Wednesday, March 28, 2018

सप्तमस्थ ग्रह एवं विवाह विलम्ब योग

सप्तमस्थ ग्रह एवं विवाह विलम्ब योग

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा|
तद्दद्द्वेदांग शास्त्राणां ज्योतिषं मूर्घिनिसं||
जैसे मयूरों के शिखा और नागों का मणि
शिरोभूषण है वैसे ही वेदाग शास्त्रों
(शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरक्त, छन्द और
ज्योतिष) में ज्योतिष शिरोभूषण है|
मानव जीवन की प्रत्येक निमिष को किसी
न किसी का अनुग्रह प्राप्त है|
इस अनिवार्य अनुभव को शब्द सम्भव और
विवेक सम्मत बनाकर भारतीय ऋषि मुनियों
ने जन्मांक चक्र की परिकल्पना की नन्मंक
चक्र का प्रत्येक भाव कुछ विशिष्ट तथ्यों
का नइयामन करता है| सप्त भाव जन्मांक
चक्र का मध्यवर्ती भाव है शत्रु भाव में क्रूर
सम्पुट में स्थित यह भाव काम कलित तथा
वासना वलयित भावों अनुभवों संबंधों
रहस्यों की वैकृतिक स्मिता और
सामाजिकता की विवेचना का मूल स्थान
है|
एक नजर सप्तमस्थ ग्रहों पर डालें-
सूर्य
स्त्रीभिःगतः परिभवः मदगे पतंगे (आचार्य
वराहमिहिर)
जिसके जन्म समय में लग्न से सप्तम में सूर्य
स्थित हो तो इसमें स्त्रियों का तिरस्कार
प्राप्त होता है| सूर्य की सप्तम भाव में
स्थिति सर्वाधिक वैवाहिक जीवन एवं
चरित्र को प्रभावित करता है| सूर्य
अग्निप्रद ग्रह होता है|जिसके कारण जातक
के विवेक तथा वासना पर कोई नियंत्रण नहीं
रह जाता है|
चन्द्रमा
सौम्यो ध्रिश्यः सुखितः सुशरीररः
कामसंयुतोद्दूने|
दैन्यरुगादित देहः कृष्णे संजायते शशिनि||
-(चमत्कार चिन्तामणि)
सप्तम भाव मे चन्द्रमा हो तो मनुष्य नम्र
विनय से वश में आने वाला सुखी सुन्दर और
कामुक होता है और चन्द्र यदि हीन वाली
हो तो मनुष्य दीन और रोगी होता है|
भौम
स्त्रियाँ दारमरणं नीचसेवनं नीच स्त्री संगमः|
कुजेतिसुस्तनी कठिनोर्ध्व कुचा||
-(पराशर)
सप्त्मस्थ मंगल की स्थिति प्रायः आचार्यों
ने कष्ट कर बताया सप्तम भाव में भौम होने से
पत्नी की मृत्यु होती है| नीच स्त्रियों से
कामानल शांत करता है| स्त्री के स्तन उन्नत
और कठिन होते हैं| जातक शारीरिक दृष्टि
से प्रायः क्षीण, रुग्ण, शत्रुवों से आक्रांत
तथा चिंताओं में लीं रहता है|
बुध
बुधे दारागारं गतवति यदा यस्य जनने|
त्वश्यं शैथिल्यं कुसुमशररगोत्सविधौ||
मृगाक्षिणां भर्तुः प्रभवति यदार्केणरहिते|
तदा कांतिश्चंचत् कनकस द्रिशीमोहजननी||
-(जातक परिजात)
जिस मनुष्य के जन्म समय मे बुध सप्तम भाव मे
हो वह सम्भोग में अवश्य शिथिल होता है|
उसका वीर्य निर्बल होता है| वह अत्यन्त
