Monday, February 2, 2026

नक्षत्र-आधारित-साधना

नक्षत्र-आधारित-साधना

 केवल भैरव-काली प्रधान क्रम (श्मशान / वाम-कौल)” 
यह आन्तरिक-भाव, साक्षी-स्थिति और मौन-स्मरण पर आधारित है—कोई बाह्य/जोखिमपूर्ण क्रिया नहीं।

प्रधानता: काली = बंधन-भक्षण | भैरव = सीमा-भेदन
रीति: जप-संख्या नहीं, लय; वाणी न्यून, दृष्टि स्थिर
रक्षा: गोपनीयता; अनुभव साझा न करें
सील: 27वें दिन के बाद नवीन प्रयोग न करें

दिन 1–9 : काली-प्रधान (अहं-मृत्यु)
उद्देश्य: भय, स्मृति, आसक्ति का क्षय---

1. अश्विनी — प्रारम्भिक छेदन
भाव: निर्भय साक्षी | स्मरण: क्रीं (मौन)

2. भरणी — सहन-शक्ति
भाव: धारण | स्मरण: क्रीं–हूं (लय)

3. कृत्तिका — अग्नि-शुद्धि
भाव: त्याग | स्मरण: क्रीं

4. रोहिणी — आकर्षण-भंग
भाव: असक्ति-त्याग | स्मरण: ह्रीं

5. मृगशिरा — चंचल-मन-विलय
भाव: स्थिरता | स्मरण: क्रीं

6. आर्द्रा — रुद्र-क्षोभ
भाव: स्वीकृति | स्मरण: हूं

7. पुनर्वसु — पुनर्जन्म-बोध
भाव: आशा-त्याग | स्मरण: ह्रीं

8. पुष्य — पोषण-संहार
भाव: वैराग्य | स्मरण: क्रीं

9. आश्लेषा — बंधन-छेदन
भाव: मुक्त-संकल्प | स्मरण: हूं
संकेत: भय-स्वप्न/हृदय-कंपन आए—रोकें नहीं; साक्षी रहें।

दिन 10–18 : भैरव-प्रधान (सीमा-भेदन)
उद्देश्य: नियम-आसक्ति का क्षय, दृष्टि-तीक्ष्णता----

10. मघा — पितृ-सीमा-विलय
भाव: निर्लेपता | स्मरण: हूं

11. पूर्व फाल्गुनी — भोग-संयम
भाव: मर्यादा | स्मरण: हूं

12. उत्तर फाल्गुनी — धर्म-परीक्षा
भाव: सत्य-साक्षी | स्मरण: हूं

13. हस्त — कर्म-भेदन
भाव: दक्ष साक्षी | स्मरण: हूं

14. चित्रा — रूप-विलय
भाव: निराकार | स्मरण: हूं

15. स्वाती — वायु-स्वातंत्र्य
भाव: निर्भरता-त्याग | स्मरण: हूं

16. विशाखा — लक्ष्य-भेदन
भाव: एकनिष्ठ | स्मरण: हूं

17. अनुराधा — निष्ठा-स्थैर्य
भाव: समर्पण | स्मरण: हूं

18. ज्येष्ठा — वरिष्ठ-संयम
भाव: प्रभुत्व-त्याग | स्मरण: हूं
संकेत: एकान्त-प्रियता, मृत्यु-विचार से निर्भयता—सामान्य है।

 दिन 19–24 : काली-भैरव संयुक्त (मूल-उत्खनन)
उद्देश्य: सूक्ष्म-बंधन का समूल क्षय---

19. मूल — मूलाधार-स्थैर्य
भाव: निर्भय-स्थिर | स्मरण: हूं

20. पूर्वाषाढ़ा — संकल्प-उत्क्रमण
भाव: दृढ़ता | स्मरण: क्रीं

21. उत्तराषाढ़ा — धर्म-स्थिरता
भाव: संतुलन | स्मरण: हूं

22. श्रवण — श्रुति-मौन
भाव: सुनना (नाद) | स्मरण: हूं

23. धनिष्ठा — ताल-लय
भाव: अनुशासन | स्मरण: हूं

24. शतभिषा — गूढ़-रक्षा
भाव: गोपन | स्मरण: क्ष्रौं (अल्प)

 दिन 25–27 : सील-खण्ड (उग्र से शान्त)
उद्देश्य: उग्रता का शमन, सिद्धि-स्थैर्य------

25. पूर्व भाद्रपद — उग्र-तप
भाव: सहन-शक्ति | स्मरण: क्रीं

26. उत्तर भाद्रपद — शान्त-समाधि
भाव: शीतलता | स्मरण: ह्रीं

27. रेवती — द्वार-बन्धन (सील)
भाव: कृतार्थता | स्मरण: गं (अल्प)
(तीन पंक्तियाँ/दिन)
आज कौन-सा बंधन ढीला हुआ
देह/श्वास/दृष्टि का संकेत
साक्षी-स्थिति (स्थिर/डगमग)

संतुलन-संकेत--
यदि अत्यधिक भय/अनिद्रा बढ़े—
26वें दिन का शान्त-भाव (ह्रीं) बढ़ाएँ, 1–2 दिन उग्रता विराम दें।

प्राणायुताक्षर महामंत्र

प्राणायुताक्षर महामंत्र:


