Wednesday, August 1, 2018

पाराशरी सिद्धांत क्या है?

पाराशरी सिद्धांत क्या है?

लघुपाराशरी एक ऐसा ग्रन्थ है जिसके बिना फलित ज्योतिष का ज्ञान अधूरा है। पाराशरी सिद्धांतों का लघुपाराशरी में वर्णन किया गया है। संस्कृत श्लोकों में रचित लघु ग्रन्थ लघुपाराशरी में फलित ज्योतिष संबंधी सिद्धांतों का वर्णन है और ये 42 सूत्रों के माध्यम से वर्णित है। एक-एक सूत्र अपने आप में अमूल्य है, इसे 'जातकचन्द्रिका'  "उडुदाय प्रदीप" भी कहा जाता है। यह विंशोत्तरी दशा पद्धति का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है तथा वृहद् पाराशर होराशास्त्र पर आधारित है। फलित ज्योतिष विद्या के महासागर रुपी ज्ञान को अर्जित करने के लिए पाराशर सिद्धांतों पर आधारित लघुपाराशरी एक बहुमूल्य साधन सिद्ध हो सकती है। इस पुस्तक का कोई एक लेखक नहीं है। यह पुस्तक पाराशरी सिद्धांत को मानने वाले महर्षि पाराशर,  उनके अनुयायियों, प्रकांड विद्वानों द्वारा सामूहिक रूप से सम्पादित है।

फलित ज्योतिष पर आधारित इस ग्रंथ के आधार में कई बडे ग्रंथों की रचना की गई। फलित ज्योतिष पर आधारित इस ग्रन्थ को अधिकतम ज्योतिषी भविष्यवाणी करने के लिए प्रयोग में लाते हैं। इस ग्रंथ में मूलतः पाराशर सिद्धांतों के 42 सूत्रों में नौ ग्रहों की विविध भावों में उपस्थिति, ग्रहों की मित्रता, शत्रुता अथवा सम होना, ग्रहों की पूर्ण व आंशिक दृष्टियों का उल्लेख, भाव, कारकों, दशाओं, राजयोग, मृत्यु योग सहित भावानुसारी फलादेश आदि पर वर्णन किया गया है।

क्‍या कहता है ज्‍योतिष शास्त्र -

ज्‍योतिष शास्त्र के अनुसार, बारह राशियां होती है और हर राशि वाले व्यक्ति की कुंडली में बारह भाव होते हैं जो नौ ग्रहों की दशा से प्रभावित होते हैं। सात मुख्य ग्रहों सूर्य, चन्द्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि के साथ-साथ 2 और ग्रहों राहु और केतु का कुंडली में बहुत ख़ास स्थान होता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, हर व्यक्ति की कुंडली में मारक और कारक दशा होती है जो ग्रहों के कारण बनती है। ऐसी ही एक दशा मारकेश है जो ग्रहों के कारण बनती है। मारकेश सिद्धांतों को संक्षिप्त में पराशर सिद्धांत्तों का आधार बताया जाता है।

लघुपाराशरी में 42 सूत्र या श्लोक हैं जो पाँच अध्यायों में विभक्त हैं।

1. संज्ञाध्याय
2. योगाध्याय
3. आयुर्दायाध्याय
4. दशाफलाध्याय
5. शुभाशुभग्रहकथनाध्याय

पाराशरी संहिता में निहित मूलभूत सिद्धांतों का वर्णन और शुभ फलों की प्राप्ति के कारक :

• जब किसी व्यक्ति की कुंडली में ग्रह एक-दूसरे की राशि में होते हैं तो शुभ फल प्राप्त होते है।
• जब किसी व्यक्ति की कुंडली में ग्रह एक-दूसरे से दृष्टि संबंध में हो तो शुभ फल प्राप्त होते है।
• कुंडली में ग्रहों की परस्पर युति होने पर शुभ फल प्राप्त होते हैं।
• कुंडली में एक ग्रह दूसरे ग्रह को संदर्भित करता हो तो शुभ फल प्राप्त होते हैं।

