Wednesday, February 25, 2026

अथ चतुःषष्टि भैरव नामावलिः

अथ चतुःषष्टि भैरव नामावलिः 

64 भैरवों के नामों का अत्यंत शक्तिशाली संग्रह



 मैं आपको एक ऐसा अद्भुत और शक्तिशाली नाम संग्रह बताने जा रहा हूँ जो श्रीरुद्रयामल तंत्र में वर्णित है। यह है चतुःषष्टि भैरव नामावलिः - भगवान भैरव के 64 स्वरूपों के नामों का अद्भुत संकलन।

 क्या है चतुःषष्टि भैरव नामावलि?

भैरव भगवान शिव के ही एक स्वरूप हैं, जो रक्षक, संहारक और तंत्र के अधिपति माने जाते हैं। भैरव के अनेक स्वरूप हैं और इस नामावली में उनके 64 प्रमुख स्वरूपों के नाम दिए गए हैं।

यह नामावली केवल नामों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उन 64 शक्तियों का आह्वान है जो भैरव के विभिन्न रूपों में विद्यमान हैं।

 इस नामावली के अद्भुत लाभ:

सभी भयों से मुक्ति - भैरव भयहरण करने वाले हैं
शत्रु नाश - शत्रुओं का संहार होता है
तंत्र बाधा से रक्षा - नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा
ग्रह बाधा निवारण - कुंडली के दोष दूर होते हैं
आध्यात्मिक उन्नति - साधना में सफलता मिलती है
मोक्ष की प्राप्ति - आध्यात्मिक मुक्ति
धन-समृद्धि में वृद्धि - आर्थिक स्थिति सुधरती है

 यह है संपूर्ण चतुःषष्टि भैरव नामावलि:

```
॥ अथ चतुःषष्टिभैरवनामावलिः ॥

असिताङ्गो विशालाक्षो मार्तण्डो मोदकप्रियः ।
स्वच्छन्दो विघ्नसन्तुष्टः खेचरः सचराचरः ॥ १॥

रुरुश्च क्रोड-दंष्ट्रश्च तथैव च जटाधरः ।
विश्वरूपो विरूपाक्षो नानारूपधरः परः ॥ २॥

वज्रहस्तो महाकायश्चण्डश्च प्रलयान्तकः ।
भूमिकम्पो नीलकण्ठो विष्णुश्च कुलपालकः॥ ३॥

मुण्डमालः कामपालः क्रोधो वै पिङ्गलेक्षणः ।
उग्ररूपो धरापालः कुटिलो मन्त्रनायकः ॥ ४॥

रुद्रः पितामहाख्यश्च व्युन्मत्तो बटुनायकः ।
शङ्करो भूत-वेतालस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तकः ॥ ५॥

वरदः पर्वतावासः कपालः शशिभूषणः ।
हस्तिचर्माम्बरधरो योगीशो ब्रह्मराक्षसः ॥ ६॥

सर्वज्ञः सर्वदेवेशः सर्वभूतहृदिस्थितः ।
भीषणाख्यो भयहरः सर्वज्ञाख्यस्तथैव च ॥ ७॥

कालाग्निश्च महारौद्रौ दक्षिणो मुखरोऽस्थिरः ।
संहारश्चातिरिक्ताङ्गो कालाग्निश्च प्रियङ्करः ॥ ८॥

घोरनादो विशालाङ्गो योगीशो दक्षसंस्थितः ।
चतुःषष्टीरूपधृग्देवो भैरवः स सदाऽवतु ॥ ९॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे 
चतुःषष्टिभैरवनामावलिः सम्पूर्णा ॥
```

सरल अर्थ - 64 भैरवों के नाम:

प्रथम श्लोक के 8 नाम:

1. असिताङ्गः - काले शरीर वाले
2. विशालाक्षः - विशाल नेत्रों वाले
3. मार्तण्डः - सूर्य के समान तेजस्वी
4. मोदकप्रियः - मोदक प्रिय (लड्डू पसंद)
5. स्वच्छन्दः - स्वतंत्र विचरण करने वाले
6. विघ्नसन्तुष्टः - विघ्नों से संतुष्ट होने वाले
7. खेचरः - आकाश में विचरण करने वाले
8. सचराचरः - चर-अचर सबमें व्याप्त

द्वितीय श्लोक के 8 नाम:

1. रुरुः - रुरु नामक भैरव
2. क्रोडदंष्ट्रः - विशाल दाढ़ों वाले
3. जटाधरः - जटा धारण करने वाले
4. विश्वरूपः - विश्व रूप धारण करने वाले
5. विरूपाक्षः - विकृत नेत्रों वाले
6. नानारूपधरः - अनेक रूप धारण करने वाले
7. परः - परम श्रेष्

तृतीय श्लोक के 8 नाम:

1. वज्रहस्तः - हाथों में वज्र धारण करने वाले
2. महाकायः - विशाल शरीर वाले
3. चण्डः - उग्र स्वभाव वाले
4. प्रलयान्तकः - प्रलय का अंत करने वाले
5. भूमिकम्पः - भूकंप उत्पन्न करने वाले
6. नीलकण्ठः - नीले कंठ वाले (शिव स्वरूप)
7. विष्णुः - विष्णु स्वरूप
8. कुलपालकः - कुल की रक्षा करने वाले

चतुर्थ श्लोक के 8 नाम:

1. मुण्डमालः - मुण्डों की माला पहनने वाले
2. कामपालः - कामनाओं की पूर्ति करने वाले
3. क्रोधः - क्रोध स्वरूप
4. पिङ्गलेक्षणः - पिंगल नेत्रों वाले
5. उग्ररूपः - उग्र रूप वाले
6. धरापालः - पृथ्वी की रक्षा करने वाले
7. कुटिलः - कुटिल (रहस्यमय) स्वरूप
8. मन्त्रनायकः - मंत्रों के स्वामी

पंचम श्लोक के 8 नाम:

1. रुद्रः - रुद्र स्वरूप
2. पितामहः - ब्रह्मा स्वरूप
3. व्युन्मत्तः - मस्त (उन्मत्त) स्वरूप
4. बटुनायकः - बटुकों के स्वामी
5. शङ्करः - कल्याण करने वाले
6. भूतवेतालः - भूत-प्रेतों के स्वामी
7. त्रिनेत्रः - तीन नेत्रों वाले
8. त्रिपुरान्तकः - त्रिपुर का नाश करने वाले

षष्ठ श्लोक के 8 नाम:

1. वरदः - वरदान देने वाले
2. पर्वतावासः - पर्वतों पर निवास करने वाले
3. कपालः - कपाल धारण करने वाले
4. शशिभूषणः - चन्द्रमा से अलंकृत
5. हस्तिचर्माम्बरधरः - हाथी की खाल पहनने वाले
6. योगीशः - योगियों के स्वामी
7. ब्रह्मराक्षसः - ब्रह्मराक्षस स्वरूप

सप्तम श्लोक के 7 नाम:

1. सर्वज्ञः - सब कुछ जानने वाले
2. सर्वदेवेशः - सभी देवताओं के स्वामी
3. सर्वभूतहृदिस्थितः - सभी प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले
4. भीषणः - भयानक स्वरूप
5. भयहरः - भय का हरण करने वाले
6. सर्वज्ञः (पुनः) - सर्वज्ञ (बल देने के लिए)
7. तथैव च - इसी प्रकार

अष्टम श्लोक के 8 नाम:

1. कालाग्निः - कालाग्नि स्वरूप
2. महारौद्रः - महारौद्र स्वरूप
3. दक्षिणः - दक्षिण मुखी भैरव
4. मुखरः - मुखर (बोलने वाले)
5. अस्थिरः - अस्थिर (गतिशील)
6. संहारः - संहार करने वाले
7. अतिरिक्ताङ्गः - अतिरिक्त अंगों वाले
8. प्रियङ्करः - प्रिय करने वाले
नवम श्लोक के 3 नाम:

1. घोरनादः - भयंकर नाद करने वाले
2. विशालाङ्गः - विशाल अंगों वाले
3. दक्षसंस्थितः - दक्षिण दिशा में स्थित

तथा: चतुःषष्टी रूपधृक् देवः - 64 रूप धारण करने वाले देव
तथा: भैरवः - भैरव

 पूरी साधना विधि:

आसन और वस्त्र:

लाल आसन बिछाएँ (भैरव को लाल रंग प्रिय है)
 लाल वस्त्र पहनें (यदि संभव हो)
 काले वस्त्र भी पहन सकते हैं

समय:

प्रातःकाल - सूर्योदय से पहले
रात्रि - विशेष रूप से रात्रि में भैरव साधना उत्तम
अष्टमी और चतुर्दशी का विशेष महत्व
 मंगलवार और शनिवार - भैरव के दिन
कालरात्रि - दीपावली की रात विशेष

📝 विधि:

चरण 1: स्नान करें - स्वच्छ होकर लाल या काले वस्त्र पहनें

चरण 2: लाल आसन पर बैठें - दक्षिण दिशा की ओर मुख करें

चरण 3: संकल्प लें - हाथ में जल लेकर कहें:
"मैं (अपना नाम, गोत्र) भैरव भगवान की कृपा से सभी भयों से मुक्ति एवं शत्रु नाश हेतु इस चतुःषष्टि भैरव नामावली का पाठ करूंगा/करूंगी।"

चरण 4: भैरव का ध्यान करें - काले रंग, त्रिशूल, डमरू, खड़ग धारण किए, भयंकर दाढ़ों वाले, ज्वालाओं से युक्त भैरव का ध्यान करें

चरण 5: नामावली का पाठ करें - 1, 3, 5, 7 या 11 बार पाठ करें

चरण 6: भोग लगाएँ - लाल फूल, लाल चंदन, लाल मिठाई (बेसन के लड्डू), शराब (यदि तांत्रिक साधना है), उड़द की दाल, तेल का दीपक

चरण 7: आरती करें - भैरव जी की आरती करें

चरण 8: क्षमा प्रार्थना - अंत में क्षमा प्रार्थना करें

दोस्तों, इस नामावली का पाठ करते समय थोड़ा सा होश रखिए। देखिए कि कैसे भैरव की भयंकर शक्ति आपके चारों ओर एक सुरक्षा कवच बना रही है। हर नाम के साथ महसूस करें कि उस विशेष शक्ति का आह्वान हो रहा है।

बस देखते रहिए। साक्षी बने रहिए। जब साक्षी भाव आएगा, तो यह साधना और भी गहरा असर दिखाएगी।

अंतिम बात:

दोस्तों, भैरव भगवान शिव के ही स्वरूप हैं और वे भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं। यह चतुःषष्टि भैरव नामावली उनके 64 स्वरूपों का आह्वान है। इसके नियमित पाठ से जहाँ एक ओर सभी भय दूर होते हैं, वहीं दूसरी ओर शत्रुओं का भी नाश होता है।

यह नामावली उन सभी के लिए वरदान है जो जीवन में सुरक्षा, संरक्षण और सफलता चाहते हैं।


रामायण की चौपाई से मिली बंधे हुए पितृ को मुक्ति

रामायण की चौपाई से मिली बंधे हुए पितृ को मुक्ति

  रियल स्टोरी

दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसी रियल स्टोरी बताने जा रहा हूँ जिसे सुनकर आपको रामायण की चौपाइयों की शक्ति पर विश्वास हो जाएगा। यह कहानी है हमारे फॉलोअर अमन शर्मा की, जो गाजियाबाद के रहने वाले हैं।

🌑 कैसे शुरू हुई समस्या?