सुन्दर और मृगनैनी स्त्री का स्वामी होता है
यदि बुध अकेला हो तो मन को मोहित करने
वाली सुवर्ण के समान देदीप्यमान कान्ति
होती है|
जीव
शास्त्राभ्यासीनम्र चितो विनीतः
कान्तान्वितात्यंतसंजात सौष्ठयः|
मन्त्री मर्त्यः काव्यकर्ता प्रसूतो जायाभावे
देवदेवाधिदेवः|
जिस जातक के जन्म समय में जीव सप्तम भाव
में स्थित हो वह स्वभाव से नम्र होता है|
अत्यन्त लोकप्रिय और चुम्बकीय व्यक्ति
का स्वामी होता है उसकी भार्या सत्य
अर्थों में अर्धांगिनी सिद्ध होती है तथा
विदुषी होती है| इसे स्त्री और धन का सुख
मिलता है| यह अच्छा सलाहकार और काव्य
रचना कुशल होता है|
शुक्र
भवेत किन्नरः किन्नराणां च मध्ये||
स्वयं कामिनी वै विदेशे रतिः स्यात्|
यदा शुक्रनामा गतः शुक्रभूमौ||
(चमत्कारचिंतामणि)
जिस जातक के जन्म समय में शुक्र सप्तम भाव
हो उसकी स्त्री गोरे रंग की श्रेष्ठ होती है|
जातक को स्त्री सुखा मिलता है गान
विद्द्या में निपुण होता है, वाहनों से युक्त
कामुक एवं परस्त्रियों में आसक्त होता है
विवाह का कारक ग्रह शुक्र है| सिद्धांत के
तहत कारक ग्रह कारक भाव के अंतर्गत हो तो
स्थिति को सामान्य नहीं रहने देता है
इसलिए सप्तम भाव में शुक्र दाम्पत्य जीवन में
कुछ अनियमितता उत्पन्न करता है ऐसे जातक
का विवाह प्रायः चर्चा का विषय बनता
है|
शनि
शरीरदोषकरः कृशकलत्रः वेश्या संभोगवान् अति
दुःखी|
उच्चस्वक्षेत्रगते अनेकस्त्रीसंभोगी कुजयुतेशिश्न
चुंवन परः||
-(भृगु संहिता)
सप्तम भाव में शनि का निवास किसी
प्रकार से शुभ या सुखद नहीं कहा जा सकता
है| सप्तम भाव में शनि होने से जातक का
शरीर दोष युक्त रहता है| (दोष का तात्पर्य
रोग से है) उसकी पत्नी क्रिश होती है
जातक वेश्यागामी एवं दुखी होता है| यदि
शनि उच्च गृही या स्वगृही हो तो जातक
अनेक स्त्री का उपभोग करता है यदि शनि
भौम से युक्त हो तो स्त्री अत्यन्त कामुक
होती है उसका विवाह अधिक उम्र वाली
स्त्री के साथ होता है|
राहु
प्रवासात् पीडनं चैवस्त्रीकष्टं पवनोत्थरुक्|
कटि वस्तिश्च जानुभ्यां सैहिकेये च सप्तमे||
-(भृगु सूत्र)
जिस जातक के जन्म समय मे राहु सप्तम
भावगत हो तो उसके दो विवाह होते हैं|
पहली स्त्री की मृत्यु होती है दूसरी स्त्री
को गुल्म रोग, प्रदर रोग इत्यादि होते हैं| एवं
जातक क्रोधी, दूसरों का नुकसान करने
वाला, व्यभिचारी स्त्री से सम्बन्ध रखने
वाला गर्बीला और असंतुष्ट होता है|
केतु
द्दूने च केतौ सुखं नैव मानलाभो वतादिरोगः|
न मानं प्रभूणां कृपा विकृता च भयं वैरीवर्गात्
भवेत् मानवानाम्|
-(भाव कौतुहल)
यदि सप्तम भाव में केतु हो तो जातक का
