Friday, January 16, 2026

कृत्या साधना

🌹कृत्या साधना🌹


तंत्र साधना में वैसे तो सभी साधनायें अपने अपने स्थान पर विशेष महत्व रखते है । पर कुछ साधनाये वैसी भी है जो बहुत ही अहम और उच्चकोटी की है । ऐसी साधनाये बहूत ही कम साधक करते है या कर पाते है । वैसी ही एक अति उच्चकोटी की साधना है कृत्या साधना ।
कृत्या साधना कीस ने और कब अस्तित्व में लाया ये कह पाना बहुत मुश्किल है । लेकीन इस का अस्तित्ब में आने का प्रमाण बहूत ही पुराना है । इस का अस्तित्व हमे हमारी प्राचिन गंन्थ्र शिव पुराण और महाभारत में मिलता है ।
धार्मिक ग्रंथो के अनुसार जब भस्मासुर ने भगवान् शिव को ही भस्म करने का मन बनाया तब मोहिनी अवतार लेकर श्री हरि ने उनका बचाव किया था । ये मोहिनी और कुछ नहीं मानस रचना ही थी ।
श्री हरि ने कृत्या साधना से मोहिनीका कृत्या बनाया था । इसके अलावा जब देवो और दानवो में अमृत को लेकर बहस हुई तब मोहिनी अवतार लेकर भगवान् विष्णु ने उनको अमृत पान से रोका था । भगवान शिव और श्री हरि दोनों कृत्या सिद्धिया में माहिर थे । नारद मुनि खुद ब्रह्मा की मानस रचना अर्थात कृत्या ही थे।
दूसरी कहानी केे अनुसार दैत्यों का कृत्या द्वारा दुर्योधन को रसातल में बुलाना भी कृत्या साधना अस्तित्व में होने का एक प्रमाण ही है ।
दुर्योधन के इस निश्‍चय को जानकर पातालवासी भयंकर दैत्‍यों और दानवों ने ( जो पूर्वकाल में देवताओं से पराजित हो चुके थे ) मन-ही-मन विचार किया कि इस प्रकार दुर्योधन का प्रणान्‍त होने से तो हमारा पक्ष ही नष्‍ट हो जायगा ।
अत: उसे अपने पास बुलाने के लिये मन्‍त्रविद्या में निपुण दैत्‍यों ने उस समय बृहस्‍पति और शुक्राचार्य के द्वारा वर्णित तथा अथर्ववेद में प्रतिपादित मन्‍त्रों द्वारा अग्रिविस्‍तारसाध्‍य यज्ञ- कर्म का अनुष्‍ठान आरम्‍भ किया और उपनिषद् ( आरण्‍यंक ) में जो मन्‍त्र जप से युक्‍त हवनादि क्रियाएं बतायी गयी हैं । उनका भी सम्‍पादन किया । तब दृढ़तापूर्वक व्रत का पालन करने वाले, वेद-वेदागों के पारंगत विद्वान ब्राह्मण एकाग्रचित्‍त हो मन्‍त्रोच्‍चारणपूर्वक प्रज्‍वलित अग्रि में घृत और खीर की आहुति देने लगे ।
राजन कर्म की सिद्धि होने पर वहाँ यज्ञकुण्‍ड से उस समय एक अत्‍यन्‍त अद्भुत कृत्‍या जंभाई लेती हुई प्रकट हुई और बोली- ‘मैं क्‍या करूं ?’ तब दैत्‍यों ने प्रसन्नचित्‍त होकर उस कृत्या से कहा- ‘तू प्रायोप वेशन करते हुए धृतराष्‍ट्र पुत्र राजा दुर्योधन को यहाँ ले आ’।
जो आज्ञा ।" कहकर वह कृत्‍या तत्‍काल वहाँ से प्रस्थित हुई और पलक मारते-मारते जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ पहुँच गयी । फिर राजा को साथ ले दो ही घड़ी में रसातल आ पहुँची और दानवों को उसके लाये जाने की सूचना दे दी । राजा दुर्योधन को लाया देख सब दानव रात में एकत्र हुए उनके मन में प्रसन्नता भरी थी और नेत्र हर्ष तिरेक से कुछ खिल उठे थे। उन्‍होंने दुर्योधन से अभिमानपूर्वक यह बात कही ।
कृत्या साधना शत्रु नाशक, हर आपद नाशक और जो भी आपद बिपद सब का नाश ये साधना से कीया जा सकता है । कारोबार और किसी भी चीज पर भाधा आ रही हो तो कृत्या का उपासना से हर भाधा दुर कीया जा सकता है ।
कृत्या सिद्धि होने पर धन की कमी नही रहता है । देवी साधक का रक्षा के साथ उसके परिवार का भी रक्षा करती है । जीसको कृत्या का कृपा प्राप्त जाता है उसका अल्प मूत्यु नही होती है ।
कृत्या साधना सिद्धि होने पर शत्रुओँ पर विजय प्राप्त करने वाला और मन से तन से अतिबलसाली हो जाता है । देवी को जो काम के लिये आग्रह करे वह खुशि खुशि उस काम को कर देती है । चाहे वह नकारात्मक काम हो या सकारात्मक काम हो ।
साधक जीस तरह की नौकरी हो या वस्तू की चाहत करता है । देवी उस की मनोकामना को मिनटो मेँ पुर्ण कर देती है । देवी के कृपा प्राप्ति के बाद यदि साधक भोगविलास का जीवन जीने लग जाये तो ही कृत्या देवी शरीर मेँ विलिन हो जाता है ।
यह साधना अत्यंत गोपनीय, दुर्लभ और प्राचीन है । यह कृत्या शरीर से उत्पन्न होती है । यह वशीकरण, सम्मोहन, मारण, उच्चाटन का प्रबल अस्त्र है । जब भगवान् शिव को क्रोध आया और उनके सैनिक परास्त होकर आ गए थे । तब उन्होंने अपने शरीर से कृत्या का निर्माण किया था और यज्ञ का नाश किया था ।
बड़े बड़े ऋषि मुनियो के तंत्र मन्त्र भी कृत्या शक्ति के आगे काम नही कर पाये अर्थात उन के तंत्रमंत्र विफल हो गये थे । कृत्या मानव शरीर से उत्पन्न एक देवी शक्ति है । जिस तरह मनुष्य अपने शरीर से मन्त्र साधना से अपने तीन हमजाद सिद्धि करता है उसी तरह कृत्या सिद्ध हो जाती है । मन्त्र की शक्ति से कृत्या तंत्र की कृत्या सौ गुना ज्यादा तीव्र कार्य करती है ।

प्राचीन काल में शिव की कृपा से महा कृत्या गुरुदेव शुक्राचार्य जी ने सिद्ध की थी । यह कृत्या तीनो लोको के कार्य संपन्न करती है । अगर साधक अपने दोनों हाथ ऊपर की तरफ आकाश में करके कृत्या का मन्त्र जप कर कार्य कहे तो स्वर्ग में हा हा कार हो जाती है । पृथ्वी के तरफ करके करे तो मानव में हलचल पैदा कर देती है ।
भूमि की तरफ देखकर करे तो पाताल लोक काप्ने लग जाता है । अर्थात कृत्या साधक किसी भी देव देवी, अप्सरा आदि को वशीभूत कर सकता है । घर बैठे उनको दण्डित कर सकता है । इतर योनि को मारण कर सकता है ।
इसी शक्ति मन्त्र के बल पर रावण ने लंका में बैठे हुए ही स्वर्गलोक में नृत्य करने वाली अप्सरा का शक्ति उच्चाटन किया था । जिससे वह बेहोश होकर गिर गयी थी ।
जब कृत्या देवी सिद्ध हो जाती है । तब मारण के लिये तो भूतप्रेत, ब्रह्म राक्षस, पिशाच, जिन, कर्णपिशाचिनी आदि शक्तियाँ भाग जाती है । नही तो यैसी शक्ती को कृत्या आपना कालग्रास बना देती है । सबको एक बबूले अर्थात बवंडर में लपेटकर अंतरिक्ष में विलीन हो जाती हैं ।
कृत्या सिद्ध होने पर साधक मन्त्र से जल पड़कर रोगी को पिलाय तो रोगी रोगमुक्त हो जाता है । इसे सिद्ध करने के बाद कोई भी तंत्र साधक हानि नही पहुंचा सकता है ।
साधक मन में असीम बल धारण कर लेता है । चार कर्म सिध्द हो जाते हैं । कृत्या एक सात्विक साधना है ।मांस मदिरा का सेवन वर्जित है । कृत्या साधना गुरुकृपा, शिवकृपा से ही प्राप्त होती है ।

Wednesday, January 14, 2026

भोग, मोक्ष प्रदायिनी श्रीविद्या उपासना /साधना

भोग, मोक्ष प्रदायिनी श्रीविद्या उपासना /साधना 

1-श्रीविद्या-आत्मविद्या-आत्मसमर्पण;श्री’ अर्थात् देवी और विद्या अर्थात ज्ञान। सीधे-सादे शब्दों में यह देवी की उपासना है। एक ऐसा ज्ञान है जिसे जानने के पश्चात कुछ जानना शेष नहीं रह जाता। मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य आत्म बोध है। अपने निज स्वरूप से अनभिज्ञ मनुष्य स्वयं को असहाय महसूस करता है। कर्म बंधन में फंसा जीवन इसी आत्म बोध के लिए जन्म जन्मांतर तक भटकता रहता है। इसी आत्मबोध के तंत्र का नाम श्री विद्या है। यह शाक्त परंपरा की प्राचीन एवं सर्वोच्च प्रणाली है।

2-आदि काल से मनुष्य लौकिक और पारलौकिक सुखों के लिए विभिन्न देवी-देवताओ की उपासना करता आया है। ऐसा अक्सर पाया जाता है कि भौतिक सुखों में लिप्त जीवन जीते हुए मनुष्य आत्मिक सुख से वंचित रहता है, कुछ अधूरा सा अनुभव करता है। यह भी माना जाता है कि आत्मिक अनुभूति के लिए भौतिक सुखों का मोह छोड़ना पड़ता है। एक साधारण मनुष्य के लिए यह भी संभव नहीं है। ऐसे संदर्भ में श्री विद्या उपासना एक महत्वपूर्ण साधन है।
यह देवी (शक्ति) की तीन अभिव्यक्तियों पर आधारित है।
2-1- भोग, मोक्ष प्रदायिनी मां ललिता त्रिपुर सुंदरी का स्वरूप।
2-2- श्री यंत्र
2-3-पंचदशाक्षरी मंत्र
3-श्रीविद्या एक क्रमबद्ध, रहस्यमयी पद्धति है जिसमें ज्ञान, योग (प्राणायाम), भक्ति और देवी के पूजन-अर्चन का सुन्दर समावेश है।
महाशक्ति त्रिपुर सुंदरी कौन' है ?-

