हें धारण किया, इसी कारण वे 'स्वधा' नाम से जानी गईं। वे ॐ, नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा एवं दक्षिणा के रूप में भी विद्यमान हैं। चारों वेदों द्वारा इन छः स्वरूपों का निरूपण किया गया है और कर्मकाण्डी लोगों में इन छहों की बड़ी मान्यता है।

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 स्वधास्तोत्रम् की महिमा

स्वधास्तोत्रम् की महिमा अपार है। ब्रह्माजी स्वयं कहते हैं -

"स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नरः। मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत्॥"

अर्थात 'स्वधा' शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य तीर्थस्नायी हो जाता है। वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वाजपेय यज्ञ के फल का अधिकारी हो जाता है।

"स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्। श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालतर्पणयोस्तथा॥"

'स्वधा, स्वधा, स्वधा' - इस प्रकार यदि तीन बार स्मरण किया जाए तो श्राद्ध, काल और तर्पण के फल पुरुष को प्राप्त हो जाते हैं।

"श्राद्धकाले स्वधास्तोत्रं यः शृणोति समाहितः। लभेच्छ्राद्धशतानाञ्च पुण्यमेव न संशयः॥"

श्राद्ध के अवसर पर जो पुरुष सावधान होकर स्वधादेवी के स्तोत्र का श्रवण करता है, वह सौ श्राद्धों का पुण्य पा लेता है - इसमें कोई संदेह नहीं है।

"स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः। प्रियां विनीतां स लभेत्साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्॥"

जो मनुष्य स्वधा, स्वधा, स्वधा इस पवित्र नाम का त्रिकाल संध्या के समय पाठ करता है, उसे विनीत, पतिव्रता एवं प्रिय पत्नी प्राप्त होती है तथा सद्गुणसम्पन्न पुत्र का लाभ होता है।

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 यह है संपूर्ण स्वधास्तोत्रम्

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॥ स्वधास्तोत्रम् ॥

ब्रह्मोवाच -

स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नरः।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत्॥१॥

स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्।
श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालतर्पणयोस्तथा॥२॥

श्राद्धकाले स्वधास्तोत्रं यः श‍ृणोति समाहितः।
लभेच्छ्राद्धशतानाञ्च पुण्यमेव न संशयः॥३॥

स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
प्रियां विनीतां स लभेत्साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्॥४॥

पितॄणां प्राणतुल्या त्वं द्विजजीवनरूपिणी।
श्राद्धाधिष्ठातृदेवी च श्राद्धादीनां फलप्रदा॥५॥

बहिर्मन्मनसो गच्छ पितॄणां तुष्टिहेतवे ।
सम्प्रीतये द्विजातीनां गृहिणां वृद्धिहेतवे॥६॥

नित्यानित्यस्वरूपासि गुणरूपासि सुव्रते।
आविर्भावस्तिरोभावः सृष्टौ च प्रलये तव॥७॥

ॐ स्वस्ति च नमः स्वाहा स्वधा त्वं दक्षिणा तथा।
निरूपिताश्चतुर्वेदे षट्प्रशस्ताश्च कर्मिणाम्॥८॥

पुरासीत्त्वं स्वधागोपी गोलोके राधिकासखी।
धृतोरसि स्वधात्मानं कृतं तेन स्वधा स्मृता॥९॥

धृतास्वोरसि कृष्णेन यतस्तेन स्वधा स्मृता
ध्वस्ता त्वं राधिकाशापाद्गोलोकाद्विश्वमागता
कृष्णाश्लिष्टा तया दृष्टा पुरा वृन्दा वने वने।
कृष्णालिङ्गनपुण्येन भूता मे मानसीसुता।
अतृप्त सुरते तेन चतुर्णां स्वामिनां प्रिया॥

स्वाहा सा सुन्दरी गोपी पुरासीद् राधिकासखी।
रतौ स्वयं कृष्णमाह तेन स्वाहा प्रकीर्तिता॥
कृष्णेन सार्धं सुचिरं वसन्ते रासमण्डले।
प्रमत्ता सुर ते श्लिष्टा दृष्टा सा राधया पुरा॥
तस्याः शापेन सा ध्वस्ता गोलोकाद्विश्वमागता।
कृष्णालिङ्गनपुण्येन समभूद्वह्निकामिनी॥

पवित्ररूपा परमा देवाद्यैर्वन्दितानृभिः।
यन्नामोच्चारणेनैव नरो मुच्येत पातकात्॥

या सुशीलाभिधागोपी पुरासीद्राधिकासखी।
उवास दक्षिणेक्रोडे कृष्णस्य च महात्मनः॥
प्रध्वस्ता सा च तच्छापाद्गोलोकाद्विश्वमागता।
कृष्णालिङ्गनपुण्येन सा बभूव च दक्षिणा॥
सा प्रेयसीरतौ दक्षा प्रशस्ता सर्वकर्मसु।
उवास दक्षिणे भर्तुर्दक्षिणा तेन कीर्तिता॥

गोप्यो बभूवुस्तिस्रो वै स्वधा स्वाहा च दक्षिणा।
कर्मिणां कर्मपूर्णार्थं पुरा चैवेश्वरेच्छया॥

इत्येवमुक्त्वा स ब्रह्मा ब्रह्मलोके च संसदि।
तस्थौ च सहसा सद्यः स्वधा साविर्बभूव ह॥१०॥

तदा पितृभ्यः प्रददौ तामेव कमलाननाम्।
तां संप्राप्य ययुस्ते च पितरश्च प्रहर्षिताः॥११॥

स्वधा स्तोत्रमिदं पुण्यं यः श‍ृणोति समाहितः।
स स्नातः सर्वतीर्थेषु वेदपाठफलं लभेत्॥१२॥