इन स्थितियों में होती है शुभ फलों की प्राप्ति असंभव -

महर्षि पाराशर मूलभूत सिद्धांतों के आधार पर शुभ फलों की प्राप्ति के कारको में कुछ ऐसी बाधाओं का भी वर्णन है जिसके रहते शुभ फलों की प्राप्ति असंभव हो जाती है। उन बाधाओं का वर्णन नीचे दिया गया है।

• नैसर्गिक शुभ ग्रह केंद्राधिपत्य रूप से दोषी न हो।
• गुरु, मंगल, शनि तथा बुध ग्रहों की दूसरी राशि दुष्ट स्थानों में न हो।
• पूर्व वर्णित चारों ही स्थितियों में ग्रहों की युति किसी अन्य पापी या क्रूर ग्रह से न हो।
• ग्रह शत्रु गृही, नीचस्तंगत या पाप कर्तरी स्थिति में न हो।
• ग्रहों को पाप मध्यत्व न प्राप्त हो।

पाराशर सिद्धांतों के 42 सूत्रों का वर्णन:

1. फल कहते हैं- नक्षत्रों की दशा के अनुसार ही शुभ-अशुभ फल कहते हैं। इस ग्रंथ के अनुसार फल कहने में विंशोत्तरी दशा ही ग्रहण करनी चाहिए। अष्टोत्तरी दशा यहां ग्राह्य नहीं है।
2. ज्योतिष शास्त्र- सामान्य ग्रंथों पर से भाव, राशि इत्यादि की जानकारी ज्योतिष शास्त्रों से जाननी चाहिए। इस ग्रंथ में जो विरोध संज्ञा है वह शास्त्रम के अनुरोध से कहते हैं।
3. ग्रह का स्थान- सभी ग्रह जिस स्थान पर बैठे हों, उससे सातवें स्थान को देखते हैं। शनि तीसरे व दसवें, गुरु नवम व पंचम तथा मंगल चतुर्थ व अष्टम स्थान को विशेष देखते हैं।
4. त्रिषडाय के स्‍वामी- कोई भी ग्रह त्रिकोण का स्वामी होने पर शुभ फलदायक होता है। (लगन, पंचम और नवम भाव को त्रिकोण कहते हैं) तथा त्रिषडाय का स्वामी हो तो पाप फलदायक होता है (तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव को त्रिषडाय कहते हैं।)
5. त्रिषडाय को अशुभ फल - सिद्धांत 4 में निहित स्थिति के बावजूद त्रिषडाय के स्वामी अगर त्रिकोण के भी स्वामी हो तो अशुभ फल ही आते हैं।
6. सौम्या ग्रह (बुध, गुरु, शुक्र और पूर्ण चंद्र) यदि केन्द्रों के स्वामी हो तो शुभ फल नहीं देते हैं।
7. क्रूर ग्रह (रवि, शनि, मंगल, क्षीण चंद्र और पापग्रस्तय बुध) यदि केन्द्र के अधिपति हो तो वे अशुभ फल नहीं देते हैं। ये अधिपति भी उत्तरोतर क्रम में बली हैं। (यानी चतुर्थ भाव से सातवां भाव अधिक बली, तीसरे भाव से छठा भाव अधिक बली)
8. स्व स्थान ना होने पर रिजल्‍ट- लग्‍न से दूसरे अथवा बारहवें भाव के स्वामी दूसरे ग्रहों के सहचर्य से शुभ अथवा अशुभ फल देने में सक्षम होते हैं। इसी प्रकार अगर वे स्व स्थान पर होने के बजाय अन्य भावों में हो तो उस भाव के अनुसार फल देते हैं। (इन भावों के अधिपतियों का खुद का कोई आत्मनिर्भर रिजल्ट नहीं होता है।)
9. लग्नेश होने पर शुभ फल- आठवां भाव नौंवे भाव से बारहवें स्थान पर पड़ता है, अत: शुभफलदायी नहीं होता है। यदि लग्नेश भी हो तभी शुभ फल देता है (यह स्थिति केवल मेष और तुला लग्न में आती है)