अपमान होता है| स्त्री सुख नहीं मिलता
स्त्री पुत्र आदि का क्लेश होता है| खर्च
की वृद्धि होती है रजा की अकृपा शत्रुओं
का डर एवं जल भय बना रहता है| वह जातक
व्यभिचारी स्त्रियों में रति करता है|
वैवाहिक विलम्ब के योग-
विवाह एक संश्लिष्ट और बाहू आयामी
संस्कार है| इसके सम्बन्ध में किसी प्रकार के
फल के लिए विस्तृत एवं धैर्यपूर्व अध्ययन मनन-
चिंतन की अनिवार्यता होती है किसी
जातक के जन्मांग से विवाह संबंधित ज्ञान
प्राप्ति के लिए द्द्वितीय, पंचम, सप्तम एवं
द्वादश भावों का विश्लेषण करना चाहिए|
आज के वर्तमान समय में कन्याओं का विवाह
विशेष रूप से समस्या पूर्ण बन गया है|
अनेकानेक कन्याओं की वरमाला उनके हाथों
ही मुरझा जाती है अर्थात उनका परिणय
तब सम्पन्न होता है जब उनके जीवन का
ऋतुराज पत्र पात के प्रतीक्षा में तिरोहित
हो जाता है वैवाहिक विलम्ब के अनेक
कारण हो सकते हैं| जैसे आर्थिक विषमता,
शिक्षा की स्थिति, शारीरिक संयोजन,
मानसिक संस्कार, ग्रहों की स्थिति
इत्यादि| आइये हम ज्योतिष का माध्यम से
कुछ योगों का अध्ययन चिंतन करें-
१. शनि और मंगल यदि लग्न में या नवांश लग्न
से सप्तमस्थ हो तो विवाह नहीं होता
विशेषतः लग्नेश और सप्तमेश के बलहीन होने
पर|
२. यदि मंगल और शनी, शुक्र और चन्द्रमा से
सप्तमस्थ हो तब विवाह विलम्ब से होता है|
३. शनि और मंगल यदि षष्ठ और अष्टम भावगत
हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है|
४. यदि शनि और मंगल में से कोई भी ग्रह
द्वितीयेश अथवा सप्तमेश हो और एक दुसरे से
दृष्ट से तो विवाह में विलम्ब होता है|
५. यदि लग्न, सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र
स्थिर राशिगत हों एवं चन्द्रमा चर राशि में
हो तो विवाह विलम्ब से होता है|
६. यदि द्वितीय भाव में कोई वक्री ग्रह
स्थित हो या द्वितीयेश स्वयं वक्री हो तो
भी विवाह में विलम्ब होता है|
७. यदि द्वितीय भाव पापग्रस्त हो तथा
द्वितीयेश द्वादश्थ हो तब भी विवाह
विलम्ब से होता है|
८. पुरुषों की कुण्डली में सूर्य मंगल अथवा
चन्द्र शुक्र की सप्तम भाव की स्थिति यदि
पापाक्रांत हो तो भी विवाह में विलम्ब
होता है|
९. राहू और शुक्र के लग्नस्थ होने पर भी
विवाह में विलम्ब होता है|
१०. यदि सप्तम बी हव का स्वामी त्रिक
(६,८,१२) भाव में स्थित या त्रिक भाव का
स्वामी सप्तम भाव में स्थित हो तो विवाह
में अत्यन्त विलम्ब होता है|
११. यदिलाग्नेश और शुक्र वन्ध्या राशिगत
हो (मिथुन, सिंह,कन्या एवं धनु)तो भी
विवाह में विलम्ब होया है|