1-महाशक्ति त्रिपुरसुंदरी महादेव की स्वरूपा शक्ति हैं।इन्हीं के सहयोग

से शिव सृष्टि में सूक्ष्म से लेकर स्थूल रूपों में उपस्थित हैं। सामान्य मनुष्य के लिए कण-कण में भगवान उपस्थित हैं। 
2-जगद् गुरु शंकराचार्य कृत सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में यह भाव प्रत्यक्ष दिखाई देता है।
'' हे भगवती! जब शिव शक्ति से युक्त होते हैं तभी जगदुत्पन्न करने में समर्थ होते हैं। यदि वे शक्ति से युक्त न हों तो सर्वथा हिलने या चलने में भी अशक्त रहते हैं।''
3-मां त्रिपुर सुंदरी की अलौकिक सुंदरता का वर्णन भी सौंदर्य लहरी में कई स्थानों (श्लोकों) में मिलता है। यूं तो मां शक्ति रूपा हैं, निराकार होकर भी सब में विद्यमान हैं, तो भी साधक के मन की एकाग्रता के लिए उनके स्थूल रूप का प्रयोजन है।
''शरदपूर्णिमा की चांदनी के समान शुभ्रवर्णा, द्वितीया के चंद्रमा से युक्त जटाजूट रूपी मकुटों वाली, अपने हाथों में वरमुद्रा, अभय मुद्रा, स्फटिक मणि की माला और पुस्तक धारण किए हुए आपको एक बार भी नमन करने वाले मनुष्य के मुख से मधु, क्षीर, द्राक्षा शर्करादि से भी मधुर अमृतमयी वाणी क्यों न झरेगी। ''
4- मां की चार भुजाओं में पाश, अंकुश, इक्षुधनु और पंच पुष्पबाणों का ध्यान किया जाता है। पाश अर्थात 36 तत्वों में प्रीति, अंकुश अर्थात क्रोध, द्वेष, इक्षुधनु - संकल्प-विकल्पात्मक क्रियारूप मन ही इक्षुधनु है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध पांच पुष्प बाण हैं।
5-पाश- इच्छाशक्ति, अंकुश-ज्ञान शक्ति तथा बाण और धनुष क्रियाशक्ति स्वरूप हैं। इन तीनों शक्तियों को अपने में धारण करती हैं मां त्रिपुर सुंदरी।
6-किसी भी कार्य को संपन्न करने के लिए मनुष्यं को उपरोक्त शक्तियों का प्रयोग करना पड़ता है। प्रथम कार्य करने की इच्छा रखना, दूसरा ज्ञान (कार्य से संबंधित ज्ञान) और तीसरा कार्य को करना। स्पष्ट है कि इन तीनों के लिए आवश्यकता होती है मन की एकाग्रता की। मन की एकाग्रता प्रबल आत्मिक शक्ति और दृढ़ संकल्प के बिना असंभव है।
7-अर्थात् आत्मिक शक्ति ही मां त्रिपुरा हैं। अदम्य आत्मिक शक्ति का परिचय उपासक को सशक्त बनाता है और वह असंभव को संभव कर देता है। मां की उपासना मां का सीधा-सादा उपदेश है- स्वात्म शक्ति का ज्ञान क्योंकि यही पारसमणि है।
श्री यंत्र:- 

1-श्री विद्या उपासना चिह्न इसकी रचना जटिल है। यह एक बिंदु के चारों ओर अनेक त्रिकोणों का क्रमबद्ध समागम है। श्री चक्र मानव जीवन के अपने केंद्र ‘‘स्व’’ तक की यात्रा का प्रतीक है। बिंदु स्व का, आत्मशक्ति का- मां त्रिपुर सुंदरी का प्रतीक है। त्रिभुज आवरण हैं। श्री यंत्र की आराधना नव (9) आवरण आराधना कही जाती है। 
2-जैसे-जैसे आवरण हटते जाते हैं उपसक अपने ही करीब आता जाता है। अंत में सब आवरण हटते ही उपासक मां त्रिपुर सुंदरी (स्वआत्मिक शक्ति) में लीन हो जाता है। यह बाहर से भीतर की यात्रा कुंडलिनी जागरण से संबंध रखती है। आदि शक्ति मूलाधार चक्र में सर्पाकार रूप में सुप्त अवस्था में उपस्थित होती है। कुंडलिनी योग और प्राणायाम से जाग्रत हो षटचक्रों को भेदती हुई सहस्त्राशार में पहुंच जाती है। यहां उपस्थित शिव तत्व में लीन होकर उपासक को परमानंद की अनुभूति देती है।
3-सौंदर्य लहरी के अनुसार((9);-
'' हे भगवती! आप मूलाधार में पृथ्वीतत्व को, मणिपुर में जलतत्व को, स्वाधिष्ठान में अग्नितत्व को, हृदय में स्थित अनाहत में मरुतत्व को, विशुद्धि चक्र में आकाशतत्व को तथा भूचक्र में मनस्तत्व को इस प्रकार सारे चक्रों का भेदन कर सुषुम्ना मार्ग को भी छोड़कर सहस्त्रा पद्म में सर्वथा एकांत में अपने पति सदाशिव के साथ विहार करती हैं।''
पंचदशाक्षरी मंत्र:-

1-सौंदर्य लहरी के अनुसार(32)
क-शिवः, ए- शक्ति, ई-कामः, ल-क्षिति,
ह्रीं-ह्रल्लेखा,-ह,-रवि, स-सोम, क- रूमर, ह- हंस ल-शुक्रः हल्लेखा - हृीं, 
स-परा शक्ति, क-मारः ल-हरि, हल्लेखा-ह्रीं- 
इस प्रकार तीन कूटबीजों की सृष्टि होती है। हे भगवती ! आपके नामरूप ये तीन कूट हैं। इनका जप करने से साधक का अतिहित होता है। -
2-इस श्लोक में गुप्त रूप से पंचदशाक्षरी मंत्र का वर्णन है। इस मंत्र के तीन भाग हैं-
2-1- वाग्भव कूट अर्थात् वाहनि कुंडलिनी, 
2-2-कामराजकूट- सूर्य कुंडलिनी 
2-3-शक्ति कूट- सोम कुंडलिनी।
3-उपरोक्त सभी विधियां सामान्य मनुष्य के लिए कठिन प्रतीत होती हैं। किसी भी ज्ञान या विद्या का मूल्यांकन उसकी व्यवहारिकता से किया जाता है। यदि किसी विद्या का प्रयोग मनुष्य रोजमर्रा के जीवन में अपने विविध कार्य कलापों के लिए न कर सके तो उसका कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। इसके लिए आदि गुरु शंकराचार्य ने अपने ग्रंथ सौंदर्य लहरी में एक सरल विधि बतायी है ...
'' हे भगवती! आत्मार्पण दृष्टि से इस देह से जो कुछ भी बाह्यन्तर साधन किया हो, वह अपनी आराधना रूप मान लें और स्वीकार करें। मेरा बोलना आपके लिए मंत्र जप हो जाए, शिल्पादि बाह्य क्रिया मुद्रा प्रदर्शन हो जाए, देह की गति (चलना) आपकी प्रदक्षिणा हो जाए, देह का सोना (शयन) अष्टांग नमस्कार हो तथा दूसरे शारीरिक सुख या दुख भोग भी सर्वार्पण भाव में आप स्वीकार करें।''
4-स्पष्ट है कि यह अत्यंत सरल मार्ग है। आत्म समर्पण भाव से यदि श्री विद्या उपासना की जाए तो शीघ्र ही मां त्रिपुरा उपासक के जीवन का संचालन स्वयं करती हैं। उपासक सुख, समृद्धि सफलता तो पाता ही है, सत् चित आनंद भी उसके लिए सुलभ और सहज हो जाते हैं अर्थात् भौतिक और आत्मिक सुख दोनों प्राप्त हो जाते हैं। यही भोग, मोक्ष प्रदायिनी मां की अपने भक्तों से प्रतिज्ञा है।
श्रीविद्या साधना चतुर्विध पुरुषार्थ क्या है?- 

1-यह तो सर्व विदित है कि श्रीविद्या साधना चतुर्विध पुरुषार्थ अर्थात धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष प्रदायिनी एक मात्र साधना है ! लोक लोकान्तर व मत मतान्तर में इस साधना को लेकर बहुत अधिक भ्रम भी व्याप्त हैं ! किन्तु श्रीविद्या के मूलतः चार कुल हैं, और प्रत्येक कुल एक समान ही फलदायी भी है, केवल प्रत्येक कुल की साधना में साधना विधान व भाव का भेद होता है !

2-श्रीविद्या के प्रत्येक कुल में चार-चार महाविद्याओं का समूह होता है व प्रत्येक समूह में एक बालरुपा (धर्म की अधिष्ठात्री), एक तरुण रूपा (अर्थ की अधिष्ठात्री), एक प्रौढ़ा रूपा (काम की अधिष्ठात्री) व एक वृद्धा रूपा (निवृत्ति/मोक्ष की अधिष्ठात्री) महाविद्या शक्ति होती हैं !

3- यह मूलविद्या अपने साधक को फल भी इसी क्रम से ही प्रदान करती है तब जाकर श्रीविद्या साधना से चतुर्विध पुरुषार्थ की पूर्ण प्राप्ति होती है ! ओर चार-चार महाविद्याओं का समूह होने के कारण ही इस समूह को श्रीविद्या कहा जाता है ! यथा :-

______________ श्रीकुल 

धर्म – बाल रूप –श्रीबाला त्रिपुर-सुन्दरी _______________ _______________ 

अर्थ – तरुण रूप – त्रिपुरसुन्दरी 

काम – प्रौढ़ा रूप – राजराजेश्वरी 

मोक्ष – वृद्धा रूप – ललिताम्बा 

4-श्रीविद्या की दीक्षा के बाद साधना करते हुए सन्यासी व गृहस्थ साधक को प्रथम पुरुषार्थ धर्म की अधिष्ठात्री बालरूपा महाविद्या शक्ति अपने नियन्त्रण व धर्म में स्थित करती है, इसके लिए वह अपने साधक के धर्म विरुद्ध सभी कर्मों व अवस्थाओं को अवरुद्ध कर देती है, ताकि वह अपने साधक के लिए नीति, न्याय व धर्म से परिपूर्ण स्वच्छ व स्वस्थ कर्मों, आय व अवस्थाओं का पुनर्निर्माण कर सके ! इसी मध्य पराम्बा अपने साधक के मन मस्तिष्क को ऐसी ऊर्जा से भर देती है कि वह साधक केवल धर्म का ही अनुसरण करता है !

