Monday, March 30, 2026

कार्तवीर्य स्तोत्र


कार्तवीर्य स्तोत्र

ॐ कार्तवीर्य खलद्वेषी कृतवीर्यसुतो बली ।
सहस्त्रबाहुः शत्रुघ्नो रक्तवासा धनुर्धरः ॥ १ ॥

रक्तगंधो रक्तमाल्यो राजा स्मर्तुरभीष्टदः ।
द्वादशैतानि नामानि कार्तवीर्यस्य यः पठेत ॥ २ ॥

सम्पदस्तस्य जायन्ते जनास्तस्य वशंगताः ।
आनयत्याशु दूरस्थं क्षेमलाभयुतं प्रियं ॥ ३ ॥

कार्तवीर्योर्जुनो नाम राजा बाहुसहस्त्रभृत ।
तस्य स्मरणमात्रेण हृतं नष्टं च लभ्यते ॥ ४ ॥

कार्तवीर्य महाबाहो सर्वदुष्टनिबर्हण ।
सर्व रक्षा सदा तिष्ठ दुष्टान्नाशय पाहि माम् ॥




कितने पाठ करें – पूरी जानकारी

साधना पाठ संख्या कितने दिन कब करें
पूर्ण साधना 16,000 पाठ जितने दिन में हो 

साधना विधि – स्टेप बाय स्टेप

पहला कदम – संकल्प

हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर बोलें –

"मैं (अपना नाम) संकल्प लेता हूँ कि मैं (41/21/ जितने दिन) तक प्रतिदिन (51/21/ जितने पाठ) कार्तवीर्य स्तोत्र का पाठ करूंगा। मेरा फँसा हुआ धन (राशि बोलें) जो (व्यक्ति का नाम) के पास है, वह शीघ्र वापस मिले। हे कार्तवीर्य महाराज मुझे आशीर्वाद दें।"

* दूसरा कदम – समय
* तीसरा कदम – स्थान
* चौथा कदम – सामग्री

सामग्री आवश्यकता
लाल वस्त्र अनिवार्य (पुरुष लाल धोती या कुर्ता, महिला लाल साड़ी या सूट)
लाल आसन अनिवार्य (लाल चटाई या लाल वस्त्र बिछाएँ)
लाल फूल गुड़हल या गुलाब (शिवलिंग पर चढ़ाएँ)
लाल मिठाई जलेबी, लाल बूंदी, गुलाब जामुन
लाल चंदन यदि उपलब्ध हो
सिंदूर शिवलिंग पर लगाने के लिए

पाँचवाँ कदम – विधि

1. स्नान करें, लाल वस्त्र पहनें।
2. शिव मंदिर जाएँ (यदि संभव न हो तो घर में शिवलिंग स्थापित करें)।
3. शिवलिंग पर जल, दूध, सिंदूर, लाल फूल चढ़ाएँ।
4. लाल आसन पर बैठें।
5. लाल मिठाई (जलेबी) का भोग लगाएँ।
6. पूरे स्तोत्र का निर्धारित संख्या में पाठ करें।
7. पाठ के बाद प्रार्थना करें – "हे कार्तवीर्य महाराज, मेरा फँसा हुआ धन शीघ्र वापस दिलवाएँ।"
8. मिठाई प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।


सफलता के संकेत

✦ सपने में शिवलिंग या लाल रंग दिखना
✦ अचानक उस व्यक्ति का संपर्क आना
✦ किसी और के माध्यम से बात बनना
✦ साधना के बीच में ही पैसा वापस आना
✦ मन में अचानक सही निर्णय आना

Tuesday, March 17, 2026

जातक की कुंडली और नक्षत्र

जातक की कुंडली और नक्षत्र
 
 किसी जातक के जीवन में कुंडली (#जन्म_कुंडली) का आधार जन्म के ठीक समय पर सूर्य, चंद्र, ग्रहों, लग्न तथा #राहु_केतु की सिद्धांतिक (#निरयण) स्थिति पर निर्भर करता है। यह सूर्य सिद्धांत के खगोलीय गणित से निकाली जाती है, जिसमें पृथ्वी को केंद्र मानकर ग्रहों की गति, उनकी औसत (#मीन) तथा सच्ची (ट्रू) स्थिति, साइन टेबल्स (#त्रिकोणमिति) और युग-चक्रों का उपयोग होता है। 

