Monday, January 19, 2026

अंगारक योग

अंगारक योग-

*आप जानते हैं आपका क्रोधी स्वभाव  कहीं कुंडली में  बने  मंगल  एवं राहु  तथा मंगल एवं केतु के कारण तो नहीं क्योंकि मंगल के साथ यदि राहु केतु होते हैं तो अंगारक योग बनता है। कुंडली में मंगल का राहु अथवा केतु में से किसी के साथ स्थान अथवा दृष्टि से संबंध स्थापित हो जाए तो ऐसी कुंडली में अंगारक योग का निर्माण हो जाता है जिसके कारण जातक का स्वभाव आक्रामक, हिंसक तथा नकारात्मक हो जाता है तथा इस योग के प्रभाव में आने वाले जातकों के अपने भाईयों, मित्रों तथा अन्य रिश्तेदारों के साथ संबंध भी खराब होते हैं।किसी कुंडली में अंगारक योग बन जाने पर ऐसा जातक अपराधी बन जाता है तथा उसे अपने अवैध कार्यों के चलते लंबे समय तक जेल अथवा कारावास में भी रहना पड़ सकता है।*

*किन्तु यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि वास्तविकता में किसी जातक को अंगारक योग के साथ जोड़े जाने वाले अशुभ फल तभी प्राप्त होते हैं जब कुंडली में अंगारक योग बनाने वाले मंगल, तथा राहु अथवा केतु दोनों ही अशुभ हों तथा कुंडली में मंगल तथा राहु केतु में से किसी के शुभ होने की स्थिति में जातक को अधिक अशुभ फल प्राप्त नहीं होते और कुडली में मंगल तथा राहु केतु दोनों के शुभ होने की स्थिति में इन ग्रहों का संबंध अशुभ फल देने वाला अंगारक योग न बना कर शुभ फल देने वाला अंगारक योग बनाता है।*

*उदाहरण के लिए किसी कुंडली के तीसरे घर में अशुभ मंगल का अशुभ राहु अथवा अशुभ केतु के साथ संबंध हो जाने की स्थिति में ऐसी कुंडली में निश्चय ही अशुभ फल प्रदान करने वाले अंगारक योग का निर्माण हो जाता है जिसके चलते इस योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अधिक आक्रामक तथा हिंसक होते हैं तथा कुंडली में कुछ अन्य विशेष प्रकार के अशुभ प्रभाव होने पर ऐसे जातक भयंकर अपराधी जैसे कि पेशेवर हत्यारे तथा आतंकवादी आदि बन सकते हैं। दूसरी ओर किसी कुंडली के तीसरे घर में शुभ मंगल का शुभ राहु अथवा शुभ केतु के साथ संबंध हो जाने से कुंडली में बनने वाला अंगारक योग शुभ फलदायी होगा जिसके प्रभाव में आने वाले जातक उच्च पुलिस अधिकारी, सेना अधिकारी, कुशल योद्धा आदि बन सकते हैं जो अपनी आक्रमकता तथा पराक्रम का प्रयोग केवल मानवता की रक्षा करने के लिए और अपराधियों को दंडित करने के लिए करते हैं।*

*कुंडली के 12 भाव में अंगारक योग से होने वाला नुकसान-*

*प्रथम भाव में अंगारक योग होने से पेट रोग, शरीर पर चोट, अस्थिर मानसिकता, क्रूरता होती है।*

*द्वितीय भाव में अंगारक योग होने से धन में उतार-चढ़ाव व व्यक्ति का घर-बार बरबाद हो जाता है।*

*तृतीय भाव में अंगारक योग होने से भाइयों से कटु संबंध बनते हैं परंतु व्यक्ति धोखेबाजी से सफल हो जाता है।*

*चतुर्थ भाव में अंगारक योग होने से माता को दुख व भूमि संबंधित विवाद होते हैं।*
 
*पंचम भाव में अंगारक योग होने से संतानहीनता व जुए-सट्टे से लाभ होता है।*

*छटम भाव में अंगारक योग होने से ऋण लेकर उन्नति होती है। व्यक्ति खूनी या शल्य-चिकित्सक भी बन सकता है।*

*सप्तम भाव में अंगारक योग होने से दुखी विवाहित जीवन, नाजायज संबंध, विधवा या विधुर होना परंतु सांझेदारी से लाभ भी मिलता है।*

*अष्टम भाव में अंगारक योग होने से पैतृक सम्पत्ति मिलती है परंतु सड़क दुर्घटना के प्रबल योग बनते हैं।*

*नवम भाव में अंगारक योग होने से व्यक्ति भाग्यहीन, वहमी, रूढ़ीवादी व तंत्रमंत्र में लिप्त होते हैं।*

*दशम भाव में अंगारक योग होने से व्यक्ति अति कर्मठ, मेहनतकश, स्पोर्टमेन व अत्यधिक सफल होते है।*

*एकादश भाव में अंगारक योग होने से प्रॉपर्टी से लाभ मिलता है। व्यक्ति चोर, कपटी धोखेबाज़ होते हैं।*

*द्वादश भाव में अंगारक योग होने से इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट व रिश्वतख़ोरी से लाभ। ऐसे व्यक्ति बलात्कार जैसे अपराधों में भी लिप्त होते हैं।*

*कुंडली के बारह घरों में मंगल-राहु अंगारक योग के उपाय-*

*1- कुंडली के पहले घर में मंगल-राहु अंगारक योग होने पर रेवडिय़ां, बताशे पानी में बहाएं।ॐ अंग अंगारकाय नमः कानियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ करें। प्रत्येक मंगलवार को गाय को गुड़ खिलाएं।*

*2- कुंडली के दूसरे भाव में अंगारक योग होने पर चांदी की अंगूठी उल्टे हाथ की लिटील फिंगर में पहनें।ॐ अंग अंगारकाय नमः कानियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ करें। सात चक्र पावर ग्रिड के नीचे फोटो रखें।*

*3- जिन लोगों की कुंडली के तीसरे भाव में ये योग होता है वह घर में हाथी दांत रखें।ॐ अंग अंगारकाय नमः कानियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ करें।*

*4- कुंडली के चौथे भाव में ये योग होने पर सोना, चांदी और तांबा तीनों को मिलाकर अंगूठी पहनें।ॐ अंग अंगारकाय नमः कानियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ करें। सात चक्र पावर ग्रिड के नीचे फोटो रखें।*

*5- कुंडली के पांचवें भाव में अंगारक योग होने पर रात को सिरहाने पानी का बर्तन भरकर रखें और सुबह उठते ही पेड़-पौधों में डालें।ॐ अंग अंगारकाय नमः का नियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ करें।*

*6-जिन लोगों की कुंडली के  छठे घर में अंगारक योग होने पर कन्याओं को दूध और चांदी का दान दें।ॐ अंग अंगारकाय नमः कानियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ  प्रतिदिन करें। प्रत्येक मंगलवार को सुंदरकांड का पाठ करें।*

*7- कुंडली के सातवें भाव में अंगारक योग होने पर चांदी की ठोस गोली अपने पास रखें।ॐ अंग अंगारकाय नमः कानियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ करें।*

*8- जिन लोगों की कुंडली के  आठवें घर में अंगारक योग बनता है तो एक तरफ सिकी हुई मीठी रोटियां कुत्तों को डालें।ॐ अंग अंगारकाय नमः कानियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ करें।*

*9- कुंडली के नवें घर में ये योग बनता है तो मंगलवार को हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाएं।ॐ अंग अंगारकाय नमः कानियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ करें। प्रत्येक मंगलवार को गाय को गुड़ खिलाएं।*

*10- दसवें भाव में अंगारक योग जिन लोगों की कुंडली में होता है वो हनुमान  मूंगा रत्न धारण करें।ॐ अंग अंगारकाय नमः कानियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ करें।*

*11- कुंडली के लाभ भाव यानि ग्यारहवें भाव में अंगारक योग होने पर मिट्टी के बर्तन में सिन्दूर रख कर, उसे घर में रखें।ॐ अंग अंगारकाय नमः कानियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ करें।*

*12- बारहवें भाव में अंगारक योग होता है वह उज्जैन जाकर अंगारेश्वर मंदिर में भात पूजा कराएं, चांदी का हाथी गले में धारण करें, सात चक्र पावर ग्रिड के नीचे फोटो रखें।ॐ अंग अंगारकाय नमः कानियमित जाप करें।हनुमान चालीसा का पाठ करें। प्रत्येक मंगलवार को गाय को गुड़ खिलाएं।*

*अंगारक योग होने पर रेवडिय़ां, बताशे पानी में बहाएं, ॐ अंग अंगारकाय नमः का नियमित जाप करें, हनुमान चालीसा का पाठ करें और प्रत्येक मंगलवार को गाय को गुड़ खिलाएं।इस योग के प्रभाव को कम करने के लिए मंगलवार के दिन व्रत करें और मंगल ग्रह के बीज मन्त्र का जाप करें।*

*भगवान शिव के पुत्र कुमार कार्तिकेय की आराधना करें।हनुमान जी की आराधना करने से इन दोनों ग्रहों के खराब प्रभाव से मुक्ति मिलती है, यह एक उत्तम उपाय है।मंगल और राहु की शांति के लिए निर्दिष्ट दान करना लाभकारी होता है।*

अंगारक स्तोत्र-

विनोयग- अस्य श्री अंगारकस्तोत्रस्य विरूपांगिरस ऋषिः अग्निर्देवता गायत्रीच्छंदः भौमप्रीत्यर्थं जपे विनोयगः।

स्तोत्रम्

अंगारकः शक्तिधरो लोहितांगो धरासुतः।

कुमारो मंगलो भौमो महाकायो धनप्रदः।।

ऋणहर्ता दृष्टिकर्ता रोगकृद्रोगनाशनः।

विघुत् प्रभो व्रणकरः कामदो धनह्रत् कुजः।।

सामगानप्रियो रक्तवस्त्रो रक्तायतेक्षणः।

लोहितो रक्तवर्णश्च सर्वकर्माविरोधकः।।

रक्तामाल्यधरो हेमकुण्डली ग्रहनायकः।

नामान्येतानि भौमस्य यः पठेत् सततं नरः।।

ऋणं तस्य हि दौर्भाग्यं दारिद्रयं च विनश्यति।

धनं प्राप्नोति विपुलं स्त्रियं चैव मनोरमाम्।।

वंशोघोतकरं पुत्रं लभते नाऽत्र संशयः।

योऽर्चयेदह्नि भौमस्य मंगलं बहुपुष्पकैः।।

सर्वा नश्यति पीडा च तस्य ग्रहकृता ध्रुवम्।।

Sunday, January 18, 2026

Vata Pitta Kapha -

Vata Pitta Kapha -


 आयुर्वेद के अनुसार आपकी बॉडी टाइप: वात, पित्त या कफ?  क्या आपने कभी सोचा है कि
कोई व्यक्ति बहुत ज़्यादा खाने के बाद भी दुबला क्यों रहता है,
और कोई बहुत कम खाने के बाद भी मोटापा क्यों बढ़ा लेता है?

किसी को मीठा बेहद पसंद आता है,
तो किसी को तीखा या मसालेदार खाना।

आख़िर ऐसा क्यों होता है?

आयुर्वेद के अनुसार, इन सभी बातों के पीछे हमारे शरीर के तीन दोष ज़िम्मेदार होते हैं -
वात, पित्त और कफ।

आयुर्वेद मानता है कि
हमारा शरीर, हमारी बनावट, स्वभाव, पसंद-नापसंद और यहां तक कि हमारी पर्सनैलिटी भी
इन्हीं तीन दोषों पर निर्भर करती है।

इसीलिए आज हम जानेंगे कि
आयुर्वेद के अनुसार आपकी बॉडी टाइप — वात, पित्त या कफ — कौन-सी है।

पंचमहाभूत और तीन दोषों का संबंध
वात-पित्त-कफ को समझने से पहले
हमें पंचमहाभूत को समझना ज़रूरी है।

पंचमहाभूत यानी —
पृथ्वी (भूमि), जल, अग्नि, वायु और आकाश।

आयुर्वेद के अनुसार,
इस संसार की हर जीवित चीज़ इन्हीं पांच तत्वों से बनी है —
और हमारा शरीर भी।

मानव शरीर में लगभग:

72% जल
12% पृथ्वी
4% अग्नि
6% वायु
6% आकाश

इन पांचों तत्वों के गुण पाए जाते हैं।

ये तत्व आपस में मिलकर
शरीर की हर क्रिया - पाचन, श्वसन, सोच, चलना-फिरना - को नियंत्रित करते हैं।

वात, पित्त और कफ क्या हैं?
वायु + आकाश के मेल से बनता है - वात दोष
अग्नि + जल के मेल से बनता है - पित्त दोष
पृथ्वी + जल के मेल से बनता है - कफ दोष

आयुर्वेद कहता है कि
हमारे शरीर में ये तीनों दोष मौजूद होते हैं,
लेकिन हर व्यक्ति में कोई एक दोष प्रमुख (डॉमिनेंट) होता है,
जिसे प्राकृतिक दोष कहा जाता है।

जब खान-पान, दिनचर्या और जीवनशैली संतुलित रहती है,
तो ये दोष संतुलन में रहते हैं।

लेकिन जब यह संतुलन बिगड़ता है,
तो बीमारियां जन्म लेने लगती हैं।

वात दोष बॉडी टाइप
वात के गुण - रूखा, हल्का, ठंडा, चलायमान और सूक्ष्म।

शारीरिक लक्षण:
दुबला-पतला शरीर
हाथ-पैर पतले
त्वचा रूखी
शरीर हल्का और एक्टिव
नींद हल्की, जल्दी टूटने वाली
भूख और पाचन अनियमित

इन लोगों को ठंड ज़्यादा लगती है
और गर्म मौसम इन्हें ज़्यादा पसंद आता है।

मानसिक व स्वभाविक गुण:
तेज़ बोलना
चंचल मन, फोकस में कठिनाई
निर्णय लेने में दुविधा

अच्छी खूबियां:

बहुत उत्साही
हमेशा एक्टिव
क्रिएटिव सोच
बड़े सपने देखने वाले
खुद से मोटिवेट रहने वाले

पित्त दोष बॉडी टाइप
पित्त के गुण — गर्म, तीक्ष्ण, हल्का, तरल और ऑयली।

शारीरिक लक्षण:
न ज़्यादा दुबले, न ज़्यादा मोटे
एथलेटिक बॉडी
शरीर में गर्मी, ज़्यादा पसीना
तेज़ भूख और मजबूत पाचन
त्वचा व बाल ऑयली
बाल झड़ना या सफ़ेद होना

गर्मी इन्हें परेशान करती है,
ठंडा मौसम इन्हें ज़्यादा पसंद आता है।

मानसिक व स्वभाविक गुण:
जल्दी गुस्सा आना
जलन और प्रतिस्पर्धा की भावना
तेज़ निर्णय लेने की क्षमता

भावनात्मक स्वभाव

अच्छी खूबियां:
आकर्षक पर्सनैलिटी
अच्छी सोशल लाइफ
नैचुरल लीडर
तेज़ दिमाग और अच्छी याददाश्त
काम को पूरी निष्ठा से करने वाले

कफ दोष बॉडी टाइप
कफ के गुण — भारी, ठंडा, स्थिर, चिकना, मुलायम और धीमा।

शारीरिक लक्षण:
भारी शरीर
मजबूत हड्डियां और मांसपेशियां
वजन जल्दी बढ़ता है
वजन कम करना मुश्किल
ज़्यादा नींद, गहरी नींद
कफ की समस्या

मानसिक व स्वभाविक गुण:
थोड़े जिद्दी
काम करने में सुस्ती
चीज़ों से जल्दी लगाव
कई बार मोटिवेशन की कमी

अच्छी खूबियां:

शांत और स्थिर स्वभाव
बेहद वफादार
अपनों की गहरी केयर
भावनात्मक रूप से मजबूत
कम समय में असरदार काम करने की क्षमता

क्या दो दोष भी हो सकते हैं?
हाँ।

कई लोगों में
एक की जगह दो दोष प्रमुख हो सकते हैं, जैसे:

वात-पित्त
पित्त-कफ
वात-कफ

कुछ दुर्लभ मामलों में
तीनों दोष समान रूप से भी हो सकते हैं,
जिसे त्रिदोष कहा जाता है।

जन्म के समय एक दोष प्राकृतिक होता है,
लेकिन समय के साथ
लाइफस्टाइल और आदतों के कारण
दूसरा दोष भी हावी हो सकता है।

Saturday, January 17, 2026

स्वर विज्ञान

स्वर विज्ञान 

 
यदि आपका उत्तर भी यही है कि नाक हमारी प्रमुख ज्ञानेन्द्रिय है, इसके द्वारा हम गंध की पहचान एवं आवश्यक प्राणवायु ग्रहण करते हैं, तो आज तक आप भी एक महत्वपूर्ण एवं लाभदायक विज्ञान से अनभिज्ञ हैं।

इसके विपरीत यदि आपके उत्तर में स्वर-विज्ञान या स्वरोदय विज्ञान का भी उल्लेख है, तो निश्चित ही आप भाग्यवान हैं एवं ईश्वर के कृपापात्र हैं, क्योंकि स्वर विज्ञान को जानने वाला कभी भी विपरीत परिस्थितियों में नहीं फँसता और फँस भी जाए तो आसानी से विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाकर बाहर निकल जाता है।
स्वर विज्ञान एक बहुत ही आसान विद्या है। इस विद्या को प्रसिद्ध स्वर साधक योगीराज यशपालजी ने ‘विज्ञान’ कहकर सुशोभित किया है। इनके अनुसार स्वरोदय, नाक के छिद्र से ग्रहण किया जाने वाला श्वास है, जो वायु के रूप में होता है। श्वास ही जीव का प्राण है और इसी श्वास को स्वर कहा जाता है।