आदिनाथ ने इसका वर्णन गुह्यकाली खंड (कामकला काली)। में (आगम संहिता/ महाकाल संहिता) में शिवाशिव संवाद के रूप में किया है। जो वर्णन ग्रंथ में किया गया है हम वैसा ही यहां उल्लेख कर रहे है। कामकलाकाली रहस्य विज्ञान पूर्व में पोस्ट किया जा चुका है। यहां सिर्फ प्राणायुताक्षर मंत्र महिमा रहस्य का वर्णन ग्रंथ अनुसार किया जा रहा है। वर्णन में काल भेद हो सकता है क्यू के जो बाते भूतकाल और भविष्य की कही गई है (पुराण आदि और कल्प आदि का वर्णन) वह शिवा अपने वर्तमान में भगवान विष्णु , महेश से कहती है। इस लिए भ्रमित न हो बस श्रवण करे। 
प्राणायुताक्षर मंत्र रहस्य :–
दश हजार अक्षर वाले मन्त्र की उत्पत्ति:- महाकाल ने कहा- हे देवि! तुमने मुझसे कामकला काली के अयुताक्षर मन्त्र को पूछा है। उसे मैने तुमको नहीं बतलाया इसमें कुछ कारण है, उसको आदर के साथ सुनो। इस पृथ्वीतल पर इससे बढ़कर उग्र कोई दूसरा मन्त्र नहीं है। इसका ज्ञाता जापक (कंठस्थ जापक) स्मर्त्ता साधक उद्धारक उपदेशक प्रष्टा और ग्रहणेच्छु (भी कोई) नहीं है। हे वरानने। छहों आम्नायों में जो मन्त्र कहे गये हैं वे सब उसी प्रकार हैं जैसे समस्त नदियों के पानी समुद्र में (समाहित) रहते हैं। पहले तुम उत्साह के साथ अयुताक्षरी विद्या की उत्पत्ति सुनो । हे प्रिये ! इसके बाद उग्र से भी उग्रतर मन्त्र को सुनना ॥
ऋष्यन्तर नामक कल्प में मैंने और नारायण ने सृष्टि के आदि में त्रिपुरारि को प्रसन्न किया। हे वरानने। हमारी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्होंने हम दोनों को त्रैलोक्याकर्षण कवच का उपदेश दिया (इस कवच का वर्णन हमने पूर्व में किया है)। इस मन्त्र का विधान ध्यान पूजा आदि की शिक्षा लेकर हम दोनों ने गुरु ( त्रिपुरारि) से आज्ञा प्राप्त की। शीघ्र ही आपस में परामर्श कर महत्तर मन्त्रराज की सिद्धि की इच्छा से एकान्त समझ कर उसको प्रसन्न और प्रत्यक्ष करने की इच्छा से हम दोनों उत्तम पुष्करद्वीप चले गये। वहाँ हम दोनों ने दिव्य सौ वर्षों तक रात-दिन घोर तपस्या की। इसके बाद प्रसन्न होकर भगवती आकर हमारे सामने खड़ी हो गयी हे प्रिये । महाभयङ्कर आकार वाली उस देवी को हम लोग (अपनी आँखों से) देखने में समर्थ नहीं हुए इसलिये आँख बन्द कर शिर झुका कर एक क्षण के लिये खड़े हो गये । हम लोगों को डरा हुआ जानकर अम्बा ने सौम्य रूप धारण किया । उसके बाद आँखों को खोलकर हम दोनों उसके पैरों पर गिर पड़े। उस जगत्धात्री ने दोनों हाथों से हमें उठाकर कहा- तुम दोनों वर माँगो। भक्ति से नम्र कन्धर वाले हम दोनों ने हाथ जोड़कर शिवा से कहा- हे देवि! तुम्हारे ही द्वारा हम दोनों संसार के संहारक एवं स्थितिकारक बनाये गये। आपकी कृपा से युद्ध में शत्रुओं के पराजय प्राप्त कर हम दोनों देवाधिपत्य प्राप्त कर इच्छानुसार कर्म करते हुए विहरण कर रहे हैं। ब्रह्मा को हम दोनों तिनके के बराबर समझते हैं और अन्य लोगों को वरदान देते है। आपकी कृपा से हम दोनों के लिये कुछ भी शेष नहीं है ॥ तुम हम दोनों की देवता हो। हम दोनों शेष देवताओं के देवता है। वे देवतागण ब्राह्मणों के देव है और ब्राह्मणलोग शेष (ब्राह्मणेतर) लोगों के देवता है। यदि आप हमदोनों को वर देना चाहती हैं तो हम दोनों को एक वर दीजिये । हे जगदम्बिके! आपकी सौम्य और उग्र मूर्तियों के कितने भेद हैं उनको मन्त्रों के सहित हम दोनों जानना चाहते हैं। हे धरा की ईश्वरि! हे चण्डिके! आपकी एक मूर्त्ति की उपासना होने पर उन सबकी उपासना हो जाती है उसी प्रकार हम दोनों की (एक मूर्ति की उपासना होने पर हमारी भी समस्त मूर्तियों की उपासना हो जाती है)। हम दोनों के वाक्य को सुनकर शिवा ने मुस्कुरा कर कहा 
- हे सुरेश्वरद्वय! इस धरती तल पर मेरी सौम्य और उम्र मूर्तियों का अन्त नहीं है। उसी प्रकार उन (मूर्तियों) के मन्त्रभेदों की सङ्ख्या भी नहीं है। आगम आदि तथा पुराणों में जो कोई शिवशक्तियाँ सुनी या देखी जाती हैं वे सब मेरी ही मूर्तियाँ है। देवताओं के द्वारा भव (शिव) को देखने के लिये कुछ मूर्तियों का निर्माण चित्स्वरूपा मैंने ही किया है। राक्षस दानव दैत्य को मारने के लिये भयानक तथा परशिव को मोह में डालने के लिये सौम्य मूर्तियों को मैने ही बनाया। इन मूर्तियों की अनुकृति अन्य मूर्तियाँ भी बनायी गयीं। सौन्दर्य से भरी करोड़ों सौम्यमूर्तियों में जो प्रसिद्ध मेरी मूर्ति है जिसका नाम त्रिपुरसुन्दरी है वह सबके मध्य में अन्तिम सीमा है (अर्थात् उससे बढ़कर कोई मूर्ति नहीं है)
मेरी आठ करोड़ मूर्तियाँ उग्र एवं अवन्ध्य हैं। घोर घोरतर आकार की ये मूर्तियाँ देखी नहीं जा सकती। चामुण्डा भैरवी भीमा गुह्यकाली दक्षिणाकाली छिन्नमस्ता एकजटा कालसङ्कर्षिणी श्मशानकाली कोरङ्गी भद्रकाली कुब्जिका उम्रचण्डा प्रचण्डा चण्डोया चण्डनायिका चण्डा चण्डवती चण्डचण्डा चण्डी चण्डिका बाभ्रवी शिवदूती कात्यायनी अर्धमस्तका तथा अन्य पचपन मुख्य कालियाँ जो समस्त आगमों में कही गयी हैं मेरी उन प्रसिद्ध घोर मूर्तियों में कामकला काली के समान उग्र मूर्ति त्रिलोक में नहीं है। मेरी उग्र मूर्तियों में यह (कामकला काली) अन्तिम सीमा है ॥हे सुरेश्वरद्वय ! मेरी जितनी सौम्य और उग्र मूर्तियाँ हैं उन सबके ध्यान मन्त्रऔर पूजा (पृथक् पृथक्) हैं। शिव को छोड़कर इस संसार में उनका कोई दूसरा ज्ञाता नहीं है। ऐसा जानकर ही उन (शिव) ने छह आम्नायों का प्रवर्तन किया। उन सर्वज्ञ (शिव) ने सबको तत्त्वतः जानकर तत्तत् मन्त्र ध्यान भेद न्यास पूजा विधि को बतलाया । उत्तर ऊर्ध्व अधः पश्चिम पूर्व और दक्षिण नाम वाले छह आम्नाय शिव के मुख से ही निकले हैं। यामल डामर तन्त्र संहितायें उसके मध्यवर्ती है। देवता ऋषि सिद्ध असुर दैत्य दानव गुह्यक अप्सरायें किन्नर उरग राक्षस चन्द्रवंशी सूर्यवंशी राजा एवं अन्य लोग जो कि प्रत्यक्षवादी है। वे सब तत्तत् कार्य आदि की सिद्धि के लिये उस-उस मूर्ति की उपासना करते हैं ॥युगों के शेष कलियुग के क्षीण होने पर अल्पायु आलसी निरुत्साह दरिद्र भक्तिहीन कुमार्गगामी मनुष्य इनके उपासक नहीं होंगे तब इन मूर्तियों का ध्यान मन्त्र आदि लुप्त हो जायगा। भिन्न-भिन्न आम्नायों से सम्बद्ध उन सौम्य और उग्र मूर्तियों का अन्धकार और प्रकाश की भाँति एक स्थान और एक काल में अवस्थान नहीं होगा। इस प्रकार एक की उपासना होने पर उन सबकी उपासना कैसे होगी यह मुझे महा दुर्घट लग रहा है। किन्तु दश हजार अक्षरों वाला एक मेरा महामन्त्र है। छह आम्नायों में स्थित प्रायः समस्त मन्त्र उसमें है ॥उसमें सौम्य और उग्र मूर्तियों के नाम तथा भेद है। तीनों लोकों में इससे बढ़ कर मन्त्र कहीं भी नहीं है। महामहा उग्रतर एवं समस्त सिद्धियों का एकमात्र साधक यह मन्त्र तथा त्रैलोक्याकर्षण कवच दोनों मेरी दृष्टि में समान हैं। जिस प्रकार नदी का समस्त जलसमूह समुद्र में प्रविष्ट हो जाता है उसी प्रकार छहों आम्नायों में स्थित मन्त्र इस (एक मन्त्र) में प्रविष्ट है। जिस प्रकार पर्वतों में सुमेरु, नदियों में गङ्गा, तीर्थों में काशी, शस्त्रों में वज्र, यज्ञों में अश्वमेध, तपस्याओं में उपवास, बलवानों में वायु, गायों में कामधेनु, देवताओं में शिव और देवियों में मैं हूँ उसी प्रकार मन्त्रों में यह अयुताक्षर (मन्त्र सर्वोपरि है। इस मन्त्र के द्वारा मेरे आराधित होने पर निश्चित रूप से षडाम्नाय की समस्त शक्तियाँ आराधित हो जाती है।
यदि तुम दोनों मेरी तथा सौम्य और उग्र उन देवताओं की आराधना करना चाहते हो तो इस अयुताक्षर मालामन्त्र के विषय में प्रयत्न करो। जिस प्रकार हाथी के पैर में सभी के पैर समाहित हो जाते हैं किन्तु हाथी का पैर किसी के पैर में समाहित नहीं होता उसी प्रकार हे सुरोत्तमद्वयः समस्त मन्त्र इस मन्त्र में प्रविष्ट हो जाते हैं किन्तु अनेक प्रकार से भी यह मन्त्र किसी में भी प्रविष्ट नहीं हो सकता । आगमशास्त्र में जितने भी बीज कूट उपकूट उद्धृत हैं वे सब इसमें उसी प्रकार स्थित हैं जैसे मेरे अन्दर त्रिभुवन। जब किसी को छह आम्नायों को उपदेश हो जाता है तब वह इसका अधिकारी होता है नहीं तो इस मन्त्र (के उपदेश) की योग्यता नहीं रखता। इस मन्त्र की महिमा को मैं जानता हूँ अथवा शिव जानते हैं। गुरु के उपदेश से ज्ञात इस मन्त्र वाले पुरुष के समक्ष मैं निरन्तर रहती हूँ। उसकी वशवर्तिनी हो जाती हूँ। जिस प्रकार रस्सी से आकाशचारी पक्षी को लोग पास में खींच लेते हैं। वैसे ही साधक इस मन्त्र के द्वारा मुझे आकृष्ट कर लेते हैं। इस प्रकार जो आप दोनों ने मुझसे पूछा उसे मैंने संक्षेप में बतला दिया विस्तार से श्रवण  करने की शक्ति तुम में नहीं है ॥
महाकाल ने कहा-देवी के पूरे वाक्य को सुनने के बाद हम दोनों ने फिर कहा- हे देवि ! यदि तुम हमारे ऊपर प्रसन्न हो तो स्वयं उपदेश करो। ऐसा कहने पर प्रसन्नमुख देवी ने हम दोनों से कहा कि हे देवद्वय! मन्त्र बोलती हुई मेरे पीछे-पीछे मन्त्र बोलो। देवी के इस वचन को सुनकर हम दोनों ने वैसा ही किया। इस प्रकार देवी ने हम दोनों को उपदेश देकर एक क्षण में अन्तर्हित हो गयी। इस प्रकार हम दोनों ने इस अयुताक्षर मन्त्र को प्राप्त किया। (आराधना से सन्तुष्ट) विष्णु ने इसे नारद और सनक को दिया। हे पार्वति ! दुर्वासा कश्यप दत्तात्रेय और कपिल ये चार इस मन्त्र के सन्दर्भ में मेरे शिष्य माने गये हैं। इन्होंने अपने बहुत से शिष्य प्रशिष्य बनाये ॥ इस प्रकार परम्पराप्राप्त यह अयुताक्षर मालामन्त्र इस लोक में मृत्युञ्जयप्राण नाम से प्रतिष्ठित हुआ। इस प्रकार इस मन्त्र की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है। जहाँ देवी ने ऐसा कहा वहाँ दूसरे की क्या बात । शाम्भव आदि कूट तार आदि बीजसमूह सबके सब उसी में स्थित हैं जैसे कि ब्रह्म में तीनों लोक। जिस प्रकार मकड़ी तन्तु को उगलती और निगलती है उसी प्रकार यह मन्त्र स्थावर जगमात्मक विश्व की सृष्टि और संहार करता है। बिना देवी की कृपा और गुरु के अनुग्रह के यह मन्त्र करोड़ हजार लाख जन्म में भी नहीं प्राप्त हो सकता। हे प्रिये! मन्त्र का ग्रहणेच्छु योगी साधक पहले इस अध्याय को पढ़कर मृत्युञ्जयप्राण का धीरे-धीरे स्पष्ट उच्चारण करे । सम्पूर्ण मन्त्र को समाप्त कर पृथ्वी पर दण्ड के समान नत होकर मृत्युञ्जयप्राण के दाता गुरु को (यह पाठ) अर्पित कर दे। अथवा गुरु जिससे सन्तुष्ट हो वह करे ॥ इस प्रकार श्रीमद् आदिनाथविरचित पचास हजार श्लोकों वाली महाकाल-संहिता के कामकलाकाली खण्ड के अयुताक्षरमन्त्रप्रशंसाकथन नाम 309/494 चतुर्दश पटल की ' हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण हुई।
