Saturday, November 4, 2017

धन प्राप्ति के लिए साधना

धन प्राप्ति के लिए साधना

।। मंत्र ।।

ॐ नमो आदेश गुरु को।
बंगाल की रानी, करे मेहमानी।
मूंज बनी के कावा, पद्मावती बैठ खावे मावा।
सत्तर सुलेमान ने हनुमान को रोट लगाया।
हनुमान ने राह का संकट हराया।
तारा देवी आवे घर।
हाथ उठा के देवे वर।
सतगुरु ने शब्द सुनाया।
सुन योगी आसन लगाया।
किसके आसन? किसके जाप?
जो बोल्या सतगुरु आप।
हर की पौड़ी, लक्ष्मी की कौड़ी।
सुलेमान आवे चढ़ घोड़ी।
आओ आओ पद्मावती माई।
करो भलाई, न करो तो गुरु गोरक्ष की दुहाई।

चौसठ योगिनी तंत्र


चौसठ योगिनी तंत्र।
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आदिशक्ति का सीधा सा सम्बन्ध है इस शब्द का जिसमे प्रकृति या ऐसी शक्ति का बोध होता जो उत्पन्न करने और पालन करने का दायित्व निभाती है जिसने भी इस शक्ति की शरणमें खुद को समर्पित कर दिया उसे फिर किसी प्रकार कि चिंता करने कि कोई आवश्यकता नहीं वह परमानन्द हो जाता है चौसठ योगिनियां वस्तुतः माता आदिशक्ति कि सहायक शक्तियों के रूप में मानी जाती हैं। जिनकी मदद से माता आदिशक्ति इस संसार का राज काज चलाती हैं एवं श्रृष्टि के अंत काल में ये मातृका शक्तियां वापस माँ आदिशक्ति में पुनः विलीन हो जाती हैं और सिर्फ माँ आदिशक्ति ही बचती हैं फिर से पुनर्निर्माण के लिए। बहुत बार देखने में आता है कि लोग वर्गीकरण करने लग जाते हैं और उसी वर्गीकरण के आधार पर साधकगण अन्य साधकों को हीन - हेय दृष्टि से देखने लग जाते हैं क्योंकि उनकी नजर में उनके द्वारा पूजित रूप को वे मूल या प्रधान समझते हैं और अन्य को द्वितीय भाव से देखते हैं जबकि ऐसा उचित नहीं है हर साधक का दुसरे साधक के लिए सम भाव होना चाहिए मैं किन्तु नैतिक दृष्टिकोण और अध्यात्मिकता के आधार पर यदि देखा जाये तो न तो कोई उच्च है न कोई हीन हम आराधना करते हैं तो कोई अहसान नहीं करते यह सिर्फ अपनी मानसिक शांति और संतुष्टि के लिए है और अगर कोई दूसरा करता है तो वह भी इसी उद्देश्य कि पूर्ती के लिए। अब अगर हम अपने विषय पर आ जाएँ तो इस मृत्यु लोक में मातृ शक्ति के जितने भी रूप विदयमान हैं सब एक ही विराट महामाया आद्यशक्ति के अंग, भाग, रूप हैं साधकों को वे जिस रूप की साधना करते हैं उस रूप के लिए निर्धारित व्यवहार और गुणों के अनुरूप फल प्राप्त होता है। चौसठ योगिनियां वस्तुतः माता दुर्गा कि सहायक शक्तियां है जो समय समय पर माता दुर्गा कि सहायक शक्तियों के रूप में काम करती हैं एवं दुसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो यह मातृका शक्तियां तंत्र भाव एवं शक्तियोंसे परिपूरित हैं और मुख्यतः तंत्र ज्ञानियों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र हैं।
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चौसठ योगिनियों के नाम।
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(1)―बहुरूप, (3)―तारा, (3)―नर्मदा, (4)―यमुना, (5)―शांति, (6)―वारुणी (7)―क्षेमंकरी, (8)―ऐन्द्री, (9)―वाराही, (10)―रणवीरा, (11)―वानर-मुखी, (12)―वैष्णवी, (13)―कालरात्रि, (14)―वैद्यरूपा, (15)―चर्चिका, (16)―बेतली, (17)―छिन्नमस्तिका, (18)―वृषवाहन, (19)―ज्वाला कामिनी, (20)―घटवार, (21)―कराकाली, (22)―सरस्वती, (23)―बिरूपा, (24)―कौवेरी, (25)―भलुका, (26)―नारसिंही, (27)―बिरजा, (28)―विकतांना, (29)―महालक्ष्मी, (30)―कौमारी, (31)―महामाया, (32)―रति, (33)―करकरी, (34)―सर्पश्या, (35)―यक्षिणी, (36)―विनायकी, (37)―विंध्यवासिनी, (38)―वीर कुमारी, (39)―माहेश्वरी, (40)―अम्बिका, (41)―कामिनी, (42)―घटाबरी, (43)―स्तुती, (44)―काली, (45)―उमा, (46)―नारायणी, (47)―समुद्र, (48)―ब्रह्मिनी, (49)―ज्वाला मुखी, (50)―आग्नेयी, (51)―अदिति, (51)―चन्द्रकान्ति, (53)―वायुवेगा, (54)―चामुण्डा, (55)―मूरति, (56)―गंगा, (57)―धूमावती, (58)―गांधार, (59)―सर्व मंगला, (60)―अजिता, (61)―सूर्यपुत्री (62)―वायु वीणा, (63)―अघोर, (64)―भद्रकाली।
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चौसठ योगनियों के मंत्र।