#नक्षत्र_कुंडली_का_सूक्ष्मतम_स्तर है—यह चंद्रमा की जन्म-स्थिति (जनम नक्षत्र) पर आधारित है। #चंद्रमा मन, भावनाओं और कर्म-फल का कारक है, अतः नक्षत्र जातक के व्यक्तित्व, दशा-चक्र तथा सूक्ष्म कर्म-प्रभाव को नियंत्रित करता है। #कुंडली में नक्षत्र ग्रहों की राशि-स्थिति से आगे जाकर उनके फल को सूक्ष्मता से संशोधित करता है।

#नक्षत्र_का_खगोलीय_विज्ञान (सूर्य सिद्धांत एवं खगोलीय गणित के आधार पर—भौतिक आधार): #सूर्य_सिद्धांत (प्राचीन वैदिक खगोल ग्रंथ, लगभग ४५०-९०० ई.) में नक्षत्रों को २७ (कभी २८) समान भागों में विभाजित किया गया है। पूरे ३६०° राशि-चक्र को २७ भागों में बाँटने पर प्रत्येक नक्षत्र १३°२०′ (अर्थात् १३ अंश २० कला) का होता है। यह #चंद्रमा के सिद्धांतिक (साइडरियल) काल-चक्र (२७.३२२ दिन) पर आधारित है—चंद्रमा प्रतिदिन एक नक्षत्र में गमन करता है। 

#सूर्य_सिद्धांत के अध्याय ८ में “#ताराओं” (नक्षत्रों) की स्थिति दी गई है; प्रत्येक नक्षत्र का “#जंक्शन_स्टार” (मुख्य तारा) निर्धारित है (जैसे अश्विनी में β-γ एरीटिस)। समय-मापन में “नक्षत्र अहोत्र” = एक सिद्धांतिक दिन (६० घटिकाएँ) है।

 गणना विधि: साइन-टेबल (त्रिज्या ३४३८, २४ खंडों में विभाजित) से ग्रहों की लंबाई, सम-गति, #स्फुट_गति, अयनांश तथा नक्षत्र-प्रवेश की गणना की जाती है। यह भौतिक विज्ञान है—नक्षत्र वास्तविक तारामंडलों (#asterisms) के समूह हैं जो क्रांतिवृत्त (#ecliptic) पर स्थित हैं; चंद्रमा इनके बीच से गुजरता है। कोई सैद्धांतिक गलती नहीं—यह दृक्-सिद्धांत से पूर्व का आधार है, जो पंचांग, दशा तथा मुहूर्त की गणना का मूल है।

#नक्षत्र पर आधारित फलादेश का तरीका (कुंडली में): फलादेश की विधि बहुस्तरीय और सटीक है:

जनम नक्षत्र (#Moon_position): चंद्रमा का जन्म-नक्षत्र जातक का मूल स्वभाव, मन और जीवन-दिशा निर्धारित करता है। उदाहरण: #अश्विनी—औषधि/चिकित्सा, पुष्य—आध्यात्मिक पोषण।

#नक्षत्र_स्वामी से दशा-चक्र: विंशोत्तरी दशा (१२० वर्ष) जनम-नक्षत्र स्वामी से शुरू होती है (अश्विनी-केतु, भरणी-शुक्र आदि)। दशा-अंतर्दशा में नक्षत्र स्वामी के फल + कुंडली-स्थिति से फलादेश।

#पाद_विभाजन: प्रत्येक नक्षत्र के ४ पाद (३°२०′ प्रत्येक) नवांश-राशि से जुड़े हैं—यह सूक्ष्म फल देता है (प्रथम पाद मेष नवांश आदि)।

ग्रहों का #नक्षत्र_स्थान: कोई भी ग्रह जिस नक्षत्र में हो, उसका फल नक्षत्र-देवता, गुण, योनி, गण (देव-मनुष्य-राक्षस) से संशोधित होता है। उदाहरण: मंगल अर्द्रा (रुद्र) में—तेज लेकिन विनाशकारी।