प्राणायुताक्षर मंत्र :–
 ओं ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं हूं छ्रीं स्त्रीं फ्रें क्रों हौं क्षौं आं स्फ्रों स्वाहा कामकलाकालि, ह्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं क्रीं ठः ठः दक्षिणकालिके ऐं क्रीं ह्रीं हूं स्त्रीं फ्रें स्त्रीं छ्रीं ख्फ्रें भद्रकालि हूं हूं फट् फट् नमः स्वाहा ओं ह्रीं ह्रीं हूं हूं भगवति श्मशानकालि नरकंकालमालाधारिणि ह्रीं क्रीं कुणपभोजिनि फ्रें फ्रें स्वाहा श्मशानकालि, क्रीं हूं ह्रीं स्त्रीं श्रीं क्लीं फट् स्वाहा कालकालि ओं फ्रें सिद्धिकरालि ह्रीं छ्रीं हूं स्त्रीं फ्रें नमः स्वाहा गुह्यकालि, ओं ओं हूं ह्रीं फ्रें छ्रीं स्त्रीं श्रीं क्रों नमो धनकाल्यै विकरालरूपिणि धनं देहि देहि दापय दापय क्षं क्षां क्षिं क्षीं क्षुं क्षूं क्षॄं क्षॄं क्षें झैं क्षों क्षौं क्षः क्रों क्रोः आं ह्रीं ह्रीं हूं हूं नमो नमः फट् स्वाहा धनकालिके, ओं ऐं क्लीं ह्रीं हूं सिद्धिकाल्यै नमः सिद्धिकालि ह्रीं चण्डाट्टहासिनि जगद्ग्रसनकारिणि नरमुण्डमालिनि चण्डकालिके क्लीं श्रीं हूं फ्रें स्त्रीं छ्रीं फट् फट् स्वाहा चण्डकालिके, नमः कमलवासिन्यै स्वाहा महालक्ष्मि ओं श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः महालक्ष्मि, ह्रीं नमो भगवति माहेश्वरि अन्नपूर्णे स्वाहा अन्नपूर्णे, ओं ह्रीं हूं उत्तिष्ठपुरूषि किं स्वपिषिभयं मे समुपस्थितं यदि शक्यमशक्यं वा क्रोधदुर्गे भगवति शमय स्वाहा हूं ह्रीं ओं वनदुर्गे, ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोरघोरतरतनुरूपे चट चट प्रचट प्रचट कह कह रम रम बन्ध बन्ध घातय घातय हूं फट्, विजयाघोरे । ह्रीं पद्मावति स्वाहा पद्मावति, महिषमर्दिनि स्वाहा महिषमर्दिनि, ओं दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा जयदुर्गे ओं ह्रीं दुं दुर्गायै स्वाहा । ऐं ह्रीं श्रीं ओं नमो भगवति मातङ्गेश्वरि सर्वस्त्रीपुरुषवशंकरि सर्वदुष्टमृगवशंकरि सर्वग्रहवशंकरि सर्वसत्त्ववशंकरि सर्वजनमनोहरि सर्वमुखरञ्जिनि सर्वराजवशंकरि सर्वलोकममुं मे वशमानय स्वाहा । राजमातङ्गि उच्छिष्टमातङ्गिनि हूं ह्रीं ओं क्लीं स्वाहा उच्छिष्टमातङ्गि उच्छिष्टचाण्डालिनि सुमुखि देविमहापिशाचिनि ह्रीं ठः ठः ठः उच्छिष्टचाण्डालिनि, ओं ह्लीं ओं बगलामुखि सर्वदुष्टानां मुखं वाचं स्तम्भय जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं नाशय ह्लीं ओं स्वाहा बगले, ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं धनलक्ष्मि ओं ह्रीं ऐं ह्रीं ओं सरस्वत्यै नमः सरस्वति, आं ह्रीं हूं भुवनेश्वरि ओं ह्रीं श्रीं हूं क्लीं आं अश्वारूढायै फट् फट् स्वाहा अश्वारूढे, ओं ऐं ह्रीं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ऐं ह्रीं स्वाहा नित्यक्लिन्ने । स्त्रीं क्षमकलह्रहसव्य्रूं (बालाकूट) ( बगलाकूट ) ( त्वरिताकूट ) जयभैरवि श्रीं ह्रीं ऐं ब्लूं ग्लौः अं आं इं राजदेवि राजलक्ष्मि ग्लं ग्लां ग्लिं ग्लीं ग्लुं ग्लूं ग्लृं ग्लॄं ग्लॄं ग्लें ग्लैं ग्लों ग्लौं ग्लः क्लीं भ्रीं ध्रीं ऐं ह्रीं क्लीं पौं राजराजेश्वरि ज्वल ज्वल शूलिनि दुष्टग्रहं ग्रस स्वाहा शूलिनि, ह्रीं महाचण्डयोगेश्वरि ध्रीं थ्रीं ण्रीं फट् फट् फट् फट् फट् जय महाचण्डयोगेश्वरि, श्रीं ह्रीं क्लीं प्लूं ऐं ह्रीं क्लीं पौं क्षीं क्लीं सिद्धिलक्ष्म्यै नमः क्लीं पौं ह्रीं ऐं राज्यसिद्धिलक्ष्मि ओं क्रः हूं आं क्रों स्त्रीं हूं क्षौं ह्रां फट् ( त्वरिता कूट) ( नक्षत्रकूट) सकह्रलम क्षखव्रूं (ग्रहकूट) म्लकह्रक्षरस्त्रीं (काम्यकूट) यम्लव्रीं (पार्श्वकूट) ( कामकूट) ग्लक्षकमह्नव्य्रऊं ह्रह्लव्य्रकऊं मफ्रलहलहखफ्रूं म्लव्य्रवऊं (शंखकूट ) म्लक्षकसहह्रूं क्षम्लब्रसहस्हक्षक्लस्त्रीं रक्षलह्रमसहकब्रूं (मत्स्यकूट ) ( त्रिशूलकूट) झसखग्रमऊं ह्रक्ष्मलीं हीं ह्रीं हूं क्लीं स्त्रीं ऐं क्रौं छ्रीं फ्रें क्रीं ग्लक्षकमह्रव्य्रऊं हूं अघोरे सिद्धिं में देहि दापय स्वाहा अघोरे । ओं नमश्चामुण्डे करङ्किणि करङ्कमालाधारिणि किं किं विलम्बसे भगवति शुष्काननि खं खं अन्त्रकरावनद्धे भो भो वल्ग वल्ग कृष्णभुजङ्गवेष्टित तनुलम्बकपाले ह्रष्ट ह्रष्ट हट्ट हट्ट पत पत पताकाहस्ते ज्वल ज्वल ज्वालामुखि अनलनख खट्वांगधारिणि हा हा चट्ट चट्ट हूं हूं अट्टाट्टहासिनि उड्डु उड्डु वेतालमुखि अकि अकि स्फुलिङ्गपिङ्गलाक्षि चल चल चालय चालय करङ्कमालिनि नमोऽस्तु ते स्वाहा विश्वलक्ष्मि, ओं ह्रीं क्ष्रीं द्रीं शीं क्रीं हूं फट् यन्त्रप्रमथिनि ख्फ्रें ल्रीं ज्रीं क्रीं ओं ह्रीं फ्रें चण्डयोगेश्वरि कालि फ्रें नमः चण्डयोगेश्वरि ह्रीं हूं फट् महाचण्डभैरवि ह्रीं हूं फट् स्वाहा महाचण्डभैरवि, ऐं ह्रीं क्लीं फ्रें ऐं ह्रीं श्रीं त्रैलोक्यविजयायै नमः स्वाहा त्रैलोक्यविजये, ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हौं जयलक्ष्मि युद्धे मे विजयं देहि हौं आं क्रों फट् फट् फट् स्वाहा जय लक्ष्मि, ( अतिचण्ड बीज ) महाप्रचण्ड भैरवि हूं फ्रों (टकारयुक्त अतिचण्ड बीज ) फ्रटं हम्लब्रीं बफ्रटं ब्रकम्लब्लक्लऊं रफ्रटं महामन्त्रेश्वरि ओं ह्रीं श्रीं क्लीं हौं हूं वज्रप्रस्तारिणि ठः ठः वज्रप्रस्तारिणि, ओं ह्रीं नमः परमभीषणे हूं हूं नरकङ्कालमालिनि फ्रें फ्रें कात्यायनि व्याघ्रचर्मावृतकटि क्रीं क्रीं श्मशानचारिणि नृत्त्य नृत्त्य गाय गाय हस हस हूं हूंकारनादिनि क्रों क्रों शववाहिनि मां रक्ष रक्ष फट् फट् हूं हूं नमः स्वाहा कात्यायनि । ऐं ह्रीं श्रीं षैं सैं फैं रैं स्हौः षां मीं थूं ह्रां ह्रीं हूं ( योगिनी कूटौ ) हसखफ्रें शिवशक्तिसमरसचण्ड कापालेश्वरि हूं नमश्चण्डकापालेश्वरि, ऐं क्रीं क्लीं पौं सखक्लक्ष्मध्रयब्लीं क्लीं भ्रीं ध्रीं क्लीं भ्रीं ध्रीं महासुवर्णकूटेश्वरि कमलक्षसहब्लूं श्रीं ह्रीं ऐं नमः स्वाहा सुवर्णकूटेश्वरि, ऐं ह्रीं श्रीं आं ग्लीं ईं आं अं नमो भगवति वार्तालि वार्तालि वाराहि वाराहि वराहमुखि ऐं ग्लूं अन्धे अन्धिनि नमः रुन्धे रुन्धिनि नमः जम्भे जम्भिनि नमः मोहे मोहिनि नमः स्तम्भे स्तम्भिनि नमः सर्वदुष्टे प्रदुष्टानां सर्ववाक् चित्तचक्षुः श्रोत्र मुखगति जिह्वा स्तम्भं कुरु कुरु शीघ्रं वशं कुरु कुरु ऐं क्रीं श्रीं ठः ठः ठः ठः ठः ओं ऐं हूं फट् ठः ठः ओं ग्लूं ह्रीं वार्तालि वाराहि ह्रीं ग्लूं ओं चण्डवार्तालि ऐं ह्रीं श्रीं आं ग्लूं ईं वार्तालि वार्तालि वाराहि वाराहि शत्रून् दह दह ग्रस ग्रस ईं आं ग्लूं हुं फट् जय वार्तालि, ऐं ह्रीं श्रीं (महाबीज ) स्हौः ॐ ह्रीं हूं फ्रें राज्यप्रदे ख्फ्रें हसख्फ्रें उग्रचण्डे रणमर्दिनि हूं फ्रें छ्रीं स्त्रीं सदा रक्ष रक्ष त्वं रूपं मां रूपं च जूं सः मृत्युहरे नमः स्वाहा अः, उग्रचण्डे ऐं ( योगिनीकूट) हसखफ्रें हसखफ्रीं औं ह्रीं हसफ्रेंहूं फ्रें उग्रचण्डे (चण्डेश्वर महाप्रेत बीजे ) स्वाहा श्मशानोग्रचण्डे ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रीं (अमृतकूट) खफ्रीं हसखफ्रीं रुद्रचण्डायै रह्रीं नमः स्वाहा रुद्रचण्डे । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ( फेत्कारी कूट वामनेत्र विभूषित ) चण्डकूटे ख्फ्रें ग्लक्षकमह्नव्य्रीं प्रचण्डायै नमः स्वाहा प्रचण्डे, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रें ह्रीं (संधिकूट) चण्डनायिकायै नमः त्रूं नमः स्वाहा चण्डनायिके, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रें हसखफ्रूं (चण्डेश्वरकूट ईकार बिन्दु युक्त महाप्रेत बीज ) क्लीं नमः स्वाहा चण्डे महादेवि ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रीं चण्डवत्यै क्ष्म्लूं नमः स्वाहा चण्डवति, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रें क्षम्लकस्हरयब्रूं ख्फ्रीं (अतिप्रेत ) अतिचण्डायै नमः ग्लूं नमः स्वाहा अतिचण्डे ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रें ( श्मशानकूट ) ख्फ्रीं ( महाप्रेत ) चण्डिकायै द्रैं नमः स्वाहा चण्डिके, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रें स्हफ्रीं क्लीं हूं क्लह्रीं कात्यायन्यै ख्फ्रें कामदायिन्यै हूं नमः स्वाहा ज्वालाकात्यायनि, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं क्लीं हूं श्रीं हभ्रीं महिषमर्दिनि श्रीं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं उन्मत्तमहिष मर्दिनि ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं (नक्षत्रकूट शंखकूट) महामहेश्वरि तुम्बुरेश्वरि स्वाहा तुम्बुरेश्वरि, ओं ह्रीं क्लीं हूं ग्लूं आं ऐं हूं स्हौ फ्रें चैतन्यभैरवि फ्रें फ्रें स्हौं क्रों आं ऐं ग्लूं हूं क्लीं ह्रीं ओं फट् ठः ठः चैतन्यभैरवि, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं मुण्डमधुमत्यै शक्ति भूतिन्यै ह्रीं ह्रीं ह्रीं फट् मधुमति । वदवद वाग्वादिनि स्हौं: क्लिन्नक्लेदिनि महाक्षोभं कुरु स्हौः वाग्वादिनि, भैरवि ह्रीं फ्रें ख्फ्रें क्लीं पूर्णेश्वरि सर्वकामान् पूरय ओं फट् स्वाहा पूर्णेश्वरि, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं रक्तरक्ते महारक्त चामुण्डेश्वरि अवतर अवतर स्वाहा रक्तचामुण्डेश्वरि माहेशि, ओं ह्रीं श्रीं त्रिपुरावागीश्वर्यै नमः त्रिपुरावागीश्वरि हसें ( मारकूट) (महाप्रेत बीज) कालभैरवि ( निशाकूट कूर्चकूट तुङ्गप्रतुङ्गकूट ) चण्डवारुणि, ओं अघोरे हा हा घोरे, घोरघोरतरे हूं सर्वर्शशर्वे ह्रें नमस्ते रुद्ररूपे हः हः ओं घोरे ह्रीं श्रीं क्रों क्लू ऐं क्रौं छ्रीं फ्रें क्रीं ख्फ्रें हूं अघोरे सिद्धिं मे देहि दापय स्वाहा क्ष्रूं अघोरे, ओं ह्रीं फ्रें हूं महादिग्वीरे ( महादिगम्बरि ) ऐं श्रीं क्लीं आं मुक्तकेशि