स्वर के चलने की क्रिया को उदय होना मानकर स्वरोदय कहा गया है तथा विज्ञान, जिसमें कुछ विधियाँ बताई गई हों और विषय के रहस्य को समझने का प्रयास हो, उसे विज्ञान कहा जाता है। स्वरोदय विज्ञान एक आसान प्रणाली है, जिसे प्रत्येक श्वास लेने वाला जीव प्रयोग में ला सकता है।

स्वरोदय अपने आप में पूर्ण विज्ञान है। इसके ज्ञान मात्र से ही व्यक्ति अनेक लाभों से लाभान्वित होने लगता है। इसका लाभ प्राप्त करने के लिए आपको कोई कठिन गणित, साधना, यंत्र-जाप, उपवास या कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होती है। आपको केवल श्वास की गति एवं दिशा की स्थिति ज्ञात करने का अभ्यास मात्र करना है।

यह विद्या इतनी सरल है कि अगर थोड़ी लगन एवं आस्था से इसका अध्ययन या अभ्यास किया जाए तो जीवनपर्यन्त इसके असंख्य लाभों से अभिभूत हुआ जा सकता है।

सूर्य, चंद्र और सुषुम्ना स्वर

सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को महसूस करने का प्रयत्न कीजिए। देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है। स्वरोदय विज्ञान के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा।

इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से निःश्वास निकलता महसूस करें तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा। श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वरोदय विज्ञान का आधार हैं।

सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिव स्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा।

स्वर को पहचानने की सरल विधियाँ

(1) शांत भाव से मन एकाग्र करके बैठ जाएँ। अपने दाएँ हाथ को नाक छिद्रों के पास ले जाएँ। तर्जनी अँगुली छिद्रों के नीचे रखकर श्वास बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से श्वास का अधिक स्पर्श होगा। जिस तरफ के छिद्र से श्वास निकले, बस वही स्वर चल रहा है।

(2) एक छिद्र से अधिक एवं दूसरे छिद्र से कम वेग का श्वास निकलता प्रतीत हो तो यह सुषुम्ना के साथ मुख्य स्वर कहलाएगा।

(3) एक अन्य विधि के अनुसार आईने को नासाछिद्रों के नीचे रखें। जिस तरफ के छिद्र के नीचे काँच पर वाष्प के कण दिखाई दें, वही स्वर चालू समझें।

जीवन में स्वर का चमत्कार

स्वर विज्ञान अपने आप में दुनिया का महानतम ज्योतिष विज्ञान है जिसके संकेत कभी गलत नहीं जाते।
शरीर की मानसिक और शारीरिक क्रियाओं से लेकर दैवीय सम्पर्कों और परिवेशीय घटनाओं तक को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला स्वर विज्ञान दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है।
स्वर विज्ञान का सहारा लेकर आप जीवन को नई दिशा दृष्टि डे सकते है.
दिव्य जीवन का निर्माण कर सकते हैं, लौकिक एवं पारलौकिक यात्रा को सफल बना सकते हैं। यही नहीं तो आप अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति और क्षेत्र की धाराओं तक को बदल सकने का सामर्थ्य पा जाते हैं।
अपनी नाक के दो छिद्र होते हैं। इनमें से सामान्य अवस्था में एक ही छिद्र से हवा का आवागमन होता रहता है। कभी दायां तो कभी बांया। जिस समय स्वर बदलता है उस समय कुछ सैकण्ड के लिए दोनों नाक में हवा निकलती प्रतीत होती है। इसके अलावा कभी – कभी सुषुम्ना नाड़ी के चलते समय दोनों नासिक छिद्रों से हवा निकलती है। दोनों तरफ सांस निकलने का समय योगियों के लिए योग मार्ग में प्रवेश करने का समय होता है।
बांयी तरफ सांस आवागमन का मतलब है आपके शरीर की इड़ा नाड़ी में वायु प्रवाह है।
इसके विपरीत दांयी नाड़ी पिंगला है।
दोनों के मध्य सुषुम्ना नाड़ी का स्वर प्रवाह होता है।

अपनी नाक से निकलने वाली साँस को परखने मात्र से आप जीवन के कई कार्यों को बेहतर बना सकते हैं। सांस का संबंध तिथियों और वारों से जोड़कर इसे और अधिक आसान बना दिया गया है।
जिस तिथि को जो सांस होना चाहिए, वही यदि होगा तो आपका दिन अच्छा जाएगा। इसके विपरीत होने पर आपका दिन बिगड़ा ही रहेगा। इसलिये साँस पर ध्यान दें और जीवन विकास की यात्रा को गति दें।
मंगल, शनि और रवि का संबंध सूर्य स्वर से है जबकि शेष का संबंध चन्द्र स्वर से।
आपके दांये नथुने से निकलने वाली सांस पिंगला है। इस स्वर को सूर्य स्वर कहा जाता है। यह गरम होती है।
जबकि बांयी ओर से निकलने वाले स्वर को इड़ा नाड़ी का स्वर कहा जाता है। इसका संबंध चन्द्र से है और यह स्वर ठण्डा है।

शुक्ल पक्ष:-

• प्रतिपदा, द्वितीया व तृतीया बांया (उल्टा)
• चतुर्थी, पंचमी एवं षष्ठी -दांया (सीधा)
• सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी बांया (उल्टा)
• दशमी, एकादशी एवं द्वादशी –दांया (सीधा)
• त्रयोदशी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमा – बांया (उल्टा)

कृष्ण पक्ष:-
• प्रतिपदा, द्वितीया व तृतीया दांया (सीधा)
• चतुर्थी, पंचमी एवं षष्ठी बांया (उल्टा)
• सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी दांया(सीधा)
• दशमी, एकादशी एवं द्वादशी बांया(उल्टा)
• त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या –दांया(सीधा)

सवेरे नींद से जगते ही नासिका से स्वर देखें। जिस तिथि को जो स्वर होना चाहिए, वह हो तो बिस्तर पर उठकर स्वर वाले नासिका छिद्र की तरफ के हाथ की हथेली का चुम्बन ले लें और उसी दिशा में मुंह पर हाथ फिरा लें।

यदि बांये स्वर का दिन हो तो बिस्तर से उतरते समय बांया पैर जमीन पर रखकर नीचे उतरें, फिर दायां पैर बांये से मिला लें और इसके बाद दुबारा बांया पैर आगे निकल कर आगे बढ़ लें।
यदि दांये स्वर का दिन हो और दांया स्वर ही निकल रहा हो तो बिस्तर पर उठकर दांयी हथेली का चुम्बन ले लें और फिर बिस्तर से जमीन पर पैर रखते समय पर पहले दांया पैर जमीन पर रखें और आगे बढ़ लें।

यदि जिस तिथि को स्वर हो, उसके विपरीत नासिका से स्वर निकल रहा हो तो बिस्तर से नीचे नहीं उतरें और जिस तिथि का स्वर होना चाहिए उसके विपरीत करवट लेट लें। इससे जो स्वर चाहिए, वह शुरू हो जाएगा और उसके बाद ही बिस्तर से नीचे उतरें।

धर्म/आध्यात्म 
स्वर विज्ञान : एक अनूठी विद्या कब करें कौन सा काम ?

आईने में क्या कभी आपने अपनी नाक को ध्यान से देखा है? अगर हाँ, तो बताइए हमारे जीवन में नाक की क्या उपयोगिता है? इस प्रश्न का उत्तर देने के बाद ही आगे पढ़ें।

यदि आपका उत्तर भी यही है कि नाक हमारी प्रमुख ज्ञानेन्द्रिय है, इसके द्वारा हम गंध की पहचान एवं आवश्यक प्राणवायु ग्रहण करते हैं, तो आज तक आप भी एक महत्वपूर्ण एवं लाभदायक विज्ञान से अनभिज्ञ 
इसके विपरीत यदि आपके उत्तर में स्वर-विज्ञान या स्वरोदय विज्ञान का भी उल्लेख है, तो निश्चित ही आप भाग्यवान हैं एवं ईश्वर के कृपापात्र हैं, क्योंकि स्वर विज्ञान को जानने वाला कभी भी विपरीत परिस्थितियों में नहीं फँसता और फँस भी जाए तो आसानी से विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाकर बाहर निकल जाता है।
स्वर विज्ञान एक बहुत ही आसान विद्या है। इस विद्या को प्रसिद्ध स्वर साधक योगीराज यशपालजी ने ‘विज्ञान’ कहकर सुशोभित किया है। इनके अनुसार स्वरोदय, नाक के छिद्र से ग्रहण किया जाने वाला श्वास है, जो वायु के रूप में होता है। श्वास ही जीव का प्राण है और इसी श्वास को स्वर कहा जाता है।

स्वर के चलने की क्रिया को उदय होना मानकर स्वरोदय कहा गया है तथा विज्ञान, जिसमें कुछ विधियाँ बताई गई हों और विषय के रहस्य को समझने का प्रयास हो, उसे विज्ञान कहा जाता है। स्वरोदय विज्ञान एक आसान प्रणाली है, जिसे प्रत्येक श्वास लेने वाला जीव प्रयोग में ला सकता है।

स्वरोदय अपने आप में पूर्ण विज्ञान है। इसके ज्ञान मात्र से ही व्यक्ति अनेक लाभों से लाभान्वित होने लगता है। इसका लाभ प्राप्त करने के लिए आपको कोई कठिन गणित, साधना, यंत्र-जाप, उपवास या कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होती है। आपको केवल श्वास की गति एवं दिशा की स्थिति ज्ञात करने का अभ्यास मात्र करना है।

यह विद्या इतनी सरल है कि अगर थोड़ी लगन एवं आस्था से इसका अध्ययन या अभ्यास किया जाए तो जीवनपर्यन्त इसके असंख्य लाभों से अभिभूत हुआ जा सकता है।

सूर्य, चंद्र और सुषुम्ना स्वर

सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को महसूस करने का प्रयत्न कीजिए। देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है। स्वरोदय विज्ञान के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा।

इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से निःश्वास निकलता महसूस करें तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा। श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वरोदय विज्ञान का आधार हैं।

सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिव स्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा।

स्वर को पहचानने की सरल विधियाँ

(1) शांत भाव से मन एकाग्र करके बैठ जाएँ। अपने दाएँ हाथ को नाक छिद्रों के पास ले जाएँ। तर्जनी अँगुली छिद्रों के नीचे रखकर श्वास बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से श्वास का अधिक स्पर्श होगा। जिस तरफ के छिद्र से श्वास निकले, बस वही स्वर चल रहा है।

(2) एक छिद्र से अधिक एवं दूसरे छिद्र से कम वेग का श्वास निकलता प्रतीत हो तो यह सुषुम्ना के साथ मुख्य स्वर कहलाएगा।

(3) एक अन्य विधि के अनुसार आईने को नासाछिद्रों के नीचे रखें। जिस तरफ के छिद्र के नीचे काँच पर वाष्प के कण दिखाई दें, वही स्वर चालू समझें।

जीवन में स्वर का चमत्कार

स्वर विज्ञान अपने आप में दुनिया का महानतम ज्योतिष विज्ञान है जिसके संकेत कभी गलत नहीं जाते।
शरीर की मानसिक और शारीरिक क्रियाओं से लेकर दैवीय सम्पर्कों और परिवेशीय घटनाओं तक को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला स्वर विज्ञान दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है।
स्वर विज्ञान का सहारा लेकर आप जीवन को नई दिशा दृष्टि डे सकते है.
दिव्य जीवन का निर्माण कर सकते हैं, लौकिक एवं पारलौकिक यात्रा को सफल बना सकते हैं। यही नहीं तो आप अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति और क्षेत्र की धाराओं तक को बदल सकने का सामर्थ्य पा जाते हैं।
अपनी नाक के दो छिद्र होते हैं। इनमें से सामान्य अवस्था में एक ही छिद्र से हवा का आवागमन होता रहता है। कभी दायां तो कभी बांया। जिस समय स्वर बदलता है उस समय कुछ सैकण्ड के लिए दोनों नाक में हवा निकलती प्रतीत होती है। इसके अलावा कभी – कभी सुषुम्ना नाड़ी के चलते समय दोनों नासिक छिद्रों से हवा निकलती है। दोनों तरफ सांस निकलने का समय योगियों के लिए योग मार्ग में प्रवेश करने का समय होता है।
बांयी तरफ सांस आवागमन का मतलब है आपके शरीर की इड़ा नाड़ी में वायु प्रवाह है।
इसके विपरीत दांयी नाड़ी पिंगला है।
दोनों के मध्य सुषुम्ना नाड़ी का स्वर प्रवाह होता है।

अपनी नाक से निकलने वाली साँस को परखने मात्र से आप जीवन के कई कार्यों को बेहतर बना सकते हैं। सांस का संबंध तिथियों और वारों से जोड़कर इसे और अधिक आसान बना दिया गया है।
जिस तिथि को जो सांस होना चाहिए, वही यदि होगा तो आपका दिन अच्छा जाएगा। इसके विपरीत होने पर आपका दिन बिगड़ा ही रहेगा। इसलिये साँस पर ध्यान दें और जीवन विकास की यात्रा को गति दें।
मंगल, शनि और रवि का संबंध सूर्य स्वर से है जबकि शेष का संबंध चन्द्र स्वर से।
आपके दांये नथुने से निकलने वाली सांस पिंगला है। इस स्वर को सूर्य स्वर कहा जाता है। यह गरम होती है।
जबकि बांयी ओर से निकलने वाले स्वर को इड़ा नाड़ी का स्वर कहा जाता है। इसका संबंध चन्द्र से है और यह स्वर ठण्डा है।

शुक्ल पक्ष:-

• प्रतिपदा, द्वितीया व तृतीया बांया (उल्टा)
• चतुर्थी, पंचमी एवं षष्ठी -दांया (सीधा)
• सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी बांया (उल्टा)
• दशमी, एकादशी एवं द्वादशी –दांया (सीधा)
• त्रयोदशी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमा – बांया (उल्टा)

कृष्ण पक्ष:-
• प्रतिपदा, द्वितीया व तृतीया दांया (सीधा)
• चतुर्थी, पंचमी एवं षष्ठी बांया (उल्टा)
• सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी दांया(सीधा)
• दशमी, एकादशी एवं द्वादशी बांया(उल्टा)
• त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या –दांया(सीधा)

सवेरे नींद से जगते ही नासिका से स्वर देखें। जिस तिथि को जो स्वर होना चाहिए, वह हो तो बिस्तर पर उठकर स्वर वाले नासिका छिद्र की तरफ के हाथ की हथेली का चुम्बन ले लें और उसी दिशा में मुंह पर हाथ फिरा लें।

यदि बांये स्वर का दिन हो तो बिस्तर से उतरते समय बांया पैर जमीन पर रखकर नीचे उतरें, फिर दायां पैर बांये से मिला लें और इसके बाद दुबारा बांया पैर आगे निकल कर आगे बढ़ लें।
यदि दांये स्वर का दिन हो और दांया स्वर ही निकल रहा हो तो बिस्तर पर उठकर दांयी हथेली का चुम्बन ले लें और फिर बिस्तर से जमीन पर पैर रखते समय पर पहले दांया पैर जमीन पर रखें और आगे बढ़ लें।

यदि जिस तिथि को स्वर हो, उसके विपरीत नासिका से स्वर निकल रहा हो तो बिस्तर से नीचे नहीं उतरें और जिस तिथि का स्वर होना चाहिए उसके विपरीत करवट लेट लें। इससे जो स्वर चाहिए, वह शुरू हो जाएगा और उसके बाद ही बिस्तर से नीचे उतरें।

स्नान, भोजन, शौच आदि के वक्त दाहिना स्वर रखें।
पानी, चाय, काफी आदि पेय पदार्थ पीने, पेशाब करने, अच्छे काम करने आदि में बांया स्वर होना चाहिए।
जब शरीर अत्यधिक गर्मी महसूस करे तब दाहिनी करवट लेट लें और बांया स्वर शुरू कर दें। इससे तत्काल शरीर ठण्ढक अनुभव करेगा।

जब शरीर ज्यादा शीतलता महसूस करे तब बांयी करवट लेट लें, इससे दाहिना स्वर शुरू हो जाएगा और शरीर जल्दी गर्मी महसूस करेगा।
जिस किसी व्यक्ति से कोई काम हो, उसे अपने उस तरफ रखें जिस तरफ की नासिका का स्वर निकल रहा हो। इससे काम निकलने में आसानी रहेगी।

जब नाक से दोनों स्वर निकलें, तब किसी भी अच्छी बात का चिन्तन न करें अन्यथा वह बिगड़ जाएगी। इस समय यात्रा न करें अन्यथा अनिष्ट होगा। इस समय सिर्फ भगवान का चिन्तन ही करें। इस समय ध्यान करें तो ध्यान जल्दी लगेगा।

दक्षिणायन शुरू होने के दिन प्रातःकाल जगते ही यदि चन्द्र स्वर हो तो पूरे छह माह अच्छे गुजरते हैं। इसी प्रकार उत्तरायण शुरू होने के दिन प्रातः जगते ही सूर्य स्वर हो तो पूरे छह माह बढ़िया गुजरते हैं। कहा गया है – कर्के चन्द्रा, मकरे भानु।

रोजाना स्नान के बाद जब भी कपड़े पहनें, पहले स्वर देखें और जिस तरफ स्वर चल रहा हो उस तरफ से कपड़े पहनना शुरू करें और साथ में यह मंत्र बोलते जाएं – ॐ जीवं रक्ष। इससे दुर्घटनाओं का खतरा हमेशा के लिए टल जाता है।