अन्य योग: #तारा_बल (जनम नक्षत्र से ग्रहों की तारा), गंड-मूल नक्षत्र शांति, नक्षत्र-देवता पूजा, योनि-मेल (विवाह में), मुहूर्त (नक्षत्र गुण: तीक्ष्ण/मृदु/चर/ध्रुव)। कुंडली में लग्न, भाव, दृष्टि, योग (#पंच_महापुरुष आदि) के साथ नक्षत्र को मिलाकर फलादेश किया जाता है। यह “DNA of chart” है—राशि सामान्य, नक्षत्र सूक्ष्म फल देता है।

दार्शनिक, आध्यात्मिक एवं भौतिक तीनों आधारों का संरक्षण (गहन शोध-आत्मक विश्लेषण): भौतिक (खगोलीय) आधार: ऊपर वर्णित सूर्य सिद्धांत गणित—तारों के वास्तविक समूह, चंद्र-गति, त्रिकोणमिति। यह “पिंड में ब्रह्मांड” का भौतिक पक्ष है; कोई कल्पना नहीं, शुद्ध गणना।

आध्यात्मिक आधार: नक्षत्र दक्ष प्रजापति की २७ पुत्रियाँ हैं (महाभारत, हरिवंश, अथर्ववेद), जिनका चंद्रमा से विवाह हुआ। प्रत्येक का अधिष्ठात्री देवता (अश्विनी—अश्विनीकुमार, कृत्तिका—अग्नि, पुष्य—बृहस्पति आदि) और शक्ति (Taittiriya Brahmana १.५.२) है। “यो वै नक्षत्रियं प्रजापतिं वेद...” पूजा से स्वर्ग-प्राप्ति होती है—यह “नक्षत्रत्व” है। नक्षत्र आत्मा के कर्म-फल वितरक हैं; वे सूक्ष्म शरीर (सूक्ष्म-शरीर) को प्रभावित करते हैं। पूजा, मंत्र (ॐ सोमाय नमः आदि) तथा देवता-आराधना से नकारात्मक प्रभाव शांत होते हैं। यह मोक्ष-मार्ग का सेतु है।

दार्शनिक आधार: नक्षत्र पुरुष-सूक्त (ऋग्वेद) से जुड़े—सूर्य नेत्र, चंद्र मन से उत्पन्न। तीन गुणों का विभाजन (९ देव-गण, ९ मनुष्य-गण, ९ राक्षस-गण); चार प्रेरणाएँ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष)। वे “नक्ष” (पहुँचना/आराधना) + “त्र” (रक्षा) से बने—कॉस्मिक ऑर्डर के रक्षक। दर्शन में वे आत्मा की उद्भव-स्थिति (स्वर्गीय प्रकाश) दर्शाते हैं; कर्म-फल के अनुसार फल देते हैं। पुरुष-प्रकृति द्वंद्व में नक्षत्र चंद्र (मन) के माध्यम से प्रकृति-शक्ति (शक्ति) का वाहक है।

तीनों का एकीकरण (गहन विश्लेषण): सूर्य सिद्धांत भौतिक गणना देता है, देवता आध्यात्मिक शक्ति, गुण-प्रेरणा दार्शनिक गहराई। कुंडली में नक्षत्र इन्हें जोड़ता है—जन्म-नक्षत्र से जातक का “कॉस्मिक ब्लूप्रिंट” बनता है। उदाहरण: मूल नक्षत्र (निर्ऋति) भौतिक रूप से तारों का समूह, आध्यात्मिक रूप से विनाश-शक्ति, दार्शनिक रूप से कर्म-संस्कार का मूल।

 फलादेश में यदि जनम-नक्षत्र शुभ हो तो भौतिक सुख, आध्यात्मिक उन्नति और दार्शनिक समाधान (मोक्ष) दोनों मिलते हैं। गंडमूल जैसे दोष में शांति-पूजा तीनों स्तरों पर संतुलन लाती है। यह कोई अंधविश्वास नहीं—वैदिक ऋषियों का शोध (वेदांग ज्योतिष से सूर्य सिद्धांत तक) है, जो आधुनिक खगोल (साइडरियल काल) से भी मेल खाता है।