1)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा।
2)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कपलिनी नागलक्ष्मी स्वाहा।
3)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा।
4)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा।
5)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विरोधिनी विलासिनी स्वाहा।
6)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा।
7)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्र रक्त भोग रूपा स्वाहा।
8)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा।
9)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा।
10)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा।
11)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री घना महा जगदम्बा स्वाहा।
12)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बलाका काम सेविता स्वाहा।
13)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा।
14)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा।
15)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा।
16)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा।
17)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा।
18)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भगमालिनी तारिणी स्वाहा।
19)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्यकलींना तंत्रार्पिता स्वाहा।
20)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा।
21)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा।
22)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महवज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा।
23)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा।
24)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा।
25)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा।
26)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा।
27)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा।
28)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विजया देवी वसुदा स्वाहा।
29)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा।
30)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा।
31)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चित्रा देवी रक्तपुजा स्वाहा।
32)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा।
33)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री डाकिनी मदसालिनी स्वाहा।
34)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री राकिनी पापराशिनी स्वाहा।
35)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा।
36)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा।
37)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा।
38)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री हाकिनी मनोहारिणी स्वाहा।
39)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री तारा योग रक्ता पूर्णा स्वाहा।
40)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री षोडशी लतिका देवी स्वाहा।
41)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा।
42)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा।
43)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा।
44)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा।
45)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा।
46)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातंगी कांटा युवती स्वाहा।
47)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा।
48)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा।
49)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा।
50)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मोहिनी माता योगिनी स्वाहा।
51)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा।
52)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा।
53)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नारसिंही वामदेवी स्वाहा।
54)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा।
55)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा।
56)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा।
57)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा।
58)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा।
59)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा।
60)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा।
61)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा।
62)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा।
63)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा।
64)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा

१४ विद्या और ६४ कलाए

१४ विद्या और ६४ कलाए :-

श्रीगणपतीको १४ विद्या और ६४ कलांओंके अधिष्ठात्रा देव के रूपमें जाना जाता है

१४ विद्या व ६४ कलाए कौनकौनसी है ...
इस बारेमें कईयोकें मनमें उत्सुकता होती है.