आप घर में हो या आफिस में, कोई आपसे मिलने आए और आप चाहते हैं कि वह ज्यादा समय आपके पास नहीं बैठा रहे। ऎसे में जब भी सामने वाला व्यक्ति आपके कक्ष में प्रवेश करे उसी समय आप अपनी पूरी साँस को बाहर निकाल फेंकियें, इसके बाद वह व्यक्ति जब आपके करीब आकर हाथ मिलाये, तब हाथ मिलाते समय भी यही क्रिया गोपनीय रूप से दोहरा दें।

आप देखेंगे कि वह व्यक्ति आपके पास ज्यादा बैठ नहीं पाएगा, कोई न कोई ऎसा कारण उपस्थित हो जाएगा कि उसे लौटना ही पड़ेगा। इसके विपरीत आप किसी को अपने पास ज्यादा देर बिठाना चाहें तो कक्ष प्रवेश तथा हाथ मिलाने की क्रियाओं के वक्त सांस को अन्दर खींच लें। आपकी इच्छा होगी तभी वह व्यक्ति लौट पाएगा।
कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है, लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है। ऐसे समय में स्वर की प्रतीक्षा करने पर उत्तम अवसर हाथों से निकल सकता है, अत: स्वर परिवर्तन के द्वारा अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए प्रस्थान करना चाहिए या कार्य प्रारंभ करना चाहिए। स्वर विज्ञान का सम्यक ज्ञान आपको सदैव अनुकूल परिणाम प्रदान करवा सकता है।

कब करें कौन सा काम

ग्रहों को देखे बिना स्वर विज्ञान के ज्ञान से अनेक समस्याओं, बाधाओं एवं शुभ परिणामों का बोध इन नाड़ियों से होने लगता है, जिससे अशुभ का निराकरण भी आसानी से किया जा सकता है।चंद्रमा एवं सूर्य की रश्मियों का प्रभाव स्वरों पर पड़ता है। चंद्रमा का गुण शीतल एवं सूर्य का उष्ण है।
शीतलता से स्थिरता, गंभीरता, विवेक आदि गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज, शौर्य, चंचलता, उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुण पैदा होते हैं। किसी भी काम का अंतिम परिणाम उसके आरंभ पर निर्भर करता है। शरीर व मन की स्थिति, चंद्र व सूर्य या अन्य ग्रहों एवं नाड़ियों को भलीभांति पहचान कर यदि काम शुरु करें तो परिणाम अनुकूल निकलते हैं।
स्वर वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चंद्र स्वर में किए जाने चाहिए, जैसे विवाह, दान, मंदिर, जलाशय निर्माण, नया वस्त्र धारण करना, घर बनाना, आभूषण खरीदना, शांति अनुष्ठान कर्म, व्यापार, बीज बोना, दूर प्रदेशों की यात्रा, विद्यारंभ, धर्म, यज्ञ, दीक्षा, मंत्र, योग क्रिया आदि ऐसे कार्य हैं कि जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की आवश्यकता होती है।
इसीलिए चंद्र स्वर के चलते इन कार्यो का आरंभ शुभ परिणामदायक होता है। उत्तेजना, आवेश और जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनमें सूर्य स्वर उत्तम कहा जाता है। दाहिने नथुने से श्वास ठीक आ रही हो अर्थात सूर्य स्वर चल रहा हो तो परिणाम अनुकूल मिलने वाला होता है।

दबाए मानसिक विकार

कुछ समय के लिए दोनों नाड़ियां चलती हैं अत: प्राय: शरीर संधि अवस्था में होता है। इस समय पारलौकिक भावनाएं जागृत होती हैं। संसार की ओर से विरक्ति, उदासीनता और अरुचि होने लगती है। इस समय में परमार्थ चिंतन, ईश्वर आराधना आदि की जाए, तो सफलता प्राप्त हो सकती है। यह काल सुषुम्ना नाड़ी का होता है, इसमें मानसिक विकार दब जाते हैं और आत्मिक भाव का उदय होता है।

अन्य उपाय

यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो जो स्वर नहीं चल रहा है, उस पैर को आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए तथा अचलित स्वर की ओर उस पुरुष या महिला को लेकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करने से क्रोधी व्यक्ति के क्रोध को आपका अविचलित स्वर का शांत भाग शांत बना देगा और मनोरथ की सिद्धि होगी।
गुरु, मित्र, अधिकारी, राजा, मंत्री आदि से वाम स्वर से ही वार्ता करनी चाहिए। कई बार ऐसे अवसर भी आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है।ऐसे समय स्वर बदलने के प्रयास करने चाहिए।
स्वर को परिवर्तित कर अपने अनुकूल करने के लिए कुछ उपाय कर लेने चाहिए। जिस नथुने से श्वास नहीं आ रही हो, उससे दूसरे नथुने को दबाकर पहले नथुने से श्वास निकालें। इस तरह कुछ ही देर में स्वर परिवर्तित हो जाएगा। घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना प्रारंभ हो जाता है। 

महाभद्रकाली

महाभद्रकाली
 
देवी महाकाली एक स्वरूप श्मशान काली का है जो विनाश करती हैं और दूसरी सौम्यमूर्ति भद्रकाली हैं जो सुख समृद्धि प्रदान करती हैं।तांत्रिक देवी भद्र काली का अर्थ है रचनात्मक मैट्रिक्स (सांस्कृतिक, सामाजिक या राजनीतिक वातावरण जिसमें कुछ विकसित होता है)। वह सर्वोच्च रचनात्मकता है। भद्रकाली का अर्थ है, कालातीत सिद्धांत (कालजयी शक्ति)।

 वह सन के रंग की चमक के साथ (धागे के लिए उगाए गए नीले फूलों वाला एक पौधा) खिलती है, ज्वलनशील सोने से बने झुमके के साथ, लंबे मुड़े हुए बालों से सुशोभित, और वर्धमान (चंद्रमा) के साथ तीन हीरे के साथ, हार के रूप में एक साँप और सोने के हार से सुशोभित; हमेशा त्रिशूल और चक्र, तलवार, शंख, तीर, भाला, वज्र और दाहिनी भुजाओं में एक छड़ी धारण किए हुए, अपने उज्ज्वल दांतों से शानदार दिखती है, देवी लगातार एक ढाल, एक खाल, एक धनुष रखती हैं उसके हाथों में एक फंदा, एक हुक, एक घंटी, एक कुल्हाड़ी और एक गदा (क्रमशः सबसे ऊपर से सबसे नीचे तक) होता है।महाकाली को काली का एक बड़ा रूप माना जाता है, जिसे ब्रह्म की अंतिम वास्तविकता के साथ पहचाना जाता है।  उन्हें शक्ति के रूप में उनके सार्वभौमिक रूप में देवी के रूप में चित्रित किया गया है। यहां देवी उस एजेंट के रूप में कार्य करती है जो ब्रह्मांडीय व्यवस्था को बहाल करने की अनुमति देता है।

2-काली को भद्रकाली रूप में दस सिर, दस हाथ और दस पैर के रूप में दर्शाया गया है।उसके दस सिर बताते हैं कि वह स्वयं दस महाविद्या है छवि को दस भुजाओं के साथ प्रदर्शित किया जा सकता है, जो एक ही अवधारणा को दर्शाता है: विभिन्न देवताओं की शक्तियाँ उनकी कृपा से ही आती हैं। इसे देवी काली के सम्मान के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जो उपसर्ग "महा-" द्वारा उनकी महानता को दर्शाता है। महाकाली, संस्कृत में, व्युत्पत्ति रूप से महाकाल या महान समय (जिसे मृत्यु के रूप में भी व्याख्या की जाती है) का स्त्री रूप है, हिंदू धर्म में भगवान शिव का एक विशेषण है। उसके दस हाथों में से प्रत्येक में एक अलग उपकरण है जो अलग-अलग खातों में भिन्न होता है, लेकिन इनमें से प्रत्येक देव या हिंदू देवताओं में से एक की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है और अक्सर किसी दिए गए देवता की पहचान करने वाला हथियार या अनुष्ठान  होता है। निहितार्थ यह है कि महाकाली इन देवताओं के पास मौजूद शक्तियों के लिए जिम्मेदार हैं और यह इस व्याख्या के अनुरूप है कि महाकाली ब्रह्म के समान हैं।

 3-कालिकापुराण में भद्रकाली का सीधा संबंध महिषासुर मर्दिनी से है, "वह जो भैंसा दानव को मारती है।"

यह माँ दुर्गा का एक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय रूप है, और सभी विभिन्न शक्तियों (नारी शक्तियों) को एक साथ एक ही रूप में लाता है।यद्यपि उसका नाम काली है, उसके पास एक सुनहरा - काला नहीं - रंग है, सुनहरे सन के बीज का रंग है।

उसकी आठ भुजाओं में धारण किए गए चिन्ह उसकी पहचान विभिन्न देवताओं और शक्तियों से करते हैं, जैसे

1-शिव-त्रिशूल 2-विष्णु - डिस्कस (चक्र), शंख3-इंद्र - वज्र 4-राजा राजेश्वरी/त्रिपुरा सुंदरी - तीर, धनुष, फंदा, बकरी (अंकुश)/हुक..संहिता के अनुसार उन्हें रुद्रकाली के नाम से भी जाना जाता है। ये देवी सोलह पंखुड़ियों की अंगूठी पर स्थित हैं और अघोरमंत्र के बत्तीस अक्षरों का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रत्येक देवता (भद्रकाली सहित) छोटा, मोटा और बड़े पेट वाला है। वे अपनी इच्छा से कोई भी रूप धारण कर सकते हैं, प्रत्येक की सोलह भुजाएँ हैं, और सभी एक अलग जानवर पर आरूढ़ हैं।भद्रकाली को कोमल काली के रूप में भी जाना जाता है, जो देवी के क्रोध से उत्पन्न हुईं, जब दक्ष ने शिव का अपमान किया। वह वीरभद्र की पत्नी हैं।यह पूर्ण शून्यता और पूर्ण परिपूर्णता है। माँ काली विरोधाभासी अवतार हैं, संघर्ष का सामना हम तब करते हैं जब हम एक ही समय में हमारे दिमाग में दो कंडक्टिंग (लीड या गाइड) लेकिन समान रूप से सच्चे प्रतिमान (देखने का एक तरीका) या विचार रखते हैं।उस संघर्ष के केंद्र में अद्वैत की शक्ति है, जिसकी गैर-बौद्धिक प्राप्ति ही समस्त तांत्रिक साधना का लक्ष्य है। और उस संघर्ष में शामिल होने में शुभता, जबरदस्त आशीर्वाद है।उनका मंत्र लोगों को अपने जीवन से बुरे प्रभावों को दूर करने में मदद करेगा। इस मंत्र का जाप और जप निश्चित अवधि तक करने से हमारे जीवन से सभी बुरे प्रभाव स्थायी रूप से दूर हो जाते हैं।

A-माँ भद्रकाली मंत्र;--ॐ क्रीं क्रीं महाकालिके क्रीं क्रीं फट् स्वाहा॥

(Om Kreem Kreem Maha Kalike Kreem Kreem  Phat Svaha

ह्रीं ॐ  भद्रकाल्यै /भद्रकालयै नमः

 मां के अद्भुत प्रतीकों की व्याख्या; --

1- महा भद्रकाली का भयंकर रूप भयानक प्रतीकों से ओत-प्रोत है।उनका काला रंग उनके सर्वव्यापी और पारलौकिक स्वभाव का प्रतीक है। महाननिर्वाण तंत्र कहता है: "जैसे काले रंग में सभी रंग गायब हो जाते हैं, वैसे ही उसके सभी नाम और रूप गायब हो जाते हैं"।

2- उसकी नग्नता प्रकृति की तरह आदिम, मौलिक और पारदर्शी है - पृथ्वी, समुद्र और आकाश। काली माया के आवरण से मुक्त है, क्योंकि वह सभी माया या "झूठी चेतना" से परे है। 

3- काली की चौसठ  मानव सिर की माला जो संस्कृत वर्णमाला के पचास   अक्षरों का प्रतीक है, अनंत ज्ञान का प्रतीक है। महा भद्रकाली को इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह काल (समय) को खा जाती है और फिर अपने स्वयं के अंधेरे निराकार को फिर से शुरू कर देती है।" वह सृष्टि के बीज की सर्वोच्च नियंत्रक हैं।

4- कटे हुए मानव हाथों की उसकी कमर काम और कर्म के चक्र से मुक्ति का प्रतीक है।

5- उसके सफेद दांत उसकी आंतरिक पवित्रता को दर्शाते हैं, और उसकी लाल रंग की जीभ उसके सर्वभक्षी स्वभाव को इंगित करती है - "दुनिया के सभी 'स्वादों' का उसका अंधाधुंध आनंद।" 6-उसकी तलवार झूठी चेतना और हमें बांधने वाले आठ बंधनों का नाश करने वाली है।

7-उसकी तीन आंखें अतीत, वर्तमान और भविष्य का प्रतिनिधित्व करती हैं, - समय के तीन तरीके एक विशेषता है जो कि काली (संस्कृत में 'काल' का अर्थ है समय) में निहित है।

8- महा भद्रकाली की श्मशान भूमि से निकटता जहां पांच तत्व या "पंच महाभूत" एक साथ आते हैं और सभी सांसारिक मोह दूर हो जाते हैं, फिर से जन्म और मृत्यु के चक्र की ओर इशारा करते हैं।

9-लेटे हुए (आराम की स्थिति में लेट जाएं) काली के चरणों के नीचे लेटे हुए शिव बताते हैं कि काली (शक्ति) की शक्ति के बिना, शिव निष्क्रिय हैं।

10--सिर मानवता के "अहंकार" का प्रतिनिधित्व करता है।इच्छा को दूर करने के लिए तलवार का प्रयोग हमें "अहंकार" से अलग करने के लिए किया जाता हैऔर हमें भौतिक/भौतिक संसार (माया) से बचने और परमात्मा के करीब होने में मदद करें।जब आप ध्यान करते हैं और अपने शरीर और भौतिक दुनिया के बारे में जागरूकता फीकी पड़ जाती है, तो आप उसके इस पहलू का अनुभव कर रहे होते हैं।

11-अपने बचे हुए हाथों से वह अक्सर इशारों (मुद्रा) बनाती है या वस्तुओं (कमल के फूल, शंख) को धारण करती है जो वरदान देने और भय को दूर करने जैसी चीजों का प्रतिनिधित्व करती है।

12-वह अपने गले में खोपड़ियों की माला, या मानव भुजाओं से बनी स्कर्ट पहन सकती है. प्रायः 50 खोपड़ियाँ होती हैं—संस्कृत वर्णमाला के प्रत्येक अक्षर के लिए एक। इसलिए, खोपड़ी की माला प्रभुत्व और शब्दों और विचार की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, वास्तव में सभी ज्ञान।एक साथ बुनी हुई खोपड़ियाँ भी समस्त सृष्टि की परस्पर संबद्धता का प्रतिनिधित्व करती हैं। सृष्टि, प्रकृति प्रकट, सुंदर हो सकती है; हालाँकि, यह सबसे अच्छा भी हो सकता है, और कभी-कभी पूरी तरह से निर्दयी भी हो सकता है। हथियारों की स्कर्ट काम पर उसकी शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है- चीजों को "करने" की हमारी क्षमता-हमारे कर्म।
देवी काली के भेद........
कालिका-पुराण’ में उल्लेख हैं कि आदि-सृष्टि में भगवती ने महिषासुर को “उग्र-चण्डी” रुप से मारा एवं द्वितीयसृष्टि में ‘उग्र-चण्डी’ ही “महा-काली” अथवा महामाया कहलाई गयी है ।इसी का नाम “भद्रकाली” भी है । भगवती कात्यायनी ‘दशभुजा’ वाली दुर्गा है । इन्ही को “उग्र-काली” कहा गया है । “वीर-काली” अष्ट-भुजा हैं, इन्होंने ही चण्ड का विनाश किया  था ।देवी काली के अलग -अलग तंत्रों में अनेक भेद हैं ।अष्ट काली के भेद इस प्रकार हैं -
 1-संहार-काली,
 2-दक्षिण-काली,
 3-भद्र-काली,
 4-गुह्य-काली,
 5-महा-काली,
 6-वीर-काली,
 7-उग्र-काली तथा
 8-चण्ड-काली ।
1-संहार-काली; – 

समयाचार रहस्य में उपरोक्त स्वरुपों से सम्बन्धित अन्य स्वरुप भेदों का वर्णन किया है ।सभी संहार-कालिका के भेद स्वरुप हैं । संहार कालिका का महामंत्र  125 वर्ण का ‘मुण्ड-माला तंत्र’ में लिखा हैं, जो प्रबल-शत्रु-नाशक हैं। “संहार-काली” की चार भुजाएँ हैं यही ‘धूम्र-लोचन’ का वध करने वाली हैं । 
  1-प्रत्यंगिरा, 2-भवानी,  3-वाग्वादिनी 4-शिवा, 5-भेदों से युक्त भैरवी, 6- योगिनी,  7-शाकिनी, 8-चण्डिका 9-रक्तचामुण्डा 
   2-दक्षिण-कालिका;-

बत्तीस प्रकार की यक्षिणी, तारा और छिन्नमस्ता ये सभी दक्षिण कालिका के स्वरुप हैं ।
  1-कराली,2- विकराली, 3-उमा, 4- मुञ्जुघोषा, 5-चन्द्र-रेखा, 6- चित्र-रेखा,7- त्रिजटा,8-  द्विजा, 9- एकजटा 10-नीलपताका, 
  3-भद्र-काली ;-

ये सभी भद्र-काली के विभिन्न रुप हैं ... 
   1- वारुणी,2- वामनी, 3- राक्षसी, 4- रावणी, 5- आग्नेयी, 6- महामारी,7- घुर्घुरी, 8-  सिंहवक्त्रा 9- भुजंगी,10-  गारुडी,  11-आसुरी-दुर्गा 
 4-गुह्य-काली/श्मशान-काली; – 
  भेदों से युक्त सभी श्मशान काली के विभिन्न रुप हैं ...1- मातंगी, 2- सिद्धकाली,3- धूमावती,  4- आर्द्रपटी चामुण्डा, 5-  नीला,   6- नीलसरस्वती, 7- घर्मटी, 8- भर्कटी, 9-  उन्मुखी तथा 10- हंसी 
  5-महा-काली;-

ये सभी महा--कालिका के भेद रुप हैं ....
1- महामाया,  2- वैष्णवी, 3- नारसिंही, 4-  वाराही, 5- ब्राह्मी, 6- माहेश्वरी, 7- कौमारी, इत्यादि अष्ट-शक्तियाँ है, भेदों से युक्त-धारा, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा इत्यादि सब नदियाँ महाकाली का स्वरुप हैं ।

6-वीर-काली ;-

ये सभी वीरकाली के नाम भेद हैं...