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्त्ते महापुराणे द्वितीये
प्रकृतिखण्डे नारदनारायणसण्वादे स्वधोपाख्याने
स्वधोत्पत्ति तत्पूजादिकं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः॥
```

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स्वधास्तोत्रम् का हिंदी अर्थ

ब्रह्माजी बोले - 'स्वधा' शब्द के उच्चारण मात्र से मानव तीर्थस्नायी हो जाता है। वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वाजपेय यज्ञ के फल का अधिकारी हो जाता है ॥१॥

स्वधा, स्वधा, स्वधा - इस प्रकार यदि तीन बार स्मरण किया जाए तो श्राद्ध, काल और तर्पण के फल पुरुष को प्राप्त हो जाते हैं ॥२॥

श्राद्ध के अवसर पर जो पुरुष सावधान होकर स्वधादेवी के स्तोत्र का श्रवण करता है, वह सौ श्राद्धों का पुण्य पा लेता है - इसमें संशय नहीं है ॥३॥

जो मानव स्वधा, स्वधा, स्वधा इस पवित्र नाम का त्रिकाल संध्या के समय पाठ करता है, उसे विनीत, पतिव्रता एवं प्रिय पत्नी प्राप्त होती है तथा सद्गुणसम्पन्न पुत्र का लाभ होता है॥४॥

देवि! तुम पितरों के लिए प्राणतुल्या और ब्राह्मणों के लिए जीवनस्वरूपिणी हो। तुम्हें श्राद्ध की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। तुम्हारी ही कृपा से श्राद्ध और तर्पण आदि के फल मिलते हैं॥५॥

तुम पितरों की तुष्टि, द्विजातियों की प्रीति तथा गृहस्थों की अभिवृद्धि के लिए मुझ ब्रह्मा के मन से निकलकर बाहर जाओ॥६॥

सुव्रते! तुम नित्य हो, तुम्हारा विग्रह नित्य और गुणमय है। तुम सृष्टि के समय प्रकट होती हो और प्रलय काल में तुम्हारा तिरोभाव हो जाता है ॥७॥

तुम ॐ, नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा एवं दक्षिणा हो। चारों वेदों द्वारा तुम्हारे इन छः स्वरूपों का निरूपण किया गया है, कर्मकाण्डी लोगों में इन छहों की बड़ी मान्यता है॥८॥

हे देवि! तुम पहले गोलोक में 'स्वधा' नामक गोपी थी और राधिका की सखी थी, भगवान कृष्ण ने अपने वक्षःस्थल पर तुम्हें धारण किया, इसी कारण तुम 'स्वधा' नाम से जानी गयी॥९॥

इस प्रकार देवी स्वधा की महिमा गाकर ब्रह्माजी अपनी सभा में विराजमान हो गये। इतने में सहसा भगवती स्वधा उनके सामने प्रकट हो गयीं ॥१०॥

तब पितामह ने उन कमलनयनी देवी को पितरों के प्रति समर्पण कर दिया। उन देवी की प्राप्ति से पितर अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने लोक को चले गये॥११॥

यह भगवती स्वधा का पुनीत स्तोत्र है। जो पुरुष समाहित चित्त से इस स्तोत्र का श्रवण करता है, उसने मानो सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान कर लिया और वह वेदपाठ का फल प्राप्त कर लेता है॥१२॥

⚡ स्वधादेवी की पूजा साधना विधि

कब करें

✅ श्राद्ध पक्ष में यह स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत फलदायी है
✅ अमावस्या के दिन विशेष रूप से करें
✅ प्रतिदिन भी कर सकते हैं

आसन और वस्त्र

✅ सफेद आसन बिछाएं
✅ सफेद वस्त्र पहनें
✅ स्वच्छ रहें

⏰ समय

✅ सुबह - ब्रह्म मुहूर्त में सबसे उत्तम
✅ शाम - सूर्यास्त के समय भी कर सकते हैं
✅ त्रिकाल संध्या - सुबह, दोपहर और शाम तीनों समय

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 पूजा साधना विधि

चरण 1: स्नान और संकल्प

सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। हाथ में जल लेकर संकल्प करें -

"मैं (अपना नाम, गोत्र) अपने पितरों की प्रसन्नता और तृप्ति के लिए इस स्वधास्तोत्र का पाठ करूंगा/करूंगी। हे स्वधादेवी! मेरी साधना स्वीकार करें।"

जल को जमीन पर छोड़ दें।

चरण 2: ध्यान

स्वधादेवी का ध्यान करें। उन्हें कमलनयनी, दिव्य स्वरूपा, पितरों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में ध्यान करें।

चरण 3: स्तोत्र का पाठ

अब इस स्तोत्र का 1, 3, 5, 7 या 11 बार पाठ करें। श्राद्ध पक्ष में 11 बार पाठ करना विशेष फलदायी है।

चरण 4: भोग लगाना

पाठ के बाद स्वधादेवी और पितरों को भोग लगाएं -

✅ सफेद मिठाई - खीर, मलाई, सफेद लड्डू
✅ जल - शुद्ध जल
✅ तिल - काले तिल
✅ जौ
✅ चावल

चरण 5: क्षमा प्रार्थना

अंत में क्षमा प्रार्थना करें -

"हे स्वधादेवी! इस पाठ में कोई कमी रह गई हो, कोई गलती हो गई हो, तो क्षमा करें। मेरे पितरों को तृप्त करें।"

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 स्वधास्तोत्र के अद्भुत लाभ

✅ पितरों की प्रसन्नता - इस स्तोत्र के पाठ से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं
✅ श्राद्ध का पूर्ण फल - सौ श्राद्धों का पुण्य मिलता है
✅ पापों से मुक्ति - सम्पूर्ण पापों से मुक्ति मिलती है
✅ तीर्थ स्नान का फल - समस्त तीर्थों में स्नान का फल मिलता है
✅ वेद पाठ का फल - वेदपाठ का फल प्राप्त होता है
✅ सुयोग्य पत्नी की प्राप्ति - विनीत, पतिव्रता पत्नी मिलती है
✅ सद्गुणी पुत्र - गुणवान पुत्र की प्राप्ति होती है
✅ पितरों से आशीर्वाद - पितरों का आशीर्वाद मिलता है
✅ कुल की वृद्धि - कुल की अभिवृद्धि होती है
✅ गृहस्थ जीवन में सुख-शांति - घर में सुख-शांति आती है

🌿 पितर और कुलदेवी का संबंध

पितर और कुलदेवी का गहरा संबंध है। कुलदेवी पूरे कुल की अधिष्ठात्री हैं और पितर उसी कुल के पूर्वज हैं। स्वधादेवी पितरों की एकमात्र देवी हैं। इसलिए जब हम स्वधादेवी को प्रसन्न करते हैं, तो पितर स्वतः प्रसन्न होते हैं। और जब पितर प्रसन्न होते हैं, तो कुलदेवी भी प्रसन्न होती हैं। इसलिए स्वधास्तोत्र का पाठ पितरों और कुलदेवी दोनों को प्रसन्न करने का सबसे सरल उपाय है।

🙏 श्राद्ध पक्ष में विशेष सुझाव

श्राद्ध पक्ष के दिनों में इस स्तोत्र का नियमित पाठ करें। साथ ही इन बातों का भी ध्यान रखें -

✅ पितरों का तर्पण करें
✅ ब्राह्मण भोजन कराएं
✅ गरीबों को दान करें
✅ कौओं को भोजन कराएं
✅ सात्विक भोजन करें
✅ तामसिक चीजों से दूर रहें

🔥 अगली पोस्ट में जानेंगे

✅ पितरों से जुड़े और भी रहस्य
✅ कुलदेवी को प्रसन्न करने के उपाय
✅ पितृ दोष निवारण की संपूर्ण विधि


Wednesday, February 25, 2026

बदलेगी कुंडली, बनेगा विवाह योग

बदलेगी कुंडली, बनेगा विवाह योग


 मैं आपको एक ऐसा अद्भुत और सिद्ध प्रयोग बताने जा रहा हूँ जो शीघ्र विवाह के लिए अत्यंत प्रभावी है। यह प्रयोग मात्र 21 दिनों में विवाह के योग बना सकता है। इसे कई साधकों ने किया है और चमत्कारिक परिणाम मिले हैं।

क्या है यह प्रयोग?

यह प्रयोग 21 हल्दी की गांठों पर आधारित है। हल्दी को सुहाग का प्रतीक माना जाता है। माँ पार्वती को पीला रंग अतिप्रिय है। इस प्रयोग में रोज एक हल्दी की गांठ माँ पार्वती को अर्पित की जाती है और 21 दिनों तक विशेष मंत्र का जाप किया जाता है।