१४ विद्या :-

चार वेद + छह वेदांग + न्याय, विश्लेषण, पुराणधर्मशास्त्र=१४

चार वेद = १) ऋग्वेद २) यजुर्वेद ३) सामवेद ४) अथर्ववेद

छह वेदांग =

१) व्याकरण- भाषाओकें शब्दोके व्यवहार का शास्त्र.
२) ज्योतिष- ग्रहगती तथा सामुद्रिक जाननेकी विद्या.
३) निरुक्त- वेदोके काठीन शब्दोका अर्थ बताने वाला शास्त्र.
४) कल्प- धार्मिक विधी- व्रतोका वर्णन बताने वाला शास्त्र ५) छंद- शब्दोकि गेय (गाने योग्य ) रचना एवं काव्यवृत्त का ज्ञान ६) शिक्षा- शिक्षण, अध्यापनअध्ययन
+ न्याय, विश्लेषण, पुराणधर्मशास्त्र =१४
६४ कलाए :
१) पानक रस तथा रागासव योजना- मदिरा व पेय तयार करना.
२) धातुवद- कच्ची धातू पक्की व मिश्रधातू अलग करना ३) दुर्वाच योग- कठीन शब्दोका अर्थ उर्दघृत करना.
४) आकर ज्ञान- खदानो के बारेमें अंतर्गत एवं परिपूर्ण ज्ञान .
५) वृक्षायुर्वेद योग- उपवन, कुंज, वाटिका, उद्यान बनाना.
६) पट्टिका वेत्रवाणकल्प- नवार, सुंभ, वेत इन चीजोसें खटीया बनाना.
७) वैनायिकी विद्याज्ञान- शिष्टाचारविनय इनका ज्ञान . ८) व्यायामिकी विद्याज्ञान- व्यायाम आदि का शास्त्रीय ज्ञान .
९) वैजापिकी विद्याज्ञान- दुसरोपर विजय पाना.
१०) शुकसारिका प्रलापन- पंछियोकी भाषा समझना. ११) अभिधान कोष छंदोज्ञान- शब्दछंद का ज्ञान.
१२) वास्तुविद्या- महाल, भवन, राजमहल,सदन बांधना.
१३) बालक्रीडाकर्म- नन्हे बालकोका मनोरंजन करना.
१४) चित्रशब्दापूपभक्षविपाक क्रिया- पाकक्रिया, एवं रसोई.
१५) पुस्तकवाचन- काव्यगद्यादी पुस्तक और ग्रंथ पढना.
१६) आकर्षण क्रीडा- दुसरोको आकर्षित करना १७) कौचुमार योग- कुरुप व्यक्तियोको रूपवान बनाना १८) हस्तलाघव - हस्तकौशल्य तथा हस्तकला.
१९) प्रहेलिका- गूढता पूर्वक और काव्यमय तरिकेसे प्रश्न पूछना
२०) प्रतिमाला- अंताक्षर कि योग्यता रखना २१) काव्यसमस्यापूर्ती- आधिअधुरी कविता पूर्ण करना
२२) भाषाज्ञान- देश तथा विदेश कि भाषाओकां ज्ञान २३) चित्रयोग- चित्रकला और रंगकला.
२४) कायाकल्प- वृध्द व्यक्तिको जवान बनाना २५) माल्यग्रंथ विकल्प- वस्त्रोका योग्य चुनाव करना.
२६) गंधयुक्ती- सुगंधी गंध और लेपन का ज्ञान.
२७) यंत्रमातृका- अनेकविध यन्त्रोका निर्माण करना.
२८) इत्तर विकल्प- फुलोंसे अर्क एवं इत्तर का निर्माण.
२९) संपाठय़- दुसरोकी बाते सुनकर सहिसही नकल करना ३०) धारण मातृका- स्मरणशक्ती वृद्धिंगत करना ३१) छलीक योग- चालाखी करके दुसरोको भ्रमित करना
३२) वस्त्रगोपन- फटेहुए वस्त्र सीना
३३) मणिभूमिका- भूमिपर मणीओकी रचना करना
३४) द्यूतक्रीडा- जुआ खेलना
३५) पुष्पशकटिका निमित्त ज्ञान- प्राकृतिक लक्षणोद्वारा भविष्य कथन करना.
३६) माल्यग्रथन- पुष्पमाला, हार,गजरे तैयार करना.
३७) मणिरागज्ञान- रंगोसे रत्नोकि परख करना तथा पहचानना ३८) मेषकुक्कुटलावक- युद्धविधी- बकरे, मुर्गे वगैरोको लडाना.
३९) विशेषकच्छेद ज्ञान- माथेपर लगने वाले तिलकोके साचे तयार करना
४०) क्रिया विकल्प- वस्तुकि क्रीयाका प्रभाव पलट देना.
४१) मानसी काव्यक्रिया- शीघ्र कवित्व ४२) आभूषण भोजन- सोना चांदी रत्न एवं मोतियोसे काया सजाना ४३) केशशेखर पीड ज्ञान- मुकुट बनाना और बालोकि पुष्परचना.
४४) नृत्यज्ञान- नृत्यकला का शास्त्रिय और परिपूर्ण ज्ञान.
४५) गीतज्ञान- गायन कला का शास्त्रिय और परिपूर्ण ज्ञान ४६) तंडुल कुसुमावली विकार- चावल और फ़ुलोसे चित्र निकालना ४७) केशमार्जन कौशल्य- तेलसे मस्तक का मालिश करना
४८) उत्सादन क्रिया- तेलसे बदनका का मालिश करना ४९) कर्णपत्र भंग- फुल पत्तियोसे कर्णफुल बनाना
५०) नेपथ्य योग- ऋतू काल अनुसार वस्त्र और अलंकारोका चुनाव.
५१) उदकघात- जलविहार करना तथा रंगीन पानी कि पिचकारीया बनाना.
५२) उदकवाद्य- जलतरंग बजाना ५३) शयनरचना- मंचक, शय्या व मंदिर सजाना ५४) चित्रकला- नक्षी वेलवुट्टी व चित्रे निकालना.
५५) पुष्पास्तरण- फ़ुलोकि कलात्मक शैय्या तयार करना.
५६) नाटय़अख्यायिका दर्शन- नाट्कोमे अभिनय करना.
५७) दशनवसनांगरात- दात, वस्त्र , काया रंगाना और सजाना.
५८) तुर्ककर्म- चरखेसे धागा कताई
५९) इंद्रजाल- संमोहन और जादूटोनेका ज्ञान.
६०) तक्षणकर्म- लकडेको तराशना
६१) अक्षर मुष्टिका कथन- करपल्लवी द्वारा संभाषण करना
६२) सूत्र तथा सूचीकर्म- वस्त्रको रफू करना.
६३) म्लेंछीतकला विकल्प- विदेशी भाषाओंका ज्ञान ६४) रत्नरौप्य परीक्षा- अनमोल धातु एवं रत्नोको परखना