 1-श्रीविद्या, 2- भुवनेश्वरी, 3- पद्मावती,4- अन्नपूर्णा,  5- रक्त-दंतिका,  6- बाला-त्रिपुर-सुंदरी,7- षोडशी की एवं काली की षोडश नित्यायें,  8-कालरात्ति,  9-वशीनी,10-  बगलामुखी  ।  
 7-उग्र-काली; -

ये सब उग्रकाली के विभिन्न नाम रुप हैं...
  1- शूलिनी 2- जयरुप-दुर्गा, 3-  महिषमर्दिनी दुर्गा, 4- शैल-पुत्री,  5- नव-दुर्गाएँ, 6. भ्रामरी, 7- शाकम्भरी,8- बंध-मोक्षणिका।   

8-चण्ड-काली;-

 चण्ड-काली’के  विषय में दुर्गा-सप्तशती में कहा हैं कि  “चण्ड-काली” की बत्तीस भुजाएँ हैं एवं शुम्भ का वध किया था ।

गुप्त नवरात्र का महत्व

गुप्त नवरात्र का महत्व


देवी दुर्गा को शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि वही इस चराचर जगत में शक्ति का संचार करती हैं। उनकी आराधना के लिये ही साल में दो बार बड़े स्तर पर लगातार नौ दिनों तक उनके अनेक रूपों की पूजा की जाती है। 9 दिनों तक मनाये जाने वाले इस पर्व को नवरात्र कहा जाता है।एक हिन्दी वर्ष में चार बार नवरात्र आती है। दो नवरात्र सामान्य होती हैं और दो गुप्त होती हैं। चैत्र और आश्विन मास में आने वाली नवरात्र से ज्यादा महत्व गुप्त नवरात्र का माना जाता है।माघ नवरात्री उत्तरी भारत में अधिक प्रसिद्ध है, और आषाढ़ नवरात्रि मुख्य रूप से दक्षिणी भारत में लोकप्रिय है।   
साल में दो बार गुप्त नवरात्र  में मां दुर्गा की दस महाविद्याओं की पूजा की जाती है। यह साधना हालांकि चैत्र और शारदीय नवरात्र से कठिन होती है लेकिन मान्यता है कि इस साधना के परिणाम बड़े आश्चर्यचकित करने वाले मिलते हैं। इसलिये तंत्र विद्या में विश्वास रखने वाले तांत्रिकों के लिये यह नवरात्र बहुत खास माने जाते हैं।मान्यता है कि गुप्त नवरात्र में की जाने वाली साधना को गुप्त रखा जाता है। इस साधना से देवी जल्दी प्रसन्न होती है। चूंकि मां की आराधना गुप्त रूप से की जाती है इसलिए इसको गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। 
पौराणिक काल से ही गुप्त नवरात्रि में शक्ति की उपासना की जाती है ताकि जीवन तनाव मुक्त रहे। माना जाता है कि जीवन में अगर कोई समस्या है तो उससे निजात  पाने के लिए माँ शक्ति के खास मंत्रों के जप से उससे मुक्ति पाई जा सकती है। 
शक्ति के दो प्रकार ;-
कुछ चीजें गुप्त होती हैं तो कुछ प्रगट। शक्ति भी दो प्रकार की होती है। एक आंतरिक और दूसरी बाह्य। आंतरिक शक्ति का संबंध सीधे तौर पर व्यक्ति के चारित्रिक गुणों से होता है। कहते हैं कि हम क्या है, यह हम ही जानते हैं। दूसरा रूप वह है जो सबके सामने है। हम जैसा दिखते हैं, जैसा करते हैं, जैसा सोचते हैं और जैसा व्यवहार में दिखते हैं। यह सर्वविदित और सर्वदृष्टिगत होता है।लेकिन हमारी आंतरिक शक्ति और ऊर्जा के बारे में केवल हम ही जानते हैं। आंतरिक ऊर्जा या शक्ति को दस रूपों में हैं। साधारण शब्दों में इनको धर्म, अर्थ, प्रबंधन, प्रशासन, मन, मस्तिष्क, आंतरिक शक्ति या स्वास्थ्य, योजना, काम और स्मरण के रूप में लिया जाता है। हमारे लोक व्यवहार में बहुत सी बातें गुप्त होती हैं और कुछ प्रगट करने वाली। यही शक्तियां समन्वित रूप से महाविद्या कही गई हैं। गुप्त नवरात्र दस महाविद्या की आराधना का पर्व है।इन दस महाविद्याओं की होती है विशेष पूजा....गुप्त नवरात्रि में 10 महाविद्याओं का पूजन किया जाता है।ये दस महाविद्याएं मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी हैं।  

क्या है गुप्त नवरात्र की पूजा विधि;-

1-जहां तक पूजा की विधि का सवाल है मान्यतानुसार गुप्त नवरात्र के दौरान भी पूजा अन्य नवरात्र की तरह ही करनी चाहिये।शारदीय और चैत्र नवरात्र की तरह ही गुप्त नवरात्र में कलश स्थापना की जाती है। नौ दिनों तक व्रत का संकल्प लेते हुए प्रतिपदा को घटस्थापना कर प्रतिदिन सुबह शाम मां दुर्गा की पूजा की जाती है। अष्टमी या नवमी के दिन कन्याओं के पूजन के साथ व्रत का उद्यापन किया जाता है।देवी भागवत के अनुसार जिस तरह वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है।तंत्र साधना वाले साधक इन दिनों में माता के नवरूपों की बजाय दस महाविद्याओं की साधना करते हैं।इस पूजा के विषय में किसी और को नहीं बताना चाहिए और मन से मां दुर्गा की आराधना में तल्लीन रहना चाहिए।
इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं।भगवान विष्णु शयन काल की अवधि के बीच होते हैं तब देव शक्तियां कमजोर होने लगती हैं। उस समय पृथ्वी पर रुद्र, वरुण, यम आदि का प्रकोप बढ़ने लगता है इन विपत्तियों से बचाव के लिए गुप्त नवरात्र में मां दुर्गा की उपासना की जाती है।

दस महाविद्या और गुप्त नवरात्र;-

श्री दुर्गा सप्तशती में कीलकम् में कहा जाता है कि भगवान शंकर ने बहुत सी विद्याओं को गुप्त कर दिया। यह विद्या कौन सी हैं? प्रसंग सती का है। भगवान शंकर की पत्नी सती ने जिद की कि वह अपने पिता दक्ष प्रजापति के यहां अवश्य जाएंगी। प्रजापति ने यज्ञ में न सती को बुलाया और न अपने दामाद भगवान शंकर को। शंकर जी ने कहा कि बिना बुलाए कहीं नहीं जाते हैं। लेकिन सती जिद पर अड़ गईं। सती ने उस समय अपनी दस महाविद्याओं का प्रदर्शन किया।शंकर जी ने सती से पूछा- 'कौन हैं ये?' सती ने बताया,‘ये मेरे दस रूप हैं। सामने काली हैं। नीले रंग की तारा हैं। पश्चिम में छिन्नमस्ता, बाएं भुवनेश्वरी, पीठ के पीछे बगलामुखी, पूर्व-दक्षिण में धूमावती, दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी, पश्चिम-उत्तर में मातंगी तथा उत्तर-पूर्व में षोड़शी हैं। मैं खुद भैरवी रूप में अभयदान देती हूं।

 2-इन्हीं दस महाविद्याओं के साथ देवी भगवती ने असुरों के साथ संग्राम भी किया। चंड-मुंड और शुम्भ-निशुम्भ वध के समय देवी की यही दश महाविद्या युद्ध करती रहीं। दश महाविद्या की आराधना अपने आंतरिक गुणों और आंतरिक शक्तियों के विकास के लिए की जाती है। यदि अकारण भय सताता हो, शत्रु परेशान करते हों, धर्म और आध्यात्म में मार्ग प्रशस्त करना हो, विद्या-बुद्धि और विवेक का परस्पर समन्वय नहीं कर पाते हों, उनके लिए दश महाविद्या की पूजा विशेष फलदायी है।चैत्र और शारदीय नवरात्र की तुलना में गुप्‍त नवरात्र में देवी की साधना ज्‍यादा कठिन होती है। इस दौरान मां दुर्गा की आराधना गुप्‍त रूप से की जाती है इसलिए इन्‍हें गुप्‍त नवरात्र कहा जाता है। इन नवरात्र में मानसिक पूजा का महत्व है। वाचन गुप्त होता है। लेकिन सतर्कता भी आवश्यक है। ऐसा कोई नियम नहीं है कि गुप्त नवरात्र केवल तांत्रिक विद्या के लिए ही होते हैं। इनको कोई भी कर सकता है लेकिन थोड़ी सतर्कता रखनी आवश्यक है। दश महाविद्या की पूजा सरल नहीं।

कालीकुल और श्री कुल...
जिस प्रकार भगवान शंकर के दो रूप हैं एक रुद्र ( काल-महाकाल) और दूसरे शिव, उसी प्रकार देवी भगवती के भी दो कुल हैं- एक काली कुल और श्री कुल। काली कुल उग्रता का प्रतीक है।काली कुल में महाकाली, तारा, छिन्नमस्ता और भुवनेश्वरी हैं। यह स्वभाव से उग्र हैं। श्री कुल की देवियों में महा-त्रिपुर सुंदरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला हैं। धूमावती को छोड़कर सभी सौंदर्य की प्रतीक हैं।नवरात्र की देवियां...नौ दुर्गा : 1. शैलपुत्री, 2. ब्रह्मचारिणी, 3. चंद्रघंटा, 4. कुष्मांडा, 5. स्कंदमाता, 6. कात्यायनी, 7. कालरात्रि, 8. महागौरी 9. सिद्धिदात्री।गुप्त नवरात्र की देवियां..दस महा विद्या : 1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4.भुवनेश्वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।

 4-दस महाविद्या किसकी प्रतीक?-
1-काली ( समस्त बाधाओं से मुक्ति)
2-तारा ( आर्थिक उन्नति)
3-त्रिपुर सुंदरी ( सौंदर्य और ऐश्वर्य)
4-भुवनेश्वरी ( सुख और शांति)
5-छिन्नमस्ता ( वैभव, शत्रु पर विजय, सम्मोहन)
6-त्रिपुर भैरवी ( सुख-वैभव, विपत्तियों को हरने वाली)
7-धूमावती ( दरिद्रता विनाशिनी)
8-बगलामुखी ( वाद विवाद में विजय, शत्रु पर विजय)
9-मातंगी ( ज्ञान, विज्ञान, सिद्धि, साधना )
10-कमला ( परम वैभव और धन)
 5- गुप्त नवरात्र से जुड़ी पौराणिक कथा;-
 कथा के अनुसार एक बार ऋषि श्रंगी भक्तों को प्रवचन दे रहे थे। इसी दौरान भीड़ से एक स्त्री हाथ जोड़कर ऋषि के सामने आई और अपनी समस्या बताने लगी। स्त्री ने कहा कि उनके पति दुर्व्यसनों से घिरे हैं और इसलिए वह किसी भी प्रकार का व्रत, धार्मिक अनुष्ठान आदि नहीं कर पाती। स्त्री ने साथ ही कहा कि वह मां दुर्गा के शरण में जाना चाहती है लेकिन पति के पापाचार के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है।यह सुन ऋषि ने बताया कि शारदीय और चैत्र नवरात्र में तो हर कोई मां दुर्गा की पूजा करता है और इससे सब परिचित भी हैं लेकिन इसके अलावा भी दो और नवरात्र हैं। ऋषि ने बताया कि दो गुप्त नवरात्र में 9 देवियों की बजाय 10 महाविद्याओं की उपासना की जाती है। ऋषि ने स्त्री से कहा कि इसे करने से सभी प्रकार के दुख दूर होंगे और जीवन खुशियों से भर जाएगा। ऐसा सुनकर स्त्री ने गुप्त नवरात्र में गुप्त रूप से ऋषि के अनुसार मां दुर्गा की कठोर साधना की। मां दुर्गा इस श्रद्धा और भक्ति से हुईं और इसका असर ये हुआ कि कुमार्ग पर चलने वाला उसका पति सुमार्ग की ओर अग्रसर हुआ। साथ ही स्त्री का घर भी खुशियों से भर गया।

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 ब्रह्म मंत्र  और उनका शक्ति बीज मंत्र;-

ब्रह्म मंत्र का जाप करने से हमें जीवन के चार उद्देश्य धार्मिकता, समृद्धि, सुख और मुक्ति को पूरा करने में मदद मिलती है। जो लोग ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं उनके लिए भी ब्रह्म  मंत्र अच्छे हैं। नीचे  ब्रह्म के तथा गुप्त नवरात्र में साधना के लिए ब्रह्म-शक्ति.. दो मंत्र दिए गए हैं...
1- "  ओम सत चिद एकं ब्रह्मः  "
2- "ओम ऐं ह्रीं श्रीं क्लीम  सौः सच्चिद एकं ब्रह्मः "
 ब्रह्म कौन है? -
  "ओम ब्रह्म का नाम है, जिसने इस ब्रह्मांड को अपने तीन गुणों (प्रकृति के गुण: सकारात्मक, नकारात्मक और मौन) के साथ बनाया, जिसने सभी चीजों को रूप दिया और जो सार्वभौमिक है।"ब्रह्मांड के रचनात्मक सिद्धांत को संस्कृत में ब्रह्म कहा जाता है। ब्रह्म सारी सृष्टि के लिए एक रूपक है: इसके नियम, इसकी अंतर्निहित बुद्धि, और इसकी सचेत रूप से प्रकट शक्तियाँ जो संतों, संतों, ऋषियों, देवों, आकाशीय और सभी प्रकार की प्रकृति, स्वभाव और विवरण के दिव्य प्राणियों के रूप में कार्य करती हैं।ओम उपनिषदों में दिया गया संस्कृत नाम है जो सभी प्रकट और अव्यक्त लोकों का योग और सार है।ब्रह्म  वह है जो न तो बनाया गया हैं और न ही नष्ट हुआ हैं बल्कि सृजन, जीवन से परे है।ब्रह्म इस ब्रह्मांड के रूप में बनाता है, संचालित करता है और ब्रह्मांड का विनाश करता है । 
ब्रह्म मंत्र का अर्थ ;- ;-
सत = सत्य
चिद  = आध्यात्मिक मन की बातें
एकम = एक, एक सेकंड के बिना
ब्रह्म = यह संपूर्ण ब्रह्मांड, इसकी सभी सामग्री के साथ
बीज के साथ ब्रह्म मंत्र;- "ओम ऐं ह्रीं श्रीं क्लीम  सौः सच्चिद एकं ब्रह्मः "
ओम;-
ओम कई मंत्रों का उपसर्ग है। यह भौंह केंद्र पर आज्ञा चक्र में ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है, जहां स्त्री और पुरुष धाराएं जुड़ जाती हैं और चेतना एकात्मक और समग्र हो जाती है।
 ऐं ;- (उद्देश्य)
 माँ सरस्वती के नाम से जाने जाने वाले स्त्री सिद्धांत के लिए एक बीज ध्वनि है। यह सिद्धांत आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ शिक्षा, विज्ञान, कला, संगीत और आध्यात्मिक अनुशासन की भौतिक गतिविधियों को नियंत्रित करता है।
 ह्रीं ;-
"महामाया" या सृष्टि के पर्दे के लिए एक बीज ध्वनि है। ऐसा कहा जाता है कि इस बीज ध्वनि पर ध्यान करने से ध्यानी को अंततः ब्रह्मांड को "जैसा है" दिखाया जाएगा, न कि जैसा कि हम इसे वर्तमान में देखते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वास्तविकता जैसा कि हम देखते हैं, यह वास्तव में हम सभी के बीच एक "समझौता" है जो पीढ़ी से पीढ़ी तक पारित होता है। बच्चे, अगर वे बात कर सकते हैं, तो ब्रह्मांड के बारे में काफी अलग तरीके से बात करेंगे। वे अंततः सीखते हैं कि मानवता का "समझौता" क्या है और वे दुनिया में कार्य करना शुरू कर देते हैं।  
श्रीं ;-
 माँ  लक्ष्मीके सिद्धांत के लिए बीज ध्वनि है। इसमें भोजन, दोस्तों, परिवार, स्वास्थ्य और असंख्य अन्य चीजों की प्रचुरता  अर्थात समृद्धि शामिल है।
 क्लीम;-
 माँ   काली के सिद्धांत के लिए बीज ध्वनि और कई अर्थों वाला एक बीज है। वर्तमान संदर्भ में यह आकर्षण का सिद्धांत है। इस मंत्र में मंत्र ध्यान की प्रक्रिया को तेज करने के लिए अन्य सिद्धांतों के फल को आकर्षित कर रहा है।
 सौः ;-
 यह एक आध्यात्मिक सिद्धांत है जो आज्ञा चक्र में एक पंखुड़ी के माध्यम से संचालित होता है। यह एक शक्ति सक्रिय करने वाली ध्वनि भी है।
सत;- सत्य
चिद ;- आध्यात्मिक मन की बातें
एकम: एक, एक सेकंड के बिना
ब्रह्म: -यह संपूर्ण ब्रह्मांड, इसकी सभी सामग्री के साथ, जिसे कभी-कभी ब्रह्म भी कहा जाता है, सचेत अस्तित्व की स्थिति जो सब कुछ के साथ एक है।

Friday, January 16, 2026

श्रीविद्या

 
साधना के प्रकार;

यह साधना मुख्यतः दो प्रकार से की जाती है :-

प्रथम प्रकार में (दीक्षा लेकर):- 

1-श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा लेकर साधना संपन्न की जाती है, जिसका प्रथम चरण पूर्ण होने के बाद शेष तीन चरणों के लिए साधक स्वतन्त्र हो जाता है, और केवल कर्ता व दृष्टा मात्र होता है, क्योंकि प्रथम पद धर्म में स्थित होने के बाद के तीनों चरणों में पराम्बा द्वारा अपने साधक को स्वयं में लीन कर लेने तक की क्रिया को पराम्बा अपने साधक से स्वयं ही संपन्न कराती है, और इसी मध्य पराम्बा अपने साधक के सभी कर्मों को भी आंशिक रूप में भोगवाकर कर्मों के बंधन से निवृत कर देती है, क्योंकि मोक्ष के लिए कर्म बंधन से निवृत्ति परम अनिवार्य है ! 