अमन बताते हैं कि उनके परिवार में पिछले 10 सालों से लगातार परेशानियाँ चल रही थीं।

व्यापार में घाटा, परिवार में कलह, संतान सुख में बाधा, नौकरी में तरक्की न होना... हर तरफ से घेराव था।

कई ज्योतिषियों को दिखाया, कई उपाय किए, कई बाबाओं के चक्कर लगाए। कोई फायदा नहीं हुआ।

कुछ लोग कहने लगे कि आपके यहाँ कोई बहुत बड़ा तांत्रिक प्रभाव है। कोई बहुत बड़ी बाधा है।

अमन परिवार समेत बहुत परेशान हो चुके थे। पूरा जीवन अंधकारमय हो गया था।

कभी सोचा नहीं था कि जीवन में ऐसे दिन भी देखने होंगे। घर में लड़ाई-झगड़े रोज के हो गए थे।

बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा था। अमन का व्यापार ठप्प पड़ गया था।

लाखों का कर्ज हो गया था। ससुराल वालों से भी अनबन हो गई थी। जिंदगी नरक बन चुकी थी।

🕯️ कैसे मिला सच का पता?

एक दिन अमन जी अपने एक मित्र के साथ बैठे थे। बातों-बातों में उन्होंने अपनी परेशानी बताई।

उनके मित्र ने कहा - "एक बार किसी सच्चे संत से मिलकर देखो।"

अमन जी काशी गए। वहाँ एक संत से मिले। संत ने उनकी कुंडली देखी और बोले -

"बेटा, तुम पर कोई तांत्रिक प्रभाव नहीं है। कोई श्राप नहीं है। कोई ग्रह दोष नहीं है।"

"एक और चीज है - पितृ बंधन। तुम्हारे पितर बंधे हुए हैं। इसलिए वे तुम्हारी सहायता नहीं कर पा रहे।"

अमन जी ने पूछा - "ये पितृ बंधन क्या होता है?"

संत ने समझाया - "पितर बंधन का मतलब है कि तुम्हारे पितर किसी तांत्रिक क्रिया से बंधन में डाल दिए गए हैं।"

"वे तुम्हारे घर में प्रवेश नहीं कर पा रहे। वे तुम्हारी रक्षा नहीं कर पा रहे।"

"इसलिए तुम्हारे जीवन में लगातार बाधाएं आ रही हैं।"

अमन जी चौंक गए। उन्होंने पूछा - "इसका उपाय क्या है?"

संत ने कहा - "इसका उपाय सिर्फ रामायण की चौपाइयों में है।"

📿 वह शक्तिशाली चौपाई जिसने बंधन काटा

संत ने अमन जी को दो अद्भुत चौपाइयाँ बताईं -

पहली चौपाई:

"जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥"

अर्थ - हे भवानी! जिस (राम) के नाम का जप करके ज्ञानी पुरुष इस संसार के बंधनों को काट देते हैं।

दूसरी चौपाई:

"तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥"

अर्थ - उसी प्रभु के दूत (हनुमान) को क्या कोई बांध सकता है? पर प्रभु के कार्य के लिए उन्होंने खुद को बंधवा लिया।

संत ने समझाया - "ये दो चौपाइयाँ बहुत शक्तिशाली हैं। पहली चौपाई बताती है कि राम नाम में हर बंधन काटने की शक्ति है।"

"दूसरी चौपाई बताती है कि हनुमान जी को भी जब प्रभु के कार्य के लिए बंधना पड़ा, तो वे बंध गए।"

"लेकिन वह बंधन भी उनकी मर्जी से था। असली में कोई उन्हें बांध नहीं सकता।"

"इसी तरह तुम्हारे पितर भले ही बंधे हों, लेकिन राम नाम की शक्ति से वे मुक्त हो सकते हैं।"

🚩 रामायण की चौपाई ने बदल दी जिंदगी

संत ने अमन जी को सरल उपाय बताया -

"रोज सुबह स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठो।"

"हनुमान जी का ध्यान करो। फिर इन दोनों चौपाइयों का 108 बार जाप करो।"

"पीले आसन पर बैठो। पीले फूल चढ़ाओ। तिल के तेल का दीपक जलाओ।"

"21 दिन लगातार यह जाप करो। 21 दिन बाद किसी गरीब ब्राह्मण को पीले वस्त्र दान करो।"

अमन जी ने पूरा विश्वास और श्रद्धा से यह उपाय किया।

🌟 क्या हुआ 21 दिन बाद?

अमन जी बताते हैं - "पहले 5-6 दिन कुछ खास असर नहीं लगा। मन में संशय होने लगा।"

"लेकिन 7वें दिन से अजीब सी शांति महसूस होने लगी। घर का माहौल थोड़ा सुधरने लगा।"

"10वें दिन मुझे सपना आया। सपने में मेरे दादा जी मुझसे बोले - बेटा, हम आजाद हो गए।"

"उन्होंने कहा - जासु नाम जपि सुनहु भवानी... इस चौपाई ने हमारे बंधन काट दिए।"

"मैं चौंक कर उठ गया। उस दिन से लगा जैसे घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो गई।"

"21 दिन बाद जैसे मानो घर में नई रोशनी आ गई। व्यापार ठीक होने लगा।"

"घर का कलह खत्म हो गया। आज मैं शांति से हूँ। रामायण की चौपाई ने मेरी जिंदगी बदल दी।"

🙏 अमन जी की सलाह

अमन जी कहते हैं - "जिन्हें भी लगता है कि जीवन में कोई बाधा है, कोई रुकावट है, कोई बंधन है - वे इन चौपाइयों का जाप जरूर करें।"

"पितर बंधन हो या कोई और बंधन - रामायण की चौपाई में वो शक्ति है जो हर बंधन को काट सकती है।"

"जासु नाम जपि सुनहु भवानी... यह चौपाई सिद्ध है। इसे अपनाकर देखो।"

"सिर्फ विश्वास चाहिए। राम का नाम ही सबसे बड़ा तंत्र है। सबसे बड़ा यंत्र है। सबसे बड़ा मंत्र है।"

🔥 अगले भाग में जानेंगे -

पितृ बंधन मुक्ति की संपूर्ण साधना विधि

✅ इन चौपाइयों का जाप कैसे करें
✅ कितने दिन करना है जाप
✅ किस दिन से शुरू करें
✅ कौन सी सामग्री चाहिए
✅ कैसे करें हवन
✅ क्या खास सावधानियाँ हैं
 अगला पार्ट मिस न करे 

Wednesday, February 18, 2026

मानव लिंग शरीर में सुषुम्णा नाड़ी के सहारे 32 पद्मों की स्थिति है।


मानव लिंग शरीर में सुषुम्णा नाड़ी के सहारे 32 पद्मों की स्थिति है।

सबसे नीचे और सबसे ऊपर दो सहस्त्रार पद्म अवस्थित हैं। नीचे अकुल स्थान स्थित अरुण वर्ण का सहस्रार पद्म ऊर्ध्वमुख तथा ऊपर ब्रह्मरन्ध्र स्थित श्वेतवर्ण सहस्रार पद्म अधोमुख है। इनमें से अधःसहस्रार को कुल कुण्डलिनी तथा ऊर्ध्व सहस्रार को अकुल कुण्डलिनी कहा गया है। अकुल कुण्डलिनी प्रकाशात्मक अकार स्वरूपा है।

अकुल शब्द का अर्थ शिव तथा कुल शब्द का अर्थ शक्ति  है। और उसकी व्याख्या में भी यही विषय प्रतिपादित है। किन्तु यहाँ शक्ति को कौलिकी कहा गया है। जिस परम तत्त्व से विविध विचित्रताओं से परिपूर्ण यह सारा जगत उत्पन्न होता है और उसी में लीन भी हो जाता है, वह परम तत्त्व शिव और शक्ति से परे है। उसी परम तत्त्व से अकुल शिव और कुल शक्ति की सृष्टि होती है। इस कौलिकी शक्ति से अकुल शिव कभी अलग नहीं रहता। 