 नक्षत्र ज्योतिष पूर्ण विज्ञान है—भौतिक गणना, आध्यात्मिक देव-शक्ति तथा दार्शनिक कर्म-दर्शन का त्रिवेणी-संगम। सही फलादेश के लिए जन्म-समय की शुद्धता, सूर्य सिद्धांत/दृक् गणना तथा नक्षत्र-देवता-पूजा अनिवार्य है। कोई सैद्धांतिक गलती नहीं—सभी बिंदु प्राचीन ग्रंथों (सूर्य सिद्धांत, तैत्तिरीय ब्राह्मण, बृहत् पाराशर होरा) पर आधारित हैं। जातक के जीवन में नक्षत्र “आत्मा का नक्शा” है, जिसे समझकर कर्म-सुधार और मोक्ष-मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।

चन्द्र कुण्डली

#चन्द्र_कुण्डली_में_दशमेश_छिपाता_है_वो_परमाणु_स्तरीय_रहस्य जो आपकी आत्मा को कर्म-बंधन से मुक्त कर सकता है – क्या आप तैयार हैं इसे जानने के लिए?

#वैदिक_ज्योतिष की गहन परतों में छिपा एक ऐसा गूढ़तम रहस्य है जो सदियों से मौन रहा – चन्द्र कुण्डली (चन्द्र लग्न से बनी कुण्डली) में #दशमेश_कर्मेश की स्थिति, उसकी राशि, नक्षत्र, दृष्टि और योग न केवल दैनिक कर्म और भौतिक सफलता को निर्देशित करते हैं, बल्कि आत्मा के परमाणु-स्तर पर #क्रियमाण कर्म को भी परिवर्तित करते हैं। यह रहस्य इतना गहरा है कि मुख्यधारा के ज्योतिष ग्रंथों में इसे स्पष्ट रूप से कभी नहीं लिखा गया, क्योंकि यह मन-बुद्धि-आत्मा के #सूक्ष्म_कंपन से जुड़ा है।

#चन्द्र_कुण्डली_क्यों_विशेष है? वेद और पुराणों का आधार

वेदों में चन्द्र को मन का देवता कहा गया है (#ऋग्वेद १०.६४.३ में चन्द्र को मनोमय पुरुष कहा गया)। पुराणों में (विष्णु पुराण और भागवत पुराण) #चन्द्र_को_सोम कहा गया, जो अमृत का स्रोत है और मन की तरंगों को नियंत्रित करता है। चन्द्र कुण्डली में लग्न चन्द्र होता है, अर्थात् सारा जीवन मन की दृष्टि से देखा जाता है। #दशम_भाव यहां कर्म का नहीं, बल्कि मन से उत्पन्न कर्मों का केंद्र बन जाता है।

भौतिक विज्ञान से तुलना करें तो #चन्द्र_कुण्डली_क्वांटम_स्तर_पर_कार्य_करती है – जहां कर्म केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि मन के विचारों के परमाणु-कंपन (quantum fluctuations) से उत्पन्न होते हैं। जैसे क्वांटम मैकेनिक्स में observer effect कहता है कि मन ही वास्तविकता को प्रभावित करता है, वैसे ही #चन्द्र_कुण्डली में दशमेश मन के observer की तरह कर्म-फल को बदल देता है।

वह गुप्त रहस्य: #दशमेश_की_मन_कर्म_अनुबंधन" प्रक्रिया

अज्ञात रहस्य यह है कि चन्द्र कुण्डली में दशमेश जब किसी भी भाव में स्थित हो, तो वह मन की सूक्ष्म इच्छा (संकल्प) को कर्म-क्षेत्र में स्थायी बंधन (#karmic_entanglement) में बदल देता है। यह बंधन इतना गहरा होता है कि दैनिक जीवन में व्यक्ति को लगता है "मैं तो बस सोच रहा था", लेकिन वास्तव में मन का वह विचार परमाणु स्तर पर कर्म-बीज बन चुका होता है।