5-तदुपरांत साधक के पुर्णतः धर्मनिष्ठ हो जाने पर बालरूपा महाविद्या शक्ति अपने साधक को द्वितीय पुरुषार्थ अर्थ की अधिष्ठात्री तरुणीरूपा महाविद्या शक्ति को अग्रसारित करती है जहाँ द्वितीय पुरुषार्थ अर्थ की महाविद्या शक्ति अपने साधक के लिए नीति, न्याय व धर्म से परिपूर्ण स्वच्छ व स्वस्थ कर्मों, आय व अवस्थाओं का पुनर्निर्माण कर अपने साधक को धर्म के अधीन ही अर्थोपार्जन के अनेक मार्ग बनाकर सन्यासी को पूर्ण तृप्ति व गृहस्थ साधक को असीमित अन्न, धन से परिपूर्ण कर तृतीय पुरुषार्थ काम की प्रौढ़रूपा महाविद्या शक्ति को अग्रसारित कर देती है !

6-फिर तृतीय पुरुषार्थ काम की अधिष्ठात्री प्रौढ़ा रूपा महाविद्या शक्ति अपने साधक को धर्म व अर्थ से परिपूर्ण रखते हुए सन्यासी को इन्द्रिय, तत्व व अवस्थाओं पर नियन्त्रण तथा गृहस्थ को भौतिक शासन सत्ता सहित असीमित सुख भोगों को प्रदान कर चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्ष की वृद्धारूपा महाविद्या शक्ति को अग्रसारित कर देती है ! 

7-जहाँ वह मोक्ष की अधिष्ठात्री वृद्धा रूपा महाविद्या शक्ति अपने सन्यासी व गृहस्थ साधक को सदैव के लिए स्वयं में समाहित कर लेती है, इसमें भी गृहस्थ को यह सौभाग्य मृत्यु के समय और सन्यासी को जीवित रहते हुए ही प्राप्त हो जाता है !

8- इस गहन विद्या का निम्नलिखित दोनों में से किसी भी एक मार्ग से साधना पूर्ण कर चुका साधक ;इसके बाद अन्य भौतिक साधनाओं को नहीं करता है, क्योंकि इसके बाद अन्य साधनाओं की उसको न तो कोई आवश्यकता ही रह जाती है, और न ही वह साधनाएं उस साधक को किसी प्रकार से प्रभावित कर पाती हैं ! अर्थात मारण, मोहन, वशीकरण, तुष्टि, पुष्टि, शान्ति आदि षट्कर्म मोक्षाभिलाषी व श्रीविद्या उपासक के लिए नहीं होते हैं, और यह षट्कर्म श्रीविद्या उपासक को प्रभावित भी नहीं कर पाते हैं ! 

9-यह षट्कर्म करना तो उन लोगों का कार्य होता है जिनको यह षट्कर्म करके इन कर्मों के परिणामों को अनेक योनि व सुख दुःख के रूप में भोगने के लिए यहीं पर जीवन मृत्यु के चक्र के मध्य ही अनन्त काल तक घूमते रहना होता है ! 

1-"त्रिपुरा शब्द का महत्व ";-

1-बाला, बाला-त्रिपुरा, त्रिपुरा-बाला, बाला-सुंदरी, बाला-त्रिपुर-सुंदरी, पिण्डी-भूता त्रिपुरा, काम-त्रिपुरा, त्रिपुर-भैरवी, वाक-त्रिपुरा, महा-लक्ष्मी-त्रिपुरा, बाला-भैरवी, श्रीललिता राजराजेश्वरी, षोडशी, श्रीललिता महा-त्रिपुरा-सुंदरी, के अन्य भेद सभी श्री श्री विद्या के नाम से पुकारे जाते है | इन सभी विद्या की उपासना ऊधर्वाम्नाय से होती है |

2-बाला, बाला-त्रिपुरा और बाला-त्रिपुर-सुंदरी नामों से एक ही महा विद्या को सम्बोधित किया जाता है | किसी भी नाम से उपासना की जाये, उपासना तो जगन्माता की ही की जाती है | नारदीय संहिता मे लिखा है कि -'वेद, धर्म-शास्त्र, पुराण, पञ्चरात्र आदि शास्त्रों मे एक 'परमेश्वरी' का वर्णन है, नाम चाहे भिन्न भिन्न हो|

3-किन्तु महा शक्ति एक ही है | कहीं मन्त्रोध्दार भेद से, कहीं आसन भेद से, कहीं सम्प्रदाय भेद से, कहीं पूजा भेद से, कहीं स्वरूप भेद से, कहीं ध्यान भेद से, "त्रिपुरा' के बहुत प्रकार है | कहीं त्रिपुरा भैरवी, कहीं त्रिपुरा ललिता, कहीं त्रिपुर सुंदरी, कहीं इन नामों से पृथक, कहीं मात्र त्रिपुरा या बाला ही कही जाती है |

4-त्रिपुरा अर्थात तीन पुरों की अधीश्वरी | तीन पुरियों में जाने के मार्ग भी तीन है | " मुक्ति' के पञ्च प्रकार १. सालोक्य २. सामीप्य ३.सारूप्य ४.सायुज्य और ५. कैवल्य है | 

5-इनमे से सालोक्य का एक मार्ग है और कैवल्य का एक | शेष तीन सायुज्य, सारुप्य, और सामीप्य का एक अलग मार्ग है | इस प्रकार कुल तीन मार्ग हुए | त्रिविध मार्ग होने से पुरियां भी तीन है | तीन पुरियों की प्राप्ति अभीष्ट होने से पर-देवता को त्रिपुरा (त्रिपुर सुंदरी ) कहा गया है |

त्रिमूर्ति ( ब्रम्हा ,विष्णु , महेश्वर )की सृष्टि से पूर्व जो विधमान थी तथा जो वेद त्रयी ( ऋग ,यजु ,साम-वेद )से पूर्व विद्यमान थी एवं त्रि-लोकों (स्वर्ग ,पृथ्वी ,पाताल )के लय होने पर भी पुन: उनको ज्यो का त्यों बना देने वाली भगवती के नाम त्रिपुरा है |

6-विश्व भर मे तीन-तीन वस्तुओं के जितने भी समुदाय है वे सब भगवती बाला त्रिपुर सुंदरी के त्रिपुरा नाम में समाविष्ट है | अर्थात संसार में त्रि-संख्यात्मक जो कुछ है वे सभी वस्तुएं त्रिपुरा के तीन अक्षरों वाले नाम से ही उत्पन्न हुई है | 

7-त्रि-संख्यात्मक वस्तुओं में कतिपय त्रि-वर्गात्मक वस्तुओं के नाम भी है जैसे..

1-तीन देवता ;-

ब्रह्मा , विष्णु, महेश 

2-तीन गुरु ;- 

गुरु ,परम गुरु ,परमेष्ठी गुरु 

3-तीन अग्नि ;-

गाहर्पत्य ,दक्षिनाग्नि ,आहवनीय अग्नि या ज्योति,

4-तीन ज्योतियां ;-

ह्रदय-ज्योति ,ललाट-ज्योति , शिरो-ज्योति

5-तीन शक्ति;-

इच्छा शक्ति , ज्ञान शक्ति , क्रिया शक्ति

6-शक्ति से तीन देवियों का भी बोध होता है ;-

ब्रह्माणी ,वैष्णवी ,रुद्राणी 

7-तीन स्वर ;-

उदात्त ,अनुदात्त , त्वरित अर्थात 

8-तीन चक्र;-

आज्ञा , शीर्ष ,ब्रह्म-ज्ञान |

9-त्रि-पदी ( तीन स्थान );-

जालन्धर-पीठ , काम-रूप-पीठ ,उड्डियान-पीठ 

10-तीन नाद ;-

गगनानंद २. परमानन्द ३. कमलानन्द 

11-त्रि-पुष्कर ( तीन तीर्थ ) ;-

शिर २. ह्रदय ३. नाभि अथवा ज्येष्ठ पुष्कर ,मध्यम पुष्कर ,कनिष्ठ पुष्कर |

12-त्रि-ब्रह्म ( तीन ब्रह्म );-

इड़ा , पिंगला ,सुषुम्ना अर्थात (अतीत ,अनागत ,वर्तमान )जैसे ह्रदय ,व्योम ,ब्रह्म-रंध्र | 

2-बाला शब्द का महत्व :- 

1-जो अपने पुत्रों को तथा संसार को बल प्रदान करती है उसे बाला कहते है | सीधे-सादे अर्थ में यह समझना चाहियें की जो संसार के प्राणियों को बल प्रदान करती है वह "बाला" है बाला वही है जो हमारें समस्त अंगों को बल प्रदान करती है | नख से शिखा तक, रक्त से ओज तक, बुद्धि से बल तक जो प्राणी को बल प्रदान करती है वह शक्ति-मति अवश्य है , जिसके बिना प्राणी अपने को निस्सहाय समझता है |

2- " बाला " अर्थात सर्व-शक्ति संपन्न, आदि माता | बाला का काम ही वृद्धि करना है | वह मानव या किसी प्राणी-विशेष को ही बल प्रदान करती हो, ऐसा नहीं- आदि-युग से ही यह जगन्माता इस संसार को बढाती चली आ रही है | आदि माता द्वारा निर्मित सृष्टि को जननी से मिला रही है | बल-वर्धिनी माता की अद्बुत शक्ति से जो परिचित हो गया, उसका जन्म तो सफल हो ही जाता है, उसके सामने त्रिभुवन की सम्पति भी तृण के सामान तुच्छ हो जाती है, क्योंकि जिस पुत्र पर माता-पिता का स्नेह हाथ फिर जाता है वह धन्य हो जाता है |

3- "बाला' ( बल-वर्धिनी ) का सेवक कभी निर्बल नहीं रह सकता और विश्वासी पर किसकी दया नहीं होती | बाला पहले अपने पुत्र को बल देती है और फिर बुद्धि | इन सब की प्राप्ति तभी होगी, जब संसार के लोग माता बाला की शरण में आयेंगें |

4- विश्वात्मिका शक्ति " श्री बाला ".. शिव और शक्ति- तत्व सृष्टी के 

आदि कारण है, वे जब ही कल्पना करते है , तभी सृष्टी होने लगती है | महा प्रलय के बाद जब "एकोहम बहु स्याम प्रजाये" की कल्पना होती है, तभी शक्ति-तत्व-शिव-तत्व से अलग होता है |

