तंत्र_साधना_में_स्त्री_शक्ति_का_भंडार
( आगमिक-शाक्त दृष्टि से शास्त्रीय गूढ़ विवेचन)
प्रस्तुत लेख तांत्रिक परंपरा के शास्त्रीय, दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष को ध्यान में रखकर लिखा गया है। इसमें कोई लौकिक या भौतिक वर्णन नहीं, बल्कि आगमिक-शाक्त दृष्टि से विषय का गूढ़ विवेचन है। यह केवल शाक्त आगमों विशेषतः योगिनीहृदय, कुलार्णव तंत्र, शारदा तिलक, तंत्रराज, निर्वाण तंत्र पर आधारित है। यह लेख गुरु-गोपनीय मर्यादा का पालन करते हुए तत्त्व-दृष्टि से लिखा गया है, किसी भी प्रकार की साधना-विधि या प्रयोग का वर्णन नहीं करता।
#तंत्र केवल क्रिया-पद्धति नहीं, अपितु चेतना-विज्ञान है। वेद जहाँ ब्रह्म के निराकार स्वरूप की उपासना करते हैं, वहीं तंत्र उस ब्रह्म को शक्ति सहित स्वीकार करता है। तंत्र का मूल सूत्र है- “शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः।” अर्थात् शक्ति के बिना शिव भी निष्क्रिय हैं।
1.#शक्ति_का_तात्त्विक_स्वरूप-- तंत्र में “स्त्री” शब्द देह या लिंग का सूचक नहीं, बल्कि सृजनशील चेतना (Creative Consciousness) का द्योतक है। यह वही शक्ति है जो ब्रह्म को जगत् में प्रकट करती है, जड़ में चैतन्यता भरती है, साधक के भीतर सुप्त कुंडलिनी को जाग्रत करती है। इसी कारण तंत्र में शक्ति को आदि-बीज, मूल-तत्त्व और भंडार कहा गया है। शाक्त आगमों में कुंडलिनी-जागरण कोई लक्ष्य नहीं,
बल्कि शुद्ध साधना का स्वाभाविक परिणाम है। #कुलार्णव_तंत्र स्पष्ट चेतावनी देता है-- न बलात् कुण्डलीं बोध्यां न चेष्ट्या न च यत्नतः । गुरुप्रसादतः सिद्धिर्भवत्येव न संशयः ॥ अर्थात् बल, प्रयास या हठ से कुंडलिनी को नहीं जगाना चाहिए; यह केवल गुरु-कृपा से ही सिद्ध होती है।
2.#योनि_का_शास्त्रीय_अर्थ-- आगमों में “योनि” शब्द का प्रयोग उत्पत्ति-स्थल के अर्थ में हुआ है। यह न तो स्थूल देह का संकेत है और न ही भोग का विषय। यह उस गुह्य केंद्र का प्रतीक है जहाँ शक्ति का संकुचन होता है। चेतना बीज रूप में स्थित रहती है। साधना द्वारा वही बीज ब्रह्मानुभूति में विकसित होता है। #कुलार्णव तंत्र में कहा गया है- “योनिरेव परा शक्तिः, योनौ विश्वं प्रतिष्ठितम्।” अर्थात् समस्त विश्व उसी शक्ति-योनि में प्रतिष्ठित है। शाक्त आगमों में मूलाधार को शक्ति-योनि कहा गया है। यही वह स्थान है जहाँ शक्ति बीज रूप में स्थित रहती है। त्रिगुण सुप्त अवस्था में रहते हैं। शिव बिंदु रूप में निष्क्रिय स्थित हैं। #शारदा_तिलक तंत्र कहता है— योनिस्थाने स्थितां शक्तिं मूलाधारनिवासिनीम् । अजां सुप्तां त्रिकोणस्थां ध्यायेत् योगविदां वरः ॥ यह त्रिकोण— इच्छा, ज्ञान, क्रिया का प्रतीक है। कुंडलिनी का आरोहण भोग से वैराग्य है। अहं से आत्मा है। द्वैत से अद्वैत की यात्रा है। #निर्वाण_तंत्र कहता है— यदा शक्तिः शिवं याति तदा जीवो न विद्यते । शिवशक्त्यैक्यभावे तु संसारो नश्यति ध्रुवम् ॥
3.#स्त्री_शक्ति : (बाह्य नहीं, आंतरिक साधना)-- तंत्र की सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि लोग उसे बाह्य कर्मकांड समझ लेते हैं। वास्तव में स्त्री शक्ति का वास्तविक भंडार साधक के भीतर है, यह शक्ति मूलाधार में सुप्त रहती है, गुरु-कृपा, संयम और शुद्ध आचरण से ही यह जाग्रत होती है, बाह्य प्रतीक केवल आंतरिक बोध के सहायक हैं। #तंत्रराज_तंत्र में कहा गया है— मायया वेष्टिता शक्तिर्बद्धा भवति देहिनाम् । विद्यया तु विमुक्ता स्यात् शिवरूपा प्रजायते ॥ अर्थात् माया से आवृत शक्ति बंधन का कारण बनती है, और विद्या से वही शक्ति शिवस्वरूप हो जाती है।
4.#शक्ति_साधना_और_मोक्ष-- तंत्र मोक्ष को पलायन नहीं मानता, बल्कि शक्ति का परिष्कार, चेतना का उत्कर्ष, द्वैत से अद्वैत की यात्रा है। जब साधक शक्ति को भोग-वस्तु नहीं, देवी के रूप में अनुभव करता है, तभी वासना ही उपासना बनती है। देह ही मंदिर बनता है। साधना ही समाधि बनती है। #शाक्त_आगम में-- कुंडलिनी कोई साधन नहीं। शक्ति कोई वस्तु नहीं। मोक्ष कोई भविष्य नहीं बल्कि यह सब अभी और यहीं घटित होने वाला बोध है। जो इसे समझता है, वह साधक नहीं रहता बल्कि वह देवी-चेतना में स्थित हो जाता है।
5.#गूढ_निष्कर्ष-- तंत्र साधना में स्त्री शक्ति कोई बाह्य सत्ता नहीं, बल्कि ब्रह्म की गतिशील अभिव्यक्ति है। साधक की अंतःचेतना का मूल स्रोत है, और मोक्ष का साक्षात् द्वार है। जो इस रहस्य को समझ लेता है, वह तंत्र से भयभीत नहीं होता, बल्कि उसे आत्मज्ञान का सर्वोच्च मार्ग मानता है।
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