#यदि_दशमेश_चन्द्र_कुण्डली_के_प्रथम_भाव (चन्द्र के साथ या निकट) में हो, तो व्यक्ति का मन ही उसका कर्म बन जाता है। विचार मात्र से घटनाएं घटित होने लगती हैं।
 उदाहरण: एक व्यक्ति जिसकी चन्द्र कुण्डली में दशमेश (कर्क लग्न में #मंगल_दशमेश) चन्द्र के साथ प्रथम में हो, वह केवल "मैं अमीर बनूंगा" सोचता है और बिना ज्यादा प्रयास के धन आकर्षित होता है – क्योंकि मन का कंपन सीधे कर्म-क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है। यह "#संघर्ष_रहित_कर्म_सिद्धि" का रहस्य है, जो पुराणों में संकल्प-सिद्धि कहलाता है (भागवत पुराण ११.१५ में वर्णित)।

यदि #दशमेश_चतुर्थ_भाव_में हो (चन्द्र से चतुर्थ), तो मन की गुप्त इच्छाएं (subconscious desires) घर-माता-स्थान से जुड़कर कर्म बनती हैं।

 भौतिक उदाहरण: जैसे परमाणु में इलेक्ट्रॉन क्लाउड छिपी ऊर्जा रखता है, वैसे ही यहां #दशमेश मन की छिपी ऊर्जा को घरेलू जीवन में कर्म-फल देता है। व्यक्ति को लगता है "मैंने तो कुछ नहीं किया", लेकिन घर बदल जाता है या माता से अप्रत्याशित लाभ होता है।

दृष्टि का परमाणु रहस्य: #दशमेश_की_दृष्टि चन्द्र कुण्डली में मन के कंपन तरंगों की तरह फैलती है। विशेषकर यदि दशमेश दशम दृष्टि (१०वीं दृष्टि) से किसी भाव को देखे, तो वह भाव कर्म-परमाणु में स्थायी रूप से बदल जाता है। जैसे भौतिकी में #गुरुत्वाकर्षण तरंगें समय-स्थान को मोड़ती हैं, वैसे ही दशमेश की १०वीं दृष्टि मन-कर्म के समय-चक्र को मोड़ देती है। यदि दशमेश सिंह राशि में हो और चन्द्र कुण्डली के नवम भाव पर १०वीं दृष्टि डाले, तो व्यक्ति का भाग्य मन की एक झलक से बदल जाता है – यह "#दृष्टि_से_सृष्टि" का गुप्त सूत्र है।

एक वास्तविक उदाहरण से गहन विश्लेषण

मान लीजिए चन्द्र कुण्डली में चन्द्र वृषभ में (लग्न), दशमेश शनि (कुंभ दशम) नवम भाव में स्थित हो, नक्षत्र शतभिषा (राहु का), और शनि की दृष्टि चतुर्थ और एकादश पर।

दैनिक स्तर: व्यक्ति को लगता है जीवन में अचानक गुप्त परिवर्तन आते हैं (अष्टम), लेकिन धन-लाभ (एकादश) घर से जुड़े (चतुर्थ) रहस्यमय तरीके से होता है।

भौतिक आधार: जैसे परमाणु में न्यूट्रॉन का decay गुप्त ऊर्जा छोड़ता है, वैसे ही यहां शनि का अष्टम में होना मन के गुप्त कर्मों को decay कर नया कर्म-चक्र शुरू करता है।

वेद-पुराण आधार: यह "अष्टम में शनि = कर्म-मोचन" का सूक्ष्म रहस्य है, जहां व्यक्ति पिछले जन्म के मन-कर्म से मुक्त होकर नया संकल्प लेता है।

यह रहस्य इसलिए अज्ञात रहा क्योंकि अधिकांश ज्योतिषी चन्द्र कुण्डली को केवल भावनात्मक विश्लेषण तक सीमित रखते हैं, जबकि यह मन के परमाणु-कर्म का द्वार है। इसे गहराई से अध्ययन करने पर जीवन की हर छोटी सोच कर्म बन जाती है – और यही मोक्ष का प्रथम सोपान है।

Tuesday, March 10, 2026

गणपति वीर शाबर मंत्र

 गणपति वीर शाबर मंत्र


ॐ गनपत वीर, भूखे मसान,
जो फल माँगूँ, सो फल आन।
गनपत देखे, गनपत के छत्र से बादशाह डरे।
राजा के मुख से प्रजा डरे, हाथा चढ़े सिन्दूर।
औलिया गौरी का पूत गनेश, गुग्गुल की धरुँ ढेरी,
रिद्धि-सिद्धि गनपत धनेरी।.......
आगे पूरा मंत्र सात्विक भक्त के लिए गुप्त रखा हे।