Wednesday, February 7, 2018

महावीर हनुमान मन्त्र ( इसको नाथ पँथ में महावीरास्त्र भी कहते हैं )

महावीर हनुमान मन्त्र ( इसको नाथ पँथ में महावीरास्त्र भी कहते हैं )

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी ओउम सोहंम धरें आकाश।आकाश में पवन।पवन में तेज।तेज में तोय।तोय में तवा।तवा में बाला परमहंस रखवाला।बाला परमहंस में अलख निरंजन।अलख निरंजन की ये काया।तो शिव शक्ति दोनों ने नाद बिन्द से रचाया।ब्रम्हा विष्णु महेश मिल के उसमें प्राण डालिया।चाम पड़े तो सती सीता माई लाजै।हाड़ गलें तो अंजनी माता लाजै।माँस सड़े तो पवन लाजै।प्राण ले जाये तो सतगुरु लाजै।पड़े नहीं पिण्ड,छूटें नहीं काया।राजा रामचन्द्र जी ने महावीरास्त्र चलाया।हाँक मार अंजनी पुत्र हनुमान जी आया।सात समुन्द्र,सात समुन्द्र बीच ऋषिम्युक पर्वत।ऋषिम्युक पर्वत पर स्फटिक शिला।जिस पर अंजनी पुत्र हनुमान जी बैठा।कानों कुण्डल काँधे मुंज जनेऊँ सिर जटा।पांव खड़ाऊँ क़मर वज्जर लँगोट हाथ में लोहे की गदा।ग्रह कील।भूत कील।प्रेत कील।वैताल कील।कंकाल कील।आकाश कील।सर्वदिशा कील।खेचरा कील।भुचरा कील।जलचरा कील।थलचरा कील।नभचरा कील।डेरू बजती ढांक कील।आकाश की कड़कती बिजली कील।आती मुठ कील।जलती चिता कील।मुर्दा कील।मरघट कील।मढ़ी कील।मसाण कील।भूमि का भोमिया कील।गढ़े धन का रखवाला कील।बादिगर का बाद कील।दुश्मन का कण्ठ कील।पूर्व कील।पश्चिम कील।उत्तर कील।दक्षिण कील।पवन पुत्र बीरबंक नाथ बजरंगबली रामदूत हनुमान जाग।तीनलोक चौदह भुवन सप्त पाताल में किलकारी मार।तूं हुंकारे।तैतीस कोटि देवी देवता काज सँवारे।ओढ़ सिन्दूर सती सीता माई का।तूं प्रहरी अयोध्यापुरी का।महावीर हनुमान बलवन्ता।राजा रामचन्द्र जी के दूत हल हलन्ता।आओ चढ़ चढन्ता।आओ गढ़ किला तोड़न्ता।आओ लंका जालन्ता बालन्ता भस्म करन्ता।आओ ले लांगुर लँगूर ते लिपिटाये सुमिरिते पटका ओ चन्दी चन्द्रावली भवानी मिल गावें मंगलाचार।जीते राजा रामचन्द्र कुंवर जति लक्ष्मण।हनुमान जी तुम आओ।आओ जी रामदूत तुम आओ।मस्तक सिन्दूर चढ़ाते आओ।दांत किट किटाते आओ।सोलह सौ योजन समुन्द्र को लाँघते आओ।मैनाक पर्वत पर विश्राम करते आओ।सिंहिका राक्षसी की खोपड़ी फोड़ते आओ।सुरसा माता के मुँह में घुस कर वापिस आओ।लंकिनी देवी के मुँह पर मुष्टिका मारते आओ।अशोक वाटिका को उजाड़ते आओ।अक्षय कुमार को उठाकर पटकते आओ।रानी मंदोदरी का सिंहासन हिलाते डुलाते आओ।द्रोणाचल पर्वत को उखाड़ते आओ।लंकापति रावण को मूर्छित करतें आओ।आओ आओ पवन कुमार हनुमान।बांये चलें सुग्रीव वीर।आगे काल भैरव किलकिलाये।पीछे जामवन्त वीर।दांये चलें अंगद वीर।ऊपर अंजनी पुत्र हनुमान जी गाजै।देव दानव राक्षस को फाड़े।डाकिनी शाकिनी को मार संहारें।श्री नाथजी गुरुजी हमारें सतगुरु।हम सतगुरू के बालक हनुमान जी को साथ ले हम रणभूमि में चलें साथ में लिया न औऱ कोई।रणभूमि में पींठ पग कभी न मोड़िये संकट मोचन हनुमान जी करें सो होय।पग पग में पदमावती देवी बसें मुल बसे गौरी नन्द गणेश।भृकुटी बीच काल भैरव बसे ह्रदय बसें महेश।हथेली में हनुमान जी बसें बाजै अनहद तूर।यमडंक लागे नहीं काल कण्टक रहें अतिदूर।इतना महावीर हनुमान मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।कैलाश गिरी की शिला पर सिद्धांसन बैठ श्री सदाशिव शम्भुजती गुरु गोरक्ष नाथजी ने राजा गोपीचन्द राजा भृतहरि को कान में सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

Saturday, January 20, 2018

चलती हुई दूकान भी एकदम से ठप्प हो जाती है ।

कभी-कभी देखने में आता है कि खूब चलती हुई दूकान भी एकदम से ठप्प हो जाती है । जहाँ पर ग्राहकों की
भीड़ उमड़ती थी, वहाँ सन्नाटा पसरने लगता है । यदि किसी चलती हुई दुकान को कोई तांत्रिक बाँध दे, तो ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, अतः इससे बचने के लिए निम्नलिखित प्रयोग करने चाहिए -

पर कोई भी प्रयोग को किसी जानकार को बिना बताए या बिना पूछे मत करना(इसमे सावधानी बहोत जरूरी है) या आपके गुरु का मार्गदर्शन लेके करे।