शक्तिशाली मंत्र:


पत्नी मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
तारिणीं दुर्गसंसार सागरस्य कुलोध्वाम् ॥


 हे माँ! मुझे मनोहर पत्नी (या पति) प्रदान करो, जो मेरे मन के अनुसार चलने वाली हो, जो इस दुर्गम संसार सागर से पार लगाने वाली हो और कुल को ऊंचा उठाने वाली हो।


पूरी साधना विधि (21 दिन):



21 हल्दी की गांठें (साबुत, बिना पिसी)
पीले फूल (गेंदा या पीले गुलाब)
पीले बेसन के लड्डू (या पीली मिठाई)
पीली चुनरी (एक बार अर्पित करनी है)
पीला आसन
पीले वस्त्र

विधि - चरणबद्ध:

चरण 1: संकल्प (पहले दिन)

सुबह स्नान करके पीले वस्त्र पहनें। पीले आसन पर बैठें। हाथ में जल लेकर संकल्प करें:

"मैं (अपना नाम, गोत्र) शीघ्र विवाह की कामना से 21 दिनों तक यह साधना करूंगा/करूंगी। हे माँ पार्वती! मेरी साधना स्वीकार करें और मुझे योग्य वर/वधू प्रदान करें।"

जल को जमीन पर छोड़ दें।

चरण 2: शिव मंदिर में जाएँ

यह प्रयोग शिव मंदिर में करना सबसे उत्तम है। अगर मंदिर न जा सकें तो घर पर ही शिव-पार्वती की तस्वीर के सामने कर सकते हैं।

चरण 3: 2 माला मंत्र जाप

शिवलिंग या माँ पार्वती की मूर्ति के सामने बैठकर 2 माला (216 बार) इस मंत्र का जाप करें:

"पत्नी मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् । तारिणीं दुर्गसंसार सागरस्य कुलोध्वाम् ॥"

माला घुमाते समय ध्यान रखें - एक माला 108 मंत्र की होती है। दो माला यानी 216 बार।

चरण 4: हल्दी गांठ अर्पित करें

जाप पूरा होने के बाद, एक हल्दी की गांठ माँ पार्वती को अर्पित करें। हल्दी की गांठ को पीले फूल के साथ चढ़ाएँ।

चरण 5: भोग लगाएँ

पीले बेसन के लड्डू या पीली मिठाई का भोग लगाएँ। अगर संभव हो तो पीले फूल भी चढ़ाएँ।

चरण 6: प्रार्थना

हाथ जोड़कर प्रार्थना करें:

"हे माँ पार्वती! हे भोलेनाथ! मेरी यह साधना स्वीकार करो। मुझे शीघ्र ही योग्य वर/वधू प्रदान करो। मेरे विवाह में आ रही सभी बाधाओं को दूर करो।"

 पहले दिन विशेष:

पहले दिन पीली चुनरी जरूर अर्पित करें। यह एक बार ही करना है। पीली चुनरी माँ पार्वती को चढ़ाएँ और प्रार्थना करें कि वे आपको सुहाग की रक्षा का आशीर्वाद दें।

इसी तरह 21 दिन करें:

रोज यही प्रक्रिया दोहराएँ:

· 2 माला मंत्र जाप
· 1 हल्दी गांठ अर्पित
· पीली मिठाई का भोग
· पीले फूल चढ़ाना (रोज नए फूल)

21वें दिन के बाद:

21 दिन की साधना पूरी होने पर, सभी 21 हल्दी की गांठों को इकट्ठा करें। उन्हें किसी बहते पानी (नदी, समुद्र) में प्रवाहित कर दें। ना मिले तो. पीपल के पेड़ पर रख आये पीले कपडे मे बाँधकर 

प्रवाहित करते समय यह प्रार्थना करें:

"हे माँ गंगे! हे माँ पार्वती! ये हल्दी की गांठें आपको अर्पित हैं। मेरी मनोकामना पूर्ण करें। मुझे शीघ्र ही योग्य वर/वधू का साथ मिले।"

कब करें यह साधना?

· समय: सुबह का समय सबसे उत्तम
· दिन: कोई भी दिन शुरू कर सकते हैं, लेकिन सोमवार, शुक्रवार विशेष फलदायी
· नवरात्रि में यह साधना करना सबसे शक्तिशाली होता है

 विशेष सुझाव:

पीले वस्त्र पहनें पूरे 21 दिन (हो सके तो)
पीला आसन का ही प्रयोग करें
सात्विक भोजन करें, प्याज-लहसुन का त्याग करें
ब्रह्मचर्य का पालन करें
सोमवार और शुक्रवार का विशेष महत्व है, इन दिनों और भी श्रद्धा से करें


क्या न करें:

साधना के दिनों में नॉन-वेज न खाएँ
प्याज-लहसुन से परहेज करें
किसी से झगड़ा न करें
नकारात्मक विचार न लाएँ
बीच में साधना न छोड़ें

दोस्तों, इस साधना को करते समय थोड़ा सा होश रखिए। देखिए कि कैसे आपके मन का डर दूर हो रहा है, कैसे आत्मविश्वास बढ़ रहा है। मंत्र जाप करते समय महसूस करें कि माँ पार्वती आपके सामने बैठी हैं, आपकी सुन रही हैं। बस देखते रहिए। साक्षी बने रहिए। जब साक्षी भाव आएगा, तो यह साधना और भी गहरा असर दिखाएगी।



21 दिन की इस साधना के बाद आप खुद महसूस करेंगे कि जीवन में सकारात्मकता आ गई, विवाह की बाधाएँ दूर हो गईं और माँ की कृपा बरसने लगी।

अथ चतुःषष्टि भैरव नामावलिः

अथ चतुःषष्टि भैरव नामावलिः 

64 भैरवों के नामों का अत्यंत शक्तिशाली संग्रह



 मैं आपको एक ऐसा अद्भुत और शक्तिशाली नाम संग्रह बताने जा रहा हूँ जो श्रीरुद्रयामल तंत्र में वर्णित है। यह है चतुःषष्टि भैरव नामावलिः - भगवान भैरव के 64 स्वरूपों के नामों का अद्भुत संकलन।

 क्या है चतुःषष्टि भैरव नामावलि?

भैरव भगवान शिव के ही एक स्वरूप हैं, जो रक्षक, संहारक और तंत्र के अधिपति माने जाते हैं। भैरव के अनेक स्वरूप हैं और इस नामावली में उनके 64 प्रमुख स्वरूपों के नाम दिए गए हैं।

यह नामावली केवल नामों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उन 64 शक्तियों का आह्वान है जो भैरव के विभिन्न रूपों में विद्यमान हैं।

 इस नामावली के अद्भुत लाभ:

सभी भयों से मुक्ति - भैरव भयहरण करने वाले हैं
शत्रु नाश - शत्रुओं का संहार होता है
तंत्र बाधा से रक्षा - नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा
ग्रह बाधा निवारण - कुंडली के दोष दूर होते हैं
आध्यात्मिक उन्नति - साधना में सफलता मिलती है
मोक्ष की प्राप्ति - आध्यात्मिक मुक्ति
धन-समृद्धि में वृद्धि - आर्थिक स्थिति सुधरती है

 यह है संपूर्ण चतुःषष्टि भैरव नामावलि:

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॥ अथ चतुःषष्टिभैरवनामावलिः ॥

असिताङ्गो विशालाक्षो मार्तण्डो मोदकप्रियः ।
स्वच्छन्दो विघ्नसन्तुष्टः खेचरः सचराचरः ॥ १॥

रुरुश्च क्रोड-दंष्ट्रश्च तथैव च जटाधरः ।
विश्वरूपो विरूपाक्षो नानारूपधरः परः ॥ २॥

वज्रहस्तो महाकायश्चण्डश्च प्रलयान्तकः ।
भूमिकम्पो नीलकण्ठो विष्णुश्च कुलपालकः॥ ३॥

मुण्डमालः कामपालः क्रोधो वै पिङ्गलेक्षणः ।
उग्ररूपो धरापालः कुटिलो मन्त्रनायकः ॥ ४॥

रुद्रः पितामहाख्यश्च व्युन्मत्तो बटुनायकः ।
शङ्करो भूत-वेतालस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तकः ॥ ५॥

वरदः पर्वतावासः कपालः शशिभूषणः ।
हस्तिचर्माम्बरधरो योगीशो ब्रह्मराक्षसः ॥ ६॥

सर्वज्ञः सर्वदेवेशः सर्वभूतहृदिस्थितः ।
भीषणाख्यो भयहरः सर्वज्ञाख्यस्तथैव च ॥ ७॥

कालाग्निश्च महारौद्रौ दक्षिणो मुखरोऽस्थिरः ।
संहारश्चातिरिक्ताङ्गो कालाग्निश्च प्रियङ्करः ॥ ८॥

घोरनादो विशालाङ्गो योगीशो दक्षसंस्थितः ।
चतुःषष्टीरूपधृग्देवो भैरवः स सदाऽवतु ॥ ९॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे 
चतुःषष्टिभैरवनामावलिः सम्पूर्णा ॥
```

