Sunday, June 4, 2017

स्वर विज्ञान (अनूठी विद्या)

स्वर विज्ञान (अनूठी विद्या)

अनूठी विद्या.... कब करें कौन सा काम आप अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति और क्षेत्र की धाराओं तक को बदल सकने का सामर्थ्य है स्वर विज्ञान के द्वारा

आईने में क्या कभी आपने अपनी नाकको ध्यान से देखा है? अगर हाँ, तो बताइए हमारे जीवन में नाक की क्या उपयोगिता है?इस प्रश्न का उत्तर देने के बाद ही आगे पढ़ें।यदि आपका उत्तर भी यही है कि नाक हमारी प्रमुख ज्ञानेन्द्रिय है, इसके द्वारा हम गंध की पहचान एवं आवश्यक प्राणवायु ग्रहण करते हैं, तो आज तक आप भी एक महत्वपूर्ण एवं लाभदायक विज्ञान से अनभिज्ञ हैं।इसके विपरीत यदि आपके उत्तर में स्वर-विज्ञान स्वरोदय विज्ञान का भी उल्लेख है, तो निश्चित ही आप भाग्यवान हैं एवं ईश्वर के कृपापात्र हैं,क्योंकि स्वर विज्ञान को जाननेवाला कभी भी विपरीत परिस्थितियों में नहीं फँसता और फँस भी जाए तो आसानी से
विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाकर बाहर
निकल जाता है।

स्वर विज्ञान एक बहुत ही आसान विद्या है। इस विद्या को प्रसिद्ध स्वर साधक ज्ञान न होने वालो ने 'विज्ञान' कहकर सुशोभित किया है। इनके अनुसार स्वरोदय, नाक के छिद्र से ग्रहण किया जानेवाला श्वास है, जो वायु के रूप में होता है। श्वास ही जीव का प्राण है और इसी श्वास को स्वर कहा जाता है। स्वर के चलने की क्रिया को उदय होना मानकर स्वरोदय कहा गया है तथा विज्ञान, जिसमें कुछ विधियाँ बताई गई हों और विषय के रहस्य को समझने का प्रयास हो, उसे विज्ञान कहा जाता है। स्वरोदय विज्ञान एक आसान प्रणाली है, जिसे प्रत्येक श्वास लेनेवाला जीव प्रयोग में ला सकता है।
स्वरोदय अपने आप में पूर्ण विज्ञान है। इसके ज्ञान मात्र से ही व्यक्ति अनेक लाभों से लाभान्वित होने लगता है। इसका लाभ प्राप्त करने के लिए आपको कोई कठिन गणित, साधना, यंत्र-जाप, उपवास या कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होती है।आपको केवल श्वास की गति एवं दिशा की स्थिति ज्ञात करने का अभ्यास मात्र करना है।यह विद्या इतनी सरल है कि अगर थोड़ी लगन एवं आस्था से इसका अध्ययन या अभ्यास किया जाए तो जीवनपर्यन्त इसके असंख्य लाभों से अभिभूत हुआ जा सकता है।सूर्य, चंद्र और सुषुम्ना स्वर सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को महसूस करने का प्रयत्न कीजिए। देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है। स्वरोदय विज्ञान के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा।इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से निःश्वास निकलता महसूस करें तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा। श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वरोदय विज्ञान का आधार हैं।सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिवस्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात् पार्वती का रूप है।इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात् इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थितहै, अतः दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा।

*स्वर को पहचानने की सरल विधियाँ
(1) शांत भाव से मन एकाग्र करके बैठ जाएँ। अपने दाएँ हाथको नाक छिद्रों के पास ले जाएँ।तर्जनी अँगुली छिद्रों के नीचे रखकर श्वास बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से श्वास का अधिक स्पर्श
होगा। जिस तरफ के छिद्र से श्वास निकले, बस वही स्वर चल रहा है।
(2) एक छिद्र से अधिक एवं दूसरे छिद्र से कम वेग का श्वासनिकलता प्रतीत हो तो यह सुषुम्ना के साथ मुख्य स्वर कहलाएगा।
(3) एक अन्य विधि के अनुसार आईने को नासाछिद्रों केनीचे रखें। जिस तरफ के छिद्र के नीचे काँच पर वाष्प के कण दिखाई दें, वही स्वर चालू समझें। जीवन में स्वर का चमत्कार.....