चण्डाट्टहासिनि छ्रीं स्त्रीं क्रीं ग्लौं मुण्डमालिनि ओं स्वाहा दिगम्बरि । आं ऐं ह्रीं कामकलाकालेश्वरि सर्वमुखस्तम्भिनि सर्वजनमनोहरि सर्वजन वशंकरि सर्वदुष्टनिमर्दिनि सर्वस्त्रीपुरुषाकर्षिणि छिन्धि शृङ्खलां त्रोटय त्रोटय सर्वशत्रून् जम्भय जम्भय र्द्विषान् निर्दलय निर्दलय सर्वान् स्तम्भय स्तम्भय मोहनास्त्रेण द्वेषिणः उच्चाटय उच्चाटय सर्ववश्यं कुरु कुरु स्वाहा देहि देहि सर्वं कालरात्र्यै कामिन्यै गणेश्वर्यै नमः कालरात्रि । ओं ऐं आं ईं णं ईं ऐह्येहि भगवति किरातेश्वरि विपिन कुसुमावतंसिनिकर्णे भुजगनिर्मोककञ्चुकिनि ह्रीं ह्रीं ह्रं ह्रं कह कह ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल सर्वसिद्धिं दद दद देहि देहि दापय दापय सर्वशत्रून् दह दह बन्ध बन्ध पठ पठ पच पच मथ मथ विध्वंसय विध्वंसय हूं हूं हूं फट् नमः स्वाहा किरातेश्वरि, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं वज्रकुब्जिके हसखफ्रीं प्राणेशि त्रैलोक्याकर्षिणि ह्रीं क्लीं अङ्गद्राविणि स्मराङ्गने अनघे महाक्षोभकारिणि ऐं क्लीं ग्लौः ग्लं ग्लां ग्लिं ग्लीं ग्लुं ग्लूं ग्लृं ग्लॄं ग्ललॄं ग्लें ग्लैं ग्लों ग्लौं ग्लः ग्लौः ग्लौं वज्रकुब्जिके नमो भगवति घोरे महेश्वरि हसखफ्रीं देवि श्रीकुब्जिके रह्रीं स्य्रीं स्य्रूं ङञणनम अघोरामुखि छां छीं छूं किलि किलि विच्चे पादुकां पूजयामि नमः समयकुब्जिके, ओं ऐं ह्रीं क्लीं फ्रें हसफ्रीं हसखफ्रें क्षह्रम्लव्य्रीं भगवति विच्चे घोरे हसखफ्रें ऐं श्री कुब्जिके रह्रीं रह्रूं स्हौं ड्ञणनम अघोरामुखि छां छीं छूं किलि किलि विच्चे स्त्रीं हूं स्हौः पादुकां पूजयामि नमः स्वाहा मोक्षकुब्जिके, नमो भगवति सिद्धे महेशानि हसफ्रां हसफ्रीं हसफ्रूं कुब्जिके रह्रां रह्रीं रहूं खगे ऐ अघोरे अघोरामुखि किलि किलि विच्चे पादुकां पूजयामि नमः भोगकुब्जिके, ऐं ह्रीं श्रीं हसखफ्रें श्य्रों श्य्रों भगवत्यम्ब ( प्राभातिककूट सकारादि युक्त प्राभातिककूट) कुब्जिकायै हसकलक्रीं यां ग्लौं ठौं ऐं क्रूं ङञणनम अघोरामुखि छां छीं छूं किलि किलि विच्चे म्रों श्रीं हसखफ्रें श्रीं ह्रीं ऐं जयकुब्जिके, ऐं ह्रीं श्रीं सहसखफ्रीं स्हौं भगवत्यम्ब ( प्राभातिककूट सकारादि युक्त प्राभातिककूट ईकारयुक्त) कुब्जिके ( बालाकूट) (ईकारयुक्त बालाकूट ) ( बालाकूट ऊकारयुक्त ) ङञणनम अघोरामुखि छां छीं किलि किलि विच्चे फट् स्वाहा हूं फट् स्वाहा नमः ऐं ऐं ऐं सिद्धिकुब्जिके, ऐं ह्रीं श्रीं हसखफ्रीं स्हौः म्लक्षकसहह्रूं सम्लक्षक सहह्रूं स्रह्रफ्रीं ( षष्ठ स्वर विहीनं तु कलाबीजेन भूषितम्। एतद् बीजं सभाभाष्य) कुब्जिके ह्रीं ह्रीं आगच्छ आगच्छ आवेशय आवेशय वेधय वेधय ह्रीं ह्रीं सम्लक्षकसहह्रूं म्लक्षकसहह्रूं नमः स्वाहा आवेशकुब्जिके (महेन्द्रकूट ) हसखफ्रें (पित्सकूट) (मार्जार मणि ऋषि सारङ्ग कूटानि ) ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं कालि कालि महाकालि मांसशोणितभोजिनि ह्रां ह्रीं ह्रूं रक्तकृष्णमुखि देवि मां मां पश्यन्तु शत्रवः श्री हृदयशिवदूति श्री पादुकां पूजयामि ह्रां हृदयाय नमः हृदय शिवदूति ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं नमो भगवति दुष्टचाण्डालिनि रुधिरमांसभक्षणि कपालखट्वाङ्गधारिणि हन हन दह दह पच पच मम शत्रून् ग्रस ग्रस मारय मारय हूं हूं हूं फट् स्वाहा शिरः शिवदूति श्री पादुकां पूजयामि ह्रीं शिरसे स्वाहा शिरः शिवदूति । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रां हसखफ्रीं हसखफ्रूं महापिङ्गलजटाभारे विकटरसनाकराले सर्वसिद्धिं देहि देहि दापय दापय शिखाशिवदूति श्रीपादुकां पूजयामि हूं शिखायै वषट् शिखाशिवदूति । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं महाश्मशानवासिनि घोराट्टहासिनि विकटतुङ्गकोकामुखि ह्रीं क्लीं श्रीं महापातालतुलितोदरि भूतवेताल सहचारिणि अनघे कवचशिवदूति श्रीपादुकां पूजयामि कवचाय हूं कवचशिवदूति । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं लेलिहानरसनाभयानके विस्रस्तचिकुरभारभासुरे चामुण्डाभैरवी डाकिनी गणपरिवृते फ्रें ख्फ्रें हूं आगच्छ आगच्छ सान्निध्यं कल्पय कल्पय त्रैलोक्यडामरे महापिशाचिनि नेत्रशिवदूति श्रीपादुकां पूजयामि नेत्रत्रयाय वौषट् नेत्रशिवदूति । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं गुह्यातिगुह्यकुब्जके हूं हूं हूं फट् मम सर्वोपद्रवान् मन्त्रतन्त्रईलि (ति) यन्त्र चूर्णप्रयोगादिकान् परकृतान् करिष्यन्ति तान् सर्वान् हन हन मथ मथ मर्दय मर्दय दंष्ट्राकरालि फ्रें हूं फट् गुह्यातिगुह्य कुब्जिके अस्त्रशिवदूति श्रीपादुकां पूजयामि अस्त्राय फट् अस्त्रशिवदूति । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हूं हूं हूं हूं हूंकारघोरनादविद्राविद्राविजगत्त्रये ह्रीं ह्रीं ह्रीं प्रसारितायुतभुजे महावेग प्रधाविते क्लीं क्लीं क्लीं पदविन्यासत्रासितसकलपाताले श्रीं श्रीं श्रीं व्यापकशिवदूति जितेन्द्रिये परमशिवपर्यङ्कशायिनि छ्रीं छ्रीं छ्रीं गलद् रुधिरमुण्डमाला धारिणि घोरघोरतररूपिणि फ्रें फ्रें फ्रें ज्वालामालि पिङ्गजटाजूटे अचिन्त्यमहिमबल प्रभावे स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं दैत्यदानवनिकृन्तनि सकलसुरासुरकार्यसाधिके ओं ओं ओं फट् नमः स्वाहा व्यापकशिवदूति । ओं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं क्रों ह्रीं आं हूं ( महापुरुष ) हौं ग्लूं क्रौं हसखफ्रें फ्रों क्रूं छ्रीं फ्रें क्लौं ब्लौं क्लूं स्हौः स्फ्रें ख्रौं जूं ब्रीं कालसंकर्षिणि हूं हूं स्वाहा कालसंकर्षिणि ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हसखफ्रें हूं हूं कुक्कुटि क्रीं आं क्रों फ्रें फ्रों फट् फट् स्वाहा कुक्कुटि ओं ह्रीं क्लीं स्त्रीं फ्रें भ्रमराम्बिके शत्रुमर्दिनि आं क्रों हौं हूं छ्रीं फट् फट् नमः स्वाहा ओं भ्रमराम्बिके, फ्रों धनदे ह्रीं सां सीं सूं संकटादेवि संकटेभ्यो मां तारय तारय श्रीं क्लीं हौं हूं आं फट् स्वाहा संकटादेवि, ओं क्रो हौं भोगवति ॐ ह्रीं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं षं सं हं क्षं षः सः हः क्षः हूं नमोः भगवति महार्णवेश्वरि, त्रैलोक्यग्रसनशीले आं ईं ऊं फट् स्वाहा महार्णवेश्वरि आं क्षीं पीं चूं भगवति घूं जूं (प्रभातकूट) म्लक्षक सहह्रूं चण्डझङ्कारकापालिनि जयकङ्केश्वरि ठः ठः जयकङ्केश्वरि, ओं ह्रीं आं शवरेश्वर्यै नमः शवरेश्वरि । ॐ ऐं आं ह्रीं श्रीं क्लीं हूं फ्रें ख्फ्रें हसखफ्रें पिङ्गले पिङ्गले महापिङ्गले क्रीं हूं फ्रें छ्रीं स्हौः क्रीं क्रों फ्रें स्त्रीं श्रीं फ्रों ब्लौं ब्रीं ठः ठः सिद्धिलक्ष्मि, ओं ऐं ह्रीं क्लीं भगवति महामोहिनि ब्रह्मविष्णु शिवादिसकलसुरासुर मोहिनिसकलं जनं मोहय मोहय वशीकुरु वशीकुरू कामाङ्गद्राविणि कामाङ्कशे स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ओं महामोहिनी, ऐं क्लीं यं क्ष्स्त्रीं हं हां हिं हीं हुं हूं हृं हॄं ह्लृं हें हैं हों हौं हः ह्रीं हसकहलह्रीं सकलह्रीं त्रिपुरसुन्दरि, हूं नमो मूकाम्बिकायै वादिनी मूकय मूकय आं क्लीं ह्रीं स्हें स्हः सौः स्वाहा मूकाम्बिके, ह्रीं क्रौं हूं फट् एकजटे ह्रीं क्रौं हूं नीलसरस्वति, ओं ह्रीं क्रों वीं फट् उग्रतारे, ओं श्रीं ह्रीं ऐं वज्रवैरोचनीये वीं वीं फट् ठः ठः छिन्नमस्ते, ओं नमो भगवत्यै पीताम्बरायै ह्रीं ह्रीं सुमुखि बगले विश्वं मे वशं कुरु कुरु ठः ठः वश्य बगले, हूं रक्ष त्रिकण्टकि, ओं क्रों क्लीं श्रीं क्र: आं स्त्रीं हूं जयदुर्गे रक्ष रक्ष स्वाहा संग्रामजयदुर्गे ह्रीं क्लीं हूं विजयप्रदे । ओं ऐं हौं ग्लूं क्रौं ब्रीं फट् ब्रह्माणि, ओं हौं ग्लूं आं ह्रीं श्रीं वीं माहेश्वरि, व्रीं ब्लौं क्लौं फ्रें क्लूं क्रीं फ्रों जूं ग्लूं स्हौः हूं हूं फट् फट् स्वाहा माहेश्वरि, ह्रीं ऐं क्लीं औं कौमारि मयूरवाहिनि शक्तिहस्ते हूं फ्रें स्त्रीं फट् फट् स्वाहा कौमारि । ओं नमो नारायण्यै जगस्थितिकारिण्यै क्लीं क्लीं क्लीं श्रीं श्रीं श्रीं आं जूं ठः ठः वैष्णवि । ओं नमो भगवत्यै वराहरूपिण्यै चतुर्दशभुवनाधिपायै भूपतित्वं मे देहि दापय स्वाहा वाराहि, ओं आं क्रों हूं जूं ह्रीं क्लीं स्त्री क्षूं क्षौं फ्रों जू फ्रें जिह्वासटाघोररूपे दंष्ट्राकराले नारसिंहि हौं हौं हौं हूं हूं हूं फट् फट् स्वाहा नारसिंह, ओं क्लीं श्रीं हूं इन्द्राणि ह्रीं ह्रीं जय जय क्षौं क्षौं फट् फट् स्वाहा इन्द्राणि, ओं क्रों क्रीं फ्रें फ्रों छ्रीं ख्रौं णीं हसखफ्रें ब्लौं जूं क्लूं ह्रीं व्रीं क्षूं क्रौं चामुण्डे ज्वल ज्वल हिलि हिलि किलि किलि मम शत्रून् त्रासय त्रासय मारय मारय हन हन पच पच भक्षय भक्षय क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं फट् फट् ठः ठः चामुण्डे, ओं नमः कामेश्वरि कामाङ्कुशे कामप्रदायिके भगवति नीलपताके भगान्तिके महेश्वरि क्लूं नमोऽस्तु ते परमगुह्ये वीं वीं वीं हूं हूं हूं मदने मदनान्तदेहे त्रैलोक्यमावेशय हूं फट् स्वाहा नीलपताके, क्रीं क्रीं हूं हूं हूं हूं क्रों क्रों क्रों श्रीं श्रीं ह्रीं ह्रीं छ्रीं फ्रें स्त्रीं चण्डघण्टे शत्रून् स्तम्भय स्तम्भय मारय मारय हूं फट् स्वाहा चण्डघण्टे । (पद्यार्थः द्विरुक्तं भजत इति विचारणीयम्।) ओं ह्रीं श्रीं हूं क्रों क्रीं स्त्रीं क्लीं स्हजहलक्षम्लवनऊं ( उमाकूट) लक्षमह्रजरक्रव्य्रऊं हस्लक्षकमह्रव्रूं म्लकह्रक्षरस्त्रै चण्डेश्वरि ख्रौं छ्रीं फ्रें क्रौं हूं हूं फट् फट् स्वाहा चण्डेश्वरि, ओं ऐं आं ह्रीं हूं क्रों क्षौं क्रीं क्रौं फ्रें अनङ्गमाले स्त्रियमाकर्षयाकर्षय त्रुट त्रुट छेदय छेदय हूं हूं फट् फट् स्वाहा अनङ्गमाले, ओं ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं क्रीं आं क्रों फ्रों हूं क्षूं हसखफ्रें फ्रें हरसिद्धे सर्वसिद्धिं कुरु कुरु देहि देहि दापय दापय हूं हूं हूं फट् फट् स्वाहा हरसिद्धे, ओं क्रों क्रौं हसखफ्रें हूं छ्रीं फेत्कारि दद दद देहि देहि दापय दापय स्वाहा फेत्कारि, ऐं श्रीं आं हौं हूं स्फ्रों स्हौः फ्रें छ्रीं स्त्रीं ठ्रीं ध्रीं प्रीं थ्रीं क्रां ओं लवणेश्वरि, क्रः छ्रीं हूं स्त्रीं फ्रें नाकुलि ओं ऐं आं