सरल अर्थ - 64 भैरवों के नाम:

प्रथम श्लोक के 8 नाम:

1. असिताङ्गः - काले शरीर वाले
2. विशालाक्षः - विशाल नेत्रों वाले
3. मार्तण्डः - सूर्य के समान तेजस्वी
4. मोदकप्रियः - मोदक प्रिय (लड्डू पसंद)
5. स्वच्छन्दः - स्वतंत्र विचरण करने वाले
6. विघ्नसन्तुष्टः - विघ्नों से संतुष्ट होने वाले
7. खेचरः - आकाश में विचरण करने वाले
8. सचराचरः - चर-अचर सबमें व्याप्त

द्वितीय श्लोक के 8 नाम:

1. रुरुः - रुरु नामक भैरव
2. क्रोडदंष्ट्रः - विशाल दाढ़ों वाले
3. जटाधरः - जटा धारण करने वाले
4. विश्वरूपः - विश्व रूप धारण करने वाले
5. विरूपाक्षः - विकृत नेत्रों वाले
6. नानारूपधरः - अनेक रूप धारण करने वाले
7. परः - परम श्रेष्

तृतीय श्लोक के 8 नाम:

1. वज्रहस्तः - हाथों में वज्र धारण करने वाले
2. महाकायः - विशाल शरीर वाले
3. चण्डः - उग्र स्वभाव वाले
4. प्रलयान्तकः - प्रलय का अंत करने वाले
5. भूमिकम्पः - भूकंप उत्पन्न करने वाले
6. नीलकण्ठः - नीले कंठ वाले (शिव स्वरूप)
7. विष्णुः - विष्णु स्वरूप
8. कुलपालकः - कुल की रक्षा करने वाले