Friday, November 3, 2017

सिद्ध नागकेसर का फूल

सिद्ध नागकेसर का फूल

तंत्र क्रियाओं के अंतर्गत कई प्रकार की वनस्पतियों का उपयोग भी किया जाता है। नागकेसर के फूल का उपयोग भी तांत्रिक क्रियाओं में किया जाता है। नागकेसर को तंत्र के अनुसार एक बहुत ही शुभ वनस्पति माना गया है। काली मिर्च के समान गोल या कबाब चीनी की भांति दाने में डंडी लगी हुई गेरू के रंग का यह गोल फूल होता है। इसकी गिनती पूजा- पाठ के लिए पवित्र पदार्थों में की जाती है। तंत्र के अनुसार नागकेसर एक धनदायक वस्तु है। इस धन प्राप्ति के प्रयोग को अपनाकर धनवान बन सकते हैं- किसी पूर्णिमा को सोमवार हो उस दिन यह प्रयोग करें। किसी मन्दिर के शिवलिंग पर पांच बिल्वपत्रों के साथ यह फूल भी चढ़ाएं। इससे पूर्व शिवलिंग को कच्चे दूध, दही, शक्कर, घी, गंगाजल, आदि से धोकर पवित्र करें। पांच बिल्व पत्र और नागकेशर के फूल की संख्या हर बार एक ही रखना चाहिए। यह क्रिया अगली पूर्णिमा तक निरंतर रखें। आखिरी दिन चढ़ाए गये फूल तथा बिल्व पत्रों में से एक अपने घर ले आएं। यह सिद्ध नागकेसर का फूल आपकी किस्मत बदल देगा तथा धन संबंधी आपकी जितनी भी समस्याएं हैं, वह सभी समाप्त हो जाएंगी।