महाविद्या तारा

महाविद्या तारा


सर्वविघ्नों का नाश करने वाली ‘महाविद्या तारा’, स्वयं भगवान शिव को अपना स्तन दुग्ध पान कराकर हलाहल की पीड़ा से मुक्त करने वाली है।

देवी महा-काली ने हयग्रीव नमक दैत्य के वध हेतु नीला वर्ण धारण किया तथा उनका वह उग्र स्वरूप उग्र तारा के नाम से विख्यात हुआ। ये देवी या शक्ति, प्रकाश बिंदु के रूप में आकाश के तारे के समन विद्यमान हैं, फलस्वरूप देवी तारा नाम से विख्यात हैं। शक्ति का यह स्वरूप सर्वदा मोक्ष प्रदान करने वाली तथा अपने भक्तों को समस्त प्रकार के घोर संकटों से मुक्ति प्रदान करने वाली हैं। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध ‘मुक्ति’ से हैं, फिर वह जीवन और मरण रूपी चक्र हो या अन्य किसी प्रकार के संकट मुक्ति हेतु

भगवान शिव द्वारा, समुद्र मंथन के समय हलाहल विष का पान करने पर, उनके शारीरिक पीड़ा (जलन) के निवारण हेतु, इन्हीं ‘देवी तारा’ ने माता के स्वरूप में शिव जी को अपना अमृतमय दुग्ध स्तन पान कराया था। जिसके कारण भगवान शिव को समस्त प्रकार के शारीरिक पीड़ा से मुक्ति मिली, देवी, जगत-जननी माता के रूप में और घोर से घोर संकटों कि मुक्ति हेतु प्रसिद्ध हुई। देवी तारा के भैरव, हलाहल विष का पान करने वाले अक्षोभ्य शिव हुए, जिनको उन्होंने अपना दुग्ध स्तन पान कराया। जिस प्रकार इन महा शक्ति ने, भगवान शिव के शारीरिक कष्ट का निवारण किया, वैसे ही देवी अपने उपासकों के घोर कष्टों और संकट का निवारण करने में समर्थ हैं तथा करती हैं।

मुख्यतः देवी की आराधना-साधना मोक्ष प्राप्त करने हेतु, वीरा-चार या तांत्रिक पद्धति से की जाती हैं, परन्तु भक्ति भाव युक्त सधाना ही सर्वोत्तम हैं, देवी, के परम भक्त बामा खेपा ने यह सिद्ध भी किया।

संपूर्ण ब्रह्माण्ड में जो भी ज्ञान इधर उधर फैला हुआ हैं, उनके एकत्रित होने पर इन्हीं देवी के रूप का निर्माण होता हैं तथा वह समस्त ज्ञान इन्हीं देवी का मूल स्वरूप ही हैं, कारणवश इनका एक नाम नील-सरस्वती भी हैं।

देवी का निवास स्थान घोर महा-श्मशान हैं, जहाँ सर्वदा चिता जलती रहती हो तथा ज्वलंत चिता के ऊपर, देवी नग्न अवस्था या बाघाम्बर पहन कर खड़ी हैं। देवी, नर खप्परों तथा हड्डियों के मालाओं से अलंकृत हैं तथा सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करती हैं। तीन नेत्रों वाली देवी उग्र तारा स्वरूप से अत्यंत ही भयानक प्रतीत होती हैं।

प्रथम ‘उग्र तारा’, अपने उग्र तथा भयानक रूप हेतु जानी जाती हैं। देवी का यह स्वरूप अत्यंत उग्र तथा भयानक हैं, ज्वलंत चिता के ऊपर, शव रूपी शिव या चेतना हीन शिव के ऊपर, देवी प्रत्यालीढ़ मुद्रा में खड़ी हैं। देवी उग्र तारा, तमो गुण सम्पन्न हैं तथा अपने साधकों-भक्तों के कठिन से कठिन परिस्थितियों में पथ प्रदर्शित तथा छुटकारा पाने में सहायता करती हैं।

द्वितीय ‘नील सरस्वती, इस स्वरूप में देवी संपूर्ण ब्रह्माण्ड के समस्त ज्ञान कि ज्ञाता हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जो भी ज्ञान इधर-उधर बिखरा हुआ पड़ा हैं, उन सब को एकत्रित करने पर जिस ज्ञान की उत्पत्ति होती हैं, वे ये देवी नील सरस्वती ही हैं। इस स्वरूप में देवी राजसिक या रजो गुण सम्पन्न हैं। देवी परम ज्ञानी हैं, अपने असाधारण ज्ञान के परिणाम स्वरूप, ज्वलंत चिता के शव को शिव स्वरूप में परिवर्तित करने में समर्थ हैं।