१॰ दुकान में लोबान की धूप लगानी चाहिए ।
२॰ शनिवार के दिन दुकान के मुख्य द्वार पर बेदाग नींबू
एवं सात हरी मिर्चें लटकानी चाहिए ।
३॰ नागदमन के पौधे की जड़ लाकर इसे दुकान के बाहर
लगा देना चाहिए । इससे बँधी हुई दुकान खुल
जाती है ।
४॰ दुकान के गल्ले में शुभ-मुहूर्त में श्री-फल लाल
वस्त्र में लपेटकर रख देना चाहिए ।
५॰ प्रतिदिन संध्या के समय दुकान में माता लक्ष्मी के
सामने शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करना
चाहिए ।
६॰ दुकान अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान की
दीवार पर शूकर-दंत इस प्रकार लगाना चाहिए कि वह
दिखाई देता रहे ।
७॰ व्यापारिक प्रतिष्ठान तथा दुकान को नजर से बचाने के लिए काले-
घोड़े की नाल को मुख्य द्वार की चौखट के
ऊपर ठोकना चाहिए ।
८॰ दुकान में मोरपंख की झाडू लेकर निम्नलिखित मंत्र के
द्वारा सभी दिशाओं में झाड़ू को घुमाकर वस्तुओं को साफ
करना चाहिए । मंत्रः- “ॐ ह्रीं
ह्रीं क्रीं”
९॰ शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के सम्मुख मोगरे
अथवा चमेली के पुष्प अर्पित करने चाहिए ।
१०॰ यदि आपके व्यावसायिक प्रतिष्ठान में चूहे आदि जानवरों के बिल
हों, तो उन्हें बंद करवाकर बुधवार के दिन गणपति को प्रसाद चढ़ाना
चाहिए ।
११॰ सोमवार के दिन अशोक वृक्ष के अखंडित पत्ते लाकर स्वच्छ
जल से धोकर दुकान अथवा व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर
टांगना चाहिए । सूती धागे को
पीसी हल्दी में रंगकर उसमें
अशोक के पत्तों को बाँधकर लटकाना चाहिए ।
१२॰ यदि आपको यह शंका हो कि किसी व्यक्ति ने
आपके व्यवसाय को बाँध दिया है या उसकी नजर
आपकी दुकान को लग गई है, तो उस व्यक्ति का नाम
काली स्याही से भोज-पत्र पर लिखकर
पीपल वृक्ष के पास भूमि खोदकर दबा देना चाहिए तथा
इस प्रयोग को करते समय किसी अन्य व्यक्ति को
नहीं बताना चाहिए । यदि पीपल वृक्ष
निर्जन स्थान में हो, तो अधिक अनुकूलता रहेगी ।
१३॰ कच्चा सूत लेकर उसे शुद्ध केसर में रंगकर अपनी
दुकान पर बाँध देना चाहिए ।
१४॰ हुदहुद पक्षी की
कलंगी रविवार के दिन प्रातःकाल दुकान पर लाकर रखने से
व्यवसाय को लगी नजर समाप्त होती है
और व्यवसाय में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है ।
१५॰ कभी अचानक ही व्यवसाय में स्थिरता
आ गई हो, तो निम्नलिखित मंत्र का प्रतिदिन ग्यारह माला जप करने
से व्यवसाय में अपेक्षा के अनुरुप वृद्धि होती है ।
मंत्रः- “ॐ ह्रीं श्रीं
क्लीं नमो भगवती माहेश्वरी १॰ सूर्यदेव के दोष के लिए खीर का भोजन बनाओ और
रोजाना चींटी के बिलों पर रखकर आवो और
केले को छील कर रखो ।
२॰ जब वापस आवो तभी गाय को खीर और
केला खिलाओ ।
३॰ जल और गाय का दूध मिलाकर सूर्यदेव को चढ़ावो। जब जल
चढ़ाओ, तो इस तरह से कि सूर्य की किरणें उस गिरते
हुए जल में से निकल कर आपके मस्तिष्क पर प्रवाहित हो ।
४॰ जल से अर्घ्य देने के बाद जहाँ पर जल चढ़ाया है, वहाँ पर
सवा मुट्ठी साबुत चावल चढ़ा देवें ।
चन्द्रमाः-
१॰ पूर्णिमा के दिन गोला, बूरा तथा घी मिलाकर गाय को
खिलायें । ५ पूर्णमासी तक गाय को खिलाना है ।
२॰ ५ पूर्णमासी तक केवल शुक्ल पक्ष में प्रत्येक
१५ दिन गंगाजल तथा गाय का दूध चन्द्रमा उदय होने के बाद
चन्द्रमा को अर्घ्य दें । अर्घ्य देते समय ऊपर दी गई
विधि का इस्तेमाल करें ।
३॰ जब चाँदनी रात हो, तब जल के किनारे जल में
चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को हाथ जोड़कर दस मिनट तक खड़ा रहे
और फिर पानी में मीठा प्रसाद चढ़ा देवें,
घी का दीपक प्रज्जवलित करें । उक्त
प्रयोग घर में भी कर सकते हैं, पीतल के
बर्तन में पानी भरकर छत पर रखकर या जहाँ
भी चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब पानी में दिख सके
वहीं पर यह कार्य कर सकते हैं ।