Wednesday, November 1, 2017

राहू और बारवां भाव

राहू और बारवां भाव

कुंडली के एक अहम भाव व्यय भाव में राहू के होने पर जातक को क्या क्या फल मिलते है उन पर कुछ लिख रहा हूँ क्योंकि पिछले दिनों में मुझे ज्यादातर कुंडलियों में राहू इस भाव में मिले तो सोचा की आज दोबारा से इसके उपर एक पोस्ट करू हालाँकि एक साल पहले भी इस पर पोस्ट की थी | इस पर कुछ लिखने से पहले राहू क्या है उस पर भी कुछ लिख रहा हूँ | राहु वास्तव में छाया ग्रह है,यह अपने ऊपर कोई आक्षेप नही लेता है,यह एक बिन्दु की तरह से है जो जीव के उसी के रूप में आगे पीछे चलता है,कभी जीव का साथ नही छोडता है,इसके अन्दर एक अजीब सी शक्ति होती है,जब जीव का दिमाग इसके अन्दर फ़ंस जाता है तो वह जीव के साथ जो नही होना होता है वह करवा देता है। यह तीन मिनट की गति से कुंडली में प्रतिदिन की औसत चाल चलता है,इसका भरोसा नही होता है,कि सुबह यह क्या कर रहा है दोपहर को क्या करेगा और शाम होते ही यह क्या दिखाना शुरु कर देगा। राहु को ही कालपुरुष की संज्ञा दी गयी है,वह विराट रूप में सभी के सामने है उसकी सीमा अनन्त है,उसकी दूरी को कोई नाप नही सका है,केवल उसकी संज्ञा नीले रंग के रूप में अनन्त आकाश की ऊंचाइयों में देखी जा सकती है,यह केतु से हमशा विरोध में रहता है,और उसकी उल्टी दिशा का बोधक होता है,जो केतु सहायता के रूप में सामने आता है यह उसी का बल हरण करने के बाद उसकी शक्ति और बोध दोनो को बेकार करने के लिये अपनी योग्यता का प्रमाण देने से नही चूकता है। सूर्य के साथ अपनी युति बनाते ही वह पिता या पुत्र को आलसी बना देता है,जो कार्य जीवन के प्रति उन्नति देने वाले होते है वे आलस की बजह से पूरे नही हो पाते है,वह आंखो को भ्रम में डाल देता है होता कुछ है और वह दिखाना कुछ शुरु कर देता है। जातक के साथ जो भी कार्य चल रहा होता है उसके अन्दर असावधानी पैदा करने के बाद उस कार्य को बेकार करने के लिये अपनी शक्ति को देता है,पलक झपकते ही आंख की किरकिरी बनकर सडक में मिला देता है|
अब हम देखते है की बारवां भाव जो की हमारे व्यय का माना जाता है ये भाव हमारे मन में अचानक से आये हुवे ख्यालात कल्पना मोक्ष आदि का भी माना गया है | इस भाव में आया हुआ राहू जातक को कल्पनाशील बहुत बना देता है | जातक जीवन में अनेक [प्रकार की योजनाये बनाता है लेकिन अंत में उन योजनाओं का नतीजा सिवाए सिर्फ के जातक को कुछ हासिल नही होता \ लाल किताब में इस भाव के राहू को शेखचिल्ली की संज्ञा दी गई है जैसे की आप सभी जानते है की शेखचिल्ली की कहानियों को हास्यापद के रूप में लिया जाता है की कैसे वो एक पैसे के बारे में सोचकर ह बड़े व्यापार और अच्छा खुशहाल परिवार की कल्पना कर लेता है लेकिन अंत में उसके सभी सपने बिखर जाते है इसी प्रकार इस भाव का राहू भी जातक के सपनों को बिखरने वाला माना गया है \ जातक सोचता तो पता नही क्या क्या है लेकिन अंत में उसे कुछ हासिल नही हो पाता है \