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स्वर विज्ञान अपने आप में दुनिया का महानतम ज्योतिष विज्ञान है जिसके संकेत कभी गलत नहीं जाते।शरीर की मानसिक और शारीरिक क्रियाओं से लेकर दैवीय सम्पर्कों और परिवेशीय घटनाओं तक को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला स्वर विज्ञान दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है।स्वर विज्ञान का सहारा लेकर आप जीवन को नई दिशा दृष्टि डे सकते है.दिव्य जीवन का निर्माण कर सकते हैं,लौकिक एवं पारलौकिक यात्रा को सफल बना सकते हैं।यही नहीं तो आप अपने सम्पर्क मेंआने वाले प्रत्येक व्यक्ति और क्षेत्र की धाराओं तक को बदल सकने का सामर्थ्य पा जाते हैं।अपनी नाक के दो छिद्र होते हैं। इनमें से सामान्यअवस्था में एक ही छिद्र से हवा का आवागमन होता रहता है। कभी दायां तो कभी बांया।जिस समय स्वर बदलता है उस समय कुछ सैकण्ड के लिए दोनों नाक में हवा निकलती प्रतीत होती है। इसके अलावा कभी -कभी सुषुम्ना नाड़ी के चलते समय दोनों नासिक छिद्रों से हवा निकलती है। दोनों तरफ सांस निकलने का समय योगियों के लिए योग मार्ग में प्रवेश करने का समय होता है।बांयी तरफ सांस आवागमन का मतलब है आपके शरीर की इड़ा नाड़ी में वायु प्रवाह है। इसके विपरीत दांयी नाड़ी पिंगला है।दोनों के मध्य सुषुम्ना नाड़ी का स्वर प्रवाह होता है।अपनी नाक से निकलने वाली साँस को परखने मात्र से आप जीवन के कई कार्यों को बेहतर बना सकते हैं। सांस का संबंध तिथियों और वारों से जोड़कर इसे और अधिक आसान बना दिया गया है।

*जिस तिथि को जो सांस होना चाहिए,वही यदि होगा तो आपका दिन अच्छा जाएगा*। इसके विपरीत होने पर आपका दिन बिगड़ा ही रहेगा। इसलिये साँस पर ध्यान दें औरजीवन विकास की यात्रा को गति दें।
मंगल, शनि और रवि का संबंध सूर्य स्वर से है जबकि शेष का संबंध चन्द्र स्वर से।आपके दांये नथुने से निकलने वाली सांस पिंगला हैइस स्वर को सूर्य स्वर कहा जाता है। यह गरम होती है।
जबकि बांयी ओर से निकलने वाले स्वर को इड़ा नाड़ी का स्वर कहा जाता है। इसका संबंध चन्द्र से है और यह स्वर ठण्डा है।

*शुक्ल पक्ष:-*
• प्रतिपदा, द्वितीया व तृतीया बांया (उल्टा)
• चतुर्थी, पंचमी एवं षष्ठी -दांया (सीधा)
• सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी बांया (उल्टा)
• दशमी, एकादशी एवं द्वादशी –दांया (सीधा)
• त्रयोदशी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमा
बांया (उल्टा)

कृष्ण पक्ष:-*
• प्रतिपदा, द्वितीया वतृतीया दांया (सीधा)
• चतुर्थी, पंचमी एवंषष्ठी बांया (उल्टा)
• सप्तमी, अष्टमी एवंनवमी दांया(सीधा)
• दशमी, एकादशी एवं द्वादशी बांया(उल्टा)
• त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या -
दांया(सीधा)

सवेरे नींद से जगते ही नासिका से स्वर देखें। जिस तिथि को जो स्वर होना चाहिए, वह हो तो बिस्तर पर उठकर स्वर वाले नासिका छिद्र की तरफ के हाथकी हथेली का चुम्बन ले लें और उसी दिशा में मुंह पर हाथ फिरा लें।
यदि बांये स्वर का दिन हो तो बिस्तर से उतरते समय बांया पैर जमीन पर रखकर नीचे उतरें, फिर दायां पैर बांये से मिला लें और इसके बाद दुबारा बांया पैर आगे निकल कर आगे बढ़ लें। यदि दांये स्वर का दिन हो और दांया स्वर ही निकल रहा हो तो बिस्तर पर उठकर दांयी हथेली का चुम्बन ले लें और फिर बिस्तर से जमीन पर पैर रखते समय पर पहले दांया पैर जमीन पर रखें और आगे बढ़ लें।यदि जिस तिथि को स्वर हो, उसके विपरीत नासिका से स्वर निकल रहा हो तो बिस्तर से नीचे नहीं उतरें और जिस तिथि का स्वर होना चाहिए
उसके विपरीत करवट लेट लें। इससे जो स्वर चाहिए,वह शुरू हो जाएगा और उसके बाद ही बिस्तर से नीचे उतरें। स्नान, भोजन, शौच आदि के वक्त दाहिना स्वर रखें।पानी, चाय, काफी आदि पेय पदार्थ
पीने, पेशाब करने, अच्छे काम करने आदि मेंबांया स्वर होना चाहिए।जब शरीर अत्यधिक गर्मी महसूस करेतब दाहिनी करवट लेट लें और बांया स्वर शुरू कर दें। इससे तत्काल शरीर ठण्ढक अनुभव करेगा।जब शरीर ज्यादा शीतलता महसूस करे तब बांयी करवट लेट लें, इससे दाहिना स्वर शुरू हो जाएगा और शरीर जल्दी गर्मी महसूस करेगा।जिस किसी व्यक्ति से कोई काम हो, उसे अपने उस तरफ रखें जिस तरफ की नासिका का स्वर निकल रहा हो। इससे काम निकलने मेंआसानी रहेगी।