2-इस प्रकार से शेष तीन चरण भी सहज ही संपन्न हो जाते हैं, और साधक को नियमों की बाध्यता भी प्रभावित नहीं करती है ! यह विधि सर्वोत्तम है क्योंकि इसमें एक बार प्रथम चरण किसी प्रकार पूर्ण होने के बाद साधक पर पराम्बा का स्वतन्त्र नियन्त्रण हो जाने के कारण पथभ्रष्ट, पतन व त्रुटि होने की सम्भावनाएं पुर्णतः शून्य हो जाती हैं ! 

3-किन्तु इस विधि से साधना करने वाले साधक को गुरुगम्य होना भी अनिवार्य होता है, तभी तो गुरु उस शिष्य की पात्रता व ग्राह्यता के आधार पर उसको गहन रहस्यों को समझाते हुए सफल होने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है !

दुसरे प्रकार में (दीक्षा अनिवार्य नहीं ) :-

1-उपरोक्त महाविद्या शक्तियों की बालरूपा से वृद्धा रूपा तक की चारों महाविद्याओं की एक-एक करके क्रमशः क्रमशः धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करते हुए साधना की जाती है, इसमें प्रत्येक अवस्था के अनुसार पृथक-पृथक नियमों की बाध्यता सहित साधना विधान पूर्ण करना 

पड़ता है ! 

2-यह अनिवार्य नहीं होता है कि चारों महाविद्याओं के पृथक-पृथक साधना विधान एक-एक या दो-दो बार में ही निर्बाध संपन्न हो जायेंगे! 

3-यदि यह क्रम पूर्ण हो जाए तब पराम्बा चतुर्थ चरण में अपने साधक के सभी कर्मों को भी आंशिक रूप में भोगवाकर कर्मों के बंधन से निवृत कर उसका मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है !

4-किन्तु चारों पुरुषार्थों की कामना करने वाले साधकों को अकेले किसी एक महाविद्या की साधना करके चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेने की भावना व आग्रह से सदैव दूर ही रहना चाहिए, क्योंकि यदि आप केवल धर्म की सूचक बाल स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो धर्म के साथ-साथ आपके पास धन व सत्ता भी हो यह अनिवार्य नहीं है, क्योंकि बाल स्वरुपा महाविद्या पुर्णतः धर्म ही सिखाती हैं ! 

5-और यदि आप केवल अर्थ की सूचक तरुण स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो थोड़ा सा धन हाथ में आते ही आप धर्म को कैसे भूल जाते हैं यह आपको स्वयं ही ज्ञात है, क्योंकि तरुण स्वरुपा महाविद्या अतिशय धन के मार्ग बनाती हैं ! 

6-इसी प्रकार से यदि आप केवल काम की सूचक प्रौढ़ा स्वरुपा महाविद्या की उपासना करते हैं तो थोड़ा सा धन ओर भले ही छोटा सा ग्राम प्रधान के रूप में थोड़ी सत्ता हाथ में आते ही आप धर्म, नीति ओर मानवता को कैसे भूल जाते हैं यह भी आपको स्वयं ही ज्ञात है, क्योंकि प्रौढ़ा स्वरुपा महाविद्या शासन सत्ता प्रदान करती हैं !

7- तो फिर ऐसे में कर्म बंधन से मुक्त हुए बिना चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति केवल दिवास्वपन से अधिक और कुछ नहीं है, किन्तु यदि धर्म की सूचक बाल स्वरुपा महाविद्या की उपासना व उसका अनुसरण करते हैं तो धर्म जनित संस्कार आपको मोक्ष मार्गी होने के लिए प्रेरित अवश्य ही करेंगे !

8-चारों पुरुषार्थों की कामना करने वाले साधकों को श्रीविद्या क्रम के सम्पूर्ण चारों क्रम की साधना को संपन्न करना चाहिए ! और इस प्रकार से किसी भी कुल में श्रीविद्या की चारों क्रम की पूर्ण साधना संपन्न कर चुका साधक धर्म से प्रारम्भ होकर मोक्ष तक निश्चित ही पहुँच जाता है, यह परम सत्य है !

श्रीविद्या साधना क्रम;-‘

`1-दस महा-विद्याओ’ में तीसरी महा-विद्या भगवती षोडशी है, अतः इन्हें तृतीया भी कहते हैं । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि वास्तव में आदि-शक्ति एक ही हैं, उन्हीं का आदि रुप ‘काली’ है और उसी रुप का विकसित स्वरुप ‘षोडशी’ है, इसी से ‘षोडशी’ को ‘रक्त-काली’ नाम से भी स्मरण किया जाता है । भगवती तारा का रुप ‘काली’ और ‘षोडशी’ के मध्य का विकसित स्वरुप है । प्रधानता दो ही रुपों की मानी जाती है और तदनुसार ‘काली-कुल′ एवं ‘श्री-कुल′ इन दो विभागों में दशों महा-विद्यायें परिगणित होती हैं ।

2-माँ की पूजाप्रधान रूप से  चार स्वरूपों में होती है ।भगवती षोडशी के मुख्यतःचार रुप हैं ;–

( 1) श्री बाला त्रिपुर-सुन्दरी या श्री बाला त्रिपुरा,

( 2) श्री षोडशी या महा-त्रिपुर सुन्दरी तथा

( 3) श्री राज-राजेश्वरी

( 4)ललिता त्रिपुर-सुन्दरी या श्री श्रीविद्या

 3-माँ की दीक्षा और साधना भी इसी क्रम में करनी चाहिए। 

 3-1- श्री बाल सुंदरी  >8 वर्षीया कन्या रूप में>धर्म,

 3-2- षोडशी त्रिपुर सुंदरी >16 वर्षीया सुंदरी>अर्थ

 3-3-श्रीराज-राजेश्वरी>युवा स्वरूप>काम

 3-4- श्रीललिता त्रिपुर सुंदरी > वृद्धा रूप>मोक्ष

4-श्री विद्या की प्रधान देवि ललिता त्रिपुर सुन्दरी है । यह धन, ऐश्वर्य भोग एवं मोक्ष की अधिष्ठातृ देवी है । अन्य विद्यायें को मोक्ष की विशेष फलदा है, तो कोई भोग की विशेष फलदा है परन्तु श्रीविद्या की उपासना से दोनों ही करतल-गत हैं ।

5-इसकी उपासना तंत्रों में अति रहस्यमय व गुप्त है तथा पूर्व जन्म के विशेष संस्कारों के बलवान होने पर ही इस विद्या की दीक्षा का योग माना है । साधक को क्रम-पूर्वक दीक्षा लेनी चाहिए तभी उत्तम रहता है । कहीं-कहीं ऐसा देखा गया है कि जिन्होंने क्रम-दीक्षा के बिना ललिता त्रिपुर सुन्दरी की उपासना सीधे की है, उन्हें पहले आर्थिक कठिनाईयाँ प्राप्त हुई है एवं बाद में उसका विकास हुआ ।

1-श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी साधना क्रम;-

1-‘श्री बाला’ का मुख्य मन्त्र तीन अक्षरों का है और उनका पूजा-यन्त्र ‘नव-योन्यात्मक’ है । अतः उन्हें ‘त्रिपुरा’ या ‘त्र्यक्षरी’ नामों से भी अभिहित करते हैं ।

2-श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी मंत्र:- 

ॐ - ऐं - क्लीं – सौः

रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। 

51 माला मंत्र 21 दिन तक लगातार जप अवश्य करें ।

3-मंत्र कब होता है सिद्ध.. 04 लाख बार जपने पर 

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2-षोडशी त्रिपुर सुंदरी साधना क्रम;-

1-ध्यान मंत्र;-

बालार्कायुंत तेजसं त्रिनयना रक्ताम्ब रोल्लासिनों। 

नानालंक ति राजमानवपुशं बोलडुराट शेखराम्।। 

हस्तैरिक्षुधनु: सृणिं सुमशरं पाशं मुदा विभृती। 

श्रीचक्र स्थित सुंदरीं त्रिजगता माधारभूता स्मरेत्।।

2-आवाहन मंत्र;-

ऊं त्रिपुर सुंदरी पार्वती देवी मम गृहे आगच्छ आवहयामि स्थापयामि।

रुद्राक्ष/कमल गट्टे की माला लेकर करीब नीचे लिखे मंत्र का जप करें 

3-पंचदशी मंत्र:-

ॐ क ए इ ल ह्रीं ।

ह स क ह ल ह्रीं। 

स क ल ह्रीं ॥

श्रावण मास में आराधना;-

1-श्रावण मास में शिव कृपा पाने के लिए भक्त कई तरह की पूजा करते हैं। इस दौरान यदि माता त्रिपुर सुंदरी की आराधना की जाए, तो भक्त कई परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं। मां त्रिपुर सुंदरी पार्वती का ही रूप हैं और इन्हें प्रसन्न करने का अर्थ है, शिव कृपा की प्राप्ति। यह मास पूजा-पाठ एवं शिव आराधना का महीना है। इस दौरान शिव जी की स्तुति करने से भक्तों के जीवन में खुशहाली आती है और उनके राह की बाधाएं भी दूर होती हैं। इस मास में शिव आराधना का काफी अधिक महत्व है।

2-दरअसल हमार जीवन एवं शरीर नौ ग्रहों से प्रेरित होता है। इन ग्रहों में चंद्रमा पृथ्वी के निकटस्थ होने की वजह से हमारे शरीर पर सबसे अधिक प्रभाव डालता है। चंद्रमा के स्वामी हैं, शिव। श्रावण ऐसा मास है, जिसमें वातावरण में अत्यधिक नमी होती है। यह सब चंद्रमा के प्रभाव की वजह से होता है। इसलिए इस मास में शिव को प्रसन्न करने का उपाय किया जाता है, ताकि उनकी कृपा से शिव कृपा से भी भक्त लाभान्वित हो जाएं।

3- अगर चंद्रमा की कृपा भक्तों पर हो जाए, तो हमें राजसी सुख मिल सकते हैं और यश भी मिलता है। अगर व्यापारिक क्षेत्रों में तरक्की चाहते हों, तो वे इस मास में किसी भी सप्ताह यह साधना कर सकते हैं। दस महाविधाओं में से एक महाविद्या त्रिपुर सुंदरी, राज राजेश्वरी, षोड्षी, पार्वती जी की सूक्ष्म साधना भी लाभप्रद साबित हो सकती है।

4-इस मास के लिए किसी भी सोमवार से अगले सोमवार तक साधना की जा सकती है। प्रात: से लेकर रात्रि तक जो भी समय सुविधापूर्ण लगे, उसमें साधना की जा सकती है। साधना काल के सप्ताह में मांस, मदिरा आदि अभक्ष्य पदार्थों के सेवन से परहेज करना चाहिए। साथ ही अनैतिक कृत्यों से भी बचना चाहिए।

5-साधना आरंभ करने से पहले स्नान आदि कर शुद्ध होकर सफेद वस्त्र धारण करें। इसके बाद रेशमी या सफेद रंग के वस्त्र का आसन लें। एक सुपारी को कलावे से अच्छी तरह लपेटकर उसे एक थाली में सफेद वस्त्र के ऊपर रखें। अब देवी पार्वती का ध्यान करते हुए उनसे प्रार्थना करते हुए उनसे उस सुपारी में अपना अंश प्रदान करने की प्रार्थना करें। यह क्रिया ग्यारह बार करें। अब देवी का ध्यान, आवाहन मंत्र जपे।

6-इसके बाद देवी को सुपारी में प्रतिष्ठित कर दें। इसे तिलक करें और धूप-दीप आदि पूजन सामग्रियों के साथ पंचोपचार विधि से पूजन पूर्ण करें अब कमल गट्टे की माला लेकर उपरोक्त लिखे मंत्र का जप करें

7-जब मंत्र जप पूर्ण हो जाए, तो देवी जी से आज्ञा लेकर अपने द्वारा की गई गलतियों की क्षमा मांगकर पूजन कार्य समाप्त करें। यह प्रक्रिया लगातार सात दिनों तक करें। आठवें दिन खील, सफेद तिल, बताशे, चीनी और गुलाब के फूल, बेल पत्र को एक साथ मिलाकर 108 आहूतियों से हवन करें। हवन के लिए मंत्र के आगे ऊं नम: स्वाहा: जोड़कर मंत्रोच्चार करें।

8-साधना आरंभ करने से पहले यह संकल्प जरूर लें कि साधना का उद्देश्य क्या है और यथाशक्ति दान क्या होगा? इस साधना से आपकी कामना पूरी होगी और शिव कृपा भी मिलेगी। पूजा के बाद पूजन सामग्री को एक जगह इकट्ठा कीजिए और देवी से प्रार्थना करें कि वे अब अपने स्थान पर वापस जा सकती हैं। उन्हें धन्यवाद देते हुए साधना का विसर्जन करें। इसके बाद सारी पूजन सामग्री की माला ,प्रतिष्ठित सुपारी को आदरपूर्वक नदी में विसर्जित करें।

9-मंत्र कब होता है सिद्ध .. 16 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है ।

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3-श्रीराज-राजेश्वरी साधना क्रम;-

श्री राजराजेश्वरी महाविद्या का मूल स्वरूप और साधना विधान ;-

1-भगवती राजराजेश्वरी मूलप्रकृति शक्ति की सुन्दर प्रौढ़ावस्था स्वरूप श्री विग्रह वाली देवी हैं । उदय कालीन सूर्य के समान जिनकी कान्ति है, चतुर्भुजी, त्रिनेत्री, पाश, अंकुश, इक्षु (गन्ना) व पद्म की मुद्रा को धारण किये हुए हैं ।

2- ये भगवती सहज व शांत मुद्रा में सृष्टि संचालक ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र व इन्द्र रूपी चार स्तम्भों के ऊपर स्थित पंचमहाभूतों के संयुक्त स्वरूप शिव रूपी आधारपृष्ठ पर माया "ह"कार की मुद्रा में विराजमान होती हैं । जो जीव इनका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं उनमें और कुबेर में कोई भेद नहीं रह जाता है । ललिता, राजराजेश्वरी, षोडशी, बाला, आदि इनकी विभिन्न अवस्थाओं नाम हैं ।

3-भगवती राजराजेश्वरी श्यामा और अरूण वर्ण के भेद से दो कही गयी है प्रथम श्यामा रूप में श्री आनन्दभैरवी, कहलाती हैं तथा द्वितीय अरूण वर्णा श्री राजराजेश्वरी कहलाती हैं ।

4-ये शक्ति तीनों लोकों के समस्त शासन, सत्ता, आदि राजसी सर्वैश्वर्यों से परिपूर्ण हैं, इसलिए ये राजराजेश्वरी, कमला, महाराज्ञी व महासम्राज्ञी कहलाती हैं ।

5-भगवती राजराजेश्वरी इस सृष्टि के सर्वोच्च आध्यात्म साधना विधान "श्रीविद्या" समूह के अधीन तृतीय पुरुषार्थ "काम" की कुल भेद के अनुसार चार अधिष्ठात्रियों में से एक देवी हैं, व अखिल ब्रह्माण्ड के द्योतक श्रीचक्र में इनका निवास माना जाता है, जिस कारण इनको श्रीविद्या की देवी व श्रीचक्रराज निलया के रूप में भी जाना जाता है।

6-इनकी साधना (अर्थात जप, तप, आत्मसंधान, यज्ञ आदि के द्वारा परा या अपरा अवस्था में स्वयं को इनकी शक्ति में अथवा इनकी शक्ति को स्वयं में विलय करने की प्रक्रिया) प्रमुख रूप में निम्नलिखित दो प्रकार से की जाती है :-

1- महाविद्या साधना विधान :-

1-1-राजराजेश्वरी महाविद्या के रूप में पंचदशाक्षरी मन्त्रों से इनकी साधना की जाती है, महाविद्या रूप में इनकी साधना को संपन्न करने से इस साधना के परिणाम स्वरूप भगवती राजराजेश्वरी अपने महाविद्या साधक के जीवन को समस्त प्रकार के केवल भौतिक शासन, सत्ता, राज सुख, यश, ऐश्वर्य, कीर्ति, धन, धान्य, समृद्धि रत्न, पुत्र आदि सर्वैश्वर्यों से सम्पन्न कर देती हैं !