राहू को ज्योतिष में धुंवा ,माना गया है और धुंवा भी ऐसा धुंवा जो गीली लकडयों कन्डो आदि से बना हो और जिसे हम रोटी पकाने आदि के कुछ भी काम में नही ले सकते ये धुंवा हमारे आँखे के सामने सिवाए अँधेरा करने के अन्य कुछ काम नही आता बल्कि हमारी आँखों को ही नुक्सान पहुंचा देता है इसिलिय इस भाव का राहू जातक की आँखों की रौशनी के लिए भी उत्तम फल नही देता और जातक के मन के उपर एक तरह से भ्रम रूपी धुंवा फैला देता है जिस से जातक किसी न किसी भ्रम में जीने लग जाता है | जातक के मन में कई बार ये भी भ्रम पैदा हो जाता है की वो किसी देवी देवता को आसानी से सिद्ध कर लेगा या कोई ऐसी विद्या बहुत जल्द सिख लेगा की किसी की शक्ल देखते ही उसके बारे में सब में सब कुछ बता देगा \
इस भाव के राहू वाले जातक जीवन के सुखों का भी पूर्ण रूप से आनन्द नही ले पाते है उनके अचेतन मन में कोई न कोइ समस्या बनी रहती है जिस से वो जीवन का पूर्ण आनन्द नही ले पाते \ आप इन्हें मानसिक रूप से कमजोर कह सकते है जिस से इन्हें कोई न कोई छोटी मोटी मानसिक बिमारी भी हो जाती है \
इस भाव के राहू वाले जातक की एक ख़ास बात अवस्य होती है की वो चाहे मन से बैचेन रहे लेकिन जानबुझकर किसी अन्य का बुरा नही करता है , दूसरों का फला करने की हमेशा कोसिस करता है चाहे उसे उसकी नेकी का फल मिले या न मिले \
इस भाव का राहू खर्च के सन्दर्भ में भी अच्छा नही होता राहू को हाथी माना गया है और जातक का खर्च हाथी के समान बड़ा होता चला जाता है \
एक ख़ास बात की भाव का राहू रात के समय अलामते भी बहुत लाता है रात के समय कई बार ऐसी बातें हो जाती है जिनका कोई आधार नही होता लेकिन कुछ समय के लिए जातक को मानसिक रूप से काफी परेशान भी कर देती है \
अब बात आती है उपाय की तो इस भाव के राहू के लिय जातक को अपनी कमाई का एक हिस्सा अपनी बहन बुआ बेटी पर खर्च अवस्य करते रहना चाहिए जिस से उसे धन को बचत करने में सहायता मिलेगी और व्यर्थ के खर्च में कमी होगी साथ ही जातक को मंगल की सहायता लेनी चाहिए हमेशा चूल्हे के पास बैठकर रोटी खानी चाहिए और एक लाल रंग के कपड़े की चोकोर थैली में सौंफ बांधकर अपने सिरहाने रखनी चाहिए \ ध्यान रखे की गोचर में इस भाव में आया हुआ राहू जातक को बहुत ज्यादा कल्पनाशील बना देता है इसिलिय जब भी किसी भी जातक के इस भाव में राहू गोचर में आया हुआ हो उसे कोई न्या काम सुरुवात करने से बचना चाहिए \