शिव को शाक्त दर्शन में अनुत्तर तत्त्व माना गया है। अनुत्तर शब्द अकार का भी नाम है। यह अकार ऐतरेय आरण्यक (2/3/6) के अनुसार समस्त वाङ्मय का जनक है। भगवद्गीता (10/32) में अपनी उत्कृष्ट विभूतियों का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि अक्षरों में मैं अकार हूँ। इसीलिये अकार को अकुल अक्षर भी कहा जाता है। अनेक ग्रंथों में उद्धृत, किन्तु अद्यावधि अनुपलब्ध ग्रंथ संकेतपद्धति में अकार को प्रकाश और परम शिव का स्वरूप कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि प्रकाशात्मक अकुल शिव अकुल अकार के रूप में अभिव्यक्त होकर इस विविध विचित्रतामय जगत की सृष्टि करता है। महार्थमंजरी की परिमल व्याख्या (पृ. 89) में महेश्वरानंद ने कुल, कौल और अकुल विभाग की चर्चा की है। नित्याषोडशिकार्णव की अर्थरत्नावली टीका के लेखक विद्यानन्द ने अकुल, कुल और कुलाकुल (पृ. 67) तथा अकुल, कुल, कुलाकुल, कौल और शुद्धकौल (पृ. 74) नामक भेदों का उल्लेख किया है। ‘कौल मत’ शब्द के विवरण में इनकी चर्चा की गई है।

कर्म कुशल और अकुशल दो प्रकार के हैं। योगानुकूल कर्म कुशल हैं तथा संसार में बाँधने वाले कर्म अकुशल हैं। धर्मकर्म कुशल हैं, अधर्मकर्म अकुशल हैं – यह भी कहा जा सकता है।

अक्रोध दस यमों में से एक प्रकार है। क्रोध चार प्रकार का कहा गया है – भावलक्षणक्रोध, कर्मलक्षणक्रोध, वैकल्यकर क्रोध तथा उद्‍वेगकर क्रोध। 

भावलक्षण क्रोध में असूया, द्‍वेष, मद, मान, मात्सर्य आदि मानसिक भाव उत्थित होते हैं। 

कर्मलक्षणक्रोध में कलह, वैर, झगड़ा आदि कलहपूर्ण कर्म उत्पन्‍न होते हैं। 

वैकल्यकारक क्रोध में हाथ, पैर आदि अंगों पर प्रहार होने से उनकी क्षति हेती है। 

तथा उद्‍वेगकारक क्रोध में अपनी अथवा शत्रु की प्राणहानि होती है जो उद्‍वेग को जन्म देती है। 

पाशुपत दर्शन में इस चार प्रकार के क्रोध का पूर्णत: निषेध किया गया है। क्रोध को मनुष्य का बहुत बड़ा शत्रु माना गया है। जिसके कारण व्यक्‍ति की हर एक बात तथा हर एक कृत्य निष्फल हो जाते हैं। अतः अक्रोध नामक यम को पाशुपत दर्शन में अवश्य पालनीय माना गया है। (पा. सू. कौ. भा. पृ 25-27)

अक्लिष्टवृत्ति चित्त की वृत्ति (चित्त-सत्त्व का परिणाम) जब अविद्यादि-क्लेशपूर्वक उदित नहीं होती, तब वह अक्लिष्टा कहलाती है। जब कोई वृत्ति क्लेशपूर्वक उदित नहीं होती, तब वह क्लेशमय वृत्ति को उत्पन्न भी नहीं करती, अतः उससे क्लेशमूलक कर्माशय का निर्माण भी नहीं होता। 

यह सत्त्वप्रधान अक्लिष्टवृत्ति अपवर्ग की सहायक होती है।

Tuesday, February 17, 2026

पितृ कैसे रक्षक से भक्षक कैसे बनते है*

*पितृ कैसे रक्षक से भक्षक कैसे बनते है* 

जब किसी व्यक्ति के कुल-पितर किसी तांत्रिक क्रिया द्वारा बंधन में डाल दिए जाते हैं, तो वे न तो स्वयं मुक्त हो पाते हैं और न ही अपने वंशजों की रक्षा कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को स्वप्न में अजीब-अजीब दृश्य दिखाई देते हैं, स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, बार-बार दुर्घटनाएँ होती हैं और घर में अशांति बनी रहती है। जब इन लक्षणों से यह स्पष्ट हो जाए कि कुल-पितर बंधन में हैं, तो सबसे पहले कुल-भैरव का सहयोग लेना चाहिए। कुल-भैरव प्रत्येक बंधन को काटने में सर्वथा समर्थ होते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रत्येक शक्तिपीठ के भैरव वहाँ के रक्षक होते हैं।

इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बिना पूरी जानकारी के पितरों के मंत्रों का जाप न करें, क्योंकि जब पितर बंधन में होते हैं तो उनके साथ कोई नकारात्मक शक्ति भी जुड़ी हो सकती है, जो अधूरे मंत्र-जाप से और अधिक सक्रिय हो जाती है। 

सबसे पहले यह समझना होगा कि पितरों का स्थान कहाँ होता है और उनकी स्थिति क्या होती है।

1. प्रवेश द्वार पर स्थान: पितरों का प्रमुख स्थान घर के प्रवेश द्वार के पास ही होता है। कुलदेवता (कुल की भगवती) और कुल-भैरव के साथ ही कुल के पितर भी वहीं निवास करते हैं।

2. अधिकार क्षेत्र: प्रवेश द्वार पर सर्वप्रथम पितरों का ही अधिकार होता है। घर में होने वाले सभी मांगलिक कार्यों पर पितरों का पूर्ण अधिकार होता है। उन्हीं की कृपा और आशीर्वाद से मांगलिक कार्य सफल होते हैं।

3. विशिष्ट साधक: यदि कुल में कोई बहुत अच्छा और विशिष्ट साधक हो, तो उन्हें भगवती की कृपा से मृत्यु के पश्चात कुल-भैरव का स्थान भी प्राप्त हो सकता है। विशेषकर वे लोग जो तांत्रिक साधना और महाविद्या की कृपा से दिव्य स्थिति प्राप्त कर लेते हैं, वे इस प्रकार के विषयों को सही प्रकार से समझ सकते हैं।

पितर अशुद्ध कैसे होते हैं?

पितरों की अशुद्धि का सीधा संबंध घर के प्रवेश द्वार से है। जब कोई व्यक्ति किसी परिवार को हानि पहुँचाना चाहता है, तो वह सर्वप्रथम प्रवेश द्वार को अशुद्ध करने का प्रयास करता है। यही पितरों की अशुद्धि का मुख्य कारण है।

प्रवेश द्वार का बंधन: जब कोई शत्रु या ईर्ष्यालु व्यक्ति तांत्रिक क्रिया द्वारा किसी परिवार को क्षति पहुँचाना चाहता है, तो उसे सर्वप्रथम उस घर की चौखट (प्रवेश द्वार) का बंधन करना पड़ता है। वह चौखट को अशुद्ध करता है, और जैसे ही प्रवेश द्वार अशुद्ध होता है, 99% पितर उसी क्षण अशुद्ध हो जाते हैं।

अशुद्धि का तात्पर्य: पितरों के अशुद्ध होने का तात्पर्य यह है कि अब वे किसी भी शुभ या मांगलिक कार्य में अपने वंशजों का साथ देने में सक्षम नहीं रहते। उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है और वे स्वयं भी बंधन में जकड़ जाते हैं।

 

Sunday, February 15, 2026

7 ચક્ર

7 चक्र 

(1) मूलाधार चक्र - गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला 'आधार चक्र' है । आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। इसके बिगड़ने से वीरता,धन ,समृधि ,आत्मबल ,शारीरिक बल ,रोजगार ,कर्मशीलता,घाटा,असफलता रक्त एवं हड्डी के रोग ,कमर व पीठ में दर्द ,आत्महत्या के बिचार ,डिप्रेशन ,केंसर अदि होता है।
(2) स्वाधिष्ठान चक्र - इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है । उसकी छ: पंखुरियाँ हैं । इसके बिगड़ने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, नपुंसकता ,बाँझपन ,मंद्बुधिता ,मूत्राशय और गर्भाशय के रोग ,अध्यात्मिक सिद्धी में बाधा बैभव के आनंद में कमी अदि होता है।
(3) मणिपूर चक्र - नाभि में दस दल वाला मणिचूर चक्र है । इसके इसके बिगड़ने पर तृष्णा, ईष्र्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, अधूरी सफलता ,गुस्सा ,चिंचिरापन, नशाखोरी,तनाव ,शंकलुप्रबिती,कई तरह की बिमारिया ,दवावो का काम न करना ,अज्ञात भय ,चहरे का तेज गायब ,धोखाधड़ी,डिप्रेशन,उग्रता ,हिंशा,दुश्मनी ,अपयश ,अपमान ,आलोचना ,बदले की भावना ,एसिडिटी ,ब्लडप्रेशर,शुगर,थाईरायेड,सिरएवं शारीर के दर्द,किडनी ,लीवर ,केलोस्ट्राल,खून का रोग आदि इसके बिगड़ने का मतलब जिंदगी का बिगड़ जाना ।
(4) अनाहत चक्र - हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है । इसके बिगड़ने पर लिप्सा, कपट, तोड़ -फोड़, कुतर्क, चिन्ता,नफरत ,प्रेम में असफलता ,प्यार में धोखा ,अकेलापन ,अपमान, मोह, दम्भ, अपनेपन में कमी ,मन में उदासी , जीवन में बिरानगी ,सबकुछ होते हुए भी बेचनी,छाती में दर्द ,साँस लेने में दिक्कत ,सुख का अभाव,ह्रदय व फेफड़े के रोग,केलोस्ट्राल में बढ़ोतरी अदि ।
(5) विशुद्धख्य चक्र - कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुरियों वाला है। यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है, इसके बिगड़ने पर वाणी दोष ,अभिब्यक्ति में कमी ,गले ,नाक,कान,दात, थाई रायेड,आत्मजागरण में बाधा आती है।
(6) आज्ञाचक्र - भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ '?' उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है । इसके बिगड़ने पर एकाग्रता ,जीने की चाह,निर्णय की सक्ति, मानसिक सक्ति,सफलता की राह आदि इसके बिगड़ने मतलब सबकुछ बिगड़ जाने का खतरा ।
(7) सहस्रार चक्र - सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है । शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।इसके बिगड़ने पर मानसिक बीमारी, अध्यात्मिकता का आभाव ,भाग्य का साथ न देना आदि ।