एकजटा, यह देवी का तीसरे स्वरूप या नाम हैं, पिंगल जटा जुट वाली यह देवी सत्व गुण सम्पन्न हैं तथा अपने भक्त को मोक्ष प्रदान करती हैं मोक्ष दात्री हैं। ज्वलंत चिता में सर्वप्रथम देवी, उग्र तारा के रूप में खड़ी हैं, द्वितीय नील सरस्वती, शव को जीवित कर शिव बनाने में सक्षम हैं तथा तीसरे स्वरूप में देवी एकजटा जीवित शिव को अपने पिंगल जटा में धारण करती हैं या मोक्ष प्रदान करती हैं। देवी अपने भक्तों को मृत्युपरांत, अपनी जटाओं में विराजित अक्षोभ्य शिव के साथ स्थान प्रदान करती हैं या कहे तो मोक्ष प्रदान करती हैं।

देवी अन्य आठ स्वरूपों में ‘अष्ट तारा’ समूह का निर्माण करती है तथा विख्यात हैं,

१. तारा२. उग्र तारा३. महोग्र तारा४. वज्र तारा५. नील तारा६. सरस्वती७. कामेश्वरी८. भद्र काली-चामुंडा

सभी स्वरूप गुण तथा स्वभाव से भिन्न-भिन्न है तथा भक्तों की समस्त प्रकार के मनोकामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ, सक्षम हैं।

देवी उग्र तारा के स्वरूप वर्णन का वर्णन।

देवी तारा, प्रत्यालीढ़ मुद्रा (जैसे की एक वीर योद्धा, अपने दाहिने पैर आगे किये युद्ध लड़ने हेतु उद्धत हो) धारण कर, शव या चेतना रहित शिव के ऊपर पर आरूढ़ हैं। देवी के मस्तक पंच कपालों से सुसज्जित हैं, नव-यौवन संपन्न हैं, नील कमल के समान तीन नेत्रों से युक्त, उन्नत स्तन मंडल और नूतन मेघ के समान कांति वाली हैं। विकट दन्त पंक्ति तथा घोर अट्टहास करने के कारण देवी का स्वरूप अत्यंत उग्र प्रतीत होता हैं। देवी का स्वरूप बहुत डरावना और भयंकर हैं तथा वास्तविक रूप से देवी, चिता के ऊपर जल रही शव पर आरूढ़ हैं तथा इन्होंने अपना बायाँ पैर शव रूपी शिव के छाती पर रखा हैं। देवी घोर नील वर्ण की हैं, महा-शंख (मानव कपाल) की माला धारण किये हुए हैं, वह छोटे कद की हैं तथा कही-कही देवी अपनी लज्जा निवारण हेतु बाघाम्बर भी धारण करती हैं। देवी के आभूषण तथा पवित्र यज्ञोपवीत सर्प हैं, साथ ही रुद्राक्ष तथा हड्डियों की बानी हुई आभूषणों को धारण करती हैं। वह अपनी छोटी लपलपाती हुई जीभ मुंह से बाहर निकले हुए तथा अपने विकराल दन्त पंक्तियों से दबाये हुए हैं। देवी के शरीर से सर्प लिपटे हुए हैं, सिर के बाल चारों ओर उलझे-बिखरे हुए भयंकर प्रतीत होते हैं। देवी चार हाथों से युक्त हैं तथा नील कमल, खप्पर (मानव खोपड़ी से निर्मित कटोरी), कैंची और तलवार धारण करती हैं। देवी, ऐसे स्थान पर निवास करती हैं जहाँ सर्वदा ही चिता जलती रहती हैं तथा हड्डियाँ, खोपड़ी इत्यादि इधर-उधर बिखरी पड़ी हुई होती हैं, सियार, गीदड़, कुत्ते इत्यादि हिंसक जीव इनके चारों ओर देखे जाते हैं।

देवी तारा के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा।

स्वतंत्र तंत्र के अनुसार, देवी तारा की उत्पत्ति मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में, चोलना नदी के तट पर हुई। हयग्रीव नाम के दैत्य के वध हेतु देवी महा-काली ने ही, नील वर्ण धारण किया था। महाकाल संहिता के अनुसार, चैत्र शुक्ल अष्टमी तिथि में ‘देवी तारा’ प्रकट हुई थीं, इस कारण यह तिथि तारा-अष्टमी कहलाती हैं, चैत्र शुक्ल नवमी की रात्रि तारा-रात्रि कहलाती हैं।

एक और देवी तारा के उत्पत्ति संदर्भ कथा ‘तारा-रहस्य नमक तंत्र’ ग्रन्थ से प्राप्त होता हैं; जो भगवान विष्णु के अवतार, श्री राम द्वारा लंका-पति दानव राज दशानन रावण का वध के समय से हैं।

सर्वप्रथम स्वर्ग-लोक के रत्नद्वीप में वैदिक कल्पोक्त तथ्यों तथा वाक्यों को देवी काली के मुख से सुनकर, शिव जी अपनी पत्नी पर बहुत प्रसन्न हुए। शिव जी ने महाकाली से पूछा, आदि काल में अपने भयंकर मुख वाले रावण का विनाश किया, तब आश्चर्य से युक्त आप का वह स्वरूप ‘तारा’ नाम से विख्यात हुआ। उस समय, समस्त देवताओं ने आप की स्तुति की थी तथा आप अपने हाथों में खड़ग, नर मुंड, वार तथा अभय मुद्रा धारण की हुई थी, मुख से चंचल जिह्वा बहार कर आप भयंकर रुपवाली प्रतीत हो रही थी। आप का वह विकराल रूप देख सभी देवता भय से आतुर हो काँप रहे थे, आपके विकराल भयंकर रुद्र रूप को देखकर, उन्हें शांत करने के निमित्त ब्रह्मा जी आप के पास गए थे। समस्त देवताओं को ब्रह्मा जी के साथ देखकर देवी, लज्जित हो आप खड़ग से लज्जा निवारण की चेष्टा करने लगी। रावण वध के समय आप अपने रुद्र रूप के कारण नग्न हो गई थी तथा स्वयं ब्रह्मा जी ने आपकी लज्जा निवारण हेतु, आपको व्याघ्र चर्म प्रदान किया था। इसी रूप में देवी ‘लम्बोदरी’ के नाम से विख्यात हुई। तारा-रहस्य तंत्र के अनुसार, भगवान राम केवल निमित्त मात्र ही थे, वास्तव में भगवान राम की विध्वंसक शक्ति देवी तारा ही थी, जिन्होंने लंका पति रावण का वध किया।

देवी तारा से सम्बंधित अन्य तथ्य।

सर्वप्रथम वशिष्ठ मुनि ने देवी तारा कि आराधना की थी, परिणाम स्वरूप देवी ’वशिष्ठाराधिता’ के नाम से भी जानी जाती हैं। सर्वप्रथम मुनि-राज ने देवी तारा की उपासना वैदिक पद्धति से कि, परन्तु वे देवी की कृपा प्राप्त करने में सफल नहीं हो सके। अलौकिक शक्तियों से उन्हें ज्ञात हुआ की देवी की आराधना का क्रम चीन देश में रहने वाले भगवान बुद्ध को ज्ञात हैं, वे उन के पास जाये तथा साधना का सही क्रम, पद्धति जानकर देवी तारा की उपासना करें। तदनंतर वशिष्ठ मुनि ने चीन देश की यात्रा की तथा भगवान बुद्ध से आराधना का सही क्रम ज्ञात किया, जिसे चिनाचार पद्धति, वीर साधना या आगमोक्ता पद्धति (तंत्र) कहा गया। भगवान बुद्ध के आदेश अनुसार उन्होंने चिनाचार पद्धति से देवी की आराधना की तथा देवी कृपा लाभ करने में सफल हुए। (बंगाल प्रान्त के बीरभूम जिले में वह स्थान आज भी विद्यमान हैं, जहाँ मुनिराज ने देवी की आराधना की थी, जिसे जगत-जननी तारा माता के सिद्ध पीठ ‘तारा पीठ’ के नाम से जाना जाता हैं।)

‘तारा’ नाम के रहस्य से ज्ञात होता हैं, ये तारने वाली हैं, मोक्ष प्रदाता हैं। जीवन तथा मृत्यु के चक्र से तारने हेतु, यह नाम ‘तारा’ देवी के नाम-रहस्य को उजागर करता हैं। महाविद्याओं में देवी दूसरे स्थान पर विद्यमान हैं तथा देवी अपने भक्तों को ‘वाक्-शक्ति’ प्रदान करने तथा भयंकर विपत्तिओ से अपने भक्तों की रक्षा करने में समर्थ हैं। शत्रु नाश, भोग तथा मोक्ष, वाक् शक्ति प्राप्ति हेतु देवी कि साधना विशेष लाभकारी सिद्ध होती हैं। सामान्यतः तंत्रोक्त पद्धति से साधना करने पर ही देवी की कृपा प्राप्त की जा सकती हैं।

देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध श्मशान भूमि से हैं, जो उनका निवास स्थान हैं। साथ ही श्मशान से सम्बंधित समस्त वस्तुओं-तत्वों जैसे मृत देह, हड्डी, चिता, चिता-भस्म, भूत, प्रेत, कंकाल, खोपड़ी, उल्लू, कुत्ता, लोमड़ी इत्यादि से देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। गुण तथा स्वभाव से देवी तारा, महा-काली से युक्त हैं।

देवी उग्र तारा, अपने भक्तों के जीवन में व्याप्त हर कठिन परिस्थितियों से रक्षा करती हैं। देवी के साधक नाना प्रकार के सिद्धियों के युक्त होते हैं, गद्ध-पद्ध-मयी वाणी साधक के मुख का कभी परित्याग नहीं करती हैं, त्रिलोक मोहन, सुवक्ता, विद्याधर, समस्त जगत को क्षुब्ध तथा हल-चल पैदा करने में साधक पूर्णतः समर्थ होता हैं। कुबेर के धन के समान धनवान, निश्चल भाव से लक्ष्मी वास तथा काव्य-आगम आदि शास्त्रों में शुक देव तथा देवगुरु बृहस्पति के तुल्य हो जाते हैं, मूर्ख हो या जड़ वह बृहस्पति के समान हो जाता हैं। साधक ब्रह्म-वेत्ता होने का सामर्थ्य रखता हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव के की साम्यता को प्राप्त कर, समस्त पाशों से मुक्त हो ब्रह्मरूप मोक्ष पद को प्राप्त करते हैं। पशु भय वाले इस संसार से मुक्ति लाभ करता हैं या अष्ट पाशों (घृणा, लज्जा, भय, शंका, जुगुप्सा, कुल, शील तथा जाति) में बंधे हुए पशु आचरण से मुक्त हो, मोक्ष (तारिणी पद) को प्राप्त करने में समर्थ होता हैं।