10. केन्द्राधिपति ग्रह- शुभ ग्रहों के केन्द्राधिपति होने के दोष गुरु और शुक्र के संबंध में विशेष हैं। ये ग्रह केन्द्राधिपति होकर मारक स्थान (दूसरे और सातवें भाव) में हो या इनके अधिपति हो तो बलवान मारक बनते हैं।
11. सूर्य और चंद्रमा को अष्टमेश दोष नहीं- केन्द्राधिपति दोष शुक्र की तुलना में बुध का कम और बुध की तुलना में चंद्र का कम होता है। इसी प्रकार सूर्य और चंद्रमा को अष्टमेश होने का दोष नहीं लगता है।
12. मंगल दशमेश होने से देगा अशुभ फल - मंगल दशम भाव का स्वामी हो तो शुभ फल देता है। किंतु यही त्रिकोण का स्वामी भी हो तभी शुभफलदायी होगा। केवल दशमेश होने से नहीं देगा। (यह स्थिति केवल कर्क लग्‍न में ही बनती है)
13. राहु और केतु जिन-जिन भावों में बैठते हैं, अथवा जिन-जिन भावों के अधिपतियों के साथ बैठते हैं तब उन भावों अथवा साथ बैठे भाव अधिपतियों के द्वारा मिलने वाले फल ही देंगे। (यानी राहु और केतु जिस भाव और राशि में होंगे अथवा जिस ग्रह के साथ होंगे, उसके फल देंगे)। फल भी भावों और अधिपतियों के मुताबिक होगा।
14. केन्द्राधिपति और त्रिकोणाधिपति - ऐसे केन्द्राधिपति और त्रिकोणाधिपति जिनकी अपनी दूसरी राशि भी केन्द्र और त्रिकोण को छोड़कर अन्य स्थानों में नहीं पड़ती हो, तो ऐसे ग्रहों के संबंध विशेष योगफल देने वाले होते हैं।
15. बलवान त्रिकोण और केन्द्र के अधिपति खुद दोषयुक्त हों, लेकिन आपस में संबंध बनाते हैं तो ऐसा संबंध योगकारक होता है।
16. धर्म और कर्म स्थान के स्वामी अपने-अपने स्थानों पर हों अथवा दोनों एक दूसरे के स्थानों पर हों तो वे योगकारक होते हैं। यहां कर्म स्थान दसवां भाव है और धर्म स्थान नवम भाव है। दोनों के अधिपतियों का संबंध योगकारक बताया गया है।
17. राजयोग कारक - नवम और पंचम स्थान के अधिपतियों के साथ बलवान केन्द्राधिपति का संबंध शुभफलदायक होता है। इसे राजयोग कारक भी बताया गया है।
18. योगकारक ग्रहों (यानी केन्द्र और त्रिकोण के अधिपतियों) की दशा में बहुधा राजयोग की प्राप्ति होती है। योगकारक संबंध रहित ऐसे शुभ ग्रहों की दशा में भी राजयोग का फल मिलता है।
19. योगज फल - योगकारक ग्रहों से संबंध करने वाला पापी ग्रह अपनी दशा में तथा योगकारक ग्रहों की अंतरदशा में जिस प्रमाण में उसका स्वयं का बल है, तदानुसार वह योगज फल देगा। (यानी पापी ग्रह भी एक कोण से राजयोग में कारकत्व की भूमिका निभा सकता है।)
20. यदि एक ही ग्रह केन्द्र व त्रिकोण दोनों का स्वामी हो तो योगकारक होता ही है। उसका यदि दूसरे त्रिकोण से संबंध हो जाए तो उससे बड़ा शुभ योग क्या हो सकता है।
21. राहु अथवा केतु यदि केन्द्र या त्रिकोण में बैठे हों और उनका किसी केन्द्र अथवा त्रिकोणाधिपति से संबंध हो तो वह योगकारक होता है।