चतुर्थ श्लोक के 8 नाम:

1. मुण्डमालः - मुण्डों की माला पहनने वाले
2. कामपालः - कामनाओं की पूर्ति करने वाले
3. क्रोधः - क्रोध स्वरूप
4. पिङ्गलेक्षणः - पिंगल नेत्रों वाले
5. उग्ररूपः - उग्र रूप वाले
6. धरापालः - पृथ्वी की रक्षा करने वाले
7. कुटिलः - कुटिल (रहस्यमय) स्वरूप
8. मन्त्रनायकः - मंत्रों के स्वामी

पंचम श्लोक के 8 नाम:

1. रुद्रः - रुद्र स्वरूप
2. पितामहः - ब्रह्मा स्वरूप
3. व्युन्मत्तः - मस्त (उन्मत्त) स्वरूप
4. बटुनायकः - बटुकों के स्वामी
5. शङ्करः - कल्याण करने वाले
6. भूतवेतालः - भूत-प्रेतों के स्वामी
7. त्रिनेत्रः - तीन नेत्रों वाले
8. त्रिपुरान्तकः - त्रिपुर का नाश करने वाले

षष्ठ श्लोक के 8 नाम:

1. वरदः - वरदान देने वाले
2. पर्वतावासः - पर्वतों पर निवास करने वाले
3. कपालः - कपाल धारण करने वाले
4. शशिभूषणः - चन्द्रमा से अलंकृत
5. हस्तिचर्माम्बरधरः - हाथी की खाल पहनने वाले
6. योगीशः - योगियों के स्वामी
7. ब्रह्मराक्षसः - ब्रह्मराक्षस स्वरूप

सप्तम श्लोक के 7 नाम:

1. सर्वज्ञः - सब कुछ जानने वाले
2. सर्वदेवेशः - सभी देवताओं के स्वामी
3. सर्वभूतहृदिस्थितः - सभी प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले
4. भीषणः - भयानक स्वरूप
5. भयहरः - भय का हरण करने वाले
6. सर्वज्ञः (पुनः) - सर्वज्ञ (बल देने के लिए)
7. तथैव च - इसी प्रकार

अष्टम श्लोक के 8 नाम:

1. कालाग्निः - कालाग्नि स्वरूप
2. महारौद्रः - महारौद्र स्वरूप
3. दक्षिणः - दक्षिण मुखी भैरव
4. मुखरः - मुखर (बोलने वाले)
5. अस्थिरः - अस्थिर (गतिशील)
6. संहारः - संहार करने वाले
7. अतिरिक्ताङ्गः - अतिरिक्त अंगों वाले
8. प्रियङ्करः - प्रिय करने वाले
नवम श्लोक के 3 नाम:

1. घोरनादः - भयंकर नाद करने वाले
2. विशालाङ्गः - विशाल अंगों वाले
3. दक्षसंस्थितः - दक्षिण दिशा में स्थित

तथा: चतुःषष्टी रूपधृक् देवः - 64 रूप धारण करने वाले देव
तथा: भैरवः - भैरव

 पूरी साधना विधि:

आसन और वस्त्र:

लाल आसन बिछाएँ (भैरव को लाल रंग प्रिय है)
 लाल वस्त्र पहनें (यदि संभव हो)
 काले वस्त्र भी पहन सकते हैं

समय:

प्रातःकाल - सूर्योदय से पहले
रात्रि - विशेष रूप से रात्रि में भैरव साधना उत्तम
अष्टमी और चतुर्दशी का विशेष महत्व
 मंगलवार और शनिवार - भैरव के दिन
कालरात्रि - दीपावली की रात विशेष

📝 विधि:

चरण 1: स्नान करें - स्वच्छ होकर लाल या काले वस्त्र पहनें

चरण 2: लाल आसन पर बैठें - दक्षिण दिशा की ओर मुख करें

चरण 3: संकल्प लें - हाथ में जल लेकर कहें:
"मैं (अपना नाम, गोत्र) भैरव भगवान की कृपा से सभी भयों से मुक्ति एवं शत्रु नाश हेतु इस चतुःषष्टि भैरव नामावली का पाठ करूंगा/करूंगी।"

चरण 4: भैरव का ध्यान करें - काले रंग, त्रिशूल, डमरू, खड़ग धारण किए, भयंकर दाढ़ों वाले, ज्वालाओं से युक्त भैरव का ध्यान करें

चरण 5: नामावली का पाठ करें - 1, 3, 5, 7 या 11 बार पाठ करें

चरण 6: भोग लगाएँ - लाल फूल, लाल चंदन, लाल मिठाई (बेसन के लड्डू), शराब (यदि तांत्रिक साधना है), उड़द की दाल, तेल का दीपक

चरण 7: आरती करें - भैरव जी की आरती करें

चरण 8: क्षमा प्रार्थना - अंत में क्षमा प्रार्थना करें

दोस्तों, इस नामावली का पाठ करते समय थोड़ा सा होश रखिए। देखिए कि कैसे भैरव की भयंकर शक्ति आपके चारों ओर एक सुरक्षा कवच बना रही है। हर नाम के साथ महसूस करें कि उस विशेष शक्ति का आह्वान हो रहा है।

बस देखते रहिए। साक्षी बने रहिए। जब साक्षी भाव आएगा, तो यह साधना और भी गहरा असर दिखाएगी।

अंतिम बात:

दोस्तों, भैरव भगवान शिव के ही स्वरूप हैं और वे भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं। यह चतुःषष्टि भैरव नामावली उनके 64 स्वरूपों का आह्वान है। इसके नियमित पाठ से जहाँ एक ओर सभी भय दूर होते हैं, वहीं दूसरी ओर शत्रुओं का भी नाश होता है।

यह नामावली उन सभी के लिए वरदान है जो जीवन में सुरक्षा, संरक्षण और सफलता चाहते हैं।


रामायण की चौपाई से मिली बंधे हुए पितृ को मुक्ति

रामायण की चौपाई से मिली बंधे हुए पितृ को मुक्ति

  रियल स्टोरी

दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसी रियल स्टोरी बताने जा रहा हूँ जिसे सुनकर आपको रामायण की चौपाइयों की शक्ति पर विश्वास हो जाएगा। यह कहानी है हमारे फॉलोअर अमन शर्मा की, जो गाजियाबाद के रहने वाले हैं।

🌑 कैसे शुरू हुई समस्या?