*जब नाक से दोनों स्वर निकलें, तब*
किसी भी अच्छी बात का चिन्तन न करें अन्यथा वह बिगड़ जाएगी। इस समय यात्रा न करें अन्यथा अनिष्ट होगा। इस समय सिर्फ भगवान का चिन्तन ही करें। इस समय ध्यान करें तो ध्यान जल्दी लगेगा।

*दक्षिणायन शुरू होने के दिन*
प्रातःकाल जगते ही यदि चन्द्र स्वर हो तो पूरे छह माह अच्छे गुजरते हैं। इसी प्रकार

*उत्तरायण शुरू होने के दिन*
प्रातः जगते ही सूर्य स्वर हो तो पूरे छह माह बढ़िया गुजरते हैं। कहा गया है - कर्के चन्द्रा, मकरे भानु।
रोजाना स्नान के बाद जब भी कपड़े पहनें, पहले स्वर देखें और जिस तरफ स्वर चल रहा हो उस तरफ सेकपड़े पहनना शुरू करें और साथ में यह मंत्र बोलते जाएं
*ॐ जीवं रक्ष*।
इससे दुर्घटनाओंका खतरा हमेशा के लिए टल जाता है।
आप घर में हो या आफिस में, कोई आपसे मिलने आए और आप चाहते हैं कि वह ज्यादा समय आपके पास नहीं बैठा रहे। ऎसे में जब भी सामनेवाला व्यक्ति आपके कक्ष में प्रवेश करे उसी समयआप अपनी पूरी साँस को बाहर निकाल फेंकियें, इसके बाद वह व्यक्ति जब आपके करीबआकर हाथ मिलाये, तब हाथ मिलाते समय भी यही क्रिया गोपनीय रूप से दोहरा दें।आप देखेंगे कि वह व्यक्ति आपके पास ज्यादा बैठ नहीं पाएगा, कोई न कोई ऎसा कारण उपस्थित हो जाएगा कि उसे लौटना ही पड़ेगा। इसके विपरीत आप किसी को अपने पास ज्यादा देर बिठाना चाहें तो कक्ष प्रवेश तथा हाथ मिलाने की क्रियाओं के वक्त सांस को अन्दर खींच लें।आपकी इच्छा होगी तभी वह व्यक्ति लौट पाएगा।कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है, लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है।ऐसे समय में स्वर की प्रतीक्षा करने पर उत्तम अवसर हाथों से निकल सकता है, अत: स्वर परिवर्तन के द्वारा अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए प्रस्थान करना चाहिए या कार्य प्रारंभ करना चाहिए। स्वर विज्ञान का सम्यक ज्ञान आपको सदैव अनुकूल परिणाम प्रदान करवा सकता है।कब करें कौन सा काम
                                     