सावधानी
शाबर मंत्र लोकपरंपरा के शक्तिशाली मंत्र होते हैं। इन्हें श्रद्धा, संयम और शुद्ध भाव से ही जपना चाहिए।
किसी को हानि पहुँचाने या गलत उद्देश्य से प्रयोग करना तांत्रिक नियमों के विरुद्ध माना गया है।

Monday, March 2, 2026

मृत्यु के 14 प्रकार

मृत्यु के 14 प्रकार


राम-रावण युद्ध चल रहा था, तब अंगद ने रावण से कहा- तू तो मरा हुआ है, मरे हुए को मारने से क्या फायदा?

रावण बोला– मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे?

अंगद बोले, सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते - साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती है!

तब अंगद ने मृत्यु के 14  प्रकार बताए👉

कौल कामबस कृपिन विमूढ़ा।
अतिदरिद्र अजसि अतिबूढ़ा।।
सदारोगबस संतत क्रोधी।
विष्णु विमुख श्रुति संत विरोधी।।
तनुपोषक निंदक अघखानी।
जीवत शव सम चौदह प्रानी।।

1. कामवश:
〰️〰️〰️〰️ जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है। वह अध्यात्म का सेवन नहीं करता है, सदैव वासना में लीन रहता है।

2. वाममार्गी:
〰️〰️〰️〰️ जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले, जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो; नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।

3. कंजूस:
〰️〰️〰️ अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याणकारी कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो, दान करने से बचता हो, ऐसा आदमी भी मृतक समान ही है।

4. अति दरिद्र:
〰️〰️〰️〰️गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वह भी मृत ही है। अत्यंत दरिद्र भी मरा हुआ है। गरीब आदमी को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। दरिद्र-नारायण मानकर उनकी मदद करनी चाहिए।

5. विमूढ़:
〰️〰️〰️ अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ ही होता है। जिसके पास बुद्धि-विवेक न हो, जो खुद निर्णय न ले सके, यानि हर काम को समझने या निर्णय लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृतक समान ही है, मूढ़ अध्यात्म को नहीं समझता।

6. अजसि:
〰️〰️〰️〰️ जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर-परिवार, कुटुंब-समाज, नगर-राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता, वह व्यक्ति भी मृत समान ही होता है।

7. सदा रोगवश
〰️〰️〰️〰️〰️ जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता हावी हो जाती है। व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।

8. अति बूढ़ा:
〰️〰️〰️〰️ अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों अक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार वह स्वयं और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके।

9. सतत क्रोधी:
〰️〰️〰️〰️〰️ 24 घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृतक समान ही है। ऐसा व्यक्ति हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता। पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है। क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरकगामी होता है।

10. अघ खानी:
〰️〰️〰️〰️〰️ जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है।

11. तनु पोषक:
〰️〰️〰️〰️〰️ ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना न हो, ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकी किसी अन्य को मिलें न मिलें, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं। शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है, क्योंकि यह शरीर विनाशी है, नष्ट होने वाला है।

12. निंदक:
〰️〰️〰️〰️ अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नजर आती हैं, जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है, ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी न किसी की बुराई ही करे, वह व्यक्ति भी मृत समान होता है। परनिंदा करने से नीच गोत्र का बंध होता है।

13. परमात्म विमुख:
〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जो व्यक्ति ईश्वर यानि परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति यह सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं; हम जो करते हैं, वही होता है, संसार हम ही चला रहे हैं, जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है।

14. श्रुति संत विरोधी:
〰️〰️〰️〰️〰️〰️जो संत, ग्रंथ, पुराणों का विरोधी है, वह भी मृत समान है। श्रुत और संत, समाज में अनाचार पर नियंत्रण (ब्रेक) का काम करते हैं। अगर गाड़ी में ब्रेक न हो, तो कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है। वैसे ही समाज को संतों की जरूरत होती है, वरना समाज में अनाचार पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा।

अतः मनुष्य को उपरोक्त चौदह दुर्गुणों से यथासंभव दूर रहकर स्वयं को मृतक समान जीवित रहन से बचाना चाहिए।