22. राजयोग भंग - धर्म और कर्म भाव के अधिपति यानी नवमेश और दशमेश यदि क्रमश: अष्टमेश और लाभेश हों तो इनका संबंध योगकारक नहीं बन सकता है। (उदाहरण के तौर पर मिथुन लग्‍न) । इस स्थिति को राजयोग भंग भी मान सकते हैं।
23. मारक स्थान - राजयोग भंग जन्म स्थान से अष्टम स्थान को आयु स्थान कहते हैं। और इस आठवें स्थान से आठवां स्थान आयु की आयु है अर्थात लग्‍न से तीसरा भाव। दूसरा भाव आयु का व्यय स्थान कहलाता है। अत: द्वितीय एवं सप्तम भाव मारक स्थान माने गए हैं।
24. जातक की मृत्यु - द्वितीय एवं सप्ताम मारक स्थानों में द्वितीय स्थान सप्तम की तुलना में अधिक मारक होता है। इन स्थानों पर पाप ग्रह हो और मारकेश के साथ युक्ति कर रहे हों तो उनकी दशाओं में जातक की मृत्यु होती है।
25. मृत्यु का संकेत- यदि उनकी दशाओं में मृत्यु की आशंका न हो तो सप्तमेश और द्वितीयेश की दशाओं में मृत्यु होती है।
26. मारकत्व गुण - मारक ग्रहों की दशाओं में मृत्यु ना होती हो तो कुण्डली में जो पापग्रह बलवान हो उसकी दशा में मृत्यु होती है। व्ययाधिपति की दशा में मृत्यु न हो तो व्ययाधिपति से संबंध करने वाले पापग्रहों की दशा में मरण योग बनेगा। व्ययाधिपति का संबंध पापग्रहों से न हो तो व्ययाधिपति से संबंधित शुभ ग्रहों की दशा में मृत्यु् का योग बताना चाहिए। ऐसा समझना चाहिए। व्ययाधिपति का संबंध शुभ ग्रहों से भी न हो तो जन्म लग्‍न से अष्टम स्थान के अधिपति की दशा में मरण होता है। अन्यथा तृतीयेश की दशा में मृत्यु होगी। (मारक स्थानाधिपति से संबंधित शुभ ग्रहों को भी मारकत्व का गुण प्राप्त होता है।)
27. मारक ग्रहों की दशा में मृत्यु न आए तो कुण्डली में जो बलवान पापग्रह हैं उनकी दशा में मृत्यु की आशंका होती है। ऐसा विद्वानों को मारक कल्पित करना चाहिए।
28. शनि ग्रह- पापफल देने वाला शनि जब मारक ग्रहों से संबंध करता है तब पूर्ण मारकेशों को अतिक्रमण कर नि: संदेह मारक फल देता है। इसमें संशय नहीं है।
29. शुभ अथवा अशुभ फल - सभी ग्रह अपनी अपनी दशा और अंतरदशा में अपने भाव के अनुरूप शुभ अथवा अशुभ फल प्रदान करते हैं। (सभी ग्रह अपनी महादशा की अपनी ही अंतरदशा में शुभफल प्रदान नहीं करते)
30. दशानाथ जिन ग्रहों के साथ संबंध करता हो और जो ग्रह दशानाथ सरीखा समान धर्म हो, वैसा ही फल देने वाला हो तो उसकी अंतरदशा में दशानाथ स्वंय की दशा का फल देता है।
31. दशानाथ के संबंध रहित तथा विरुद्ध फल देने वाले ग्रहों की अंतरदशा में दशाधिपति और अंतरदशाधिपति दोनों के अनुसार दशाफल कल्पना करके समझना चाहिए। (विरुद्ध व संबंध रहित ग्रहों का फल अंतरदशा में समझना अधिक महत्वपूर्ण है)