5-उसके पहले वे एक ही रहते है | उस एक रहने का नाम नाद है अर्थात सृष्टी की कल्पना होने के समय निष्क्रिय शिव और सक्रिय शक्ति की जो विपरीत रति होती है उसे ही नाद कहते है और इसी विपरीत रति द्वारा बिन्दु की उत्पति होती है | 

6-शक्ति जब निष्कल शिव से युक्त होती है, तब वे चिद-रूपिणी और विश्वोत्तीर्णा अर्थात विश्व के बाहर रहती है और जब वे सकल शिव के साथ होती है तब वे विश्वात्मिका होती है | परा शक्ति वे है, जो चैतन्य के साथ विश्रमावस्था में रहती है | इनको ही कादी-विद्या में "महा-काली" कहा जाता है और हादी विद्या में "महा-त्रिपुर-सुंदरी" |

7-नाद से जो बिन्दु उत्पन्न होता है वही श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी है अर्थात महा-त्रिपुर-सुंदरी नाद है और श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी बिन्दु है | जो शक्ति विश्वोत्तीर्णा है, वही महा-त्रिपुर-सुंदरी है और जो विश्वात्मिका है वे ही श्रीबाला है |

8-दुसरे प्रकार से विचार करे तो उपनिषद के अनुसार जाग्रत, स्वप्न और सुशुप्ताभिमानी विश्व "तैजस और प्राज्ञ पुरुष है | इन त्रि-मात्राओं के दर्शन से पता चलता है कि शक्ति ही जगत-रूप में अभिव्यक्त है | वाक्य द्वारा इसका वर्णन नहीं किया जा सकता | अत: यह सिद्धांत निकलता है की नाद को बिन्दु में युक्त करना चाहिए | 

9-उक्त व्याख्या से स्पष्ट है की महा-त्रिपुर-सुंदरी से श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी को युक्त समझना आवश्यक है | वास्तव में नामान्तर से दो भेद "शक्ति" के प्रतीत होते है, जो वस्तुतः एक ही है, कोई भेद नहीं है | जो नाद है वही बिन्दु है | जो महा-त्रिपुर-सुंदरी है वही श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी है |

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महात्रिपुर सुन्दरी साधना(‘पञ्च-दशी’ )का महत्व ;-‘ 

1-सोलह कला,श्री जो प्रदान करे वही षोडशी है। ये ऐश्वर्य,धन,पद जो भी चाहिए सभी कुछ प्रदान कर देती है।इनके श्री चक्र को श्रीयंत्र भी कहा जाता है।इनकी साधना से भक्त जो इच्छा करेगा,वह पा ही लेगा।ये त्रिपुरा समस्त भुवन मे सबसे अधिक सुन्दर है।इन्हे जो एक बार देख ले तो दूसरी कोई भी रुप देखने की रुची नही रहती।

2-इनकी पलक कभी नही गिरती है,ये जीव को शिव बना देती है।अभाव क्या है,कर्म क्या है,इनके भक्त क्या जाने,भक्त जैसी भी इच्छा करते है,वह सभी उन्हे प्राप्त हो जाता है।ये सभी की अधिश्वरी है।श्याम वर्ण मे काली कामाख्या है,वही गौर वर्ण मे राज राजेश्वरी है।सौन्दर्य रुप,श्रृंगार,विलास,स्वास्थ्य सभी कुछ इनके कृपा मात्र से प्राप्त होता है।

3-‘श्री षोडशी’ या ‘महा-त्रिपुर-सुन्दरी’ का मुख्य मन्त्र सोलह अक्षरों का है, उसी के अनुरुप उनका नाम है । पूजा यन्त्र ‘श्रीललिता’ – जैसा ही है ।

‘श्री ललिता’ एवं श्री ‘षोडशी’ के मन्त्रों में तीन ‘कूटों’ का समावेश है, जो क्रमशः ‘वाक्-कूट’, काम-कूट’ तथा ‘शक्ति-कूट’ नामों से प्रसिद्ध हैं । यहाँ ज्ञातव्य है कि पञ्चदशी के कूट-त्रय ‘क’, ‘ह′ या ‘स’ से प्रारम्भ होते हैं । अतः विभिन्न ‘कादि’, ‘हादि’ और ‘सादि’ – विद्या नाम से जाने जाते हैं ।

4-भगवती षोडशी से सम्बन्धित पूजा-यन्त्र ‘श्री-चक्र’ या ‘श्री-यन्त्र’ की विशेष ख्याति है । इस तरह का जटिल पूजा-यन्त्र अन्य किसी देवता का नहीं है । वह पिण्ड और ब्रह्माण्ड के समस्त रहस्यों का बोधक है । इसी से उसे ‘यन्त्र-राज’ या ‘चक्र-राज’ भी कहते हैं ।

5-महात्रिपुर सुन्दरी श्री कुल की विद्या है। महाविद्या समुदाय में त्रिपुरा नाम की अनेक देवियां हैं, जिनमें त्रिपुरा-भैरवी, त्रिपुरा और त्रिपुर सुंदरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। देवी त्रिपुरसुंदरी ब्रह्मस्वरूपा हैं, भुवनेश्वरी विश्वमोहिनी हैं। ये श्रीविद्या, षोडशी, ललिता, राज-राजेश्वरी, बाला पंचदशी अनेक नामों से जानी जाती हैं। त्रिपुरसुंदरी का शक्ति-संप्रदाय में असाधारण महत्त्व है। महात्रिपुर सुन्दरी देवी माहेश्वरी शाक्ति की सबसे मनोहर श्री विग्रह वाली सिद्घ देवी हैं।

6-श्री श्रीविद्या’ का मुख्य मन्त्र पन्द्रह अक्षरों का होने से उनका नामान्तर ‘पञ्च-दशी’ भी है । इनका पूजा-यन्त्र ‘श्री-चक्र’ या ‘श्री-यन्त्र’ नाम से प्रसिद्ध 

है ।ये श्री कुल की विद्या है,इनकी पूजा गुरु मार्ग से की जाती है।ये साधक को पूर्ण समर्थ बनाती है,आकर्षण,वशित्व,कवित्व,भौतिक सुख सभी को देने वाली है।इनकी साधना से सभी भोग भोगते हुये मोक्ष की प्राप्ती होती है।ये परम करुणामयी जीव को उस स्वरुप को प्रकट करती है तो जीव शिव बन अपना स्वरुप देखता है की वह तो मै ही हूँ।ॐ तत्सत् इस रहस्य से परिचित होता है।

7-इनकी पूजा मे श्री बाला त्रिपुरसुन्दरी की भी पूजा की जाती है।इनकी साधना से साधक का कुन्डलिनी शक्ति खुल जाती है।ये श्री माँ है,सारे अभावो को दूर कर भक्त को धन,यश के साथ दिव्यदृष्टि प्रदान करती है।ये चार पायों से युक्त जिनके नीचे ब्रह्मा,विष्णु,रुद्र,ईश्वर पाया बन जिस सिंहासन को अपने मस्तक पर विराजमान किये है उसके ऊपर सदा शिव लेटे हुये है और उनके नाभी से एक कमल जो खिलता हुआ,उसपर ये त्रिपुरा विराजमान है।

8-सैकड़ों पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव और गुरु कृपा से इनका मंत्र मिल पाता है।किसी भी ग्रह,दोष,या कोई भी अशुभ प्रभाव इनके भक्त पर नही हो पाता।श्रीयंत्र की पूजन सभी के वश की बात नही है।किसी भी महाविद्या की साधना मे गुरु शिव,,गणेश,भैरव की पूजा अनिवार्य होती है।

9-इनकी महिमा अवर्णनीय है। संसार के समस्त तंत्र-मंत्र इनकी आराधना करते हैं। प्रसन्न होने पर ये भक्तों को अमूल्य निधियां प्रदान कर देती हैं। चार दिशाओं में चार और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें तंत्र शास्त्रों में ‘पंचवक्त्र’ अर्थात् पांच मुखों वाली कहा गया है। आप सोलह कलाओं से परिपूर्ण हैं, इसलिए इनका नाम ‘षोडशी’ भी है।

10-कलिका पुराण के अनुसार एक बार पार्वती जी ने भगवान शंकर से पूछा, ‘भगवन! आपके द्वारा वर्णित तंत्र शास्त्र की साधना से जीव के आधि-व्याधि, शोक संताप, दीनता-हीनता तो दूर हो जाएगी, किन्तु गर्भवास और मरण के असह्य दुख की निवृत्ति और मोक्ष पद की प्राप्ति का कोई सरल उपाय बताइए।’

11-तब पार्वती जी के अनुरोध पर भगवान शंकर ने त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या साधना-प्रणाली को प्रकट किया। "भैरवयामल और शक्तिलहरी" में त्रिपुर सुन्दरी उपासना का विस्तृत वर्णन मिलता है। ऋषि दुर्वासा आपके परम आराधक थे। इनकी उपासना "श्री चक्र" में होती है। 

12-आदिगुरू शंकरचार्य ने भी अपने ग्रन्थ सौन्दर्यलहरी में त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या की बड़ी सरस स्तुति की है। कहा जाता है भगवती त्रिपुर सुन्दरी के आशीर्वाद से साधक को भोग और मोक्ष दोनों सहज उपलब्ध हो जाते हैं।

देवी श्री विद्या त्रिपुरसुन्दरी के स्वरूप का वर्णन ;-

1-महाविद्याओं में तीसरे स्थान पर विद्यमान महा शक्ति त्रिपुरसुंदरी, तीनों लोकों में सोलह वर्षीय युवती स्वरूप में सर्वाधिक मनोहर तथा सुन्दर रूप से सुशोभित हैं। देवी का शारीरिक वर्ण हजारों उदीयमान सूर्य के कांति कि भाँति है, देवी की चार भुजा तथा तीन नेत्र (त्रि-नेत्रा) हैं। अचेत पड़े हुए सदाशिव के नाभि से उद्भूत कमल के आसन पर देवी विराजमान है। देवी अपने चार हाथों में पाश, अंकुश, धनुष तथा बाण से सुशोभित है।

2- देवी पंचवक्त्र है अर्थात देवी के पांच मस्तक या मुख है, चारों दिशाओं में चार तथा ऊपर की ओर एक मुख हैं। देवी के मस्तक तत्पुरुष, सद्ध्योजात, वामदेव, अघोर तथा ईशान नमक पांच शिव स्वरूपों के प्रतीक हैं क्रमशः हरा, लाल, धूम्र, नील तथा पीत वर्ण वाली हैं।