कुंडली में शनि से बनने वाले विभिन्न ग्रह योग

🕳️कुंडली में शनि से बनने वाले विभिन्न ग्रह योग🕳️


           शनि देव को भगवान शिव ने न्यायाधीश का पद दिया है और उसका दायित्व शनिदेव पूर्ण निष्ठा से व बिना किसी दुराग्रह के संपादित करते हैं।

🕳️साढ़ेसाती व ढैय्या के समय जरूर कष्ट प्रदान करते हैं परंतु पूर्ण समय तक नहीं, उसमें भी प्रभाव मित्र राशि में है या शत्रु राशि में तथा उन पर किसी शुभ ग्रह का प्रभाव है या अशुभ ग्रह का, तदनुसार शुभ-अशुभ फल प्राप्त होते हैं।

🕳️🕳️शनि से बनने वाले विभिन्न योगों का क्रमानुसार वर्णन इस प्रकार है 🕳️🕳️

1.🕳️ शशयोग:
🌼अगर शनि देव केंद्र स्थानों में स्वराशि का होकर बैठे हां (मकर, कुंभ) तो यह योग बनता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक नौकरों से अच्छी तरह काम लेता है, किसी संस्थान समूह या कस्बे का प्रमुख और राजा होता है एवं वह सब गुणों से युक्त सर्वसंपन्न होता है।

2. 🕳️राजयोग: 🕳️

🌼अगर वृष लग्न में चंद्रमा हो, दशम में शनि हो, चतुर्थ में सूर्य तथा सप्तमेश गुरु हो तो यह योग बनता है। ऐसा जातक सेनापति/पुलिस कप्तान या विभाग का प्रमुख होता है।

3.🕳️ दीर्घ आयु योग: 🕳️

🌼लग्नेश, अष्टमेश, दशमेश व शनि केंद्र त्रिकोण या लाभ भाव में (11वां भाव) हो तो दीर्घ आयु योग होता है।

4.🕳️ रवि योग: 🕳️

🌼अगर सूर्य दशम भाव में हो और दशमेश तीसरे भाव में शनि के साथ बैठा है तो यह योग बनता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक उच्च विचारों वाला और सामान्य आहार लेने वाला होता है। जातक सरकार से लाभान्वित, विज्ञान से ओतप्रोत, कमल के समान आंखों व भरी हुई छाती वाला होता है।

5.🕳️ पशुधन लाभ योग ( आज के ज़माने में वाहन योग जाने )🕳️

🌼यदि चतुर्थ में शनि के साथ सूर्य तथा चंद्रमा नवम भाव में हो, एकादश स्थान में मंगल हो तो गाय भैंस आदि पशु धन का लाभ होता है।

6. 🕳️अपकीर्ति योग: 🕳️

🌼अगर दशम में सूर्य व श्न हो व अशुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो इस योग का निर्माण होता है। इस प्रकार के जातक की ख्याति नहीं होती वरन् वह कुख्यात होता है।

7.🕳️ बंधन योग: 🕳️

🌼अगर लग्नेश और षष्टेश केंद्र में बैठे हों और शनि या राहु से युति हो तो बंधन योग बनता है। इसमें जातक को कारावास काटना पड़ता है।

8. 🕳️धन योग: 🕳️

🌼लग्न से पंचम भाव में शनि अपनी स्वराशि में हो और बुध व मंगल ग्यारहवें भाव में हों तो यह योग निर्मित होता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक महाधनी होता है। अगर लग्न में पांचवे घर में शुक्र की राशि हो तथा शुक्र पांचवे या ग्यारहवें भाव में हो तो धन योग बनता है। ऐसा जातक अथाह संपत्ति का मालिक होता है।