Sunday, October 22, 2017

अमावस्या और पूर्णिमा का रहस्य जानिए...

अमावस्या और पूर्णिमा का रहस्य जानिए...

हिन्दू धर्म में पूर्णिमा, अमावस्या और ग्रहण के रहस्य को उजागर किया गया है। इसके अलावा वर्ष में ऐसे कई महत्वपूर्ण दिन और रात हैं जिनका धरती और मानव मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उनमें से ही माह में पड़ने वाले 2 दिन सबसे महत्वपूर्ण हैं- पूर्णिमा और अमावस्या। पूर्णिमा और अमावस्या के प्रति बहुत से लोगों में डर है। खासकर अमावस्या के प्रति ज्यादा डर है। वर्ष में 12 पूर्णिमा और 12 अमावस्या होती हैं। सभी का अलग-अलग महत्व है।
हिन्दू पंचांग के अनुसार माह के 30 दिन को चन्द्र कला के आधार पर 15-15 दिन के 2 पक्षों में बांटा गया है- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। शुक्ल पक्ष के अंतिम दिन को पूर्णिमा कहते हैं और कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन को अमावस्या।
हिन्दू पंचांग की अवधारणा
यदि शुरुआत से गिनें तो 30 तिथियों के नाम निम्न हैं-पूर्णिमा (पूरनमासी), प्रतिपदा (पड़वा), द्वितीया (दूज), तृतीया (तीज), चतुर्थी (चौथ), पंचमी (पंचमी), षष्ठी (छठ), सप्तमी (सातम), अष्टमी (आठम), नवमी (नौमी), दशमी (दसम), एकादशी (ग्यारस), द्वादशी (बारस), त्रयोदशी (तेरस), चतुर्दशी (चौदस) और अमावस्या (अमावस)।
अमावस्या पंचांग के अनुसार माह की 30वीं और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है जिस दिन कि चंद्रमा आकाश में दिखाई नहीं देता। हर माह की पूर्णिमा और अमावस्या को कोई न कोई पर्व अवश्य मनाया जाता ताकि इन दिनों व्यक्ति का ध्यान धर्म की ओर लगा रहे। लेकिन इसके पीछे आखिर रहस्य क्या है?
नकारात्मक और सकारात्मक
शक्तियां : धरती के मान से 2 तरह की शक्तियां होती हैं- सकारात्मक और नकारात्मक, दिन और रात, अच्छा और बुरा आदि। हिन्दू धर्म के अनुसार धरती पर उक्त दोनों तरह की शक्तियों का वर्चस्व सदा से रहता आया है। हालांकि कुछ मिश्रित शक्तियां भी होती हैं, जैसे संध्या होती है तथा जो दिन और रात के बीच होती है। उसमें दिन के गुण भी होते हैं और रात के गुण भी।
इन प्राकृतिक और दैवीय शक्तियों के कारण ही धरती पर भांति-भांति के जीव-जंतु, पशु-पक्षी और पेड़-पौधों, निशाचरों आदि का जन्म और विकास हुआ है। इन शक्तियों के कारण ही मनुष्यों में देवगुण और दैत्य गुण होते हैं।
हिन्दुओं ने सूर्य और चन्द्र की गति और कला को जानकर वर्ष का निर्धारण किया गया। 1 वर्ष में सूर्य पर आधारित 2 अयन होते हैं- पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। इसी तरह चंद्र पर आधारित 1 माह के 2 पक्ष होते हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
इनमें से वर्ष के मान से उत्तरायण में और माह के मान से शुक्ल पक्ष में देव आत्माएं सक्रिय रहती हैं, तो दक्षिणायन और कृष्ण पक्ष में दैत्य और पितर आत्माएं ज्यादा सक्रिय रहती हैं। अच्छे लोग किसी भी प्रकार का धार्मिक और मांगलिक कार्य रात में नहीं करते जबकि दूसरे लोग अपने सभी धार्मिक और मांगलिक कार्य सहित सभी सांसारिक कार्य रात में ही करते हैं।
पूर्णिमा का विज्ञान :
🌞🌞🌞🌞🌞🌞 पूर्णिमा की रात मन ज्यादा बेचैन रहता है और नींद कम ही आती है। कमजोर दिमाग वाले लोगों के मन में आत्महत्या या हत्या करने के विचार बढ़ जाते हैं। चांद का धरती के जल से संबंध है। जब पूर्णिमा आती है तो समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है, क्योंकि चंद्रमा समुद्र के जल को ऊपर की ओर खींचता है। मानव के शरीर में भी लगभग 85 प्रतिशत जल रहता है। पूर्णिमा के दिन इस जल की गति और गुण बदल जाते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार इस दिन चन्द्रमा का प्रभाव काफी तेज होता है इन कारणों से शरीर के अंदर रक्त में न्यूरॉन सेल्स क्रियाशील हो जाते हैं और ऐसी स्थिति में इंसान ज्यादा उत्तेजित या भावुक रहता है। एक बार नहीं, प्रत्येक पूर्णिमा को ऐसा होता रहता है तो व्यक्ति का भविष्य भी उसी अनुसार बनता और बिगड़ता रहता है।