3- देवी दस भुजा वाली हैं तथा अभय, वज्र, शूल, पाश, खड़ग, अंकुश, टंक, नाग तथा अग्नि धारण की हुई हैं। देवी अनेक प्रकार के अमूल्य रत्नों से युक्त आभूषणों से सुशोभित हैं तथा देवी ने अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण कर रखा हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा यम देवी के आसन को अपने मस्तक पर धारण करते हैं।

4-देवी काली की समान ही देवी त्रिपुरसुंदरी चेतना से सम्बंधित हैं। देवी त्रिपुरा, ब्रह्मा, शिव, रुद्र तथा विष्णु के शव पर आरूढ़ हैं, तात्पर्य, चेतना रहित देवताओं के देह पर देवी चेतना रूप से विराजमान हैं तथा ब्रह्मा, शिव, विष्णु, लक्ष्मी तथा सरस्वती द्वारा पूजिता हैं। कुछ शास्त्रों के अनुसार, देवी कमल के आसन पर भी विराजमान हैं, जो अचेत शिव के नाभि से निकलती हैं शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा यम, चेतना रहित शिव सहित देवी को अपने मस्तक पर धारण किये हुए हैं।

आदि देवी की उपासना-पीठ ;- 

1-यंत्रों में श्रेष्ठ श्री यन्त्र या श्री चक्र, साक्षात् देवी त्रिपुरा का ही स्वरूप हैं तथा श्री विद्या या श्री संप्रदाय, पंथ या कुल का निर्माण करती हैं। देवी त्रिपुरा आदि शक्ति हैं, कश्मीर, दक्षिण भारत तथा बंगाल में आदि काल से ही, श्री संप्रदाय विद्यमान हैं तथा देवी आराधना की जाती हैं, विशेषकर दक्षिण भारत में देवी श्री विद्या नाम से विख्यात हैं।

2- मदुरै में विद्यमान मीनाक्षी मंदिर, कांचीपुरम में विद्यमान कामाक्षी मंदिर, दक्षिण भारत में हैं तथा यहाँ देवी श्री विद्या के रूप में पूजिता हैं। वाराणसी में विद्यमान राजराजेश्वरी मंदिर, देवी श्री विद्या से ही सम्बंधित हैं तथा आकर्षण सम्बंधित विद्याओं की प्राप्ति हेतु प्रसिद्ध हैं।

3-देवी की उपासना श्री चक्र में होती है, श्री चक्र से सम्बंधित मुख्य शक्ति देवी त्रिपुरसुंदरी ही हैं। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध गुप्त अथवा परा शक्तियों, विद्याओं से हैं; तन्त्र की ये अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। तंत्र में वर्णित मरण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तंभन इत्यादि प्रयोगों की देवी अधिष्ठात्री है। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध गुप्त अथवा परा शक्तियों, विद्याओं से हैं, तन्त्र की ये अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। समस्त प्रकार के तांत्रिक कर्म देवी की कृपा के बिना सफल नहीं होते हैं।

4-योनि-पीठ कामाख्या;-

आदि काल से ही देवी के योनि-पीठ कामाख्या में, समस्त तंत्र साधनाओं का विशेष विधान हैं। देवी आज भी वर्ष में एक बार देवी ऋतु वत्सल होती है जो ३ दिन का होता है, इस काल में असंख्य भक्त तथा साधु, सन्यासी देवी कृपा प्राप्त करने हेतु कामाख्या धाम आते हैं। देवी कि रक्त वस्त्र जो ऋतुस्रव के पश्चात प्राप्त होता है, प्रसाद के रूप में प्राप्त कर उसे अपनी सुरक्षा हेतु अपने पास रखते हैं।


सत्यम, शिवम और सुंदरम

सत्यम, शिवम और सुंदरम 


 सत्य का अर्थ ईश्वर, शिवम का अर्थ भगवान शिव से और सुंदरम का अर्थ कला आदि सुंदरता से लगाते होंगे, लेकिन अब हम आपको बताएंगे कि आखिर में हिन्दू धर्म और दर्शन का इस बारे में मत क्या है।

हालांकि वेद, उपनिषद और पुराणों में इस संबंध में अलग अलग मत मिलते हैं, लेकिन सभी उसके एक मूल अर्थ पर एकमत हैं। धर्म और दर्शन की धारणा इस संबंध में क्या  हो सकती है यह भी बहुत गहन गंभीर मामला है। दर्शन में भी विचारधाएं भिन्न-भिन्न मिल जाएगी, लेकिन आखिर सत्य क्या है इस पर सभी के मत भिन्न हो सकते हैं।

सत्यम
 
  योग में यम का दूसरा अंग है सत्य। हिन्दू धर्म में ब्रह्म को ही सत्य माना गया है। जो ब्रह्म (परमेश्वर) को छोड़कर सबकुछ जाने का प्रयास करता है वह व्यक्ति जीवन पर्यन्त भ्रम में ही अपना जीवन गुजार देता है। यह ब्रह्म निराकार, निर्विकार और निर्गुण है। उसे जानने का विकल्प है स्वयं को जानना। अर्थात आत्मा ही सत्य है, जो अजर अमर, निर्विकार और निर्गुण है। शरीर में रहकर वह खुद को जन्मा हुआ मानती है जो कि एक भ्रम है। इस भ्रम को जानना ही सत्य है।

'सत (ईश्वर) एक ही है। कवि उसे इंद्र, वरुण व अग्नि आदि भिन्न नामों से पुकारते हैं।'-ऋग्वेद
'जो सर्वप्रथम ईश्वर को इहलोक और परलोक में अलग-अलग रूपों में देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात उसे बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में फँसना पड़ता है।'-कठोपनिषद-।।10।।

सत्य का अलौकिक अर्थ

  सत्य को समझना मुश्किल है, लेकिन उनके लिए नहीं जो धर्म और दर्शन को भलिभांति जानते हैं। सत्य का आमतौर पर अर्थ माना जाता है झूठ न बोलना, लेकिन यह सही नहीं है। सत् और तत् धातु से मिलकर बना है सत्य, जिसका अर्थ होता है यह और वह- अर्थात यह भी और वह भी, क्योंकि सत्य पूर्ण रूप से एकतरफा नहीं होता। परमात्मा से परिपूर्ण यह जगत आत्माओं का जाल है।
 
जीवन, संसार और मन यह सभी विरोधाभासी है। इसी विरोधाभास में ही छुपा है वह जो स्थितप्रज्ञ आत्मा और ईश्वर है। सत्य को समझने के लिए एक तार्किक और बोधपूर्ण दोनों ही बुद्धि की आवश्यकता होती है। तार्किक‍ बुद्धि आती है भ्रम और द्वंद्व के मिटने से। भ्रम और द्वंद्व मिटता है मन, वचन और कर्म से एक समान रहने से। 
 
शास्त्रों में आत्मा, परमात्मा, प्रेम और धर्म को सत्य माना गया है। सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं। सत्य के साथ रहने से मन हल्का और प्रसन्न चित्त रहता है। मन के हल्का और प्रसंन्न चित्त रहने से शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता है। सत्य की उपयोगिता और क्षमता को बहुत कम ही लोग समझ पाते हैं। सत्य बोलने से व्यक्ति को सद्गति मिलती है। गति का अर्थ सभी जानते हैं।

‘सत चित आनन्द’

  सत् अर्थात मूल कण या तत्व, चित्त अर्थात आत्मा और आनंद अर्थात प्रकृति और आत्मा के मिलन से उत्पन्न अनुभूति और इसके विपरित शुद्ध आत्म अनुभव करना।... परामात्मा और आत्मा का होना ही सत्य है बाकी सभी उसी के होने से है। आत्मा सत (सत्य) चित (चित्त की एकाग्रता से) और आनन्द (परमानन्द की झलक मात्र) को अनुभव रूप महसूस करने लगती है। यानी आत्मा के सत्य में चित्त के लीन या लय हो जाने पर बनी आनन्द की स्थिति ही सच्चिदानन्द स्थिति होती है।
 
सत्य का लौकिक अर्थ

  सत्य को जानना कठिन है। ईश्वर ही सत्य है। सत्य बोलना भी सत्य है। सत्य बातों का समर्थन करना भी सत्य है। सत्य समझना, सुनना और सत्य आचरण करना कठिन जरूर है लेकिन अभ्यास से यह सरल हो जाता है। जो भी दिखाई दे रहा है वह सत्य नहीं है, लेकिन उसे समझना सत्य है अर्थात जो-जो असत्य है उसे जान लेना ही सत्य है। असत्य को जानकर ही व्यक्ति सत्य की सच्ची राह पर आ जाता है।
 
जब व्यक्ति सत्य की राह से दूर रहता है तो वह अपने जीवन में संकट खड़े कर लेता है। असत्यभाषी व्यक्ति के मन में भ्रम और द्वंद्व रहता है, जिसके कारण मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। मानसिक रोगों का शरीर पर घातक असर पड़ता है। ऐसे में सत्य को समझने के लिए एक तार्किक बुद्धि की आवश्यकता होती है। तार्किक‍ बुद्धि आती है भ्रम और द्वंद्व के मिटने से। भ्रम और द्वंद्व मिटता है मन, वचन और कर्म से एक समान रहने से।

सत्य का आमतौर पर अर्थ माना जाता है झूठ न बोलना, लेकिन सत् और तत् धातु से मिलकर बना है सत्य, जिसका अर्थ होता है यह और वह- अर्थात यह भी और वह भी, क्योंकि सत्य पूर्ण रूप से एकतरफा नहीं होता। रस्सी को देखकर सर्प मान लेना सत्य नहीं है, किंतु उसे देखकर जो प्रतीति और भय उत्पन हुआ, वह सत्य है। अर्थात रस्सी सर्प नहीं है, लेकिन भय का होना सत्य है। दरअसल हमने कोई झूठ नहीं देखा, लेकिन हम गफलत में एक झूठ को सत्य मान बैठे और उससे हमने स्वयं को रोगग्रस्त कर लिया।
 
तो सत्य को समझने के लिए जरूरी है तार्किक बुद्धि, सत्य वचन बोलना और होशो-हवास में जीना। जीवन के दुख और सुख सत्य नहीं है, लेकिन उनकी प्रतीति होना सत्य है। उनकी प्रतीति अर्थात अनुभव भी तभी तक होता है जब तक कि आप दुख और सुख को सत्य मानकर जी रहे हैं।
 