32. केन्द्र का स्वामी और त्रिकोणेश - केन्द्र का स्वामी अपनी दशा में संबंध रखने वाले त्रिकोणेश की अंतरदशा में शुभफल प्रदान करता है। त्रिकोणेश भी अपनी दशा में केन्द्रेश के साथ यदि संबंध बनाए तो अपनी अंतरदशा में शुभफल प्रदान करता है। यदि दोनों का परस्पर संबंध न हो तो दोनों अशुभ फल देते हैं।
33. राज्याधिकार से प्रसिद्धि- यदि मारक ग्रहों की अंतरदशा में राजयोग आरंभ हो तो वह अंतरदशा मनुष्य को उत्तरोतर राज्याधिकार से केवल प्रसिद्ध कर देती है। पूर्ण सुख नहीं दे पाती है।
34. राज्य से सुख और प्रतिष्ठा - अगर राजयोग करने वाले ग्रहों के संबंधी शुभग्रहों की अंतरदशा में राजयोग का आरंभ हो तो राज्य से सुख और प्रतिष्ठा बढ़ती है। राजयोग करने वाले से संबंध न करने वाले शुभग्रहों की दशा प्रारंभ हो तो फल सम होते हैं। फलों में अधिकता या न्यूनता नहीं दिखाई देगी। जैसा है वैसा ही बना रहेगा।
35. योगकारक ग्रहों के साथ संबंध करने वाले शुभग्रहों की महादशा के योगकारक ग्रहों की अंतरदशा में योगकारक ग्रह योग का शुभफल देते हैं।
36. राजयोग रहित शुभग्रह - राहु केतू यदि केन्द्र (विशेषकर चतुर्थ और दशम स्थान में) अथवा त्रिकोण में स्थित होकर किसी भी ग्रह के साथ संबंध नहीं करते हो तो उनकी महादशा में योगकारक ग्रहों की अंतरदशा में उन ग्रहों के अनुसार शुभयोगकारक फल देते हैं। (यानी शुभारुढ़ राहु केतु शुभ संबंध की अपेक्षा नहीं रखते। बस वे पाप संबंधी नहीं होने चाहिए तभी कहे हुए अनुसार फलदायक होते हैं।) राजयोग रहित शुभग्रहों की अंतरदशा में शुभफल होगा, ऐसा समझना चाहिए।
37. महादशा के स्वामी - यदि महादशा के स्वामी पापफलप्रद ग्रह हों तो उनके असंबंधी शुभग्रह की अंतरदशा पापफल ही देती है। उन महादशा के स्वामी पापी ग्रहों के संबंधी शुभग्रह की अंतरदशा मिश्रित (शुभ एवं अशुभ) फल देती है।
38. पापी दशाधिप से असंबंधी योगकारक ग्रहों की अंतरदशा अत्यंत पापफल देने वाली होती है।
39. मारक ग्रहों की महादशा में उनके साथ संबंध करने वाले शुभ ग्रहों की अंतरदशा में दशानाथ मारक नहीं बनता है। परन्तु उसके साथ संबंध रहित पापग्रह अंतरदशा में मारक बनते हैं।
40. शुक्र और शनि अपनी-अपनी महादशा और अंतरदशा में शुभ फल देते हैं। यानि शनि महादशा में शुक्र की अंतरदशा हो तो शनि के फल मिलेंगे। शुक्र की महादशा में शनि के अंतर में शुक्र के फल मिलेंगे। इस फल के लिए दोनों ग्रहों के आपसी संबंध की अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए।
41. दशम स्थान का स्‍वामी लग्‍न में और लग्‍न का स्वामी दशम में, ऐसा योग हो तो वह राजयोग समझना चाहिए। इस योग पर विख्यात और विजयी ऐसा मनुष्य होता है।
42. नवम स्थान का स्वामी दशम में और दशम स्थान का स्वामी नवम में हो तो ऐसा योग राजयोग होता है। इस योग पर विख्यात और विजयी पुरुष होता है।