अमन बताते हैं कि उनके परिवार में पिछले 10 सालों से लगातार परेशानियाँ चल रही थीं।

व्यापार में घाटा, परिवार में कलह, संतान सुख में बाधा, नौकरी में तरक्की न होना... हर तरफ से घेराव था।

कई ज्योतिषियों को दिखाया, कई उपाय किए, कई बाबाओं के चक्कर लगाए। कोई फायदा नहीं हुआ।

कुछ लोग कहने लगे कि आपके यहाँ कोई बहुत बड़ा तांत्रिक प्रभाव है। कोई बहुत बड़ी बाधा है।

अमन परिवार समेत बहुत परेशान हो चुके थे। पूरा जीवन अंधकारमय हो गया था।

कभी सोचा नहीं था कि जीवन में ऐसे दिन भी देखने होंगे। घर में लड़ाई-झगड़े रोज के हो गए थे।

बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा था। अमन का व्यापार ठप्प पड़ गया था।

लाखों का कर्ज हो गया था। ससुराल वालों से भी अनबन हो गई थी। जिंदगी नरक बन चुकी थी।

🕯️ कैसे मिला सच का पता?

एक दिन अमन जी अपने एक मित्र के साथ बैठे थे। बातों-बातों में उन्होंने अपनी परेशानी बताई।

उनके मित्र ने कहा - "एक बार किसी सच्चे संत से मिलकर देखो।"

अमन जी काशी गए। वहाँ एक संत से मिले। संत ने उनकी कुंडली देखी और बोले -

"बेटा, तुम पर कोई तांत्रिक प्रभाव नहीं है। कोई श्राप नहीं है। कोई ग्रह दोष नहीं है।"

"एक और चीज है - पितृ बंधन। तुम्हारे पितर बंधे हुए हैं। इसलिए वे तुम्हारी सहायता नहीं कर पा रहे।"

अमन जी ने पूछा - "ये पितृ बंधन क्या होता है?"

संत ने समझाया - "पितर बंधन का मतलब है कि तुम्हारे पितर किसी तांत्रिक क्रिया से बंधन में डाल दिए गए हैं।"

"वे तुम्हारे घर में प्रवेश नहीं कर पा रहे। वे तुम्हारी रक्षा नहीं कर पा रहे।"

"इसलिए तुम्हारे जीवन में लगातार बाधाएं आ रही हैं।"

अमन जी चौंक गए। उन्होंने पूछा - "इसका उपाय क्या है?"

संत ने कहा - "इसका उपाय सिर्फ रामायण की चौपाइयों में है।"

📿 वह शक्तिशाली चौपाई जिसने बंधन काटा

संत ने अमन जी को दो अद्भुत चौपाइयाँ बताईं -

पहली चौपाई:

"जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥"

अर्थ - हे भवानी! जिस (राम) के नाम का जप करके ज्ञानी पुरुष इस संसार के बंधनों को काट देते हैं।

दूसरी चौपाई:

"तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥"

अर्थ - उसी प्रभु के दूत (हनुमान) को क्या कोई बांध सकता है? पर प्रभु के कार्य के लिए उन्होंने खुद को बंधवा लिया।

संत ने समझाया - "ये दो चौपाइयाँ बहुत शक्तिशाली हैं। पहली चौपाई बताती है कि राम नाम में हर बंधन काटने की शक्ति है।"

"दूसरी चौपाई बताती है कि हनुमान जी को भी जब प्रभु के कार्य के लिए बंधना पड़ा, तो वे बंध गए।"

"लेकिन वह बंधन भी उनकी मर्जी से था। असली में कोई उन्हें बांध नहीं सकता।"

"इसी तरह तुम्हारे पितर भले ही बंधे हों, लेकिन राम नाम की शक्ति से वे मुक्त हो सकते हैं।"

🚩 रामायण की चौपाई ने बदल दी जिंदगी

संत ने अमन जी को सरल उपाय बताया -

"रोज सुबह स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठो।"

"हनुमान जी का ध्यान करो। फिर इन दोनों चौपाइयों का 108 बार जाप करो।"

"पीले आसन पर बैठो। पीले फूल चढ़ाओ। तिल के तेल का दीपक जलाओ।"

"21 दिन लगातार यह जाप करो। 21 दिन बाद किसी गरीब ब्राह्मण को पीले वस्त्र दान करो।"

अमन जी ने पूरा विश्वास और श्रद्धा से यह उपाय किया।

🌟 क्या हुआ 21 दिन बाद?

अमन जी बताते हैं - "पहले 5-6 दिन कुछ खास असर नहीं लगा। मन में संशय होने लगा।"

"लेकिन 7वें दिन से अजीब सी शांति महसूस होने लगी। घर का माहौल थोड़ा सुधरने लगा।"

"10वें दिन मुझे सपना आया। सपने में मेरे दादा जी मुझसे बोले - बेटा, हम आजाद हो गए।"

"उन्होंने कहा - जासु नाम जपि सुनहु भवानी... इस चौपाई ने हमारे बंधन काट दिए।"

"मैं चौंक कर उठ गया। उस दिन से लगा जैसे घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो गई।"

"21 दिन बाद जैसे मानो घर में नई रोशनी आ गई। व्यापार ठीक होने लगा।"

"घर का कलह खत्म हो गया। आज मैं शांति से हूँ। रामायण की चौपाई ने मेरी जिंदगी बदल दी।"

🙏 अमन जी की सलाह

अमन जी कहते हैं - "जिन्हें भी लगता है कि जीवन में कोई बाधा है, कोई रुकावट है, कोई बंधन है - वे इन चौपाइयों का जाप जरूर करें।"

"पितर बंधन हो या कोई और बंधन - रामायण की चौपाई में वो शक्ति है जो हर बंधन को काट सकती है।"

"जासु नाम जपि सुनहु भवानी... यह चौपाई सिद्ध है। इसे अपनाकर देखो।"

"सिर्फ विश्वास चाहिए। राम का नाम ही सबसे बड़ा तंत्र है। सबसे बड़ा यंत्र है। सबसे बड़ा मंत्र है।"