सत्य के लाभ
 
  सत्य बोलने और हमेशा सत्य आचरण करते रहने से व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है। मन स्वस्थ और शक्तिशाली महसूस करता है। डिप्रेशन और टेंडन भरे जीवन से मुक्ति मिलती है। शरीर में किसी भी प्रकार के रोग से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है। सुख और दुख में व्यक्ति सम भाव रहकर निश्चिंत और खुशहाल जीवन को आमंत्रित कर लेता है। सभी तरह के रोग और शोक का निदान होता है।
 
शिवम

  शिवम का संबंध अक्सर लोग भगवान शंकर से जोड़ देते हैं, जबकि भगवान शंकर अलग हैं और शिव अलग। शिव निराकार, निर्गुण और अमूर्त सत्य है। निश्चित ही माता पार्वती के पति भी ध्यानी होकर उस परम सत्य में लीन होने के कारण शिव स्वरूप ही है, लेकिन शिव नहीं।

शिव का अर्थ है शुभ। अर्थात सत्य होगा तो उससे जुड़ा शुभ भी होगा अन्यथा सत्य हो नहीं सकता। वह सत्य ही शुभ अर्थात भलिभांति अच्छा है। सर्वशक्तिमान आत्मा ही शिवम है। दो भोओं के बीच आत्मा लिंगरूप में विद्यमान है। 

शिवम

  शिवम का संबंध अक्सर लोग भगवान शंकर से जोड़ देते हैं, जबकि भगवान शंकर अलग हैं और शिव अलग। शिव निराकार, निर्गुण और अमूर्त सत्य है। निश्चित ही माता पार्वती के पति भी ध्यानी होकर उस परम सत्य में लीन होने के कारण शिव स्वरूप ही है, लेकिन शिव नहीं।

शिव का अर्थ है शुभ। अर्थात सत्य होगा तो उससे जुड़ा शुभ भी होगा अन्यथा सत्य हो नहीं सकता। वह सत्य ही शुभ अर्थात भलिभांति अच्छा है। सर्वशक्तिमान आत्मा ही शिवम है। दो भोओं के बीच आत्मा लिंगरूप में विद्यमान है। 

सुंदरम् : - यह संपूर्ण प्रकृति सुंदरम कही गई है। इस दिखाई देने वाले जगत को प्रकृति का रूप कहा गया है। प्रकृति हमारे स्वभाव और गुण को प्रकट करती है। पंच कोष वाली यह प्रकृति आठ तत्वों में विभाजित है।

त्रिगुणी प्रकृति

  परम तत्व से प्रकृति में तीन गुणों की उत्पत्ति हुई सत्व, रज और तम। ये गुण सूक्ष्म तथा अतिंद्रिय हैं, इसलिए इनका प्रत्यक्ष नहीं होता।

 इन तीन गुणों के भी गुण हैं- प्रकाशत्व, चलत्व, लघुत्व, गुरुत्व आदि इन गुणों के भी गुण हैं, अत: स्पष्ट है कि यह गुण द्रव्यरूप हैं।   द्रव्य अर्थात पदार्थ। पदार्थ अर्थात जो दिखाई दे रहा है और जिसे किसी भी प्रकार के सूक्ष्म यंत्र से देखा जा सकता है, महसूस किया जा सकता है या अनुभूत किया जा सकता है। ये ब्रहांड या प्रकृति के निर्माणक तत्व हैं।
 
प्रकृति से ही महत् उत्पन्न हुआ जिसमें उक्त गुणों की साम्यता और प्रधानता थी। सत्व शांत और स्थिर है। रज क्रियाशील है और तम विस्फोटक है। उस एक परमतत्व के प्रकृति तत्व में ही उक्त तीनों के टकराव से सृष्टि होती गई। 

 सर्वप्रथम महत् उत्पन्न हुआ, जिसे बुद्धि कहते हैं। बुद्धि प्रकृति का अचेतन या सूक्ष्म तत्व है।  महत् या बुद्ध‍ि से अहंकार। अहंकार के भी कई उप भाग है। यह व्यक्ति का तत्व है।  व्यक्ति अर्थात जो व्यक्त हो रहा है सत्व, रज और तम में। सत्व से मनस, पाँच इंद्रियाँ, पाँच कार्मेंद्रियाँ जन्मीं। तम से पंचतन्मात्रा, पंचमहाभूत (आकाश, अग्न‍ि, वायु, जल और ग्रह-नक्षत्र) जन्मे।   
 
पंचकोष

  जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद। इस ही अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कहते हैं। दरअसल, आप एक शरीर में रहते हैं जो कि जड़ जगत का हिस्सा है। आपके शरीर के भीतर प्राणमय अर्थात प्राण है जो कि वायुतत्व से भरा है। यह तत्व आपके जिंदा रहने को संचालित करता है। यदि आप देखे और सुने गए अनुसार संचालित होते हैं तो आपम प्राणों में जीते हैं अर्थात आप एक प्राणी से ज्यादा कुछ नहीं।

मनोमय का अर्थ आपके शरीर में प्राण के अलावा मन भी है जिसे चित्त कहते हैं। पांचों इंद्रियों का जिस पर प्रभाव पड़ता है और समझने की क्षमता भी रखता है। इस मन के अलावा आपके ‍भीतर विज्ञान मन अर्थात एक ऐसी बुद्धि भी है जो विश्लेषण और विभाजन करना जानती है।

 इसके गहरे होने से मन का लोप हो जाता है और व्यक्ति बोध में जीता है। इस बोध के गहरे होने जाने पर ही व्यक्ति खुद के स्वरूप अर्थात आनंदमय स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। अर्थात जो आत्मा पांचों इंद्रियों के बगैर खुद के होने के भलिभांति जानती है। 
 
आठ तत्व

 अनंत-महत्-अंधकार-आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी। अनंत जिसे आत्मा कहते हैं। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार यह प्रकृति के आठ तत्व हैं। 

अत: हम एक सुंदर प्रकृति और जगत के घेरे से घिरे हुए हैं। इस घेरे से अलग होकर जो व्यक्ति खुद को प्राप्त कर लेता है वही सत्य को प्राप्त कर लेता है। संसार में तीन ही तत्व है सत्य, शिव और सुंदरम। ईश्वर, आत्मा और प्रकृति। इसे ही सत्य, चित्त और आनंद कहते हैं।

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तंत्र_साधना_में_स्त्री_शक्ति_का_भंडार

तंत्र_साधना_में_स्त्री_शक्ति_का_भंडार


( आगमिक-शाक्त दृष्टि से शास्त्रीय गूढ़ विवेचन)
प्रस्तुत लेख तांत्रिक परंपरा के शास्त्रीय, दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष को ध्यान में रखकर लिखा गया है। इसमें कोई लौकिक या भौतिक वर्णन नहीं, बल्कि आगमिक-शाक्त दृष्टि से विषय का गूढ़ विवेचन है। यह केवल शाक्त आगमों विशेषतः योगिनीहृदय, कुलार्णव तंत्र, शारदा तिलक, तंत्रराज, निर्वाण तंत्र पर आधारित है। यह लेख गुरु-गोपनीय मर्यादा का पालन करते हुए तत्त्व-दृष्टि से लिखा गया है, किसी भी प्रकार की साधना-विधि या प्रयोग का वर्णन नहीं करता।
#तंत्र केवल क्रिया-पद्धति नहीं, अपितु चेतना-विज्ञान है। वेद जहाँ ब्रह्म के निराकार स्वरूप की उपासना करते हैं, वहीं तंत्र उस ब्रह्म को शक्ति सहित स्वीकार करता है। तंत्र का मूल सूत्र है- “शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः।” अर्थात् शक्ति के बिना शिव भी निष्क्रिय हैं।
1.#शक्ति_का_तात्त्विक_स्वरूप-- तंत्र में “स्त्री” शब्द देह या लिंग का सूचक नहीं, बल्कि सृजनशील चेतना (Creative Consciousness) का द्योतक है। यह वही शक्ति है जो ब्रह्म को जगत् में प्रकट करती है, जड़ में चैतन्यता भरती है, साधक के भीतर सुप्त कुंडलिनी को जाग्रत करती है। इसी कारण तंत्र में शक्ति को आदि-बीज, मूल-तत्त्व और भंडार कहा गया है। शाक्त आगमों में कुंडलिनी-जागरण कोई लक्ष्य नहीं,
बल्कि शुद्ध साधना का स्वाभाविक परिणाम है। #कुलार्णव_तंत्र स्पष्ट चेतावनी देता है-- न बलात् कुण्डलीं बोध्यां न चेष्ट्या न च यत्नतः । गुरुप्रसादतः सिद्धिर्भवत्येव न संशयः ॥ अर्थात् बल, प्रयास या हठ से कुंडलिनी को नहीं जगाना चाहिए; यह केवल गुरु-कृपा से ही सिद्ध होती है।
2.#योनि_का_शास्त्रीय_अर्थ-- आगमों में “योनि” शब्द का प्रयोग उत्पत्ति-स्थल के अर्थ में हुआ है। यह न तो स्थूल देह का संकेत है और न ही भोग का विषय। यह उस गुह्य केंद्र का प्रतीक है जहाँ शक्ति का संकुचन होता है। चेतना बीज रूप में स्थित रहती है। साधना द्वारा वही बीज ब्रह्मानुभूति में विकसित होता है। #कुलार्णव तंत्र में कहा गया है- “योनिरेव परा शक्तिः, योनौ विश्वं प्रतिष्ठितम्।” अर्थात् समस्त विश्व उसी शक्ति-योनि में प्रतिष्ठित है। शाक्त आगमों में मूलाधार को शक्ति-योनि कहा गया है। यही वह स्थान है जहाँ शक्ति बीज रूप में स्थित रहती है। त्रिगुण सुप्त अवस्था में रहते हैं। शिव बिंदु रूप में निष्क्रिय स्थित हैं। #शारदा_तिलक तंत्र कहता है— योनिस्थाने स्थितां शक्तिं मूलाधारनिवासिनीम् । अजां सुप्तां त्रिकोणस्थां ध्यायेत् योगविदां वरः ॥ यह त्रिकोण— इच्छा, ज्ञान, क्रिया का प्रतीक है। कुंडलिनी का आरोहण भोग से वैराग्य है। अहं से आत्मा है। द्वैत से अद्वैत  की यात्रा है। #निर्वाण_तंत्र कहता है— यदा शक्तिः शिवं याति तदा जीवो न विद्यते । शिवशक्त्यैक्यभावे तु संसारो नश्यति ध्रुवम् ॥
3.#स्त्री_शक्ति : (बाह्य नहीं, आंतरिक साधना)-- तंत्र की सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि लोग उसे बाह्य कर्मकांड समझ लेते हैं। वास्तव में स्त्री शक्ति का वास्तविक भंडार साधक के भीतर है, यह शक्ति मूलाधार में सुप्त रहती है, गुरु-कृपा, संयम और शुद्ध आचरण से ही यह जाग्रत होती है, बाह्य प्रतीक केवल आंतरिक बोध के सहायक हैं। #तंत्रराज_तंत्र में कहा गया है— मायया वेष्टिता शक्तिर्बद्धा भवति देहिनाम् । विद्यया तु विमुक्ता स्यात् शिवरूपा प्रजायते ॥ अर्थात् माया से आवृत शक्ति बंधन का कारण बनती है, और विद्या से वही शक्ति शिवस्वरूप हो जाती है।
4.#शक्ति_साधना_और_मोक्ष-- तंत्र मोक्ष को पलायन नहीं मानता, बल्कि शक्ति का परिष्कार, चेतना का उत्कर्ष, द्वैत से अद्वैत की यात्रा है। जब साधक शक्ति को भोग-वस्तु नहीं, देवी के रूप में अनुभव करता है, तभी वासना ही उपासना बनती है। देह ही मंदिर बनता है। साधना ही समाधि बनती है। #शाक्त_आगम में-- कुंडलिनी कोई साधन नहीं। शक्ति कोई वस्तु नहीं। मोक्ष कोई भविष्य नहीं बल्कि यह सब अभी और यहीं घटित होने वाला बोध है। जो इसे समझता है, वह साधक नहीं रहता बल्कि वह देवी-चेतना में स्थित हो जाता है।
5.#गूढ_निष्कर्ष-- तंत्र साधना में स्त्री शक्ति कोई बाह्य सत्ता नहीं, बल्कि ब्रह्म की गतिशील अभिव्यक्ति है। साधक की अंतःचेतना का मूल स्रोत है, और मोक्ष का साक्षात् द्वार है। जो इस रहस्य को समझ लेता है, वह तंत्र से भयभीत नहीं होता, बल्कि उसे आत्मज्ञान का सर्वोच्च मार्ग मानता है।