Wednesday, March 28, 2018

सप्तमस्थ ग्रह एवं विवाह विलम्ब योग

सप्तमस्थ ग्रह एवं विवाह विलम्ब योग

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा|
तद्दद्द्वेदांग शास्त्राणां ज्योतिषं मूर्घिनिसं||
जैसे मयूरों के शिखा और नागों का मणि
शिरोभूषण है वैसे ही वेदाग शास्त्रों
(शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरक्त, छन्द और
ज्योतिष) में ज्योतिष शिरोभूषण है|
मानव जीवन की प्रत्येक निमिष को किसी
न किसी का अनुग्रह प्राप्त है|
इस अनिवार्य अनुभव को शब्द सम्भव और
विवेक सम्मत बनाकर भारतीय ऋषि मुनियों
ने जन्मांक चक्र की परिकल्पना की नन्मंक
चक्र का प्रत्येक भाव कुछ विशिष्ट तथ्यों
का नइयामन करता है| सप्त भाव जन्मांक
चक्र का मध्यवर्ती भाव है शत्रु भाव में क्रूर
सम्पुट में स्थित यह भाव काम कलित तथा
वासना वलयित भावों अनुभवों संबंधों
रहस्यों की वैकृतिक स्मिता और
सामाजिकता की विवेचना का मूल स्थान
है|
एक नजर सप्तमस्थ ग्रहों पर डालें-
सूर्य
स्त्रीभिःगतः परिभवः मदगे पतंगे (आचार्य
वराहमिहिर)
जिसके जन्म समय में लग्न से सप्तम में सूर्य
स्थित हो तो इसमें स्त्रियों का तिरस्कार
प्राप्त होता है| सूर्य की सप्तम भाव में
स्थिति सर्वाधिक वैवाहिक जीवन एवं
चरित्र को प्रभावित करता है| सूर्य
अग्निप्रद ग्रह होता है|जिसके कारण जातक
के विवेक तथा वासना पर कोई नियंत्रण नहीं
रह जाता है|
चन्द्रमा
सौम्यो ध्रिश्यः सुखितः सुशरीररः
कामसंयुतोद्दूने|
दैन्यरुगादित देहः कृष्णे संजायते शशिनि||
-(चमत्कार चिन्तामणि)
सप्तम भाव मे चन्द्रमा हो तो मनुष्य नम्र
विनय से वश में आने वाला सुखी सुन्दर और
कामुक होता है और चन्द्र यदि हीन वाली
हो तो मनुष्य दीन और रोगी होता है|
भौम
स्त्रियाँ दारमरणं नीचसेवनं नीच स्त्री संगमः|
कुजेतिसुस्तनी कठिनोर्ध्व कुचा||
-(पराशर)
सप्त्मस्थ मंगल की स्थिति प्रायः आचार्यों
ने कष्ट कर बताया सप्तम भाव में भौम होने से
पत्नी की मृत्यु होती है| नीच स्त्रियों से
कामानल शांत करता है| स्त्री के स्तन उन्नत
और कठिन होते हैं| जातक शारीरिक दृष्टि
से प्रायः क्षीण, रुग्ण, शत्रुवों से आक्रांत
तथा चिंताओं में लीं रहता है|
बुध
बुधे दारागारं गतवति यदा यस्य जनने|
त्वश्यं शैथिल्यं कुसुमशररगोत्सविधौ||
मृगाक्षिणां भर्तुः प्रभवति यदार्केणरहिते|
तदा कांतिश्चंचत् कनकस द्रिशीमोहजननी||
-(जातक परिजात)
जिस मनुष्य के जन्म समय मे बुध सप्तम भाव मे
हो वह सम्भोग में अवश्य शिथिल होता है|
उसका वीर्य निर्बल होता है| वह अत्यन्त