1-2-महाविद्या के रूप में इनकी साधना करने से केवल भौतिक सम्पन्नता की ही प्राप्ति होती है, जिस सम्पन्नता के मद में स्वार्थवश जीव अपनी मानवीय, धार्मिक, नैतिक व न्यायिक सीमाओं का अतिक्रमण करने से तनिक भी नहीं चूकता है ! अतः इस प्रकार से की जाने वाली साधना पुर्णतः भौतिक साधना होती है, जिसमें धर्म व आध्यात्म की उपस्थिति व लाभ अनिवार्य नहीं होता है, साधक स्वयं के प्रयास से स्वयं को मानवीय, धार्मिक, नैतिक व न्यायिक सीमाओं का अतिक्रमण करने से रोक कर आध्यात्मिक बना रह सकता है !

यह साधना मन्त्र भेद के अनुसार 11, 21 या 41 दिन में विधिवत् सम्पन्न कर ली जाती है !

2- श्रीविद्या साधना विधान :-

2-1-श्रीकुल की रीती से "श्रीविद्या पूर्णाभिषेक" में दीक्षित हुआ साधक अपनी श्रीविद्या साधना के अन्तर्गत श्रीविद्या के नियमानुसार "षोडशाक्षरी विद्या" द्वारा सबसे पहले प्रथम पुरुषार्थ "धर्म" की अधिष्ठात्री के रूप में बालस्वरुप व द्वितीय पुरुषार्थ "अर्थ" की अधिष्ठात्री की अधिष्ठात्री तरुण स्वरूपा की साधना सम्पन्न करने के उपरान्त तृतीय पुरुषार्थ "काम" की अधिष्ठात्री के प्रौढ़ स्वरूप में भगवती राजराजेश्वरी का ध्यान करते हुए इनकी साधना को सम्पन्न करता है !

2-2-साधक की यह साधना विधिवत् संपन्न हो जाने पर भगवती राजराजेश्वरी अपने श्रीविद्या साधक के निष्पाप "धर्म व अर्थमय" जीवन को "धर्म व अर्थ से परिपूर्ण काम" पुरुषार्थ प्रदान कर समस्त प्रकार के शासन, सत्ता, राज सुख, यश, ऐश्वर्य, कीर्ति, धन, धान्य, समृद्धि रत्न, पुत्र आदि सर्वैश्वर्यों से सम्पन्न कर उसके लिए शेष अन्तिम पुरुषार्थ "मोक्ष" पुरुषार्थों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर उसको अग्रिम साधना की ओर अग्रसारित करने के साथ ही उसकी साधना में "मोक्ष" पुरुषार्थ प्राप्त होने तक आध्यात्म मार्ग में स्वयं उसका पूर्ण मार्गदर्शन व सहयोग करती हैं ।

2-3-इस प्रकार से की गई साधना पूर्ण रूप से आध्यात्मिक साधना होती है, क्योंकि इस साधनाकाल में भगवती षोडशी द्वारा पहले ही श्रीविद्या साधक को "धर्म" में स्थित कर दिए जाने पर भगवती त्रिपुरसुन्दरी द्वारा "धर्म से परिपूर्ण अर्थ" पुरुषार्थ प्रदान किया जाता है, जिसके परिणाम स्वरूप वाह्यान्तर से निष्पाप हो चुका व "धर्म से परिपूर्ण अर्थ व काम" से समृद्ध हुआ साधक नीति, धर्म, मानवता व न्याय के विपरीत कोई कर्म ही नहीं करता है !

2-4-श्रीविद्या साधना विधान "षोडशाक्षरी विद्या" के अन्तर्गत होने के कारण पृथक से किसी महाविद्या की दीक्षा नहीं लेनी होती है, केवल श्रीविद्या साधना विधान के अनुसार साधक के प्रथम व द्वितीय पुरुषार्थ "धर्म व अर्थ" में स्थित हो जाने पर यह साधना भगवती राजराजेश्वरी द्वारा स्वयं ही सम्पन्न करा ली जाती है !

2-5-इनकी उपासना (अर्थात विभिन्न प्रकार से पूजा, पाठ, अर्चना, यज्ञ, स्तोत्र, भक्ति, आदि के द्वारा इनको परा अवस्था में प्रसन्न (सिद्ध) कर मनोरथ सिद्ध करना, अथवा परा या अपरा अवस्था में स्वयं को इनकी शक्ति में अथवा इनकी शक्ति को स्वयं में विलय करने की प्रक्रिया) "महाविद्या" व "श्रीविद्या" दोनों ही विधान में दीक्षित हुए साधकों द्वारा श्रीचक्र (श्री यन्त्र) या नव योनी चक्र के केंद्र में प्रौढ़स्वरुप में की जाती है ।

2-6-भगवती राजराजेश्वरी अपने स्वभाव के अनुसार ही "महाविद्या" व "श्रीविद्या" दोनों ही विधान में दीक्षित होकर साधना पूर्ण कर चुके साधकों को शासन, सत्ता व राजसुख अवश्य ही प्रदान करती हैं !

2-7-जिस प्रकार जंगल की सूखी हुयी घास और पत्तियों को प्रचंड

अग्नि एक क्षण में जला देती है ठीक उसी प्रकार ये साधना पूर्व

जीवन और इस जीवन के सभी पापों को एक ही क्षण में समाप्त

कर भस्मीभूत कर देती है lये साधना तंत्र का आधारहै ,और इसके

बाद कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता हैl

2-8-इस साधना के प्रभाव से साधक सहस्रार से टपकते अमृत को

धारण करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है ,और वही अमृत

उसके बिंदु के साथ मिलकर ओजस में परिवर्तित हो जाता है

तथा निर्जरा देह और पूर्ण ऐश्वर्य की प्राप्ति कराता है l

2-9-किसी भी शुक्ल पक्ष की पंचमी को इस साधना का प्रारंभ

किया जाता है , साधना के लिए , श्री यन्त्र की आवशयकता

होती है, श्वेत वस्त्र पहनकर मध्य रात्रि में इस साधना

का प्रारम्भ करे,पूर्ण भगवती राजराजेश्वरी की साधना

में सफलता हेतु श्वेत वस्त्र, आसन, श्वेत पुष्प और खीर

से भगवती और श्री यन्त्र का पूजन करे l ये शास्त्रोक्त पद्धति से पंचोपचार पूजन करने के बाद स्फटिक माला से राजराजेश्वरी मन्त्र की

१०८ माला जप करे,

2-10-दीपक शुद्ध घी का होना चाहिए और इस साधना क्रम को

७ दिनों तक संपन्न करना हैlइस साधना के प्रभाव से स्फटिक

माला विजय माला में परिवर्तित हो जाती हैlइस माला को पूरे

जीवन भर धारण करना हैlराज राजेश्वरी मंत्र में ग की ध्वनि आयेगीl

ये एक अद्विय्तीय साधना है ,जिसके द्वारा सम्पूर्ण जीवन को

जगमगाहट से भरा जा सकता हैl

दिव्य भगवती राजराजेश्वरी मंत्र;-

1-''ॐ ऐं ह्रीं श्रीं''

AUM AING HREENG SHREENG

2-षोडशाक्षरी विद्या मंत्र:-

''ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं श्रीं॥

========================

4-माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी आराधना;-

1-ललिता त्रिपुर सुंदरी या त्रिपुर सुंदरी को श्री विद्या भी कहा जाता है ,जो दस महाविद्या में से एक प्रमुख महाविद्या हैं और श्री कुल की अधिष्ठात्री |इन्हें ५१ शक्तिपीठों में भी स्थान प्राप्त है और कामाख्या को भी इनका स्वरुप कहा जाता है [यद्यपि कामाख्या को काली से भी जोड़ा जाता है ]|देवी ललिता आदि शक्ति का वर्णन देवी पुराण में प्राप्त होता है. भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर सती नैमिष में लिंगधारिणीनाम से विख्यात हुईं इन्हें ललिता देवी के नाम से पुकारा जाने लगा.
2-एक अन्य कथा अनुसार ललिता देवी का प्रादुर्भाव तब होता है जब ब्रह्मा जी द्वारा छोडे गये चक्र से पाताल समाप्त होने लगा. इस स्थिति से विचलित होकर ऋषि-मुनि भी घबरा जाते हैं, और संपूर्ण पृथ्वी धीरे-धीरे जलमग्न होने लगती है. तब सभी ऋषि माता ललिता देवी की उपासना करने लगते हैं. उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी जी प्रकट होती हैं तथा इस विनाशकारी चक्र को थाम लेती हैं. सृष्टि पुन: नवजीवन को पाती है.
3-श्री ललिता जयंती पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है. पौराणिक मान्यतानुसार इस दिन देवी ललिता भांडा नामक राक्षस को मारने के लिए अवतार लेती हैं. राक्षस भांडा कामदेव के शरीर के राख से उत्पन्न होता है. इस दिन भक्तगण षोडषोपचार विधि से मां ललिता का पूजन करते है. इस दिन मां ललिता के साथ साथ स्कंदमाता और शिव शंकर की भी शास्त्रानुसार पूजा की जाती है.

4-माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी रक्त काली स्वरूपा हैं।बृहन्नीला तंत्र के अनुसार काली के दो भेद कहे गए हैं कृष्ण वर्ण और रक्त वर्ण।महा विद्याओं में

कोई स्वरुप भोग देने में प्रधान है तो कोई स्वरूप मोक्ष देने में परंतु त्रिपुरसुंदरी अपने साधक को दोनों ही देती है। 

2-शुक्ल पक्ष के समय प्रात:काल माता की पूजा उपासना करनी चाहिए. कालिकापुराण के अनुसार देवी की दो भुजाएं हैं, यह गौर वर्ण की, रक्तिम कमल पर विराजित हैं. प्रतिदिन अथवा पंचमी के दिन ललिता माता के निम्न मंत्र का जाप करने का कुछ विशेष ही महत्व होता है।

माता ललिता का ध्यान धरकर उनकी प्रार्थना एवं निम्न 

मंत्र का जाप करने से मनुष्य सभी कष्टों से मुक्ति पा जाता है।

3-पंचमी के दिन इस ध्यान मंत्र से मां को लाल रंग के पुष्प, लाल वस्त्र आदि भेंट कर इस मंत्र का अधिकाधिक जाप करने से जीवन की आर्थिक समस्याएं दूर होकर धन की प्राप्ति के सुगम मार्ग मिलता है।

4-देवी ललिता जी का ध्यान रुप बहुत ही उज्जवल व प्रकाश मान है. ललिता देवी की पूजा से समृद्धि की प्राप्त होती है. दक्षिणमार्गी शाक्तों के मतानुसार देवी ललिता को चण्डी का स्थान प्राप्त है. इनकी पूजा पद्धति देवी चण्डी के समान ही है।

5-ललिता माता का पवित्र मंत्र :-

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।'

ध्यान मन्त्र से माँ को रक्त पुष्प , वस्त्र आदि चढ़ाकर अधिकाधिक जप करें।

मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है। 

 IN NUTSHELL;-

श्रीविद्या साधना संसार की सर्वश्रेष्ठ साधनाओ मे से एक हैं।ध्यान के बिना केवल मन्त्र का जाप करना श्री विद्या साधना नही है।बिना ध्यान के केवल दस प्रतिशत का ही लाभ मिल सकता है।श्रीविद्या साधना में ध्यान का विशेष महत्व हैं। इसलिए पहले ध्यान का अभ्यास करे व साथ-साथ जप करे,अन्त मे केवल ध्यान करें।

साधना क्रम;-

1- श्री बाल सुंदरी >8 वर्षीया कन्या रूप में>धर्म,

श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी मंत्र:-

ॐ - ऐं - क्लीं – सौः

मंत्र कब होता है सिद्ध.. 04 लाख बार जपने पर

2- षोडशी त्रिपुर सुंदरी >16 वर्षीया सुंदरी>अर्थ

 षोडशी त्रिपुर सुंदरी(पंचदशी) मंत्र:-

ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं ॥

मंत्र कब होता है सिद्ध .. 16 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है ।

3-श्रीराज-राजेश्वरी>युवा स्वरूप>काम

षोडशाक्षरी विद्या मंत्र:-

''ॐ क ए इ ल ह्रीं ।ह स क ह ल ह्रीं। स क ल ह्रीं श्रीं॥

मंत्र कब होता है सिद्ध ..21 लाख बार जपने पर सिद्ध हो जाता है।

 4- श्रीललिता त्रिपुर सुंदरी > वृद्धा रूप>मोक्ष

 ललिता माता का पवित्र मंत्र :-

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।' 

वीर बुलाकी

वीर बुलाकी



कलयुग में ऐसे बहुत से वीर हुए हैं जिन्होंने अपनी शक्तियों के बल पर पूरी दुनिया में अपना डंका बजवाया है और अपने भगतों के ऐसे ऐसे काम सिद्ध किये हैं , जिनको कोई महान शक्तियों का मालिक ही कर सकता है। 

आज हम आप लोगो के सामने एक ऐसे ही लोक देवता बाबा वीर बुलाकी को लेके आये हैं , जो कलयुग में सबसे शक्तिशाली और उग्र देवताओं में गिने जाते हैं। 

ये एक ऐसे देवता हैं जिनकी शक्ति ही गजब की है जहाँ अपनी बात पर रुष्ट होकर अड़ जाये तो फिर बड़े से बड़े देवी और देवता भी इसके सामने हाथ जोडते नजर आते हैं।
इस वीर की बैठ सभी देवियो के पास है सभी देवियाँ इसकी और सभी देवियो का ये वीर बुलाकी जिसे चाहे उसे मना लें जिसका चाहे उसका हो जाए। 
इस कलयुग में ये वीर लोगो के अच्छे और बुरे दोनों तरह के काम करता है। 

वीर बुलाकी का नाम सबसे शक्तिशाली और उग्र देवताओं में आता हैं , जिनके घर वीर बुलाकी कुल देव हैं और बाबा जी उस घर से खुश हैं तो ये उस घर में खुशियों की बारिश कर देते हैं , लेकिन अगर उस घर की कोई पीढ़ी बाबा श्री  का भोग समय से नहीं देती हैं तो ये जल्दी ही रुष्ट होकर बिना नजर में आये उस घर को श्मशान  बना देते हैं। 

आज के इस कलयुग में कुछ लोगों ने पैसों के लालच में आकर इनसे गलत काम कराने शुरू कर दिए हैं जैसे पति-पत्नी में झगड़ा लगवाना , लड़कियों को वश में करवाना फिर उच्चाटन करवाना , कोई भी बीमारी लगवा देना , अपघात करवाना , घर में बंधन लगवाना , मोटापा बढ़ा देना, शादी तुडवा देना,…. इत्यादि , क्योंकि उनको पता है की जिस पर भी बुलाकी या मसानी चढ़ा दिया जाए उसको वही तांत्रिक बुलाकी चढ़ाकर मुक्त कर सकते हैं । 

मसानी की काट बाबा श्री ही हैं और उनकी विद्या वही काट सकते है।

वीर बुलाकी का जन्म

वीर बुलाकी के जन्म के बारे में लोगो के दो मत हैं :-

पहला मत :-

कुछ लोगो के अनुसार एक बार गुरु गोरखनाथ कजली वन में अपना धुना लगा कर ध्यान में बैठे थे, योग विद्या और भविष्य का हाल जान लेने की विद्या के कारण उन्हें बागड़ देश के ददरेड़ा शहर के चौहान वंश के शासन को डावां डोल होने का नजारे का आभास होने लगा। 

गुरु गोरखनाथ को दिखने लगा की उनके परम् शिष्य गोगा वीर अपने क्रोध के कारण भारी संकट का सामना करेंगे और बागड़ देश में शनि देव का आगमन होग। 

उन्हें पता था की गोगा वीर अपने दोनों मौसेरे भाइयो को मारकर उनका अंत करेगा और भले ही कोई इसका विरोध न करें लेकिन धर्म राज शनि देव नही बख्सेंगे।

 इससे गोगा वीर को बचाने के लिए ही गुरु गोरखनाथ ने बाछल के द्वारा गोगा वीर को देश निकला दिया था। लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था,  गोगा वीर को देश निकाला दिए जाने के बाद भी गोगा वीर 8 साल तक रानी श्रियल से रात के अंधेरे में मिलते रहे। 

इसी प्रकार मिलन होने से बाबा जाहर जती के संपर्क में आने पर माता श्रियल गर्भ धारण कर लेती हैं। माता श्रियल के गर्भवती होते ही गुरु गोरख नाथ को शनि देव के बागड़ में प्रवेश करने के पुख्ता साबुत मिल जाते है।

 उन्हें पता चल जाता हैं के रानी श्रीयल के गर्भ में जो बच्चा हैं वह खुद शनि देव हैं तो वे अपने चेले गोगा पीर से उस गर्भ को त्यागने की बात कहते हैं। परन्तु वहां एक समस्या यह उत्पन्न हो गयी की इस गर्भ को त्यागा कैसे जाये क्योंकि अगर किसी राज दाई को बुलावा भेजा जाये तो पूरी रियासत को पता चल जायेगा 

और ये गर्भ नाजायज माना जायेगा जिससे माता श्रीयल के सात्विकता को भी कलंक लगेगा और यदि इस गर्भ को गोगा वीर का मान दे दिया जाये तो गोगा वीर अपनी माँ बाछल को दिए वचन को भंग करने का दोषी माना जायेगा। 