रावण की बेटी सुवर्णमत्या

रावण की बेटी सुवर्णमत्स्या
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 रावण की बेटी का उल्‍लेख थाईलैंड की रामकियेन रामायण और कंबोडिया की रामकेर रामायण में किया गया है, जबकि वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास के रामचरित मानस में इसका उल्लेख नहीं किया गया है।

रामकियेन और रामकेर रामायण के मुताबिक, रावण के तीन पत्नियों से 7 बेटे थे। इनमें पहली पत्‍नी मंदोदरी से दो बेटे मेघनाद और अक्षय कुमार थे। वहीं, दूसरी पत्‍नी धन्यमालिनी से अतिकाय और त्रिशिरा नाम के दो बेटे थे।  तीसरी पत्‍नी से प्रहस्थ, नरांतक और देवांतक नाम के तीन बेटे थे। दोनों रामायण में बताया गया है कि सात बेटों के अलावा रावण की एक बेटी भी थी, जिसका नाम सुवर्णमछा या सुवर्णमत्‍स्‍य था। कहा जाता है कि सुवर्णमत्‍स्‍य देखने में बहुत सुंदर थी। उसे स्‍वर्ण जलपरी भी कहा जाता है। एक अन्‍य रामायण ‘अद्भुत रामायण’ में राम जी की पत्‍नी सीता जी को भी रावण की बेटी बताया गया है। 
       दशानन रावण की बेटी सुवर्णमत्‍स्‍य का शरीर सोने की तरह दमकता था। इसीलिए उसको सुवर्णमछा भी कहा जाता था। इसका शाब्दिक अर्थ होता है, सोने की मछली। इसीलिए थाईलैंड और कंबोडिया में सुनहरी मछली को ठीक उसी तरह से पूजा जाता है, जैसे चीन में ड्रैगन की पूजा होती है
     राम जी ने लंका पर विजय अभियान के दौरान समुद्र पार करने के लिए नल और नील को सेतु बनाने का काम सौंपा। राम जी के आदेश पर जब नल और नील लंका तक समुद्र पर सेतु बना रहे थे, तब रावण ने अपनी बेटी सुवर्णमत्‍स्‍य को ही ये योजना नाकाम करने का काम सौंपा था। पिता की आज्ञा पाकर सुवर्णमछा ने वानरसेना की ओर से समुद्र में फेंके जाने वाले पत्‍थरों और चट्टानों को गायब करना शुरू कर दिया। उसने इस काम के लिए समुद्र में रहने वाले अपने पूरे दल की मदद ली।

रामकियेन और रामकेर रामायण में लिखा गया है कि जब वानरसेना की ओर से डाले जाने वाले पत्‍थर गायब होने लगे तो हनुमानजी ने समुद्र में उतरकर देखा कि आखिर ये चट्टानें जा कहां रही हैं? उन्‍होंने देखा कि पानी के अंदर रहने वाले लोग पत्‍थर और चट्टानें उठाकर कहीं ले जा रहे हैं। उन्‍होंने उनका पीछा किया तो देखा कि एक मत्‍स्‍य कन्‍या उनको इस कार्य के लिए निर्देश दे रही है। कथा में कहा गया है कि सुवर्णमछा ने जैसे ही हनुमानजी को देखा, उनसे प्रेम हो गया। हनुमानजी उसके मन की स्थिति भांप लेते हैं और समुद्रतल पर ले जाकर पूछते हैं कि आप कौन हैं देवी ? वह बताती हैं कि मैं रावण की बेटी हूं। फिर हनुमान जी उसे समझाते हैं कि रावण क्‍या गलत कार्य कर रहा है। हनुमानजी के समझाने पर सुवर्णमछा सभी चट्टानें लौटा देती हैं, तब रामसेतु के निर्माण का कार्य पूरा हो पाता है। थाई रामायण रामकियेन के अनुसार महाबली हनुमान जी के आशीर्वाद से स्वर्णमछा को एक पुत्र की प्राप्ति भी हुई थी जिसका नाम मैकचनू (मछानु) था। 

Saturday, January 10, 2026

હિન્દુસ્તાન રાજા નું રાજ ના ઇતિહાસ

વાંચવા જેવી માહિતી




માહિતી એકઠી કરનાર મિત્રને અભિનંદન,

1190 હિન્દુ સમ્રાટ પૃથ્વીરાજ હિન્દુ રાજ અહીંથી પુરુ આ પછીના જેટલા આવ્યા એટલા બધા લુંટારા
   1 = 1193 *મુહમ્મદ ઘોરી*
   2 = 1206 *કુતુબુદ્દીન પણ ઐબક*
   3 = 1210 *અરમ શાહ*
   4 = 1211 *ઇલતુત્મિશ*
   5 = 1236 *રુકનુદ્દીન ફિરોઝ શાહ*
   6 = 1236 *રઝિયા સુલતાન*
   7 = 1240 *મુઇઝુદ્દીન બહરામ શાહ*
   8 = 1242 *અલ્લાઉદ્દીન મસૂદ શાહ*
   9 = 1246 *નસીરુદ્દીન મેહમૂદ*
   10 = 1266 *ગિયાસુદીન બાલ્બન*
   11 = 1286 *કાઈ ખુશરો*
   12 = 1287 *મુઇઝુદ્દીન કૈકુબાદ*
   13 = 1290 *શામુદ્દીન કોમર્સ*
          1290 *ગુલામ વંશનો અંત*
   (રાજ્યકાળ - લગભગ 97 વર્ષ)

   *ખિલજી વંશ*
   1 = 1290 જલાલુદ્દીન *ફિરોઝ ખિલજી*
   2 = 1296 *અલાદ્દીન ખિલજી*
   4 = 1316 *સહાબુદ્દીન ઓમર શાહ*
   5 = 1316 *કુતુબુદ્દીન મુબારક શાહ*
   6 = 1320 *નસીરુદ્દીન ખુસરો શાહ*
   7 = 1320 *ખિલજી* *વંશનો અંત*
   (રાજ્યકાળ - લગભગ 30 વર્ષ)

   *તુગલક વંશ*
   1 = 1320 *ગિયાસુદ્દીન તુઘલક I*
   2 = 1325 *મુહમ્મદ બિન તુગલક II*
   3 = 1351 *ફિરોઝ શાહ તુગલક*
   4 = 1388 *ગિયાસુદ્દીન તુગલક II*
   5 = 1389 *અબુ બકર શાહ*
   6 = 1389 *મુહમ્મદ તુગલક III*
   7 = 1394 *સિકંદર શાહ પ્રથમ*
   8 = 1394 *નસીરુદ્દીન શાહ દુસરા*
   9 = 1395 *નસરત શાહ*
   10 = 1399 *નસીરુદ્દીન મુહમ્મદ શાહ*
 વેન્ટાડે બીજા સ્થાને છે
   11 = 1413 *દોલત શાહ*
   1414 *તુગલક વંશનો અંત*
   (રાજ્યકાળ - લગભગ 94 વર્ષ)

   *સૈયદ વંશ*
   1 = 1414 *ખિઝર ખાન*
   2 = 1421 *મુઇઝુદ્દીન મુબારક શાહ II*
   3 = 1434 *મુહમ્મદ શાહ IV*
   4 = 1445 *અલ્લાઉદ્દીન આલમ શાહ*
   1451 *સૈયદ* *વંશનો અંત*
   (રાજ્યકાળ - લગભગ 37 વર્ષ)

   *અલોદી વંશ*
   1 = 1451 *બહલોલ લોદી*
   2 = 1489 *સિકંદર લોદી II*
   3 = 1517 *ઇબ્રાહિમ લોદી*
   1526 *લોદી વંશનો અંત*
   (રાજ્યકાળ - લગભગ 75 વર્ષ)

   *મુઘલ વંશ*
   1 = 1526 *ઝહરુદ્દીન બાબર*
   2 = 1530 *હુમાયુ*
   1539 *મુઘલ વંશનો અંત*

   *સુરી રાજવંશ*
   1 = 1539 *શેર શાહ સૂરી*
   2 = 1545 *ઈસ્લામ શાહ સૂરી*
   3 = 1552 *મહમુદ શાહ સૂરી*
   4 = 1553 *ઈબ્રાહીમ સુરી*
   5 = 1554 *ફિરુઝ શાહ સૂરી*
   6 = 1554 *મુબારક ખાન સુરી*
   7 = 1555 *સિકંદર સુરી*
   *સુરી વંશનો અંત,*
 (શાસન-16 વર્ષ આશરે)

   *મુઘલ વંશ ફરી શરૂ થયો*
   1 = 1555 *હુમાયુ ફરી સિંહાસન પર*
   2 = 1556 *જલાલુદ્દીન અકબર*
   3 = 1605 *જહાંગીર સલીમ*
   4 = 1628 *શાહજહાં*
   5 = 1659 *ઔરંઝેબ*
   6 = 1707 *શાહ આલમ પ્રથમ*
   7 = 1712 *જહાદર શાહ*
   8 = 1713 *ફારુખસિયાર*
   9 = 1719 *રાયફુદુ રજત*
   10 = 1719 *રૈફુદ દૌલા*
   11 = 1719 *નેકુશિયાર*
   12 = 1719 *મહમુદ શાહ*
   13 = 1748 *અહમદ શાહ*
   14 = 1754 *આલમગીર*
   15 = 1759 *શાહ આલમ*
   16 = 1806 *અકબર શાહ*

   17 = 1837 *બહાદુર શાહ ઝફર*
   1857 *મુઘલ વંશનો અંત*
   (શાસનનો સમયગાળો - લગભગ 315 વર્ષ.)