सुन्दर और मृगनैनी स्त्री का स्वामी होता है
यदि बुध अकेला हो तो मन को मोहित करने
वाली सुवर्ण के समान देदीप्यमान कान्ति
होती है|
जीव
शास्त्राभ्यासीनम्र चितो विनीतः
कान्तान्वितात्यंतसंजात सौष्ठयः|
मन्त्री मर्त्यः काव्यकर्ता प्रसूतो जायाभावे
देवदेवाधिदेवः|
जिस जातक के जन्म समय में जीव सप्तम भाव
में स्थित हो वह स्वभाव से नम्र होता है|
अत्यन्त लोकप्रिय और चुम्बकीय व्यक्ति
का स्वामी होता है उसकी भार्या सत्य
अर्थों में अर्धांगिनी सिद्ध होती है तथा
विदुषी होती है| इसे स्त्री और धन का सुख
मिलता है| यह अच्छा सलाहकार और काव्य
रचना कुशल होता है|
शुक्र
भवेत किन्नरः किन्नराणां च मध्ये||
स्वयं कामिनी वै विदेशे रतिः स्यात्|
यदा शुक्रनामा गतः शुक्रभूमौ||
(चमत्कारचिंतामणि)
जिस जातक के जन्म समय में शुक्र सप्तम भाव
हो उसकी स्त्री गोरे रंग की श्रेष्ठ होती है|
जातक को स्त्री सुखा मिलता है गान
विद्द्या में निपुण होता है, वाहनों से युक्त
कामुक एवं परस्त्रियों में आसक्त होता है
विवाह का कारक ग्रह शुक्र है| सिद्धांत के
तहत कारक ग्रह कारक भाव के अंतर्गत हो तो
स्थिति को सामान्य नहीं रहने देता है
इसलिए सप्तम भाव में शुक्र दाम्पत्य जीवन में
कुछ अनियमितता उत्पन्न करता है ऐसे जातक
का विवाह प्रायः चर्चा का विषय बनता
है|
शनि
शरीरदोषकरः कृशकलत्रः वेश्या संभोगवान् अति
दुःखी|
उच्चस्वक्षेत्रगते अनेकस्त्रीसंभोगी कुजयुतेशिश्न
चुंवन परः||
-(भृगु संहिता)
सप्तम भाव में शनि का निवास किसी
प्रकार से शुभ या सुखद नहीं कहा जा सकता
है| सप्तम भाव में शनि होने से जातक का
शरीर दोष युक्त रहता है| (दोष का तात्पर्य
रोग से है) उसकी पत्नी क्रिश होती है
जातक वेश्यागामी एवं दुखी होता है| यदि
शनि उच्च गृही या स्वगृही हो तो जातक
अनेक स्त्री का उपभोग करता है यदि शनि
भौम से युक्त हो तो स्त्री अत्यन्त कामुक
होती है उसका विवाह अधिक उम्र वाली
स्त्री के साथ होता है|
राहु
प्रवासात् पीडनं चैवस्त्रीकष्टं पवनोत्थरुक्|
कटि वस्तिश्च जानुभ्यां सैहिकेये च सप्तमे||
-(भृगु सूत्र)
जिस जातक के जन्म समय मे राहु सप्तम
भावगत हो तो उसके दो विवाह होते हैं|
पहली स्त्री की मृत्यु होती है दूसरी स्त्री
को गुल्म रोग, प्रदर रोग इत्यादि होते हैं| एवं
जातक क्रोधी, दूसरों का नुकसान करने
वाला, व्यभिचारी स्त्री से सम्बन्ध रखने
वाला गर्बीला और असंतुष्ट होता है|
केतु
द्दूने च केतौ सुखं नैव मानलाभो वतादिरोगः|
न मानं प्रभूणां कृपा विकृता च भयं वैरीवर्गात्
भवेत् मानवानाम्|
-(भाव कौतुहल)