देवी काली तथा तारा में समानतायें।

देवी काली ही, नील वर्ण धारण करने के कारण ‘तारा’ नाम से जानी जाती हैं तथा दोनों का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। जैसे दोनों शिव रूपी शव पर प्रत्यालीढ़ मुद्रा धारण किये हुए आरूढ़ हैं, अंतर केवल देवी काली शव रूपी शिव पर आरूढ़ हैं तथा देवी तारा जलती हुई चिता पर आरूढ़ हैं। दोनो। दोनों का निवास स्थान श्मशान भूमि हैं, दोनों देवियों की जिह्वा मुंह से बाहर हैं तथा भयंकर दन्त-पंक्ति से दबाये हुए हैं, दोनों रक्त प्रिया हैं, भयानक तथा डरावने स्वरूप वाली हैं, भूत-प्रेतों से सम्बंधित हैं, दोनों देवियों का वर्ण गहरे रंग का हैं एक गहरे काले वर्ण की हैं तथा दूसरी गहरे नील वर्ण की। दोनों देवियाँ नग्न विचरण करने वाली हैं, कही-कही देवी काली कटे हुई हाथों की करधनी धारण करती हैं, नर मुंडो की माला धारण करती हैं वही देवी तारा व्यग्र चर्म धारण करती हैं तथा नर खप्परों की माला धारण करती हैं। दोनों की साधना तंत्रानुसार पंच-मकार विधि से की जाती हैं, सामान्यतः दोनों एक ही हैं इनमें बहुत काम भिन्नताएं दिखते हैं। दोनों देवियों का वर्णन शास्त्रानुसार शिव पत्नी के रूप में किया गया हैं तथा दोनों के नाम भी एक जैसे ही हैं जैसे, हर-वल्लभा, हर-प्रिया, हर-पत्नी इत्यादि, ‘हर’ भगवान शिव का एक नाम हैं। परन्तु देवी तारा ने, भगवान शिव को बालक रूप में परिवर्तित कर, अपना स्तन दुग्ध पान कराया था। समुद्र मंथन के समय कालकूट विष का पान करने के परिणाम स्वरूप, भगवान शिव के शरीर में जलन होने लगी तथा वे तड़पने लगे, देवी ने उन के शारीरिक कष्ट को शांत करने हेतु अपने अमृतमय स्तन दुग्ध पान कराया। देवी काली के सामान ही देवी तारा का सम्बन्ध निम्न तत्वों से हैं।

श्मशान वासिनी :तामसिक, विध्वंसक प्रवृत्ति से सम्बंधित रखने वाले देवी देवता मुख्यतः श्मशान भूमि में वास करते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से श्मशान वह स्थान हैं, जहाँ शव के दाह का कार्य होता हैं। परन्तु आध्यात्मिक या दार्शनिक दृष्टि से श्मशान का अभिप्राय कुछ और ही हैं, यह वह स्थान हैं जहाँ ‘पंच या पञ्च महाभूत’ या देह में विद्यमान स्थूल तत्त्व, चिद्-ब्रह्म में विलीन होते हैं। आकाश, पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि इन महा भूतों से संसार के समस्त जीवों के देह का निर्माण होता हैं, समस्त जीव शरीर या देह इन्हीं पंच महाभूतों का मिश्रण हैं। श्मशान वह स्थान हैं जहाँ पञ्च भूत या तत्त्व के मिश्रण से निर्मित देह, अपने-अपने तत्त्व में विलीन हो जाते हैं। तामसी गुण से सम्बद्ध रखने वाले देवी-देवता, श्मशान भूमि को इसी कारण-वश अपना निवास स्थान बनाते हैं। देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनती हैं, इसका एक और महत्त्वपूर्ण कारण हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान विकार रहित हृदय या मन का प्रतिनिधित्व करता हैं, मानव देह कई प्रकार के विकारों का स्थान हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि, अतः देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनती हैं जहाँ इन विकारों या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं। मन या हृदय भी वह स्थान हैं या कहें तो वह श्मशान हैं, जहाँ इन समस्त विकारों का दाह होता हैं अतः देवी काली-तारा अपने उपासकों के विकार शून्य हृदय पर ही वास करती हैं।

चिता : मृत देह के दाह संस्कार हेतु, लकड़ियों के ढेर के ऊपर शव को रख कर जला देना, चिता कहलाता हैं। साधक को अपने श्मशान रूपी हृदय में सर्वदा ज्ञान रूपी अग्नि जलाये रखना चाहिए, ताकि अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सके।

देवी का आसन : देवी शव रूपी शिव पर विराजमान हैं या कहे तो शव को अपना आसन बनाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप ही शव में चैतन्य का संचार होता हैं। बिना शक्ति के शिव, शव के ही सामान हैं, चैतन्य हीन हैं। देवी की कृपा लाभ से ही, देह पर प्राण रहते हैं।

करालवदना या घोररूपा : देवी काली, तारा घनघोर या अत्यंत काले वर्ण की हैं तथा स्वरूप से भयंकर और डरावनी हैं। परन्तु देवी के साधक या देवी जिन के हृदय में स्थित हैं, उन्हें डरने के आवश्यकता नहीं हैं, स्वयं काल या यम भी देवी से भय-भीत रहते हैं।

पीनपयोधरा : देवी काली-तारा के स्तन बड़े तथा उन्नत हैं, यहाँ तात्पर्य हैं कि देवी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से तीनों लोकों का पालन करती हैं। अपने अमृतमय दुग्ध को आहार रूप में दे कर देवी अपने साधक को कृतार्थ करती हैं।

प्रकटितरदना : देवी काली-तारा के विकराल दन्त पंक्ति बहार निकले हुए हैं तथा उन दाँतो से उन्होंने अपने जिह्वा को दबा रखा हैं। यहाँ देवी रजो तथा तमो गुण रूपी जिह्वा को, सत्व गुण के प्रतीक उज्ज्वल दाँतो से दबाये हुए हैं।

मुक्तकेशी : देवी के बाल, घनघोर काले बादलों की तरह बिखरे हुए हैं और ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कोई भयंकर आँधी आने वाली हो।

संक्षेप में देवी तारा से सम्बंधित मुख्य तथ्य।

मुख्य नाम : तारा।अन्य नाम : उग्र तारा, नील सरस्वती, एकजटा।भैरव : अक्षोभ्य शिव, बिना किसी क्षोभ के हलाहल विष का पान करने वाले।भगवान विष्णु के २४ अवतारों से सम्बद्ध : भगवान राम।कुल : काली कुल।दिशा : ऊपर की ओर।स्वभाव : सौम्य उग्र, तामसी गुण सम्पन्न।वाहन : गीदड़।सम्बंधित तीर्थ स्थान या मंदिर : तारापीठ, रामपुरहाट, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत; सुघंधा, बांग्लादेश तथा सासाराम, बिहार, भारत।कार्य : मोक्ष दात्री, भव-सागर से तारने वाली, जन्म तथा मृत्यु रूपी चक्र से मुक्त करने वाली।शारीरिक वर्ण : नीला।

द्वितीय महाविद्या तारा की कृपा से सभी शास्त्रों का पांडित्य, कवित्व प्राप्त होता हैं, साधक बृहस्पति के समान ज्ञानी हो जाता हैं। वाक् सिद्धि प्रदान करने से ये नील सरस्वती कही जाती हैं, सुख, मोक्ष प्रदान करने तथा उग्र आपत्ति हरण करने के कारण इन्हें ताराणी भी कहा जाता हैं।

देवी की साधना एकलिंग शिव मंदिर (पाँच कोस क्षेत्र के मध्य एक शिव-लिंग), श्मशान भूमि, शून्य गृह, चौराहे, शवासन, मुंडों के आसन, गले तक जल में खड़े हो कर, वन में करने का शास्त्रों में विधान हैं। इन स्थानों पर देवी की साधना शीघ्र फल प्रदायक होती हैं, विशेषकर सर्व शास्त्र वेत्ता होकर परलोक में ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करता हैं।

मत्स्य सूक्त के अनुसार कोमलासन (जिसका मुंडन संस्कार न हुआ हो या छः से दस मास के भीतर के गर्भच्युत मृत बालक), कम्बल का आसन, कुशासन अथवा विशुद्ध आसन पर बैठ कर ही देवी तारा की आराधना करना उचित हैं। नील तंत्र के अनुसार पाँच वर्ष तक के बालक का मृत देह भी कोमलासन की श्रेणी में आता हैं, कृष्ण मृग या मृग तथा व्याघ्र चर्म आसन पूजा में विहित हैं।

लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कीर्ति, शांति, तुष्टि, पुष्टि रूपी आठ शक्तियां नील सरस्वती की पीठ शक्ति मानी जाती हैं, देवी का वाहन शव हैं।

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव तथा परमशिव को षट्-शिव (६ शिव) कहा जाता हैं।

तारा, उग्रा, महोग्रा, वज्रा, काली, सरस्वती, कामेश्वरी तथा चामुंडा ये अष्ट तारा नाम से विख्यात हैं। देवी के मस्तक में स्थित अक्षोभ्य शिव अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

महा-शंख माला जो मनुष्य के ललाट के हड्डियों से निर्मित होती हैं तथा जिस में ५० मणियाँ होती हैं, से देवी की साधना करने का विधान हैं। कान तथा नेत्र के बीज के भाग को या ललाट का भाग महा-शंख कहलाता हैं, इस माला का स्पर्श तुलसी, गोबर, गंगा-जल तथा शाल-ग्राम से कभी नहीं करना चाहिये।

देवी की कृपा से साधक प्राण ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करता है

गृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिए

देवी अज्ञान रुपी शव पर विराजती हैं और ज्ञान की खडग से अज्ञान रुपी शत्रुओं का नाश करती हैं

लाल व नीले फूल और नारियल चौमुखा दीपक चढाने से देवी होतीं हैं प्रसन्न

देवी के भक्त को ज्ञान व बुद्धि विवेक में तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पता!
माँ तारा की कृपा से साधक प्राण ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करता है

गृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिए

देवी अज्ञान रुपी शव पर विराजती हैं और ज्ञान की खडग से अज्ञान रुपी शत्रुओं का नाश करती हैं

लाल व नीले फूल और नारियल चौमुखा दीपक चढाने से देवी होतीं हैं प्रसन्न

देवी के भक्त को ज्ञान व बुद्धि विवेक में तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पता

देवी की मूर्ती पर रुद्राक्ष चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है

महाविद्या तारा के मन्त्र से होता है बड़े से बड़े दुखों का नाश
देवी माँ का स्वत: सिद्ध महामंत्र है

1. बिल्व पत्र, भोज पत्र और घी से हवन करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है 

2.मधु. शर्करा और खीर से होम करने पर वशीकरण होता है 3.घृत तथा शर्करा युक्त हवन सामग्री से होम करने पर आकर्षण होता है।

4. काले तिल व खीर से हवन करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है।

विशेष पूजा सामग्रियां-पूजा में जिन सामग्रियों के प्रयोग से देवी की विशेष कृपा मिलाती है