Monday, February 2, 2026

नक्षत्र-आधारित-साधना

नक्षत्र-आधारित-साधना

 केवल भैरव-काली प्रधान क्रम (श्मशान / वाम-कौल)” 
यह आन्तरिक-भाव, साक्षी-स्थिति और मौन-स्मरण पर आधारित है—कोई बाह्य/जोखिमपूर्ण क्रिया नहीं।

प्रधानता: काली = बंधन-भक्षण | भैरव = सीमा-भेदन
रीति: जप-संख्या नहीं, लय; वाणी न्यून, दृष्टि स्थिर
रक्षा: गोपनीयता; अनुभव साझा न करें
सील: 27वें दिन के बाद नवीन प्रयोग न करें

दिन 1–9 : काली-प्रधान (अहं-मृत्यु)
उद्देश्य: भय, स्मृति, आसक्ति का क्षय---

1. अश्विनी — प्रारम्भिक छेदन
भाव: निर्भय साक्षी | स्मरण: क्रीं (मौन)

2. भरणी — सहन-शक्ति
भाव: धारण | स्मरण: क्रीं–हूं (लय)

3. कृत्तिका — अग्नि-शुद्धि
भाव: त्याग | स्मरण: क्रीं

4. रोहिणी — आकर्षण-भंग
भाव: असक्ति-त्याग | स्मरण: ह्रीं

5. मृगशिरा — चंचल-मन-विलय
भाव: स्थिरता | स्मरण: क्रीं

6. आर्द्रा — रुद्र-क्षोभ
भाव: स्वीकृति | स्मरण: हूं

7. पुनर्वसु — पुनर्जन्म-बोध
भाव: आशा-त्याग | स्मरण: ह्रीं

8. पुष्य — पोषण-संहार
भाव: वैराग्य | स्मरण: क्रीं

9. आश्लेषा — बंधन-छेदन
भाव: मुक्त-संकल्प | स्मरण: हूं
संकेत: भय-स्वप्न/हृदय-कंपन आए—रोकें नहीं; साक्षी रहें।

दिन 10–18 : भैरव-प्रधान (सीमा-भेदन)
उद्देश्य: नियम-आसक्ति का क्षय, दृष्टि-तीक्ष्णता----

10. मघा — पितृ-सीमा-विलय
भाव: निर्लेपता | स्मरण: हूं

11. पूर्व फाल्गुनी — भोग-संयम
भाव: मर्यादा | स्मरण: हूं

12. उत्तर फाल्गुनी — धर्म-परीक्षा
भाव: सत्य-साक्षी | स्मरण: हूं

13. हस्त — कर्म-भेदन
भाव: दक्ष साक्षी | स्मरण: हूं

14. चित्रा — रूप-विलय
भाव: निराकार | स्मरण: हूं

15. स्वाती — वायु-स्वातंत्र्य
भाव: निर्भरता-त्याग | स्मरण: हूं

16. विशाखा — लक्ष्य-भेदन
भाव: एकनिष्ठ | स्मरण: हूं

17. अनुराधा — निष्ठा-स्थैर्य
भाव: समर्पण | स्मरण: हूं

18. ज्येष्ठा — वरिष्ठ-संयम
भाव: प्रभुत्व-त्याग | स्मरण: हूं
संकेत: एकान्त-प्रियता, मृत्यु-विचार से निर्भयता—सामान्य है।

 दिन 19–24 : काली-भैरव संयुक्त (मूल-उत्खनन)
उद्देश्य: सूक्ष्म-बंधन का समूल क्षय---

19. मूल — मूलाधार-स्थैर्य
भाव: निर्भय-स्थिर | स्मरण: हूं

20. पूर्वाषाढ़ा — संकल्प-उत्क्रमण
भाव: दृढ़ता | स्मरण: क्रीं

21. उत्तराषाढ़ा — धर्म-स्थिरता
भाव: संतुलन | स्मरण: हूं

22. श्रवण — श्रुति-मौन
भाव: सुनना (नाद) | स्मरण: हूं

23. धनिष्ठा — ताल-लय
भाव: अनुशासन | स्मरण: हूं

24. शतभिषा — गूढ़-रक्षा
भाव: गोपन | स्मरण: क्ष्रौं (अल्प)

 दिन 25–27 : सील-खण्ड (उग्र से शान्त)
उद्देश्य: उग्रता का शमन, सिद्धि-स्थैर्य------

25. पूर्व भाद्रपद — उग्र-तप
भाव: सहन-शक्ति | स्मरण: क्रीं

26. उत्तर भाद्रपद — शान्त-समाधि
भाव: शीतलता | स्मरण: ह्रीं

27. रेवती — द्वार-बन्धन (सील)
भाव: कृतार्थता | स्मरण: गं (अल्प)
(तीन पंक्तियाँ/दिन)
आज कौन-सा बंधन ढीला हुआ
देह/श्वास/दृष्टि का संकेत
साक्षी-स्थिति (स्थिर/डगमग)

संतुलन-संकेत--
यदि अत्यधिक भय/अनिद्रा बढ़े—
26वें दिन का शान्त-भाव (ह्रीं) बढ़ाएँ, 1–2 दिन उग्रता विराम दें।

प्राणायुताक्षर महामंत्र

प्राणायुताक्षर महामंत्र:


आदिनाथ ने इसका वर्णन गुह्यकाली खंड (कामकला काली)। में (आगम संहिता/ महाकाल संहिता) में शिवाशिव संवाद के रूप में किया है। जो वर्णन ग्रंथ में किया गया है हम वैसा ही यहां उल्लेख कर रहे है। कामकलाकाली रहस्य विज्ञान पूर्व में पोस्ट किया जा चुका है। यहां सिर्फ प्राणायुताक्षर मंत्र महिमा रहस्य का वर्णन ग्रंथ अनुसार किया जा रहा है। वर्णन में काल भेद हो सकता है क्यू के जो बाते भूतकाल और भविष्य की कही गई है (पुराण आदि और कल्प आदि का वर्णन) वह शिवा अपने वर्तमान में भगवान विष्णु , महेश से कहती है। इस लिए भ्रमित न हो बस श्रवण करे। 
प्राणायुताक्षर मंत्र रहस्य :–
दश हजार अक्षर वाले मन्त्र की उत्पत्ति:- महाकाल ने कहा- हे देवि! तुमने मुझसे कामकला काली के अयुताक्षर मन्त्र को पूछा है। उसे मैने तुमको नहीं बतलाया इसमें कुछ कारण है, उसको आदर के साथ सुनो। इस पृथ्वीतल पर इससे बढ़कर उग्र कोई दूसरा मन्त्र नहीं है। इसका ज्ञाता जापक (कंठस्थ जापक) स्मर्त्ता साधक उद्धारक उपदेशक प्रष्टा और ग्रहणेच्छु (भी कोई) नहीं है। हे वरानने। छहों आम्नायों में जो मन्त्र कहे गये हैं वे सब उसी प्रकार हैं जैसे समस्त नदियों के पानी समुद्र में (समाहित) रहते हैं। पहले तुम उत्साह के साथ अयुताक्षरी विद्या की उत्पत्ति सुनो । हे प्रिये ! इसके बाद उग्र से भी उग्रतर मन्त्र को सुनना ॥
ऋष्यन्तर नामक कल्प में मैंने और नारायण ने सृष्टि के आदि में त्रिपुरारि को प्रसन्न किया। हे वरानने। हमारी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्होंने हम दोनों को त्रैलोक्याकर्षण कवच का उपदेश दिया (इस कवच का वर्णन हमने पूर्व में किया है)। इस मन्त्र का विधान ध्यान पूजा आदि की शिक्षा लेकर हम दोनों ने गुरु ( त्रिपुरारि) से आज्ञा प्राप्त की। शीघ्र ही आपस में परामर्श कर महत्तर मन्त्रराज की सिद्धि की इच्छा से एकान्त समझ कर उसको प्रसन्न और प्रत्यक्ष करने की इच्छा से हम दोनों उत्तम पुष्करद्वीप चले गये। वहाँ हम दोनों ने दिव्य सौ वर्षों तक रात-दिन घोर तपस्या की। इसके बाद प्रसन्न होकर भगवती आकर हमारे सामने खड़ी हो गयी हे प्रिये । महाभयङ्कर आकार वाली उस देवी को हम लोग (अपनी आँखों से) देखने में समर्थ नहीं हुए इसलिये आँख बन्द कर शिर झुका कर एक क्षण के लिये खड़े हो गये । हम लोगों को डरा हुआ जानकर अम्बा ने सौम्य रूप धारण किया । उसके बाद आँखों को खोलकर हम दोनों उसके पैरों पर गिर पड़े। उस जगत्धात्री ने दोनों हाथों से हमें उठाकर कहा- तुम दोनों वर माँगो। भक्ति से नम्र कन्धर वाले हम दोनों ने हाथ जोड़कर शिवा से कहा- हे देवि! तुम्हारे ही द्वारा हम दोनों संसार के संहारक एवं स्थितिकारक बनाये गये। आपकी कृपा से युद्ध में शत्रुओं के पराजय प्राप्त कर हम दोनों देवाधिपत्य प्राप्त कर इच्छानुसार कर्म करते हुए विहरण कर रहे हैं। ब्रह्मा को हम दोनों तिनके के बराबर समझते हैं और अन्य लोगों को वरदान देते है। आपकी कृपा से हम दोनों के लिये कुछ भी शेष नहीं है ॥ तुम हम दोनों की देवता हो। हम दोनों शेष देवताओं के देवता है। वे देवतागण ब्राह्मणों के देव है और ब्राह्मणलोग शेष (ब्राह्मणेतर) लोगों के देवता है। यदि आप हमदोनों को वर देना चाहती हैं तो हम दोनों को एक वर दीजिये । हे जगदम्बिके! आपकी सौम्य और उग्र मूर्तियों के कितने भेद हैं उनको मन्त्रों के सहित हम दोनों जानना चाहते हैं। हे धरा की ईश्वरि! हे चण्डिके! आपकी एक मूर्त्ति की उपासना होने पर उन सबकी उपासना हो जाती है उसी प्रकार हम दोनों की (एक मूर्ति की उपासना होने पर हमारी भी समस्त मूर्तियों की उपासना हो जाती है)। हम दोनों के वाक्य को सुनकर शिवा ने मुस्कुरा कर कहा 
- हे सुरेश्वरद्वय! इस धरती तल पर मेरी सौम्य और उम्र मूर्तियों का अन्त नहीं है। उसी प्रकार उन (मूर्तियों) के मन्त्रभेदों की सङ्ख्या भी नहीं है। आगम आदि तथा पुराणों में जो कोई शिवशक्तियाँ सुनी या देखी जाती हैं वे सब मेरी ही मूर्तियाँ है। देवताओं के द्वारा भव (शिव) को देखने के लिये कुछ मूर्तियों का निर्माण चित्स्वरूपा मैंने ही किया है। राक्षस दानव दैत्य को मारने के लिये भयानक तथा परशिव को मोह में डालने के लिये सौम्य मूर्तियों को मैने ही बनाया। इन मूर्तियों की अनुकृति अन्य मूर्तियाँ भी बनायी गयीं। सौन्दर्य से भरी करोड़ों सौम्यमूर्तियों में जो प्रसिद्ध मेरी मूर्ति है जिसका नाम त्रिपुरसुन्दरी है वह सबके मध्य में अन्तिम सीमा है (अर्थात् उससे बढ़कर कोई मूर्ति नहीं है)
मेरी आठ करोड़ मूर्तियाँ उग्र एवं अवन्ध्य हैं। घोर घोरतर आकार की ये मूर्तियाँ देखी नहीं जा सकती। चामुण्डा भैरवी भीमा गुह्यकाली दक्षिणाकाली छिन्नमस्ता एकजटा कालसङ्कर्षिणी श्मशानकाली कोरङ्गी भद्रकाली कुब्जिका उम्रचण्डा प्रचण्डा चण्डोया चण्डनायिका चण्डा चण्डवती चण्डचण्डा चण्डी चण्डिका बाभ्रवी शिवदूती कात्यायनी अर्धमस्तका तथा अन्य पचपन मुख्य कालियाँ जो समस्त आगमों में कही गयी हैं मेरी उन प्रसिद्ध घोर मूर्तियों में कामकला काली के समान उग्र मूर्ति त्रिलोक में नहीं है। मेरी उग्र मूर्तियों में यह (कामकला काली) अन्तिम सीमा है ॥हे सुरेश्वरद्वय ! मेरी जितनी सौम्य और उग्र मूर्तियाँ हैं उन सबके ध्यान मन्त्रऔर पूजा (पृथक् पृथक्) हैं। शिव को छोड़कर इस संसार में उनका कोई दूसरा ज्ञाता नहीं है। ऐसा जानकर ही उन (शिव) ने छह आम्नायों का प्रवर्तन किया। उन सर्वज्ञ (शिव) ने सबको तत्त्वतः जानकर तत्तत् मन्त्र ध्यान भेद न्यास पूजा विधि को बतलाया । उत्तर ऊर्ध्व अधः पश्चिम पूर्व और दक्षिण नाम वाले छह आम्नाय शिव के मुख से ही निकले हैं। यामल डामर तन्त्र संहितायें उसके मध्यवर्ती है। देवता ऋषि सिद्ध असुर दैत्य दानव गुह्यक अप्सरायें किन्नर उरग राक्षस चन्द्रवंशी सूर्यवंशी राजा एवं अन्य लोग जो कि प्रत्यक्षवादी है। वे सब तत्तत् कार्य आदि की सिद्धि के लिये उस-उस मूर्ति की उपासना करते हैं ॥युगों के शेष कलियुग के क्षीण होने पर अल्पायु आलसी निरुत्साह दरिद्र भक्तिहीन कुमार्गगामी मनुष्य इनके उपासक नहीं होंगे तब इन मूर्तियों का ध्यान मन्त्र आदि लुप्त हो जायगा। भिन्न-भिन्न आम्नायों से सम्बद्ध उन सौम्य और उग्र मूर्तियों का अन्धकार और प्रकाश की भाँति एक स्थान और एक काल में अवस्थान नहीं होगा। इस प्रकार एक की उपासना होने पर उन सबकी उपासना कैसे होगी यह मुझे महा दुर्घट लग रहा है। किन्तु दश हजार अक्षरों वाला एक मेरा महामन्त्र है। छह आम्नायों में स्थित प्रायः समस्त मन्त्र उसमें है ॥उसमें सौम्य और उग्र मूर्तियों के नाम तथा भेद है। तीनों लोकों में इससे बढ़ कर मन्त्र कहीं भी नहीं है। महामहा उग्रतर एवं समस्त सिद्धियों का एकमात्र साधक यह मन्त्र तथा त्रैलोक्याकर्षण कवच दोनों मेरी दृष्टि में समान हैं। जिस प्रकार नदी का समस्त जलसमूह समुद्र में प्रविष्ट हो जाता है उसी प्रकार छहों आम्नायों में स्थित मन्त्र इस (एक मन्त्र) में प्रविष्ट है। जिस प्रकार पर्वतों में सुमेरु, नदियों में गङ्गा, तीर्थों में काशी, शस्त्रों में वज्र, यज्ञों में अश्वमेध, तपस्याओं में उपवास, बलवानों में वायु, गायों में कामधेनु, देवताओं में शिव और देवियों में मैं हूँ उसी प्रकार मन्त्रों में यह अयुताक्षर (मन्त्र सर्वोपरि है। इस मन्त्र के द्वारा मेरे आराधित होने पर निश्चित रूप से षडाम्नाय की समस्त शक्तियाँ आराधित हो जाती है।