9.🕳️ जड़बुद्धि योग: 🕳️

🌼अगर पंचमेश अशुभ ग्रह से दृष्ट हो या युति करता हो, शनि पंचम में हो तथा लग्नेश को शनि देखता हो तो इस योग का निर्माण होता है। इस योग में जन्म लेने वाले जातक की बुद्धि जड़ होती है।

10. 🕳️कुष्ठ योग: 🕳️

🌼यदि मंगल या बुध की राशि लग्न में हो अर्थात मेष, वृश्चिक, मिथुन, कन्या लग्न में हो एवं लग्नेश चंद्रमा के साथ हो, इनके साथ राहु एवं शनि भी हो तो कुष्ठ रोग होता है। षष्ठ स्थान में चंद्र, शनि हो तो 55वें वर्ष में कुष्ठ की संभावना रहती है।

11.🕳️ वात रोग योग: 🕳️

🌼यदि लग्न में एवं षष्ठ भाव में शनि हो तो 59 वर्ष में वात रोग होता है। जब बृहस्पति लग्न में हो व शनि सातवें में हो तो यह योग बनता है।

12. 🕳️दुर्भाग्य योग:🕳️

🌼 (1) यदि नवम में शनि व चंद्रमा हो, लग्नेश नीच राशि में गया हो तो मनुष्य भीख मांग कर गुजारा करता है।
  (2) यदि पंचम भाव में तथा पंचमेश या भाग्येश अष्टम में नीच राशिगत हो तो मनुष्य भाग्यहीन होता है।

13.🕳️ पापकर्म से धनार्जन योग: 🕳️

🌼यदि द्वादश भाव में शनि-राहु के साथ मंगल हो तथा शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो पाप कार्यों से धन लाभ होता है।

14. 🕳️अंगहीन योग: 🕳️

🌼दशम में चंद्रमा हो सप्तम में मंगल हो सूर्य से दूसरे भाव में शनि हो तो यही योग बनता है। इस योग में जातक अंगहीन हो जाता है।

15. 🕳️सदैव रोगी योग:🕳️

🌼 यदि षष्ठभाव तथा षष्ठेश दोनों ही पापयुक्त हां और शनि राहु साथ हों तो सदैव रोगी होता है।

16. 🕳️मतिभ्रम योग: 🕳️

🌼शनि लग्न में हो मंगल नवम पंचम या सप्तम में हो, चंद्रमा शनि के साथ बारहवं भाव में हों एवं चंद्रमा कमजोर हो तो यह योग बनता है।

17. 🕳️बहुपुत्र योग: 🕳️

🌼अगर नवांश में राहु पंचम भाव में हो व शनि से संयुक्त हो तो इस योग का निर्माण होता है। इस योग में जन्म लेने वाले जातक के बहुत से पुत्र होते हैं।

18. 🕳️युद्धमरण योग: 🕳️

🌼यदि मंगल छठे या आठवें भाव का स्वामी होकर छठे, आठवें या बारहवें भाव में शनि या राहु से युति करे तो जातक की युद्ध में मृत्यु होती है।

19. 🕳️नरक योग: 🕳️

🌼यदि 12वें भाव में शनि, मंगल, सूर्य, राहु हो तथा व्ययेश अस्त हो तो मनुष्य नरक में जाता है और पुनर्जन्म लेकर कष्ट भोगता है।

20. 🕳️सर्प योग: 🕳️

🌼यदि तीन पापग्रह शनि, मंगल, सूर्य कर्क, तुला, मकर राशि में हो या लगातार तीन केंद्रों में हो तो सर्पयोग होता है। यह एक अशुभ योग है।

21. 🕳️दत्तक पुत्र योग: 🕳️

🌼शनि-मंगल यदि पांचवें भाव में हों तथा सप्तमेश 11वें भाव में हो, पंचमेश शुभ हो तो यह योग बनता है। नवम भाव में चर राशि में शनि से दृष्ट हो, द्वादशेश बलवान हो, तो जातक गोद जायेगा।

यदि पांचवें भाव में ग्रह हो तथा पंचमेश व्यय स्थान में हो, लग्नेश व चंद्र बली हो तो जातक को गोद लिया पुत्र होगा।

🕳️🕳️🕳️🕳️🕳️🕳️🕳️🕳️