   *બ્રિટિશ રાજ (વાઈસરોય)*
   1 = 1858 *લોર્ડ કેનિંગ*
   2 = 1862 *લોર્ડ જેમ્સ બ્રુસ એલ્ગિન*
   3 = 1864 *લોર્ડ જોન લોરેન્સ*
   4 = 1869 *લોર્ડ રિચાર્ડ મેયો*
   5 = 1872 *લોર્ડ નોર્થબુક*
   6 = 1876 *લોર્ડ એડવર્ડ લેટેનલોર્ડ*
   7 = 1880 *લોર્ડ જ્યોર્જ રિપન*
   8 = 1884 *લોર્ડ ડફરીન*
   9 = 1888 *લોર્ડ હની લેન્સડન*
   10 = 1894 *લોર્ડ વિક્ટર બ્રુસ એલ્ગિન*
   11 = 1899 *લોર્ડ જ્યોર્જ કર્ઝન*
   12 = 1905 *લોર્ડ ટીવી ગિલ્બર્ટ મિન્ટો*
   13 = 1910 *લોર્ડ ચાર્લ્સ હાર્ડિન્જ*
   14 = 1916 *લોર્ડ ફ્રેડરિક સેલ્મ્સફોર્ડ*
   15 = 1921 *લોર્ડ રૂક્સ આઇઝેક રાઇડિંગ*
   16 = 1926 *લોર્ડ એડવર્ડ ઇર્વિન*
   17 = 1931 *લોર્ડ ફ્રીમેન વેલિંગ્ટન*
   18 = 1936 *લોર્ડ એલેક્ઝાન્ડર લિનલિથગો*
   19 = 1943 *લોર્ડ આર્ચીબાલ્ડ વેવેલ*
   20 = 1947 *લોર્ડ માઉન્ટબેટન*

 *અંગ્રેજી શાસનનો લગભગ 90 વર્ષનો અંત આવ્યો.*

   *આઝાદ ભારત, વડાપ્રધાન*
   1 = 1947 *જવાહરલાલ નેહરુ*
   2 = 1964 *ગુલઝારીલાલ નંદા*
   3 = 1964 *લાલ બહાદુર શાસ્ત્રી*
   4 = 1966 *ગુલઝારીલાલ નંદા*
   5 = 1966 *ઇન્દિરા ગાંધી*
   6 = 1977 *મોરારજી દેસાઈ*
   7 = 1979 *ચરણ સિંહ*
   8 = 1980 *ઇન્દિરા ગાંધી*
   9 = 1984 *રાજીવ ગાંધી*
   10 = 1989 *વિશ્વનાથ પ્રતાપ સિંહ*
   11 = 1990 *ચંદ્રશેખર*
   12 = 1991 *પીવી નરસિમ્હા રાવ*
   13 = અટલ બિહારી વાજપેયી હિન્દુ
            રાજની આશા
   14 = 1996 *એચ.ડી.  દેવા ગૌડા*
   15 = 1997 *આઈકે ગુજરાલ*
   16 = 1998 અટલ બિહારી વાજપેયી
                      હિન્દુ રાજની ફરી આશા
   17 = 2004 ડૉ. મનમોહ સિંહ

અહીંથી હિન્દુ રાજ શરૂ
1. શ્રી નરેન્દ્ર મોદી 2014 થી*
 
*764 વર્ષ પછી વિદેશી અને અંગ્રેજોની ગુલામીમાંથી આઝાદી મળી.*

 *ભારત પર લગભગ "800" વર્ષ સુધી મુસ્લિમો દ્વારા શાસન કરવામાં આવ્યું.*
 
 

Tuesday, January 6, 2026

राजसी_देवात्माएँ उपदेवता कहलाती हैं।

राजसी_देवात्माएँ उपदेवता कहलाती हैं। 

यक्ष, गन्धर्व और किन्नर-- ये तीन वर्ग उपदेताओं के हैं। 16 प्रकार के यक्ष- यक्षिणियां हैं। वे स्वयं सुन्दर होते हैं और सौंदर्य के प्रेमी भी होते हैं। मनुष्य के प्रति इनका विशेष आकर्षण होता है। सुन्दर और आकर्षक स्त्री के प्रति यक्षों की रूचि सर्वाधिक होती है। जहाँ सुन्दर, कमनीय, लावण्यमयी स्त्री को देखते हैं, तुरन्त मोहित हो जाते हैं वे उस पर और विभिन्न प्रकार से वे उसकी सहायता करते हैं अदृश्य रूप से। यक्ष लोग अत्यधिक कामुक और रतिप्रिय होते हैं। वे काम-क्रीड़ा और रति-क्रिया के समस्त गूढ़ रहस्यों से परिचित होते हैं। जो कलाकार काम और रति की विभिन्न मुद्राओं का आश्रय लेकर श्रंगारिक मूर्ति या चित्र का निर्माण करते हैं, उनको बराबर अगोचर सहयोग मिलता है यक्षों का।
     जो लोग आत्माकर्षिणी विद्या की सिद्धि को उपलब्ध हैं, उनको तो इस दिशा में भरपूर सहयोग मिलता है यक्षों का। कभी-कभी तो सुन्दर मानव के रूप में भी प्रकट होकर मनुष्यों की सहायता करते हैं। ऐसी ही यक्षिणियां भी होती हैं। वे भी जहाँ सुन्दर, आकर्षक, युवा व्यक्ति को देखती हैं, तुरंत मोहित हो जाती हैं वे। वे भी कामुक और रतिप्रिया होती हैं। उनकी ऑंखें मोरनी जैसी होती हैं। वे पुरुषों से  संपर्क स्थापित करने के लिए सदैव लालायित रहती हैं। जिसने आत्माकर्षिणी विद्या के द्वारा किसी यक्षिणी को सिद्ध कर लिया है, उसकी प्रत्येक कामना को वे पूर्ण करती हैं। लेकिन साधक को इसका मूल्य चुकाना पड़ता है उसकी काम-पिपासा को शान्त करके। कभी-कभी यक्षिणियां भी सशरीर प्रकट हो जाती हैं और इच्छानुसार रूप धारण कर लेती हैं। वास्तव में यक्षिणियां अति रहस्यमयी होती हैं। जो उनके चंगुल और मायाजाल में एक बार फंस गया, उसका फिर शीघ्र मुक्त होना संभव नहीं।
      इस विश्वब्रह्माण्ड में जितने भी प्रकार के प्राणी होते हैं, वे सभी प्राण तथा उसके विभिन्न आयामों द्वारा संचालित होते हैं। जहां तक आत्माओं का सम्बन्ध है, वे स्वयं की नैसर्गिक ऊर्जा द्वारा होती हैं संचालित और उसी के आधार पर इच्छानुसार रूप धारण कर लेती हैं। ऐसी ही आत्माओं को विशुद्ध आत्मा कहते हैं।
     यक्षों में सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इनमें प्राण-शक्ति और आत्म- शक्ति--दोनों का सामंजस्य है। वे जितने देवताओं के निकट हैं, कहीं उससे अधिक निकट हैं वे मनुष्यों के लिए।
     यजन करने वाली जाति को *यक्ष* कहते हैं। हमें यह बात ज्ञात होनी चाहिए कि ब्रह्मा ने सबसे पहले पंचतत्वों में जल की उत्पत्ति की और उसके पश्चात् अन्य प्राणियों का निर्माण किया। जल का अर्थ है--जीवन देने वाला। इसीलिए इसकी सबसे पहले उत्पत्ति की गयी प्राक्काल में। जिन-जिन प्राणियों का निर्माण हुआ था--वे सब मिलकर ब्रह्माजी के पास गए और कहने लगे कि हम सब भूख-प्यास से व्याकुल हैं। ब्रह्मा ने कहा--जल की रक्षा करो। एकमात्र जल ही जीवन है। कालान्तर में जल तत्व द्वारा ही अन्य पदार्थों का निर्माण होगा, इसलिए उसकी रक्षा करो। 
     यह सुनकर उन समस्त प्राणियों में से अधिकाँश बोल उठे--'वयं रक्षामः' (हम रक्षा करेंगे) और उनमें से कुछ बोल उठे--'वयं यक्षामः' (हम यजन करेंगे अर्थात् यज्ञ करेंगे)। 'वयं रक्षामः' बोलने वाले रक्ष संस्कृति के कारण आगे चल कर राक्षस या दानव कहलाये और 'वयं यक्षामः' कहने वाले यक्ष संस्कृति (यज्ञ-याग) के फलस्वरूप कहलाये--यक्ष। इस प्रकार हम देखते हैं कि मूल रूप से एक समय दो ही जातियां थीं। एक थी--यक्ष और दूसरी थी राक्षस। यक्ष ही आगे चलकर आर्यावर्त में मनु की सन्तान होने के फलस्वरूप मानव कहलाये। इस तरह पृथ्वी पर दानव और मानव दो प्रकार के शरीरधारी प्राणी बने सर्वप्रथम। मानव में प्रकृति प्रदत्त 'मन' की प्रधानता है-इसीलिए उसे मनुष्य कहा गया। जबकि दानव में है बुद्धि चातुर्य की प्रधानता। अग्नि पुराण के अनुसार यक्षों की उत्पत्ति प्रचेता अर्थात् वरुण से हुई। इसलिए जलतत्व का प्रतीक वरुण है। जलतत्व व्यापक काम की स्थिति है और यही कारण है कि यक्ष-यक्षिणियां अत्यधिक कामातुर और कामाचारी होते हैं। मनुष्य से सौ गुना अधिक कामाचारी होते हैं--यक्ष-यक्षिणियां।