यदि तुम दोनों मेरी तथा सौम्य और उग्र उन देवताओं की आराधना करना चाहते हो तो इस अयुताक्षर मालामन्त्र के विषय में प्रयत्न करो। जिस प्रकार हाथी के पैर में सभी के पैर समाहित हो जाते हैं किन्तु हाथी का पैर किसी के पैर में समाहित नहीं होता उसी प्रकार हे सुरोत्तमद्वयः समस्त मन्त्र इस मन्त्र में प्रविष्ट हो जाते हैं किन्तु अनेक प्रकार से भी यह मन्त्र किसी में भी प्रविष्ट नहीं हो सकता । आगमशास्त्र में जितने भी बीज कूट उपकूट उद्धृत हैं वे सब इसमें उसी प्रकार स्थित हैं जैसे मेरे अन्दर त्रिभुवन। जब किसी को छह आम्नायों को उपदेश हो जाता है तब वह इसका अधिकारी होता है नहीं तो इस मन्त्र (के उपदेश) की योग्यता नहीं रखता। इस मन्त्र की महिमा को मैं जानता हूँ अथवा शिव जानते हैं। गुरु के उपदेश से ज्ञात इस मन्त्र वाले पुरुष के समक्ष मैं निरन्तर रहती हूँ। उसकी वशवर्तिनी हो जाती हूँ। जिस प्रकार रस्सी से आकाशचारी पक्षी को लोग पास में खींच लेते हैं। वैसे ही साधक इस मन्त्र के द्वारा मुझे आकृष्ट कर लेते हैं। इस प्रकार जो आप दोनों ने मुझसे पूछा उसे मैंने संक्षेप में बतला दिया विस्तार से श्रवण  करने की शक्ति तुम में नहीं है ॥
महाकाल ने कहा-देवी के पूरे वाक्य को सुनने के बाद हम दोनों ने फिर कहा- हे देवि ! यदि तुम हमारे ऊपर प्रसन्न हो तो स्वयं उपदेश करो। ऐसा कहने पर प्रसन्नमुख देवी ने हम दोनों से कहा कि हे देवद्वय! मन्त्र बोलती हुई मेरे पीछे-पीछे मन्त्र बोलो। देवी के इस वचन को सुनकर हम दोनों ने वैसा ही किया। इस प्रकार देवी ने हम दोनों को उपदेश देकर एक क्षण में अन्तर्हित हो गयी। इस प्रकार हम दोनों ने इस अयुताक्षर मन्त्र को प्राप्त किया। (आराधना से सन्तुष्ट) विष्णु ने इसे नारद और सनक को दिया। हे पार्वति ! दुर्वासा कश्यप दत्तात्रेय और कपिल ये चार इस मन्त्र के सन्दर्भ में मेरे शिष्य माने गये हैं। इन्होंने अपने बहुत से शिष्य प्रशिष्य बनाये ॥ इस प्रकार परम्पराप्राप्त यह अयुताक्षर मालामन्त्र इस लोक में मृत्युञ्जयप्राण नाम से प्रतिष्ठित हुआ। इस प्रकार इस मन्त्र की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है। जहाँ देवी ने ऐसा कहा वहाँ दूसरे की क्या बात । शाम्भव आदि कूट तार आदि बीजसमूह सबके सब उसी में स्थित हैं जैसे कि ब्रह्म में तीनों लोक। जिस प्रकार मकड़ी तन्तु को उगलती और निगलती है उसी प्रकार यह मन्त्र स्थावर जगमात्मक विश्व की सृष्टि और संहार करता है। बिना देवी की कृपा और गुरु के अनुग्रह के यह मन्त्र करोड़ हजार लाख जन्म में भी नहीं प्राप्त हो सकता। हे प्रिये! मन्त्र का ग्रहणेच्छु योगी साधक पहले इस अध्याय को पढ़कर मृत्युञ्जयप्राण का धीरे-धीरे स्पष्ट उच्चारण करे । सम्पूर्ण मन्त्र को समाप्त कर पृथ्वी पर दण्ड के समान नत होकर मृत्युञ्जयप्राण के दाता गुरु को (यह पाठ) अर्पित कर दे। अथवा गुरु जिससे सन्तुष्ट हो वह करे ॥ इस प्रकार श्रीमद् आदिनाथविरचित पचास हजार श्लोकों वाली महाकाल-संहिता के कामकलाकाली खण्ड के अयुताक्षरमन्त्रप्रशंसाकथन नाम 309/494 चतुर्दश पटल की ' हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण हुई।
प्राणायुताक्षर मंत्र :–
 ओं ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं हूं छ्रीं स्त्रीं फ्रें क्रों हौं क्षौं आं स्फ्रों स्वाहा कामकलाकालि, ह्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं क्रीं ठः ठः दक्षिणकालिके ऐं क्रीं ह्रीं हूं स्त्रीं फ्रें स्त्रीं छ्रीं ख्फ्रें भद्रकालि हूं हूं फट् फट् नमः स्वाहा ओं ह्रीं ह्रीं हूं हूं भगवति श्मशानकालि नरकंकालमालाधारिणि ह्रीं क्रीं कुणपभोजिनि फ्रें फ्रें स्वाहा श्मशानकालि, क्रीं हूं ह्रीं स्त्रीं श्रीं क्लीं फट् स्वाहा कालकालि ओं फ्रें सिद्धिकरालि ह्रीं छ्रीं हूं स्त्रीं फ्रें नमः स्वाहा गुह्यकालि, ओं ओं हूं ह्रीं फ्रें छ्रीं स्त्रीं श्रीं क्रों नमो धनकाल्यै विकरालरूपिणि धनं देहि देहि दापय दापय क्षं क्षां क्षिं क्षीं क्षुं क्षूं क्षॄं क्षॄं क्षें झैं क्षों क्षौं क्षः क्रों क्रोः आं ह्रीं ह्रीं हूं हूं नमो नमः फट् स्वाहा धनकालिके, ओं ऐं क्लीं ह्रीं हूं सिद्धिकाल्यै नमः सिद्धिकालि ह्रीं चण्डाट्टहासिनि जगद्ग्रसनकारिणि नरमुण्डमालिनि चण्डकालिके क्लीं श्रीं हूं फ्रें स्त्रीं छ्रीं फट् फट् स्वाहा चण्डकालिके, नमः कमलवासिन्यै स्वाहा महालक्ष्मि ओं श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः महालक्ष्मि, ह्रीं नमो भगवति माहेश्वरि अन्नपूर्णे स्वाहा अन्नपूर्णे, ओं ह्रीं हूं उत्तिष्ठपुरूषि किं स्वपिषिभयं मे समुपस्थितं यदि शक्यमशक्यं वा क्रोधदुर्गे भगवति शमय स्वाहा हूं ह्रीं ओं वनदुर्गे, ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोरघोरतरतनुरूपे चट चट प्रचट प्रचट कह कह रम रम बन्ध बन्ध घातय घातय हूं फट्, विजयाघोरे । ह्रीं पद्मावति स्वाहा पद्मावति, महिषमर्दिनि स्वाहा महिषमर्दिनि, ओं दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा जयदुर्गे ओं ह्रीं दुं दुर्गायै स्वाहा । ऐं ह्रीं श्रीं ओं नमो भगवति मातङ्गेश्वरि सर्वस्त्रीपुरुषवशंकरि सर्वदुष्टमृगवशंकरि सर्वग्रहवशंकरि सर्वसत्त्ववशंकरि सर्वजनमनोहरि सर्वमुखरञ्जिनि सर्वराजवशंकरि सर्वलोकममुं मे वशमानय स्वाहा । राजमातङ्गि उच्छिष्टमातङ्गिनि हूं ह्रीं ओं क्लीं स्वाहा उच्छिष्टमातङ्गि उच्छिष्टचाण्डालिनि सुमुखि देविमहापिशाचिनि ह्रीं ठः ठः ठः उच्छिष्टचाण्डालिनि, ओं ह्लीं ओं बगलामुखि सर्वदुष्टानां मुखं वाचं स्तम्भय जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं नाशय ह्लीं ओं स्वाहा बगले, ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं धनलक्ष्मि ओं ह्रीं ऐं ह्रीं ओं सरस्वत्यै नमः सरस्वति, आं ह्रीं हूं भुवनेश्वरि ओं ह्रीं श्रीं हूं क्लीं आं अश्वारूढायै फट् फट् स्वाहा अश्वारूढे, ओं ऐं ह्रीं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ऐं ह्रीं स्वाहा नित्यक्लिन्ने । स्त्रीं क्षमकलह्रहसव्य्रूं (बालाकूट) ( बगलाकूट ) ( त्वरिताकूट ) जयभैरवि श्रीं ह्रीं ऐं ब्लूं ग्लौः अं आं इं राजदेवि राजलक्ष्मि ग्लं ग्लां ग्लिं ग्लीं ग्लुं ग्लूं ग्लृं ग्लॄं ग्लॄं ग्लें ग्लैं ग्लों ग्लौं ग्लः क्लीं भ्रीं ध्रीं ऐं ह्रीं क्लीं पौं राजराजेश्वरि ज्वल ज्वल शूलिनि दुष्टग्रहं ग्रस स्वाहा शूलिनि, ह्रीं महाचण्डयोगेश्वरि ध्रीं थ्रीं ण्रीं फट् फट् फट् फट् फट् जय महाचण्डयोगेश्वरि, श्रीं ह्रीं क्लीं प्लूं ऐं ह्रीं क्लीं पौं क्षीं क्लीं सिद्धिलक्ष्म्यै नमः क्लीं पौं ह्रीं ऐं राज्यसिद्धिलक्ष्मि ओं क्रः हूं आं क्रों स्त्रीं हूं क्षौं ह्रां फट् ( त्वरिता कूट) ( नक्षत्रकूट) सकह्रलम क्षखव्रूं (ग्रहकूट) म्लकह्रक्षरस्त्रीं (काम्यकूट) यम्लव्रीं (पार्श्वकूट) ( कामकूट) ग्लक्षकमह्नव्य्रऊं ह्रह्लव्य्रकऊं मफ्रलहलहखफ्रूं म्लव्य्रवऊं (शंखकूट ) म्लक्षकसहह्रूं क्षम्लब्रसहस्हक्षक्लस्त्रीं रक्षलह्रमसहकब्रूं (मत्स्यकूट ) ( त्रिशूलकूट) झसखग्रमऊं ह्रक्ष्मलीं हीं ह्रीं हूं क्लीं स्त्रीं ऐं क्रौं छ्रीं फ्रें क्रीं ग्लक्षकमह्रव्य्रऊं हूं अघोरे सिद्धिं में देहि दापय स्वाहा अघोरे । ओं नमश्चामुण्डे करङ्किणि करङ्कमालाधारिणि किं किं विलम्बसे भगवति शुष्काननि खं खं अन्त्रकरावनद्धे भो भो वल्ग वल्ग कृष्णभुजङ्गवेष्टित तनुलम्बकपाले ह्रष्ट ह्रष्ट हट्ट हट्ट पत पत पताकाहस्ते ज्वल ज्वल ज्वालामुखि अनलनख खट्वांगधारिणि हा हा चट्ट चट्ट हूं हूं अट्टाट्टहासिनि उड्डु उड्डु वेतालमुखि अकि अकि स्फुलिङ्गपिङ्गलाक्षि चल चल चालय चालय करङ्कमालिनि नमोऽस्तु ते स्वाहा विश्वलक्ष्मि, ओं ह्रीं क्ष्रीं द्रीं शीं क्रीं हूं फट् यन्त्रप्रमथिनि ख्फ्रें ल्रीं ज्रीं क्रीं ओं ह्रीं फ्रें चण्डयोगेश्वरि