जिन्हें मंदाग्नि रोग होता है या जिनके पेट में चय-उपचय की क्रिया शिथिल होती है, तब अक्सर सुनने में आता है कि ऐसे व्यक्ति भोजन करने के बाद नशा जैसा महसूस करते हैं और नशे में न्यूरॉन सेल्स शिथिल हो जाते हैं जिससे दिमाग का नियंत्रण शरीर पर कम, भावनाओं पर ज्यादा केंद्रित हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों पर चन्द्रमा का प्रभाव गलत दिशा लेने लगता है। इस कारण पूर्णिमा व्रत का पालन रखने की सलाह दी जाती है।
कुछ मुख्य पूर्णिमा :
🌞🌞🌞🌞🌞🌞कार्तिक पूर्णिमा, माघ पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा आदि।
चेतावनी :
🐙🐙🐙 इस दिन किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए। इसके शरीर पर ही नहीं, आपके भविष्य पर भी दुष्परिणाम हो सकते हैं। जानकार लोग तो यह कहते हैं कि चौदस, पूर्णिमा और प्रतिपदा उक्त 3 दिन पवित्र बने रहने में ही भलाई है।
अमावस्या :
🌚🌚🌚🌚वर्ष के मान से उत्तरायण में और माह के मान से शुक्ल पक्ष में देव आत्माएं सक्रिय रहती हैं तो दक्षिणायन और कृष्ण पक्ष में दैत्य आत्माएं ज्यादा सक्रिय रहती हैं। जब दानवी आत्माएं ज्यादा सक्रिय रहती हैं, तब मनुष्यों में भी दानवी प्रवृत्ति का असर बढ़ जाता है इसीलिए उक्त दिनों के महत्वपूर्ण दिन में व्यक्ति के मन-मस्तिष्क को धर्म की ओर मोड़ दिया जाता है।
अमावस्या के दिन भूत-प्रेत, पितृ, पिशाच, निशाचर जीव-जंतु और दैत्य ज्यादा सक्रिय और उन्मुक्त रहते हैं। ऐसे दिन की प्रकृति को जानकर विशेष सावधानी रखनी चाहिए। प्रेत के शरीर की रचना में 25 प्रतिशत फिजिकल एटम और 75 प्रतिशत ईथरिक एटम होता है। इसी प्रकार पितृ शरीर के निर्माण में 25 प्रतिशत ईथरिक एटम और 75 प्रतिशत एस्ट्रल एटम होता है। अगर ईथरिक एटम सघन हो जाए तो प्रेतों का छायाचित्र लिया जा सकता है और इसी प्रकार यदि एस्ट्रल एटम सघन हो जाए तो पितरों का भी छायाचित्र लिया जा सकता है।
ज्योतिष में चन्द्र को मन का देवता माना गया है। अमावस्या के दिन चन्द्रमा दिखाई नहीं देता। ऐसे में जो लोग अति भावुक होते हैं, उन पर इस बात का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। लड़कियां मन से बहुत ही भावुक होती हैं। इस दिन चन्द्रमा नहीं दिखाई देता तो ऐसे में हमारे शरीर में हलचल अधिक बढ़ जाती है। जो व्यक्ति नकारात्मक सोच वाला होता है उसे नकारात्मक शक्ति अपने प्रभाव में ले लेती है।
धर्मग्रंथों में चन्द्रमा की 16वीं कला को 'अमा' कहा गया है। चन्द्रमंडल की 'अमा' नाम की महाकला है जिसमें चन्द्रमा की 16 कलाओं की शक्ति शामिल है। शास्त्रों में अमा के अनेक नाम आए हैं, जैसे अमावस्या, सूर्य-चन्द्र संगम, पंचदशी, अमावसी, अमावासी या अमामासी। अमावस्या के दिन चन्द्र नहीं दिखाई देता अर्थात जिसका क्षय और उदय नहीं होता है उसे अमावस्या कहा गया है, तब इसे 'कुहू अमावस्या' भी कहा जाता है। अमावस्या माह में एक बार ही आती है। शास्त्रों में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है। अमावस्या सूर्य और चन्द्र के मिलन का काल है। इस दिन दोनों ही एक ही राशि में रहते हैं।
कुछ मुख्य अमावस्या :
🌚🌚🌚🌚🌚🌚🌚भौमवती अमावस्या, मौनी अमावस्या, शनि अमावस्या, हरियाली अमावस्या, दिवाली अमावस्या, सोमवती अमावस्या, सर्वपितृ अमावस्या।
चेतावनी :
🐙🐙🐙 इस दिन किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए। इसके शरीर पर ही नहीं, आपके भविष्य पर भी दुष्परिणाम हो सकते हैं। जानकार लोग तो यह कहते हैं कि चौदस, अमावस्या और प्रतिपदा उक्त 3 दिन पवित्र बने रहने में ही भलाई है।