इस समस्या का समाधान करने के लिए गुरु गोरखनाथ ने अपने वीरो को उस गर्भ को माता श्रीयल के गर्भ से मायावी रूप में हटाने को कहा लेकिन उनका एक भी वीर ऐसा करने में सफल नहीं हो पाया क्योंकि माता श्रीयल एक स्त्री थी।

 तब गुरु गोरखनाथ ने जगत जननी आदि शक्ति माता मदानण का आवाहन किया और उस संकट की परिस्थिति में सहायक होने की प्रार्थना की, माता मदानण ने तब मसानी का रूप भर कर उस गर्भ को रानी श्रीयल के गर्भ से हटाया। 

माता मदानण ने उस गर्भ को अपने आँचल में जगह दे कर बागड़ से प्रस्थान किया, लेकिन गर्भ सूर्य पुत्र शनि देव का अंश होने के कारण बहुत ही तेजमय था और उसका तेज इतना भयंकर था था की उसे संभालना ज्यादा देर तक नामुमकिन था। 

माता मदानण जैसे ही उस गर्भ को लेकर बागड़ से निकली और कजरी वन पहुंची वैसे ही गर्भ मां के आंचल को फाड़ते हुए कजरी वन में गिर पड़ा , जहां – जहां तक ये गर्भ गिरा कजरी वन में वहा वहा तक आग लग चली थी। 

फिसल कर जाते समय ये गोरख धुनें से टकराया जो दो हिस्सों में बंट गया। धुनें का एक हिस्सा वही गोरख नाथ की आन में रुक गया जो आगे चलकर कजरी वन के काळा देव के नाम से जाना गया और दूसरा हिस्सा दिल्ली के तख्त हजारा पर गिरा जो बुलाकी वीर के नाम से जाना गया। 

जिस वक़्त दिल्ली के हजारा तख्त पर गर्भ गिरा था उस वक़्त वह मुगलों का शासन था। जहाँ पर पंज पीर की बैठक थी। गर्भ का हिस्सा होने के कारन पंज पीरों ने उस तख्त का त्याग किया और उस तख्त पर फिर बाबा बुलाकी ने अपना पहली बार बाल रूप धारण कर उस तखत पर अपना अधिपत्य स्थापित किया।

दूसरा मत : –

कुछ लोगो का मानना हैं की बाबा श्री वीर बुलाकी कोई और नही स्वयं बाबा महाकाल भैरव नाथ है , जो कलयुग में मसान भैरव की छवि के साथ बुलाकी मसान के नाम से अवतरित हुए है क्योंकि बुलाकी का अर्थ है बालक या बटुक और मसान का अर्थ है शमशान है । 

उनका मानना हैं की इनकी कोई ऐसी माँ नही है जिसकी योनि या गर्भ से इन्होंने जन्म लिया हो। बाबा श्री के पहनावे और रूप रंग से देखो तो, एक ऐसा बालक वीर जो रंग से काला हाथ में सोटा एक हाथ में मदिरा पान का पात्र (खप्पर) और लाल लंगोट के साथ लँगोट धारी हैं 

 और लड्डुओं के साथ मदिरा भोग जो स्वयं महाकाल भैरव की छवी दिखती है। उनका मानना हैं की ये कट्टर सनातनी वीर हैं , इसलिए इसने इस्लाम के विरुद्ध सुअर की बली स्वीकार की है। 

बिगड़े रूप में ये मुसलमानो के मुर्दे भी नोच नोच कर खा जाये तभी तो ये समसान का अघोर वीर है , अघोर वीर बुलाकी है। 

इस वीर की भक्ति नाथों की है और शक्ति भी नाथों की है।
जो भी साधक इस वीर की सेवा पूजा पाठ सच्चे मन से निस्वार्थ भाव से करेगा ये वीर बाबा उस साधक को नाथों की सेवा में लगा देते है।
फिर ये इस साधक को भुत प्रेतों की सेवा में नही रहने देते हैं।

वीर बुलाकी का खेड़ा 

वीर बुलाकी का खेड़ा उत्तर प्रदेश के आगरा के रसूलपुर , अर्जुन नगर में हैं। 

यहाँ पर कृष्णा पक्ष की पडवा के दिन लाखो की संख्या में लोग वीर बुलाकी के दर्शन करने आते हैं। लोगो का मानना हैं की जिस पर बाबा वीर बुलाकी खुश हो जाते हैं उस पर धन और दौलत की वर्षा कर देते हैं, उसके अन्न और धन के भंडारे सदा भरे रहते हैं। हजारों की संख्या में भगतजन बाबा वीर बुलाकी के सामने उनके खेडे पर मन्नत मांगते हैं।

वैदिक तन्त्र साधना

 वैदिक तन्त्र साधना



हिंदू धर्म में हजारों तरह की विद्याओं और साधनाओं का वर्णन मिलता है।

साधना से सिद्धियां प्राप्त होती हैं। व्यक्ति सिद्धियां इसलिए प्राप्त करना चाहता है, क्योंकि या तो वह उससे सांसारिक लाभ प्राप्त करना चाहता है या फिर आध्यात्मिक लाभ।

साधना के चार प्रकार माने जा सकते हैं-

तंत्र साधना, मंत्र साधना, यंत्र साधना और योग साधना। चारों ही तरह की साधना के कई उप प्रकार हैं।

तंत्र साधना क्या है?

तंत्र विद्या, साधना या तंत्र शास्त्र का नाम सुनते ही लोगों में भय व्याप्त हो जाता है। माना जाता है कि यह कोई भयानक विद्या या अघोरियों की साधना होगी। लेकिन ऐसा नहीं है।

अघोर साधना अलग होती है और तंत्र साधना अलग।

तंत्र, मंत्र और यंत्र में तंत्र को सबसे पहले रखा गया है।

तंत्र एक रहस्यमयी विद्या है। हिन्दू धर्म के साथ ही बौद्ध और जैन धर्म में भी इस विद्या का प्रचलन है।

आओ जानते हैं कि तंत्र विद्या के 10 रहस्य...

1. तंत्र में शरीर है महत्वपूर्ण : साधारण अर्थ में तंत्र का अंर्थ तन से, मंत्र का अर्थ मन से और यंत्र का अर्थ किसी मशीन या वस्तु से होता है। तंत्र का एक दूसरा अर्थ होता है व्यवस्था। तंत्र मानता है कि हम शरीर में है यह एक वास्तविकता है। भौतिक शरीर ही हमारे सभी कार्यों का एक केंद्र है। अत: इस शरीर को हर तरह से तृप्त और स्वस्थ रखना अत्यंत जरूरी है। इस शरीर की क्षमता को बढ़ाना जरूरी है। इस शरीर से ही अध्यात्म को साधा जा सकता है। योग भी यही कहता है।

तंत्र का मांस, मदिरा और संभोग से किसी भी प्रकार का संबंध नहीं है, जो व्यक्ति इस तरह के घोर कर्म में लिप्त है, वह कभी तांत्रिक नहीं बन सकता। तंत्र को इसी तरह के लोगों ने बदनाम कर दिया है। तांत्रिक साधना का मूल उद्देश्य सिद्धि से साक्षात्कार करना है। इसके लिए अंतर्मुखी होकर साधनाएं की जाती हैं।

2.तंत्र के ग्रंथ :

तंत्र को मूलत: शैव आगम शास्त्रों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका मूल अथर्ववेद में पाया जाता है।

तंत्र शास्त्र 3 भागों में विभक्त है आगम तंत्र, यामल तंत्र और मुख्‍य तंत्र। आगम में शैवागम, रुद्रागम और भैरवागमन प्रमुख है।

वाराहीतंत्र के अनुसार जिसमें सृष्टि प्रलय, देवताओं की पूजा, सत्कर्यों के साधन, पुरश्चरण, षट्कर्मसाधन और चार प्रकार के ध्यानयोग का वर्णन हो उसे 'आगम' कहते हैं। जिसमें सृष्टितत्त्व, ज्योतिष, नित्य कृत्य, क्रम, सूत्र, वर्णभेद और युगधर्म का वर्णन हो उसे 'यामल' कहते हैं।

इसी तरह जिसमें सृष्टि, लय, मन्त्र, निर्णय, तीर्थ, आश्रमधर्म, कल्प, ज्योतिषसंस्थान, व्रतकथा, शौच-अशौच, स्त्रीपुरुषलक्षण, राजधर्म, दानधर्म, युगधर्म, व्यवहार तथा आध्यात्मिक नियमों का वर्णन हो, वह 'मुख्य तंत्र' कहलाता है।

वाराही तंत्र के अनुसार तंत्र के नौ लाख श्लोकों में एक लाख श्लोक भारत में हैं। तंत्र साहित्य विस्मृति के चलते विनाश और उपेक्षा का शिकार हो गया है।

तंत्र शास्त्र के अनेक ग्रंथ लुप्त हो चुके हैं।

वर्तमान में प्राप्त सूचनाओं के अनुसार 199 तंत्र ग्रंथ हैं।

तंत्र का विस्तार ईसा पूर्व से तेरहवीं शताब्दी तक बड़े प्रभावशाली रूप में भारत, चीन, तिब्बत, थाईदेश, मंगोलिया, कंबोज आदि देशों में रहा। तंत्र को तिब्बती भाषा में ऋगयुद कहा जाता है।

समस्त ऋगयुद 78 भागों में है जिनमें 2640 स्वतंत्र ग्रंथ हैं। इनमें कई ग्रंथ भारतीय तंत्र ग्रंथों का अनुवाद है और कई तिब्बती तपस्वियों द्वारा रचित है।

3.रहस्यमयी विद्याएं :

तंत्र में बहुत सारी विद्याएं आती है उसी में एक है गुह्य-विद्या। गुह्य का अर्थ है रहस्य। तंत्र विद्या के माध्‍यम से व्यक्ति अपनी आत्मशक्ति का विकास करके कई तरह की शक्तियों से संपन्न हो सकता है। यही तंत्र का उद्देश्य है। इसी तरह तंत्र से ही सम्मोहन, त्राटक, त्रिकाल, इंद्रजाल, परा, अपरा और प्राण विद्या का जन्म हुआ है। तंत्र से वशीकरण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन और स्तम्भन क्रियाएं भी की जाती है।

इसी तरह मनुष्य से पशु बन जाना, गायब हो जाना, एक साथ 5-5 रूप बना लेना, समुद्र को लांघ जाना, विशाल पर्वतों को उठाना, करोड़ों मील दूर के व्यक्ति को देख लेना व बात कर लेना जैसे अनेक कार्य ये सभी तंत्र की बदौलत ही संभव हैं। तंत्र शास्त्र के मंत्र और पूजा अलग किस्म के होते हैं।

4.तांत्रिक गुरु :

तंत्र के प्रथम उपदेशक भगवान शंकर और उसके बाद भगवान दत्तात्रेय हुए हैं। बाद में सिद्ध, योगी, शाक्त और नाथ परंपरा का प्रचलन रहा है। तंत्र साधना के प्रणेता, शिव, दत्तात्रेय के अलावा नारद, परशुराम, पिप्पलादि, वसिष्ठ, सनक, शुक, सन्दन, सनतकुमार, भैरव, भैरवी, काली आदि कई ऋषि मुनि इस साधना के उपासक रहे हैं।

ब्रह्मयामल में बहुसंख्यक ऋषियों का नामोल्लेख है, जिसमें शिव ज्ञान के प्रवर्तक थे; उनमें उशना, बृहस्पति, दधीचि, सनत्कुमार, नमुलीश आदि उल्लेख मिलता है।

जयद्रथयामल के मंगलाष्टक प्रकरण में तन्त्र प्रवर्तक बहुत से ऋषियों के नाम हैं, जैसे दुर्वासा, सनक, विष्णु, कस्प्य, संवर्त, विश्वामित्र, गालव, गौतम, याज्ञवल्क्य, शातातप, आपस्तम्ब, कात्यायन, भृगु आदि।

5.तंत्र से हथियार :-

तंत्र के माध्यम से ही प्राचीनकाल में घातक किस्म के हथियार बनाए जाते थे, जैसे पाशुपतास्त्र, नागपाश, ब्रह्मास्त्र आदि। जिसमें यंत्रों के स्थान पर मानव अंतराल में रहने वाली विद्युत शक्ति को कुछ ऐसी विशेषता संपन्न बनाया जाता है जिससे प्रकृति से सूक्ष्म परमाणु उसी स्थिति में परिणित हो जाते हैं जिसमें कि मनुष्य चाहता है।

पदार्थों की रचना, परिवर्तन और विनाश का बड़ा भारी काम बिना किन्हीं यंत्रों की सहायता के तंत्र द्वारा हो सकता है। विज्ञान के इस तंत्र भाग को 'सावित्री विज्ञान' तंत्र-साधना, वाममार्ग आदि नामों से पुकारते हैं। तंत्र-शास्त्र में जो पंच प्रकार की साधना बतलाई गई है, उसमें मुद्रा साधन बड़े महत्व का और श्रेष्ठ है। मुद्रा में आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि योग की सभी क्रियाओं का समावेश होता है।

6.तांत्रिक साधना :

तांत्रिक साधना को साधारणतया 3 मार्ग- वाम मार्ग, दक्षिण मार्ग और मध्यम मार्ग कहा गया है। हालांकि यह मुख्यत: दो प्रकार की होती है- एक वाम मार्गी तथा दूसरी दक्षिण मार्गी। वाम मार्गी साधना बेहद कठिन है। वाम मार्गी तंत्र साधना में 6 प्रकार के कर्म बताए गए हैं जिन्हें षट् कर्म कहते हैं।

शांति, वक्ष्य, स्तम्भनानि, विद्वेषणोच्चाटने तथा।

गोरणों तनिसति षट कर्माणि मणोषणः॥

अर्थात शांति कर्म, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण ये छ: तांत्रिक षट् कर्म।

इसके अलावा नौ प्रयोगों का वर्णन मिलता है:-

मारण मोहनं स्तम्भनं विद्वेषोच्चाटनं वशम्‌।

आकर्षण यक्षिणी चारसासनं कर त्रिया तथा॥

अर्थात: मारण, मोहनं, स्तम्भनं, विद्वेषण, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण, यक्षिणी साधना, रसायन क्रिया तंत्र के ये 9 प्रयोग हैं।

रोग कृत्वा गृहादीनां निराण शन्तिर किता।

विश्वं जानानां सर्वेषां निधयेत्व मुदीरिताम्‌॥

पूधृत्तरोध सर्वेषां स्तम्भं समुदाय हृतम्‌।

स्निग्धाना द्वेष जननं मित्र, विद्वेषण मतत॥

प्राणिनाम प्राणं हरपां मरण समुदाहृमत्‌।

7 चमत्कारिक अष्ट यक्षिणियों की साधना, तुरंत मिलेगा फल

जिससे रोग, कुकृत्य और ग्रह आदि की शांति होती है, उसको शांति कर्म कहा जाता है और जिस कर्म से सब प्राणियों को वश में किया जाए, उसको वशीकरण प्रयोग कहते हैं तथा जिससे प्राणियों की प्रवृत्ति रोक दी जाए, उसको स्तम्भन कहते हैं तथा दो प्राणियों की परस्पर प्रीति को छुड़ा देने वाला नाम विद्वेषण है और जिस कर्म से किसी प्राणी को देश आदि से पृथक कर दिया जाए, उसको उच्चाटन प्रयोग कहते हैं तथा जिस कर्म से प्राण हरण किया जाए, उसको मारण कर्म कहते हैं।

तंत्र के प्रतीक : त्रिकोण से बनाए गए स्टार के बीच स्वास्तिक या ॐ का चिन्हा, हाथों में लगाई जाने वाली मेहंदी, आंगन द्वारों पर चित्रित की जाने वाली अल्पना, बालक के संध्या काल पैदा होने पर लगाए जाने वाले स्वास्तिक और डलिया की आकृति, दीपावली और अन्य त्योहारों पर सजाई गई रंगोली आदि तंत्र के प्रतीक हैं। हालांकि तंत्र के और भी प्रतीक हैं जैसे योग की कुछ मुद्राएं, क्रियाएं आदि।

8.तांत्रिक मंत्र :

मुख्यत: 3 प्रकार के मंत्र होते हैं- 1. वैदिक मंत्र, 2. तांत्रिक मंत्र और 3. शाबर मंत्र।

तांत्रिकों के बीज मंत्रों में ह्नीं, क्लीं, श्रीं, ऐं, क्रूं आदि तरह के अक्षरों का उपयोग किया जाता है। जिस भी मंत्र में प्रारंभ में इस तरह के अक्षर होते हैं वे सभी तांत्रिक मंत्र होते हैं। एक अक्षर से पता चलता है कि यह किस देवता का मंत्र है जैसे लक्ष्मी माता के लिये श्रीं का उपयोग करते हैं। काली माता के लिये क्रीं का।

तंत्रिक मंत्रों में भी एकाक्षरी (काली) मंत्र ॐ क्रीं,

तीन अक्षरी काली मंत्र ॐ क्रीं ह्रुं ह्रीं॥

पांच अक्षरी काली मंत्र ॐ क्रीं ह्रुं ह्रीं हूँ फट्॥

षडाक्षरी काली मंत्र ॐ क्रीं कालिके स्वाहा॥

सप्ताक्षरी काली मंत्र ॐ हूँ ह्रीं हूँ फट् स्वाहा॥

श्री दक्षिणकाली पूर्ण मंत्र ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणकालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रुं ह्रुं ह्रीं ह्रीं॥

या

ॐ ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिके ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥

तंत्र साधना के देवी और देवता :

तंत्र साधना में देवी काली, अष्ट भैरवी, नौ दुर्गा, दस महाविद्या, 64 योगिनी आदि देवियों की साधना की जाती है। इसी तरह देवताओं में बटुक भैरव, काल भैरव, नाग महाराज की साधना की जाती है। उक्त की साधना को छोड़कर जो लोग यक्षिणी, पिशाचिनी, अप्सरा, वीर साधना, गंधर्व साधना, किन्नर साधना, नायक नायिका साधान, डाकिनी-शाकिनी, विद्याधर, सिद्ध, दैत्य, दानव, राक्षस, गुह्मक, भूत, वेताल, अघोर आदि की साधनाएं निषेध है।

10.कैसे करें तांत्रिक साधना :

सबसे पहली बात तो यह कि आपक क्यों तंत्र साधना करना चाहते हैं? जब आपका यह 'क्यों' स्पष्ट हो जाए तब आप उक्त साधना से संबंधित किताबों का अध्ययन करें। किताबों का अध्ययन करने के बाद आप किसी योग्य तंत्र साधक को खोजे। संभव: यह आपको हिन्दू धर्म के संन्यासी समाज के मुख्‍य 13 अखाड़ों के संन्यासियों में मिल जाएगा।

जब यदि कोई योग्य साधक मिल जाता है तो उसके पास रहकर ही यह साधना सीखें और करें। यदि आप चार किताबें पढ़कर यह साधना करते हैं तो आप सावधान हो जाएं, क्योंकि इससे बुरा परिणाम हो सकता है। यदि आपका उद्येश्य इस साधना के माध्यम से किसी का बुरा करना है तब भी आप सावधान हो जाएंगे क्योंकि इसके परिणाम भी आप ही को भुगतने हो सकते हैं।

भगवान शिव को गुरु बनाने की विधि?