सफेद या नीला कमल का फूल चढ़ाना

रुद्राक्ष से बने कानों के कुंडल चढ़ाना

अनार के दाने प्रसाद रूप में चढ़ाना

शंख को देवी पूजा में रखना

भोजपत्र पर ह्रीं लिख करा चढ़ाना

दूर्वा,अक्षत,रक्तचंदन,पंचगव्य,पञ्चमेवा व पंचामृत चढ़ाएं

पूजा में उर्द की दाल व लौंग काली मिर्च का चढ़ावे के रूप प्रयोग करें(साभार)

॥ 🌹भैरवी साधना रहस्य🌹 ॥


॥ 🌹भैरवी साधना रहस्य🌹 ॥

 वाममार्गी तन्त्र-साधना में देह को साधना का मुख्य आधार माना गय
॥ भैरवी साधना रहस्य ॥

 वाममार्गी तन्त्र-साधना में देह को साधना का मुख्य आधार माना गया है। देह में स्थित ‘देव’ को उसकी सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ जागृत रखने के लिए ध्यान की पद्धति साधना का प्रारम्भिक चरण है,भगवान से यह शरीर प्राप्त हुआ है, अत: भगवान भी इस शरीर से ही प्राप्त होंगें– यह तथ्य सोलह आना सच्ची एवं स्वाभाविक सत्य है,देह पर संस्कारों और वासनाओं का आवरण विद्यमान रहता है । ‘वासना’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘वसन’ शब्द से हुई है । वसन का अर्थ है,वस्त्र वस्तुत: वस्त्र वासना को उद्दीप्त करते हैं । अत: वस्त्र-विहीन देह से आत्मस्वरूप का ध्यान करना साधक को वासना-मुक्त होने में सहायक होता है।

  इसी प्रकार योनि-पूजन, लिंगार्चन, भैरवी-साधना-चक्र-पूजा एवं बङ्काौली आदि गुप्त साधनाओं के द्वारा तन्त्र-मार्ग में मुक्ति के आनन्द का अनुभव प्राप्त करने की अन्यान्य विधियाँ भी वर्णित हैं किन्तु,ये सभी विधियाँ योग्य व अनुभवी गुरु के सानिध्य में ही सम्पन्न हों, तभी इसमे सफलता प्राप्त किया जा सकता है और जीवन को आनंदित बना सकते है यहाँ तन्त्र-मार्ग की गुह्य साधनाओं में से केवल भैरवी-साधना पर थोड़ा-सा चर्चा करना चाहते हैं। 

   ॥ ‘स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु’ ॥

अर्थात् , जगत् में जो कुछ है वह स्त्री-रूप ही है,अन्यथा निर्जीव है, तांत्रिक साधना में स्त्री को शक्ति का प्रतीक माना गया है, बिना स्त्री के यह साधना सिद्धिदायक नहीं मानी गयी तंत्र-मार्ग में नारी का सम्मान सर्वोच्च है,पूजनीय है।

॥ ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ ॥

  इस मान्यता को तंत्र-मार्ग में वास्तविक प्रतिष्ठा प्राप्त है । रूढ़िवादी सोच के लोग जहाँ नारी को ‘नरक का द्वार’ कहते हैं, वहीं तंत्र-मार्ग में उसे देवी का स्वरूप मानते हुए, पुरुष के बराबर का अधिकार दिया गया है । तंत्र-मार्ग में किसी भी कुल की नारी को हिन भावना से नहीं देखा जाता है ।

 भैरवी-चक्र-पूजा के सम्बन्ध में ‘निर्वाण-तंत्र’ में उल्लेख है।

नात्राधिकार: सर्वेषां ब्रह्मज्ञान् साधकान् बिना ।      

 परब्रह्मोपासका: ये ब्रह्मज्ञा: ब्रह्मतत्परा: ।।

 शुद्धन्तकरणा: शान्ता: सर्व प्राणिहते रता: ।

निर्विकारा: निर्विकल्पा: दयाशीला: दृढ़व्रता: ।।

सत्यसंकल्पका: ब्रह्मास्तः एवात्राधिकारिण: ।।

                   ॥ अर्थात् ॥

चक्र-पूजा में सम्मिलित होने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को नहीं है । जो ब्रह्म को जानने वाला साधक है, उसके सिवाय इसमें कोई शामिल नहीं हो सकता जो ब्रह्म के उपासक हैं,जो ब्रह्म को जानते हैं,जो ब्रह्म को पाने के लिए तत्पर हैं,जिनके मन शुद्ध हैं, जो शान्तचित्त हैं,जो सब प्राणियों की भलाई में लगे रहते हैं,जो विकार से रहित हैं, जो दुविधा से रहित हैं,जो दयावान् हैं,जो प्रण पर दृढ़ रहने वाले हैं,जो सच्चे संकल्प वाले हैं,जो अपने को ब्रह्ममय मानते हैं– वे ही भैरवी-चक्र-पूजा के अधिकारी हैं।

 भैरवी-साधना का उद्देश्य मानव-देह में स्थित काम-ऊर्जा की आणविक शक्ति के माध्यम से संसार की विस्मृति और ब्रह्मानन्द की अनुभूति प्राप्त करना है । भैरवी-साधना कई चरणों में सम्पन्न होती है। प्रारम्भिक चरण में इस साधना के साधक स्त्री-पुरुष एकान्त और सुुगन्धित वातावरण में निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के सामने बिना एक दूसरे को स्पर्श किए दो-तीन फुट की दूरी पर सुखासन या पद्मासन में बैठकर एक दूसरे की आँखों में देखते हुए मन्त्र का जप करते हैं। निरन्तर ऐसा करते रहने से साधकों के अन्दर का काम-भाव ऊध्र्वगामी होकर दिव्य ऊर्जा के रूप में सहस्र- दल का भेदन करता है।

 इस साधना के दूसरे चरण में स्त्री-पुरुष साधक एक-दूसरे के अंग-प्रत्यंग का स्पर्श करते हुए ऊध्र्वगामी काम-भाव को स्थिर बनाये रखने का प्रयत्न करते हैं । इस बीच मन्त्र का जप निरन्तर होते रहना चाहिए कामोद्दीपन की बाहरी क्रियाओं को करते हुए स्खलन से बचने के लिए भरपूर आत्मसंयम रखना चाहिए - गुरु-कृपा और गुरु-निर्देशन में साधना करने से संयम के सूत्र आसानी से समझे जा सकते हैं।

भैरवी-साधना के अन्तिम चरण में स्त्री-पुरुष साधकों द्वारा परस्पर सम-भोग (संभोग) की क्रिया सम्पन्न की जाती है । समान भाव, समान श्रद्धा, समान उत्साह और समान संयम की रीति से शारीरिक भोग की इस साधना को ही सम-भोग अथवा संभोग कहा गया है। यह क्रिया निरापद, निर्भीक, नि:संकोच, निद्र्वन्द्व और निर्लज्ज भाव से मंत्र-जप करते हुए सम्पन्न की जानी चाहिए । युगल-साधकों को पूर्ण आत्मसंयम बरतते हुए भरपूर प्रयास इस बात का करना चाहिए कि दोनों का स्खलन यथा संभव विलम्ब से और एक साथ सम्पन्न हो । अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन में भैरवी-चक्र-पूजा के दौरान यह आसानी से संभव हो पाता है।

भैरवी-चक्र की अनेक विधियाँ बतायी गई हैं, राजचक्र, महाचक्र, देवचक्र, वीरचक्र, पशुचक्र आदि । चक्र-भेद के अनुसार इस साधना में स्त्री के जाति-वर्ण, पूजा-उपचार, देश-काल, तथा फल-प्राप्ति में अन्तर आ जाता है । भैरवी चक्र-पूजा में सम्मिलित सभी उपासक एवं उपासिकाएँ भैरव और भैरवी स्वरूप हो जाते हैं, क्योंकि उनका देहाभिमान गल जाता है और वे देह-भेद या जाति-भेद से ऊपर उठ जाते हैं। किन्तु, चक्रार्चन के बाहर वर्णाश्रम-कर्म का पालन अवश्य करना चाहिए 

 भैरवी-चक्र-पूजा की सफलता पर एक अलौकिक अनुभव प्राप्त होता है। जैसे बिजली के दो तारों–फेस और न्यूटल– के टकराने से चिंगारी निकलती है, वैसे ही स्त्री-पुरुष दोनों के एकसाथ स्खलित होने से जो चरम-ऊर्जा उत्पन्न होती है, वह एक ही झटके में सहस्रदल का भेदन कर ब्रह्मानंद का साक्षात्कार करवा देने में सक्षम है । तंत्र-मार्ग में इसी को ‘ब्रह्म-सुख’कहा गया है।

शक्ति-संगम संक्षोभात् शत्तयावेशावसानिकम् ।  

 यत्सुखं ब्रह्मतत्त्वस्य तत्सुखं ब्रह्ममुच्यते ।।

                 ॥ अर्थात् ॥

शक्ति-संगम के आरम्भ से लेकर शक्ति-आवेश के अन्त तक जो ब्रह्मतत्व का सुख प्राप्त होता है, उसे ‘ब्रह्म-सुख’ कहा जाता है । सहस्र-दल-भेदन करने के लिए आज तक जितने भी प्रयोग हुए हैं, उन सभी प्रयोगों में यह प्रयोग सबसे अनूठा है ।

 भैरवी-साधना सिद्ध होे जाने पर साधक को ब्रह्माण्ड में गूँज रहे दिव्य मंत्र सुनायी पड़ने लगते हैं, दिव्य प्रकाश दिखने लगता है तथा साधक के मन में दीर्घ अवधि तक काम-वासना जागृत नहीं होती । साथ ही उसका मन शान्त व स्थिर हो जाता है तथा उसके चेहरे पर एक अलौकिक आभा झलकने लगती है।

प्रत्येक साधना में कोई-न-कोई कठिनाई अवश्य होती है। भैरवी-साधना में भी जो सबसे बड़ी कठिनाई है। वह है अपने आप को काबू में रखना तथा साधक व साधिका का एक साथ स्खलित होना। निश्चय ही गुरु-कृपा और निरन्तर के अभ्यास से यह सम्भव हो पाता है।

भैरवी-साधना प्रकारान्तर से शिव-शक्ति की आराधना ही है । शुद्ध और समर्पित भाव से, गुरु-आज्ञानुसार साधक यदि इसको आत्मसात् करें तो जीवन के परम लक्ष्य– ब्रह्मानंद की उपलब्धि उनके लिए सहज सम्भव हो जाती है।

किन्तु, कलिकाल के कराल-विकराल जंजाल में फंसे हुए मानव के लिए भैरवी-साधना के रहस्य को समझ पाना अति दुष्कर है। यंत्रवत् दिनचर्या व्यतीत करने वाले तथा भोगों की लालसा में रोगों को पालने वाले आधुनिक जीवन-शैली के दास भला इस दैवीय साधना के परिणामों से कैसे लाभान्वित हो सकते हैं ? इसके लिए शास्त्र और गुरु-निष्ठा के साथ-साथ गहन आत्मविश्वास भी आवश्यक है ।