🔥 अगले भाग में जानेंगे -

पितृ बंधन मुक्ति की संपूर्ण साधना विधि

✅ इन चौपाइयों का जाप कैसे करें
✅ कितने दिन करना है जाप
✅ किस दिन से शुरू करें
✅ कौन सी सामग्री चाहिए
✅ कैसे करें हवन
✅ क्या खास सावधानियाँ हैं
 अगला पार्ट मिस न करे 

Wednesday, February 18, 2026

मानव लिंग शरीर में सुषुम्णा नाड़ी के सहारे 32 पद्मों की स्थिति है।


मानव लिंग शरीर में सुषुम्णा नाड़ी के सहारे 32 पद्मों की स्थिति है।

सबसे नीचे और सबसे ऊपर दो सहस्त्रार पद्म अवस्थित हैं। नीचे अकुल स्थान स्थित अरुण वर्ण का सहस्रार पद्म ऊर्ध्वमुख तथा ऊपर ब्रह्मरन्ध्र स्थित श्वेतवर्ण सहस्रार पद्म अधोमुख है। इनमें से अधःसहस्रार को कुल कुण्डलिनी तथा ऊर्ध्व सहस्रार को अकुल कुण्डलिनी कहा गया है। अकुल कुण्डलिनी प्रकाशात्मक अकार स्वरूपा है।

अकुल शब्द का अर्थ शिव तथा कुल शब्द का अर्थ शक्ति  है। और उसकी व्याख्या में भी यही विषय प्रतिपादित है। किन्तु यहाँ शक्ति को कौलिकी कहा गया है। जिस परम तत्त्व से विविध विचित्रताओं से परिपूर्ण यह सारा जगत उत्पन्न होता है और उसी में लीन भी हो जाता है, वह परम तत्त्व शिव और शक्ति से परे है। उसी परम तत्त्व से अकुल शिव और कुल शक्ति की सृष्टि होती है। इस कौलिकी शक्ति से अकुल शिव कभी अलग नहीं रहता। 

शिव को शाक्त दर्शन में अनुत्तर तत्त्व माना गया है। अनुत्तर शब्द अकार का भी नाम है। यह अकार ऐतरेय आरण्यक (2/3/6) के अनुसार समस्त वाङ्मय का जनक है। भगवद्गीता (10/32) में अपनी उत्कृष्ट विभूतियों का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि अक्षरों में मैं अकार हूँ। इसीलिये अकार को अकुल अक्षर भी कहा जाता है। अनेक ग्रंथों में उद्धृत, किन्तु अद्यावधि अनुपलब्ध ग्रंथ संकेतपद्धति में अकार को प्रकाश और परम शिव का स्वरूप कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि प्रकाशात्मक अकुल शिव अकुल अकार के रूप में अभिव्यक्त होकर इस विविध विचित्रतामय जगत की सृष्टि करता है। महार्थमंजरी की परिमल व्याख्या (पृ. 89) में महेश्वरानंद ने कुल, कौल और अकुल विभाग की चर्चा की है। नित्याषोडशिकार्णव की अर्थरत्नावली टीका के लेखक विद्यानन्द ने अकुल, कुल और कुलाकुल (पृ. 67) तथा अकुल, कुल, कुलाकुल, कौल और शुद्धकौल (पृ. 74) नामक भेदों का उल्लेख किया है। ‘कौल मत’ शब्द के विवरण में इनकी चर्चा की गई है।

कर्म कुशल और अकुशल दो प्रकार के हैं। योगानुकूल कर्म कुशल हैं तथा संसार में बाँधने वाले कर्म अकुशल हैं। धर्मकर्म कुशल हैं, अधर्मकर्म अकुशल हैं – यह भी कहा जा सकता है।

अक्रोध दस यमों में से एक प्रकार है। क्रोध चार प्रकार का कहा गया है – भावलक्षणक्रोध, कर्मलक्षणक्रोध, वैकल्यकर क्रोध तथा उद्‍वेगकर क्रोध। 

भावलक्षण क्रोध में असूया, द्‍वेष, मद, मान, मात्सर्य आदि मानसिक भाव उत्थित होते हैं। 

कर्मलक्षणक्रोध में कलह, वैर, झगड़ा आदि कलहपूर्ण कर्म उत्पन्‍न होते हैं। 

वैकल्यकारक क्रोध में हाथ, पैर आदि अंगों पर प्रहार होने से उनकी क्षति हेती है। 

तथा उद्‍वेगकारक क्रोध में अपनी अथवा शत्रु की प्राणहानि होती है जो उद्‍वेग को जन्म देती है। 

पाशुपत दर्शन में इस चार प्रकार के क्रोध का पूर्णत: निषेध किया गया है। क्रोध को मनुष्य का बहुत बड़ा शत्रु माना गया है। जिसके कारण व्यक्‍ति की हर एक बात तथा हर एक कृत्य निष्फल हो जाते हैं। अतः अक्रोध नामक यम को पाशुपत दर्शन में अवश्य पालनीय माना गया है। (पा. सू. कौ. भा. पृ 25-27)

अक्लिष्टवृत्ति चित्त की वृत्ति (चित्त-सत्त्व का परिणाम) जब अविद्यादि-क्लेशपूर्वक उदित नहीं होती, तब वह अक्लिष्टा कहलाती है। जब कोई वृत्ति क्लेशपूर्वक उदित नहीं होती, तब वह क्लेशमय वृत्ति को उत्पन्न भी नहीं करती, अतः उससे क्लेशमूलक कर्माशय का निर्माण भी नहीं होता। 

यह सत्त्वप्रधान अक्लिष्टवृत्ति अपवर्ग की सहायक होती है।

Tuesday, February 17, 2026

पितृ कैसे रक्षक से भक्षक कैसे बनते है*

*पितृ कैसे रक्षक से भक्षक कैसे बनते है* 

जब किसी व्यक्ति के कुल-पितर किसी तांत्रिक क्रिया द्वारा बंधन में डाल दिए जाते हैं, तो वे न तो स्वयं मुक्त हो पाते हैं और न ही अपने वंशजों की रक्षा कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को स्वप्न में अजीब-अजीब दृश्य दिखाई देते हैं, स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, बार-बार दुर्घटनाएँ होती हैं और घर में अशांति बनी रहती है। जब इन लक्षणों से यह स्पष्ट हो जाए कि कुल-पितर बंधन में हैं, तो सबसे पहले कुल-भैरव का सहयोग लेना चाहिए। कुल-भैरव प्रत्येक बंधन को काटने में सर्वथा समर्थ होते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रत्येक शक्तिपीठ के भैरव वहाँ के रक्षक होते हैं।

इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बिना पूरी जानकारी के पितरों के मंत्रों का जाप न करें, क्योंकि जब पितर बंधन में होते हैं तो उनके साथ कोई नकारात्मक शक्ति भी जुड़ी हो सकती है, जो अधूरे मंत्र-जाप से और अधिक सक्रिय हो जाती है। 

सबसे पहले यह समझना होगा कि पितरों का स्थान कहाँ होता है और उनकी स्थिति क्या होती है।

1. प्रवेश द्वार पर स्थान: पितरों का प्रमुख स्थान घर के प्रवेश द्वार के पास ही होता है। कुलदेवता (कुल की भगवती) और कुल-भैरव के साथ ही कुल के पितर भी वहीं निवास करते हैं।

2. अधिकार क्षेत्र: प्रवेश द्वार पर सर्वप्रथम पितरों का ही अधिकार होता है। घर में होने वाले सभी मांगलिक कार्यों पर पितरों का पूर्ण अधिकार होता है। उन्हीं की कृपा और आशीर्वाद से मांगलिक कार्य सफल होते हैं।

3. विशिष्ट साधक: यदि कुल में कोई बहुत अच्छा और विशिष्ट साधक हो, तो उन्हें भगवती की कृपा से मृत्यु के पश्चात कुल-भैरव का स्थान भी प्राप्त हो सकता है। विशेषकर वे लोग जो तांत्रिक साधना और महाविद्या की कृपा से दिव्य स्थिति प्राप्त कर लेते हैं, वे इस प्रकार के विषयों को सही प्रकार से समझ सकते हैं।

पितर अशुद्ध कैसे होते हैं?

पितरों की अशुद्धि का सीधा संबंध घर के प्रवेश द्वार से है। जब कोई व्यक्ति किसी परिवार को हानि पहुँचाना चाहता है, तो वह सर्वप्रथम प्रवेश द्वार को अशुद्ध करने का प्रयास करता है। यही पितरों की अशुद्धि का मुख्य कारण है।

प्रवेश द्वार का बंधन: जब कोई शत्रु या ईर्ष्यालु व्यक्ति तांत्रिक क्रिया द्वारा किसी परिवार को क्षति पहुँचाना चाहता है, तो उसे सर्वप्रथम उस घर की चौखट (प्रवेश द्वार) का बंधन करना पड़ता है। वह चौखट को अशुद्ध करता है, और जैसे ही प्रवेश द्वार अशुद्ध होता है, 99% पितर उसी क्षण अशुद्ध हो जाते हैं।

अशुद्धि का तात्पर्य: पितरों के अशुद्ध होने का तात्पर्य यह है कि अब वे किसी भी शुभ या मांगलिक कार्य में अपने वंशजों का साथ देने में सक्षम नहीं रहते। उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है और वे स्वयं भी बंधन में जकड़ जाते हैं।

 

Sunday, February 15, 2026

7 ચક્ર

7 चक्र 

(1) मूलाधार चक्र - गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला 'आधार चक्र' है । आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। इसके बिगड़ने से वीरता,धन ,समृधि ,आत्मबल ,शारीरिक बल ,रोजगार ,कर्मशीलता,घाटा,असफलता रक्त एवं हड्डी के रोग ,कमर व पीठ में दर्द ,आत्महत्या के बिचार ,डिप्रेशन ,केंसर अदि होता है।
(2) स्वाधिष्ठान चक्र - इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है । उसकी छ: पंखुरियाँ हैं । इसके बिगड़ने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, नपुंसकता ,बाँझपन ,मंद्बुधिता ,मूत्राशय और गर्भाशय के रोग ,अध्यात्मिक सिद्धी में बाधा बैभव के आनंद में कमी अदि होता है।
(3) मणिपूर चक्र - नाभि में दस दल वाला मणिचूर चक्र है । इसके इसके बिगड़ने पर तृष्णा, ईष्र्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, अधूरी सफलता ,गुस्सा ,चिंचिरापन, नशाखोरी,तनाव ,शंकलुप्रबिती,कई तरह की बिमारिया ,दवावो का काम न करना ,अज्ञात भय ,चहरे का तेज गायब ,धोखाधड़ी,डिप्रेशन,उग्रता ,हिंशा,दुश्मनी ,अपयश ,अपमान ,आलोचना ,बदले की भावना ,एसिडिटी ,ब्लडप्रेशर,शुगर,थाईरायेड,सिरएवं शारीर के दर्द,किडनी ,लीवर ,केलोस्ट्राल,खून का रोग आदि इसके बिगड़ने का मतलब जिंदगी का बिगड़ जाना ।
(4) अनाहत चक्र - हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है । इसके बिगड़ने पर लिप्सा, कपट, तोड़ -फोड़, कुतर्क, चिन्ता,नफरत ,प्रेम में असफलता ,प्यार में धोखा ,अकेलापन ,अपमान, मोह, दम्भ, अपनेपन में कमी ,मन में उदासी , जीवन में बिरानगी ,सबकुछ होते हुए भी बेचनी,छाती में दर्द ,साँस लेने में दिक्कत ,सुख का अभाव,ह्रदय व फेफड़े के रोग,केलोस्ट्राल में बढ़ोतरी अदि ।
(5) विशुद्धख्य चक्र - कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुरियों वाला है। यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है, इसके बिगड़ने पर वाणी दोष ,अभिब्यक्ति में कमी ,गले ,नाक,कान,दात, थाई रायेड,आत्मजागरण में बाधा आती है।
(6) आज्ञाचक्र - भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ '?' उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है । इसके बिगड़ने पर एकाग्रता ,जीने की चाह,निर्णय की सक्ति, मानसिक सक्ति,सफलता की राह आदि इसके बिगड़ने मतलब सबकुछ बिगड़ जाने का खतरा ।
(7) सहस्रार चक्र - सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है । शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।इसके बिगड़ने पर मानसिक बीमारी, अध्यात्मिकता का आभाव ,भाग्य का साथ न देना आदि ।