कालि फ्रें नमः चण्डयोगेश्वरि ह्रीं हूं फट् महाचण्डभैरवि ह्रीं हूं फट् स्वाहा महाचण्डभैरवि, ऐं ह्रीं क्लीं फ्रें ऐं ह्रीं श्रीं त्रैलोक्यविजयायै नमः स्वाहा त्रैलोक्यविजये, ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हौं जयलक्ष्मि युद्धे मे विजयं देहि हौं आं क्रों फट् फट् फट् स्वाहा जय लक्ष्मि, ( अतिचण्ड बीज ) महाप्रचण्ड भैरवि हूं फ्रों (टकारयुक्त अतिचण्ड बीज ) फ्रटं हम्लब्रीं बफ्रटं ब्रकम्लब्लक्लऊं रफ्रटं महामन्त्रेश्वरि ओं ह्रीं श्रीं क्लीं हौं हूं वज्रप्रस्तारिणि ठः ठः वज्रप्रस्तारिणि, ओं ह्रीं नमः परमभीषणे हूं हूं नरकङ्कालमालिनि फ्रें फ्रें कात्यायनि व्याघ्रचर्मावृतकटि क्रीं क्रीं श्मशानचारिणि नृत्त्य नृत्त्य गाय गाय हस हस हूं हूंकारनादिनि क्रों क्रों शववाहिनि मां रक्ष रक्ष फट् फट् हूं हूं नमः स्वाहा कात्यायनि । ऐं ह्रीं श्रीं षैं सैं फैं रैं स्हौः षां मीं थूं ह्रां ह्रीं हूं ( योगिनी कूटौ ) हसखफ्रें शिवशक्तिसमरसचण्ड कापालेश्वरि हूं नमश्चण्डकापालेश्वरि, ऐं क्रीं क्लीं पौं सखक्लक्ष्मध्रयब्लीं क्लीं भ्रीं ध्रीं क्लीं भ्रीं ध्रीं महासुवर्णकूटेश्वरि कमलक्षसहब्लूं श्रीं ह्रीं ऐं नमः स्वाहा सुवर्णकूटेश्वरि, ऐं ह्रीं श्रीं आं ग्लीं ईं आं अं नमो भगवति वार्तालि वार्तालि वाराहि वाराहि वराहमुखि ऐं ग्लूं अन्धे अन्धिनि नमः रुन्धे रुन्धिनि नमः जम्भे जम्भिनि नमः मोहे मोहिनि नमः स्तम्भे स्तम्भिनि नमः सर्वदुष्टे प्रदुष्टानां सर्ववाक् चित्तचक्षुः श्रोत्र मुखगति जिह्वा स्तम्भं कुरु कुरु शीघ्रं वशं कुरु कुरु ऐं क्रीं श्रीं ठः ठः ठः ठः ठः ओं ऐं हूं फट् ठः ठः ओं ग्लूं ह्रीं वार्तालि वाराहि ह्रीं ग्लूं ओं चण्डवार्तालि ऐं ह्रीं श्रीं आं ग्लूं ईं वार्तालि वार्तालि वाराहि वाराहि शत्रून् दह दह ग्रस ग्रस ईं आं ग्लूं हुं फट् जय वार्तालि, ऐं ह्रीं श्रीं (महाबीज ) स्हौः ॐ ह्रीं हूं फ्रें राज्यप्रदे ख्फ्रें हसख्फ्रें उग्रचण्डे रणमर्दिनि हूं फ्रें छ्रीं स्त्रीं सदा रक्ष रक्ष त्वं रूपं मां रूपं च जूं सः मृत्युहरे नमः स्वाहा अः, उग्रचण्डे ऐं ( योगिनीकूट) हसखफ्रें हसखफ्रीं औं ह्रीं हसफ्रेंहूं फ्रें उग्रचण्डे (चण्डेश्वर महाप्रेत बीजे ) स्वाहा श्मशानोग्रचण्डे ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रीं (अमृतकूट) खफ्रीं हसखफ्रीं रुद्रचण्डायै रह्रीं नमः स्वाहा रुद्रचण्डे । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ( फेत्कारी कूट वामनेत्र विभूषित ) चण्डकूटे ख्फ्रें ग्लक्षकमह्नव्य्रीं प्रचण्डायै नमः स्वाहा प्रचण्डे, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रें ह्रीं (संधिकूट) चण्डनायिकायै नमः त्रूं नमः स्वाहा चण्डनायिके, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रें हसखफ्रूं (चण्डेश्वरकूट ईकार बिन्दु युक्त महाप्रेत बीज ) क्लीं नमः स्वाहा चण्डे महादेवि ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रीं चण्डवत्यै क्ष्म्लूं नमः स्वाहा चण्डवति, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रें क्षम्लकस्हरयब्रूं ख्फ्रीं (अतिप्रेत ) अतिचण्डायै नमः ग्लूं नमः स्वाहा अतिचण्डे ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रें ( श्मशानकूट ) ख्फ्रीं ( महाप्रेत ) चण्डिकायै द्रैं नमः स्वाहा चण्डिके, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रें स्हफ्रीं क्लीं हूं क्लह्रीं कात्यायन्यै ख्फ्रें कामदायिन्यै हूं नमः स्वाहा ज्वालाकात्यायनि, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं क्लीं हूं श्रीं हभ्रीं महिषमर्दिनि श्रीं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं उन्मत्तमहिष मर्दिनि ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं (नक्षत्रकूट शंखकूट) महामहेश्वरि तुम्बुरेश्वरि स्वाहा तुम्बुरेश्वरि, ओं ह्रीं क्लीं हूं ग्लूं आं ऐं हूं स्हौ फ्रें चैतन्यभैरवि फ्रें फ्रें स्हौं क्रों आं ऐं ग्लूं हूं क्लीं ह्रीं ओं फट् ठः ठः चैतन्यभैरवि, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं मुण्डमधुमत्यै शक्ति भूतिन्यै ह्रीं ह्रीं ह्रीं फट् मधुमति । वदवद वाग्वादिनि स्हौं: क्लिन्नक्लेदिनि महाक्षोभं कुरु स्हौः वाग्वादिनि, भैरवि ह्रीं फ्रें ख्फ्रें क्लीं पूर्णेश्वरि सर्वकामान् पूरय ओं फट् स्वाहा पूर्णेश्वरि, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं रक्तरक्ते महारक्त चामुण्डेश्वरि अवतर अवतर स्वाहा रक्तचामुण्डेश्वरि माहेशि, ओं ह्रीं श्रीं त्रिपुरावागीश्वर्यै नमः त्रिपुरावागीश्वरि हसें ( मारकूट) (महाप्रेत बीज) कालभैरवि ( निशाकूट कूर्चकूट तुङ्गप्रतुङ्गकूट ) चण्डवारुणि, ओं अघोरे हा हा घोरे, घोरघोरतरे हूं सर्वर्शशर्वे ह्रें नमस्ते रुद्ररूपे हः हः ओं घोरे ह्रीं श्रीं क्रों क्लू ऐं क्रौं छ्रीं फ्रें क्रीं ख्फ्रें हूं अघोरे सिद्धिं मे देहि दापय स्वाहा क्ष्रूं अघोरे, ओं ह्रीं फ्रें हूं महादिग्वीरे ( महादिगम्बरि ) ऐं श्रीं क्लीं आं मुक्तकेशि चण्डाट्टहासिनि छ्रीं स्त्रीं क्रीं ग्लौं मुण्डमालिनि ओं स्वाहा दिगम्बरि । आं ऐं ह्रीं कामकलाकालेश्वरि सर्वमुखस्तम्भिनि सर्वजनमनोहरि सर्वजन वशंकरि सर्वदुष्टनिमर्दिनि सर्वस्त्रीपुरुषाकर्षिणि छिन्धि शृङ्खलां त्रोटय त्रोटय सर्वशत्रून् जम्भय जम्भय र्द्विषान् निर्दलय निर्दलय सर्वान् स्तम्भय स्तम्भय मोहनास्त्रेण द्वेषिणः उच्चाटय उच्चाटय सर्ववश्यं कुरु कुरु स्वाहा देहि देहि सर्वं कालरात्र्यै कामिन्यै गणेश्वर्यै नमः कालरात्रि । ओं ऐं आं ईं णं ईं ऐह्येहि भगवति किरातेश्वरि विपिन कुसुमावतंसिनिकर्णे भुजगनिर्मोककञ्चुकिनि ह्रीं ह्रीं ह्रं ह्रं कह कह ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल सर्वसिद्धिं दद दद देहि देहि दापय दापय सर्वशत्रून् दह दह बन्ध बन्ध पठ पठ पच पच मथ मथ विध्वंसय विध्वंसय हूं हूं हूं फट् नमः स्वाहा किरातेश्वरि, ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं वज्रकुब्जिके हसखफ्रीं प्राणेशि त्रैलोक्याकर्षिणि ह्रीं क्लीं अङ्गद्राविणि स्मराङ्गने अनघे महाक्षोभकारिणि ऐं क्लीं ग्लौः ग्लं ग्लां ग्लिं ग्लीं ग्लुं ग्लूं ग्लृं ग्लॄं ग्ललॄं ग्लें ग्लैं ग्लों ग्लौं ग्लः ग्लौः ग्लौं वज्रकुब्जिके नमो भगवति घोरे महेश्वरि हसखफ्रीं देवि श्रीकुब्जिके रह्रीं स्य्रीं स्य्रूं ङञणनम अघोरामुखि छां छीं छूं किलि किलि विच्चे पादुकां पूजयामि नमः समयकुब्जिके, ओं ऐं ह्रीं क्लीं फ्रें हसफ्रीं हसखफ्रें क्षह्रम्लव्य्रीं भगवति विच्चे घोरे हसखफ्रें ऐं श्री कुब्जिके रह्रीं रह्रूं स्हौं ड्ञणनम अघोरामुखि छां छीं छूं किलि किलि विच्चे स्त्रीं हूं स्हौः पादुकां पूजयामि नमः स्वाहा मोक्षकुब्जिके, नमो भगवति सिद्धे महेशानि हसफ्रां हसफ्रीं हसफ्रूं कुब्जिके रह्रां रह्रीं रहूं खगे ऐ अघोरे अघोरामुखि किलि किलि विच्चे पादुकां पूजयामि नमः भोगकुब्जिके, ऐं ह्रीं श्रीं हसखफ्रें श्य्रों श्य्रों भगवत्यम्ब ( प्राभातिककूट सकारादि युक्त प्राभातिककूट) कुब्जिकायै हसकलक्रीं यां ग्लौं ठौं ऐं क्रूं ङञणनम अघोरामुखि छां छीं छूं किलि किलि विच्चे म्रों श्रीं हसखफ्रें श्रीं ह्रीं ऐं जयकुब्जिके, ऐं ह्रीं श्रीं सहसखफ्रीं स्हौं भगवत्यम्ब ( प्राभातिककूट सकारादि युक्त प्राभातिककूट ईकारयुक्त) कुब्जिके ( बालाकूट) (ईकारयुक्त बालाकूट ) ( बालाकूट ऊकारयुक्त ) ङञणनम अघोरामुखि छां छीं किलि किलि विच्चे फट् स्वाहा हूं फट् स्वाहा नमः ऐं ऐं ऐं सिद्धिकुब्जिके, ऐं ह्रीं श्रीं हसखफ्रीं स्हौः म्लक्षकसहह्रूं सम्लक्षक सहह्रूं स्रह्रफ्रीं ( षष्ठ स्वर विहीनं तु कलाबीजेन भूषितम्। एतद् बीजं सभाभाष्य) कुब्जिके ह्रीं ह्रीं आगच्छ आगच्छ आवेशय आवेशय वेधय वेधय ह्रीं ह्रीं सम्लक्षकसहह्रूं म्लक्षकसहह्रूं नमः स्वाहा आवेशकुब्जिके (महेन्द्रकूट ) हसखफ्रें (पित्सकूट) (मार्जार मणि ऋषि सारङ्ग कूटानि ) ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं कालि कालि महाकालि मांसशोणितभोजिनि ह्रां ह्रीं ह्रूं रक्तकृष्णमुखि देवि मां मां पश्यन्तु शत्रवः श्री हृदयशिवदूति श्री पादुकां पूजयामि ह्रां हृदयाय नमः हृदय शिवदूति ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं नमो भगवति दुष्टचाण्डालिनि रुधिरमांसभक्षणि कपालखट्वाङ्गधारिणि हन हन दह दह पच पच मम शत्रून् ग्रस ग्रस मारय मारय हूं हूं हूं फट् स्वाहा शिरः शिवदूति श्री पादुकां पूजयामि ह्रीं शिरसे स्वाहा शिरः शिवदूति । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हसखफ्रां हसखफ्रीं हसखफ्रूं महापिङ्गलजटाभारे विकटरसनाकराले सर्वसिद्धिं देहि देहि दापय दापय शिखाशिवदूति श्रीपादुकां पूजयामि हूं शिखायै वषट् शिखाशिवदूति । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं महाश्मशानवासिनि घोराट्टहासिनि विकटतुङ्गकोकामुखि ह्रीं क्लीं श्रीं महापातालतुलितोदरि भूतवेताल सहचारिणि अनघे कवचशिवदूति श्रीपादुकां पूजयामि कवचाय हूं कवचशिवदूति । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं लेलिहानरसनाभयानके विस्रस्तचिकुरभारभासुरे चामुण्डाभैरवी डाकिनी गणपरिवृते फ्रें ख्फ्रें हूं आगच्छ आगच्छ सान्निध्यं कल्पय कल्पय त्रैलोक्यडामरे महापिशाचिनि नेत्रशिवदूति श्रीपादुकां पूजयामि नेत्रत्रयाय वौषट् नेत्रशिवदूति । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं गुह्यातिगुह्यकुब्जके हूं हूं हूं फट् मम सर्वोपद्रवान् मन्त्रतन्त्रईलि (ति) यन्त्र चूर्णप्रयोगादिकान् परकृतान् करिष्यन्ति तान् सर्वान् हन हन मथ मथ मर्दय मर्दय दंष्ट्राकरालि फ्रें हूं फट् गुह्यातिगुह्य कुब्जिके अस्त्रशिवदूति श्रीपादुकां पूजयामि अस्त्राय फट् अस्त्रशिवदूति । ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं हूं हूं हूं हूं हूंकारघोरनादविद्राविद्राविजगत्त्रये ह्रीं ह्रीं ह्रीं प्रसारितायुतभुजे महावेग प्रधाविते क्लीं क्लीं क्लीं पदविन्यासत्रासितसकलपाताले श्रीं श्रीं श्रीं व्यापकशिवदूति जितेन्द्रिये परमशिवपर्यङ्कशायिनि छ्रीं छ्रीं छ्रीं गलद् रुधिरमुण्डमाला धारिणि घोरघोरतररूपिणि फ्रें फ्रें फ्रें ज्वालामालि पिङ्गजटाजूटे अचिन्त्यमहिमबल प्रभावे स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं दैत्यदानवनिकृन्तनि सकलसुरासुरकार्यसाधिके ओं ओं ओं फट् नमः स्वाहा व्यापकशिवदूति । ओं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं क्रों ह्रीं आं हूं ( महापुरुष ) हौं ग्लूं क्रौं हसखफ्रें फ्रों क्रूं छ्रीं फ्रें क्लौं ब्लौं क्लूं स्हौः स्फ्रें ख्रौं जूं ब्रीं कालसंकर्षिणि हूं हूं स्वाहा कालसंकर्षिणि ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हसखफ्रें हूं हूं कुक्कुटि क्रीं आं क्रों फ्रें फ्रों फट् फट् स्वाहा कुक्कुटि ओं ह्रीं क्लीं स्त्रीं फ्रें भ्रमराम्बिके शत्रुमर्दिनि आं क्रों हौं हूं छ्रीं फट् फट् नमः स्वाहा ओं भ्रमराम्बिके, फ्रों धनदे ह्रीं सां सीं सूं संकटादेवि संकटेभ्यो मां तारय तारय श्रीं क्लीं हौं हूं आं फट् स्वाहा संकटादेवि, ओं क्रो हौं भोगवति ॐ ह्रीं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं षं सं हं क्षं षः सः हः क्षः हूं नमोः भगवति महार्णवेश्वरि, त्रैलोक्यग्रसनशीले आं ईं ऊं फट् स्वाहा महार्णवेश्वरि आं क्षीं पीं चूं भगवति घूं जूं (प्रभातकूट) म्लक्षक सहह्रूं चण्डझङ्कारकापालिनि जयकङ्केश्वरि ठः ठः जयकङ्केश्वरि, ओं ह्रीं आं शवरेश्वर्यै नमः शवरेश्वरि । ॐ ऐं आं ह्रीं श्रीं क्लीं हूं फ्रें ख्फ्रें हसखफ्रें पिङ्गले पिङ्गले महापिङ्गले क्रीं हूं फ्रें छ्रीं स्हौः क्रीं क्रों फ्रें स्त्रीं श्रीं फ्रों ब्लौं ब्रीं ठः ठः सिद्धिलक्ष्मि, ओं ऐं ह्रीं क्लीं भगवति महामोहिनि ब्रह्मविष्णु शिवादिसकलसुरासुर मोहिनिसकलं जनं मोहय मोहय वशीकुरु वशीकुरू कामाङ्गद्राविणि कामाङ्कशे स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ओं महामोहिनी, ऐं क्लीं यं क्ष्स्त्रीं हं हां हिं हीं हुं हूं हृं हॄं ह्लृं हें हैं हों हौं हः ह्रीं हसकहलह्रीं सकलह्रीं त्रिपुरसुन्दरि, हूं नमो मूकाम्बिकायै वादिनी मूकय मूकय आं क्लीं ह्रीं स्हें स्हः सौः स्वाहा मूकाम्बिके, ह्रीं क्रौं हूं फट् एकजटे ह्रीं क्रौं हूं नीलसरस्वति, ओं ह्रीं क्रों वीं फट् उग्रतारे, ओं श्रीं ह्रीं ऐं वज्रवैरोचनीये वीं वीं फट् ठः ठः छिन्नमस्ते, ओं नमो भगवत्यै पीताम्बरायै ह्रीं ह्रीं सुमुखि बगले विश्वं मे वशं कुरु कुरु ठः ठः वश्य बगले, हूं रक्ष त्रिकण्टकि, ओं क्रों क्लीं श्रीं क्र: आं स्त्रीं हूं जयदुर्गे रक्ष रक्ष स्वाहा संग्रामजयदुर्गे ह्रीं क्लीं हूं विजयप्रदे । ओं ऐं हौं ग्लूं क्रौं ब्रीं फट् ब्रह्माणि, ओं हौं ग्लूं आं ह्रीं श्रीं वीं माहेश्वरि, व्रीं ब्लौं क्लौं फ्रें क्लूं क्रीं फ्रों जूं ग्लूं स्हौः हूं हूं फट् फट् स्वाहा माहेश्वरि, ह्रीं ऐं क्लीं औं कौमारि मयूरवाहिनि शक्तिहस्ते हूं फ्रें स्त्रीं फट् फट् स्वाहा कौमारि । ओं नमो नारायण्यै जगस्थितिकारिण्यै क्लीं क्लीं क्लीं श्रीं श्रीं श्रीं आं जूं ठः ठः वैष्णवि । ओं नमो भगवत्यै वराहरूपिण्यै चतुर्दशभुवनाधिपायै भूपतित्वं मे देहि दापय स्वाहा वाराहि, ओं आं क्रों हूं जूं ह्रीं क्लीं स्त्री क्षूं क्षौं फ्रों जू फ्रें जिह्वासटाघोररूपे दंष्ट्राकराले नारसिंहि हौं हौं हौं हूं हूं हूं फट् फट् स्वाहा नारसिंह, ओं क्लीं श्रीं हूं इन्द्राणि ह्रीं ह्रीं जय जय क्षौं क्षौं फट् फट् स्वाहा इन्द्राणि, ओं क्रों क्रीं फ्रें फ्रों छ्रीं ख्रौं णीं हसखफ्रें ब्लौं जूं क्लूं ह्रीं व्रीं क्षूं क्रौं चामुण्डे ज्वल ज्वल हिलि हिलि किलि किलि मम शत्रून् त्रासय त्रासय मारय मारय हन हन पच पच भक्षय भक्षय क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं फट् फट् ठः ठः चामुण्डे, ओं नमः कामेश्वरि कामाङ्कुशे कामप्रदायिके भगवति नीलपताके भगान्तिके महेश्वरि क्लूं नमोऽस्तु ते परमगुह्ये वीं वीं वीं हूं हूं हूं मदने मदनान्तदेहे त्रैलोक्यमावेशय हूं फट् स्वाहा नीलपताके, क्रीं क्रीं हूं हूं हूं हूं क्रों क्रों क्रों श्रीं श्रीं ह्रीं ह्रीं छ्रीं फ्रें स्त्रीं चण्डघण्टे शत्रून् स्तम्भय स्तम्भय मारय मारय हूं फट् स्वाहा चण्डघण्टे । (पद्यार्थः द्विरुक्तं भजत इति विचारणीयम्।) ओं ह्रीं श्रीं हूं क्रों क्रीं स्त्रीं क्लीं स्हजहलक्षम्लवनऊं ( उमाकूट) लक्षमह्रजरक्रव्य्रऊं हस्लक्षकमह्रव्रूं म्लकह्रक्षरस्त्रै चण्डेश्वरि ख्रौं छ्रीं फ्रें क्रौं हूं हूं फट् फट् स्वाहा चण्डेश्वरि, ओं ऐं आं ह्रीं हूं क्रों क्षौं क्रीं क्रौं फ्रें अनङ्गमाले स्त्रियमाकर्षयाकर्षय त्रुट त्रुट छेदय छेदय हूं हूं फट् फट् स्वाहा अनङ्गमाले, ओं ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं क्रीं आं क्रों फ्रों हूं क्षूं हसखफ्रें फ्रें हरसिद्धे सर्वसिद्धिं कुरु कुरु देहि देहि दापय दापय हूं हूं हूं फट् फट् स्वाहा हरसिद्धे, ओं क्रों क्रौं हसखफ्रें हूं छ्रीं फेत्कारि दद दद देहि देहि दापय दापय स्वाहा फेत्कारि, ऐं श्रीं आं हौं हूं स्फ्रों स्हौः फ्रें छ्रीं स्त्रीं ठ्रीं ध्रीं प्रीं थ्रीं क्रां ओं लवणेश्वरि, क्रः छ्रीं हूं स्त्रीं फ्रें नाकुलि ओं ऐं आं