यदि सप्तम भाव में केतु हो तो जातक का
अपमान होता है| स्त्री सुख नहीं मिलता
स्त्री पुत्र आदि का क्लेश होता है| खर्च
की वृद्धि होती है रजा की अकृपा शत्रुओं
का डर एवं जल भय बना रहता है| वह जातक
व्यभिचारी स्त्रियों में रति करता है|
वैवाहिक विलम्ब के योग-
विवाह एक संश्लिष्ट और बाहू आयामी
संस्कार है| इसके सम्बन्ध में किसी प्रकार के
फल के लिए विस्तृत एवं धैर्यपूर्व अध्ययन मनन-
चिंतन की अनिवार्यता होती है किसी
जातक के जन्मांग से विवाह संबंधित ज्ञान
प्राप्ति के लिए द्द्वितीय, पंचम, सप्तम एवं
द्वादश भावों का विश्लेषण करना चाहिए|
आज के वर्तमान समय में कन्याओं का विवाह
विशेष रूप से समस्या पूर्ण बन गया है|
अनेकानेक कन्याओं की वरमाला उनके हाथों
ही मुरझा जाती है अर्थात उनका परिणय
तब सम्पन्न होता है जब उनके जीवन का
ऋतुराज पत्र पात के प्रतीक्षा में तिरोहित
हो जाता है वैवाहिक विलम्ब के अनेक
कारण हो सकते हैं| जैसे आर्थिक विषमता,
शिक्षा की स्थिति, शारीरिक संयोजन,
मानसिक संस्कार, ग्रहों की स्थिति
इत्यादि| आइये हम ज्योतिष का माध्यम से
कुछ योगों का अध्ययन चिंतन करें-
१. शनि और मंगल यदि लग्न में या नवांश लग्न
से सप्तमस्थ हो तो विवाह नहीं होता
विशेषतः लग्नेश और सप्तमेश के बलहीन होने
पर|
२. यदि मंगल और शनी, शुक्र और चन्द्रमा से
सप्तमस्थ हो तब विवाह विलम्ब से होता है|
३. शनि और मंगल यदि षष्ठ और अष्टम भावगत
हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है|
४. यदि शनि और मंगल में से कोई भी ग्रह
द्वितीयेश अथवा सप्तमेश हो और एक दुसरे से
दृष्ट से तो विवाह में विलम्ब होता है|
५. यदि लग्न, सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र
स्थिर राशिगत हों एवं चन्द्रमा चर राशि में
हो तो विवाह विलम्ब से होता है|
६. यदि द्वितीय भाव में कोई वक्री ग्रह
स्थित हो या द्वितीयेश स्वयं वक्री हो तो
भी विवाह में विलम्ब होता है|
७. यदि द्वितीय भाव पापग्रस्त हो तथा
द्वितीयेश द्वादश्थ हो तब भी विवाह
विलम्ब से होता है|
८. पुरुषों की कुण्डली में सूर्य मंगल अथवा
चन्द्र शुक्र की सप्तम भाव की स्थिति यदि
पापाक्रांत हो तो भी विवाह में विलम्ब
होता है|
९. राहू और शुक्र के लग्नस्थ होने पर भी
विवाह में विलम्ब होता है|
१०. यदि सप्तम बी हव का स्वामी त्रिक
(६,८,१२) भाव में स्थित या त्रिक भाव का
स्वामी सप्तम भाव में स्थित हो तो विवाह
में अत्यन्त विलम्ब होता है|
११. यदिलाग्नेश और शुक्र वन्ध्या राशिगत
हो (मिथुन, सिंह,कन्या एवं धनु)तो भी
विवाह में विलम्ब होया है|