 भगवान शिव को गुरु बनाने की विधि?


देवो के देव महादेव भगवान शिव को गुरु बनाने की विधि:-- 

शिव गुरु को साक्षी मानकर किये गये,  कोई भी कार्य मे कभी रुकावटें नही आतीं, भगवान शिव गुरुओं के भी गुरु हैं और जब गुरू शिव हों, तो इष्ट कोई भी हो अभीष्ट की प्राप्ति हो ही जाती है, उनको गुरु बनाने की विधि नीचे है, उसे अपनायें और अनंत सुखों की राह पर चल पड़ें।

1-सबसे पहले मन को शांत करके ध्यान की मुद्रा मे आंखें बंद करके बैठ जायें, इसके बाद भगवान शिव से कहें-

“हे शिव मै ‘अमुक नाम’ गोत्र ‘अमुक गोत्र’ आप को अपना गुरु बनाने का आग्रह कर रहा हूँ, आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार करें”

2-फिर दोनों ऊपर हाथ उठाकर ब्रह्मांड की तरफ देखते हुए 3 बार घोषणा करें-

“मै ‘अमुक नाम’ गोत्र ‘अमुक गोत्र’ अखिल अन्तरिक्ष सम्राज्य में घोषणा करता हूं कि, शिव मेरे गुरु हैं,

 मै उनका शिष्य हूं, शिव मेरे गुरु हैं मै उनका शिष्य हूं, शिव मेरे गुरु हैं, मै उनका शिष्य हूं, मैं गुरु दक्षिणा के रूप में आपको राम नाम सुनाऊंगा, तथास्तु घोषणा दर्ज हो” !

इससे भगवान शिव अपनी ही तय शास्त्रीय व्यवस्था के मुताबिक आग्रह करने वाले को शिष्य के रूप में स्वीकार कर लेते हैं।

3-शिव गुरु को साक्षी मानकर शुरु किये गए कार्यों में रुकावटें नही आती हैं, इसलिये जो भी काम करें, उसके लिये भगवान शिव को पहले साक्षी बना लें और कहें...

“हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मै आपका शिष्य हूं ,आपको साक्षी बनाकर ये कार्य करने जा रहा हूं, इसकी सफलता के लिये मुझे दैवीय सहायता और सुरक्षा प्रदान करें”

4-फिर शिव गुरु से कम से कम तीन बार रोज कहें-

''हे शिव आप मेरे गुरु हैं मै आपका शिष्य हूं मुझ शिष्य पर दया करें, हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मै आपका शिष्य हूं, मुझ शिष्य पर दया करें, हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मै आपका शिष्य हूं, मुझ शिष्य पर दया करें.”!

5-फिर हर रोज शिव गुरु को नमन करें, इसके लिये शांत मन से कुछ मिनटों तक ” ॐ नमः शिवाय गुरवे, सच्चिदानन्द मूर्तये, निष्प्रपञ्चाय शान्ताय, निरालम्बाय तेजसे “ का जाप करें !

ॐ नमःशिवाय गुरवे

सच्चिदानन्द मूर्तये ।

निष्प्रपञ्चाय शान्ताय

निरालम्बाय तेजसे ॥

अर्थ;-

''उस कल्याणकारी (शिव) गुरु, सत्-चित् और आनन्द की मूर्ति को नमस्कार है ।उस निष्प्रपञ्च, शान्त, आलम्ब (आश्रय) रहित, तेज:स्वरूप परमात्मा को नमन है। जो निरालम्ब (परमात्म तत्त्व) का आश्रय ग्रहण करके (सांसारिक) आलम्बन का परित्याग कर देता है, वह योगी और संन्यासी है, वही कैवल्य (मोक्ष) पद प्राप्त करता है॥''

6-इसके बाद गुरु दक्षिणा के रूप मे “संजीवनी मंत्र  ” मंत्र की कम से कम 51 माला का जाप  करें और प्रतिदिन कम से कम एक माला जाप  करने का संकल्प लेकर शिव गुरु को अर्पित करें।

साधना के स्टेप;-

1- पहले आपको संकल्प लेना है।  भगवान शिव को साक्षी बनायें और कहें- कि भगवान शिव आप तो पूरे ब्रह्मांड के गुरु हैं। आपके बिना तो इस सृष्टि में एक पत्ता भी नहीं हिलता है और आज गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर मैं आपकी  यह साधना करने  जा रहा/रही हूं।  हे शिव आप मेरे गुरू हैं मै आपका/ आपकी शिष्य हूं, मुझ शिष्य पर दया करें। आपको साक्षी बनाकर मै  संजीवनी साधना सम्पन्न कर रहा/रही हूं। इसकी सफलता हेतु मुझे दैवीय सहायता और सुरक्षा प्रदान करें। 

2-भगवान शिव  का फोटो सामने रखें... फोटो को एकटक देखते रहें। उनके माथे के बीच तीसरे नेत्र का प्रतीक हल्का बिंदु दिखेगा। उसी पर अपनी नजरें टिकाये रखें।  

3-दोनों हाथों में मृत संजीवनी मुद्रा बनायें। मुद्रा में हाथ की तर्जनी (इंडेक्स फिंगर) को मोड़कर अंगूठे की जड़ में दबा लेना है।  तर्जनी उंगुली को मोड़कर अंगूठे की जड़ में लगाकर और मध्यम और अनामिका अंगुली के अग्र भाग को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाएं। सबसे छोटी अंगुली को सीधा रखें ऐसे मृत संजीवनी मुद्रा बनती है। इस मुद्रा में दो मुद्राएं बनती हैं—वायु मुद्रा और अपान मुद्रा। इसलिए इस मुद्रा को अपान वायु मुद्रा भी कहते हैं।  

 4- ''ऊं ह्रौं जूं सः  नमः शिवाय''मंत्र के साथ 10 संजीवनी प्राणायाम करें। ''ऊं. ह्रौं जूं सः नमः शिवाय'' का जप करते हुए किये जाने वाले प्राणायाम को संजीवनी प्राणायाम कहा जाता है। इसमें 'ऊं ह्रौं जूं सः ' जपते हुए लम्बी सांस अदर खींचनी होती है। कुछ क्षण सांस रोकें... फिर  ''नमः शिवाय''जपते हुए सांस को धीरे धीरे बाहर निकालें।संजीवनी प्राणायाम के परिणाम बड़े ही चमत्कारिक होते हैं। इससे शरीर के रोम रोम में उर्जाओं का संचरण होता है।जिससे कोशिकायें अपना पुनर्जनन करती हैं। कोशिकाओं का पुनर्जन न सिर्फ शरीर को निरोगी करता है बल्कि मन मस्तिष्क की सक्रियता को भी चरम पर पहुंचाता है... जो कि सिद्धियों के लिये अनिवार्य होता है।इसके लिये 'ऊं ह्रौं जूं सः ' का जप करते हुए सांस को धीरे धीरे भीतर खींचें  और 'नमः शिवाय' का जप करते हुए सांस को धीरे धीरे बाहर निकालें। सांस को अंदर लेने और बाहर निकालने के बीच कुछ क्षण रुकें। इसी तरह सांस निकालने और दोबारा खींचने के बीच भी कुछ क्षण रुकें। संजीवनी प्राणायाम से उर्जा चक्रों और पंच तत्वों का जागरण होता है। आभामंडल  सकारात्मक उर्जाओं से भर जाता है। जर्जर शरीर भी कायाकल्प की तरफ बढ़ जाते हैं। 

5-संजीवनी प्राणायाम के बाद आंखें बंद कर लें। हाथों में मृत संजीवनी मुद्रा बनाये रखें। रिलैक्स होकर बैठें और  अविचलित रूप से संजीवनी मंत्र जप करते रहें।संजीवनी प्राणायाम के बाद इन मंत्र का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।इससे मान-सम्मान प्रतिष्ठा और व्यक्तित्व का आकर्षण भी बढ़ता है। मंत्र जप पूरा होने पर आंखें खोल लें। तन,मन,धन के सुखों के लिये भगवान शिव को धन्यवाद दें। धरती मां को  ,दिव्य संजीवनी शक्ति को धन्यवाद दें। फिर ऊं इंद्राय नमः कहकर उठ जायें। जो लोग किसी कारण वश सुबह 7 बजे की साधना नही कर सकते; वे  रुद्राक्ष धारण करके साधना करें। जिससे दिन -रात में किसी भी टाइम साधना की जा सकती है।उसमें समय का बंधन नही। 

 लघु महामृत्युंजय / संजीवनी  मंत्र ''ऊं ह्रौं जूं सः''  का अर्थ ;- 

''ह्रौं";-

 इस प्रासादबीज का अर्थ है 'भगवान् शिव एवं सदाशिव मेरे दुखों को दूर करें।''ह्रौं" शिव बीज है। यह भगवान शिव का बीज मंत्र है। अकाल मृत्यु से रक्षा, रोग नाश, चहुमुखी विकास व मोक्ष की कामना के लिए श्वेत आसन पर उत्तर मुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य  1008 बार जप करने से आश्चर्य जनक परिवर्तन होता है। इस शिव बीज में ह से शिव का आहवान होता है औरऔ से सदाशिव जो कि शिव का अत्यंत शक्तिशाली रूप है।और  अनुस्वार है दुख हरण । यह बीज मंत्र ऊर्जा ,क्षमता और  रहस्यो से भरा भी है। यह बीज मंत्र हमारे लिए बहुत ही उच्च विद्या महामृत्युंजय विद्या के द्वार हमारे लिए खोलता है। 

जुं;-

  'जुं'; ;- 

'जुं' ध्यान के लिए और हर समय सभी बुराइयों से सुरक्षा के लिए उपयोग किया जाता है। यह बीज मूल रूप से भगवान शिव द्वारा बृहस्पति को सिखाया गया था, जिसके कारण बृहस्पति देवताओं के गुरु बन गए और जिसके कारण वे भगवान शिव के हाथों इंद्र को निश्चित विनाश से बचाने में सक्षम थे। उनके समर्पण और अच्छे स्वभाव से प्रसन्न, भगवान शिव ने बृहस्पति को जीवा (जीव) के रूप में जाना जाने का आशीर्वाद दिया, जिसके द्वारा वे जीवन के अस्तित्व को इंगित करेंगे और जिनकी उपस्थिति से मृत्यु के देवता यम करेंगे कालचक्र में बृहस्पति श्री जीव बन जाते हैं और दक्षिण दिशा में विराजमान हो जाते हैं, जो कि यम का मार्ग है, जिससे मृत्यु को होने से रोका जा सकता है। जब तक श्री जीव अपनी दक्षिण दिशा में विराजमान रहेगा, जीव जीवित रहेगा। 

'जुं' is to be used for meditation and at all times for protection from all evils.This bīja was taught originally by Lord Śhiva to Bṛhaspati, due to which Bṛhaspati became the preceptor of the gods and due to which he was able to save Indra from definite destruction at the hands of Lord Śhiva.Pleased with his dedication and well-meaning disposition, Lord Śhiva blessed Bṛhaspati to be known as जीव (jīva) by which he shall signify the very existence of life and by whose presence, the god of death Yama will have to turn away.In the Kāla-Chakra Bṛhaspati becomes Śrī Jīva and sits in the southern direction, which is the path of Yama, thereby blocking death from happening.So long as Śrī Jīva sits in his southern direction, the being shall live.

सः ;-

स=दुर्गा>>अनुस्वार=दुःख हरण

HOW TO MEDITATE WITH ''ॐ जुं सः''॥(Om juṁ saḥ)   

इस मंत्र को बहुत ही शांति से मन में दोहराते हुए ध्यान करें। (ओम); -

मन को पैरों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए लाएं और एक अक्षर...ॐ का पाठ करें।

Meditate with this mantra repeating it very quietly in the mind.  ॐ (om);-

Bring the mind to focus on the feet and recite the monosyllable ...ॐ .  

जुं (juṁ);-

फिर बीज जुं को हृदय चक्र में रखना होता है।

Then the bīja जुं has to be placed in the heart chakra.  

सः (saḥ);-

अंत में सिर के ऊपर स्थित सहस्रार चक्र को बीज अक्षर के साथ मानसिक ध्यान में लाया जाता है

Finally the sahasrara chakra on top of the head is brought into mental focus with the seed syllable  

 वषट ;-

वषट के ध्वन्यात्मक मूल में सूक्ष्म क्षेत्र में भलाई की भावना होती है, इसलिये वह सूक्ष्म क्षेत्र में आशीष देने के विचार से उस भावना का अति बीज या महाबीज है।सूक्ष्म क्षेत्र में भलाई करने का विचार और उसका क्रियान्वयन ‘‘वषट‘‘ से प्रकट किया जाता है। वे जो शिव से सार्वभौमिक भलाई के लिये प्रार्थना करते हैं वे कहते हैं  ‘एैम शिवाय वषट‘ , वे जो सूक्ष्म ज्ञान को प्राप्त करना   वे कहते हैं‘‘ वरुणाय वोषट‘‘।  परंतु वे जो दुष्टों से किये जा रहे युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिये प्रार्थना करते हैं वे कहते हैं ‘‘वरुणाय वषट‘‘। 

क्रोध और तनाव से मुक्ति के लिए;-

नाभि से ऊपर दोनों पसलियों के बीच स्थित मणिपुर चक्र के बिगड़ने से तनाव होता है। दिखने वाले कारणों में कलह, क़र्ज़, नाकामी, बेइज्जती या कुछ और हो सकता है। मगर सच्चाई यही है कि तनाव सिर्फ मणिपुर चक्र के बिगड़ने से होता है। अक्सर जब मणिपुर चक्र दूषित होकर बड़ा हो जाता है..तब तनाव पैदा होता है।इस विधि से नेचुरल तरीके से मणिपुर चक्र की सफाई होती है और वह संतुलित हो जाता है।तनाव खत्म होने के लिये इतना ही काफी है।इससे कोई फर्क नही पड़ता कि तनाव का कारण क्या है!इसे कभी भी कहीं भी कर सकते हैं।इससे गुस्सा भी कंट्रोल होता है।

विधि;- 

1-भगवान शिव से सुरक्षा की कामना करते हुए कहें ..हे मृत्युंजय भगवान् हम आपको साक्षी बनाकर संजीवनी उपचार कर रहा हूं इसकी सफलता हेतु दैवीय सहायता और सुरक्षा प्रदान करें, आपका धन्यवाद। 

2-सोलह बार लम्बी और गहरी साँसे लें। 

3-एक पीला फूल लेकर सामने रखें 'ॐ ह्रौं जूं सः नमः शिवाय' मन्त्र का जप करते हुए फूल को 10 मिनट देखें। और फूल से कामना करते हुए कहें ..आप मेरे मणिपुर चक्र में मौजूद सभी तरह की दूषित ऊर्जाओं को अपने भीतर खीच कर चक्र की सफाई करें। 

4-उसके बाद पीले फूल को हटाकर उसकी जगह एक नीला फूल रख लें।  

5-फिर ॐ ह्रौं जूं सः नमः शिवाय मन्त्र का जप करते हुए फूल को 10 मिनट देखें और फूल से कामना करते हुए कहें ...आप मेरे मणिपुर चक्र को प्राकृतिक रूप से छोटा करके संतुलित कर दें। 

6-बाद में दोनों फूलों को धन्यवाद देकर उन्हें कहीं मिटटी में दबा दें।  

NOTE;-

 इस प्रकार आप भगवान शिव को गुरु बना सकते हैं, किन्तु हमेशा ये स्मरण रहे कि, आप भगवान शिव के शिष्य बन जाएंगे, इसलिए हमेशा सच्चाई, ईमानदारी, छल ,कपट से दूर रहे। सत्य की  राह पर चलते हुये सत्कर्म करना और हमेशा जनसेवा एवं समाजसेवा के कार्य करने होंगे। यदि आप, ऐसा नहीं करते हैं तो, भगवान शिव आपको अपने शिष्य के रूप में अस्वीकार कर देंगे।