   *ग्रहों को देखे बिना स्वर विज्ञान के ज्ञान से अनेक समस्याओं बाधाओं एवं शुभ परिणामों का बोध इन नाड़ियों से होने लगता है* *जिससे अशुभ का निराकरण भी आसानी से किया जा सकता है*।चंद्रमा एवं सूर्य की रश्मियों का प्रभाव स्वरों पर पड़ता है।
चंद्रमा का गुण शीतल एवं सूर्य का उष्ण है।
शीतलता से स्थिरता, गंभीरता, विवेक आदि गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज, शौर्य, चंचलता,उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुण पैदा होते हैं किसी भी काम का अंतिम परिणाम उसकेआरंभ पर निर्भर करता है। शरीर व मन की स्थिति, चंद्र व सूर्य या अन्य ग्रहों एवं नाड़ियों को भलीभांति पहचान कर यदि काम शुरु करें
तो परिणाम अनुकूल निकलते हैं।स्वर वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि विवेकपूर्ण औरस्थायी कार्चंद्रस्वर में किए जाने चाहिए, *जैसे*विवाह, दान, मंदिर, जलाशय निर्माण, नया वस्त्र धारण करना, घर बनाना, आभूषण खरीदना, शांति अनुष्ठानकर्म,व्यापार, बीज बोना, दूर प्रदेशों की यात्रा,विद्यारंभ, धर्म, यज्ञ, दीक्षा, मंत्र, योग क्रिया आदि ऐसे कार्य हैं कि जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की आवश्यकता होती है।इसीलिए चंद्र स्वर के चलते इन कार्यो का आरंभशुभ परिणामदायक होता है। उत्तेजना, आवेश और जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनमें सूर्य स्वर उत्तम कहा जाता है। दाहिने नथुने से श्वास ठीक आ रही हो अर्थात सूर्य स्वर चल रहा हो तो परिणाम अनुकूल मिलने वाला होता है।दबाए मानसिक विकार कुछ समय के लिए दोनों नाड़ियां चलती हैं अत: प्राय:शरीर संधि अवस्था में होता है। इस समय पारलौकिक भावनाएं जागृत होती हैं। संसार की ओर से विरक्ति, उदासीनता और अरुचि होने लगती है। इस समय में परमार्थ चिंतन, ईश्वरआराधना आदि की जाए, तो सफलता प्राप्त हो सकती है। यह काल सुषुम्ना नाड़ी का होता है, इसमें मानसिक विकार दब जाते हैं और आत्मिक भाव का उदय होता है।

*अन्य उपाय*
यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो जो स्वर नहीं चल रहा है, उस पैर को आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए तथा अचलित स्वर की ओर उस पुरुष या महिला को लेकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करने से क्रोधी व्यक्ति के क्रोध को आपका अविचलित स्वर
का शांत भाग शांत बना देगा और मनोरथ की सिद्धि होगी।गुरु, मित्र, अधिकारी, राजा, मंत्री आदि से वाम स्वर से ही वार्ता करनी चाहिए।कई बार ऐसे अवसर भी आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है।ऐसे समय स्वर बदलने के प्रयास करने चाहिए।स्वर को परिवर्तित कर अपने अनुकूल करने के लिए कुछ उपायकर लेने चाहिए। जिस नथुने से श्वास नहीं आरही हो, उससे दूसरे नथुने को दबाकर पहले नथुने से श्वास निकालें। इस तरह कुछ ही देर में स्वर परिवर्तित हो जाएगा।

घी खाने से वाम स्वर
         और
शहद खाने से दक्षिण स्वर
         चलना प्रारंभ हो जाता है।

राहू और बारवां भाव

राहू  और  बारवां भाव 
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कुंडली के  एक  अहम  भाव व्यय  भाव में राहू  के  होने  पर  जातक को क्या  क्या  फल मिलते  है  उन  पर  कुछ  लिख  रहा हूँ  क्योंकि  पिछले  दिनों में मुझे  ज्यादातर  कुंडलियों  में राहू इस  भाव  में मिले  तो  सोचा  की  आज  दोबारा  से  इसके  उपर एक  पोस्ट करू  हालाँकि  एक  साल  पहले भी इस  पर  पोस्ट  की  थी | इस  पर  कुछ  लिखने  से  पहले  राहू  क्या  है  उस  पर  भी  कुछ  लिख  रहा  हूँ | राहु वास्तव में छाया ग्रह है,यह अपने ऊपर कोई आक्षेप नही लेता है,यह एक बिन्दु की तरह से है जो जीव के उसी के रूप में आगे पीछे चलता है,कभी जीव का साथ नही छोडता है,इसके अन्दर एक अजीब सी शक्ति होती है,जब जीव का दिमाग इसके अन्दर फ़ंस जाता है तो वह जीव के साथ जो नही होना होता है वह करवा देता है। यह तीन मिनट की गति से कुंडली में प्रतिदिन की औसत चाल चलता है,इसका भरोसा नही होता है,कि सुबह यह क्या कर रहा है दोपहर को क्या करेगा और शाम होते ही यह क्या दिखाना शुरु कर देगा। राहु को ही कालपुरुष की संज्ञा दी गयी है,वह विराट रूप में सभी के सामने है उसकी सीमा अनन्त है,उसकी दूरी को कोई नाप नही सका है,केवल उसकी संज्ञा नीले रंग के रूप में अनन्त आकाश की ऊंचाइयों में देखी जा सकती है,यह केतु से हमशा विरोध में रहता है,और उसकी उल्टी दिशा का बोधक होता है,जो केतु सहायता के रूप में सामने आता है यह उसी का बल हरण करने के बाद उसकी शक्ति और बोध दोनो को बेकार करने के लिये अपनी योग्यता का प्रमाण देने से नही चूकता है। सूर्य के साथ अपनी युति बनाते ही वह पिता या पुत्र को आलसी बना देता है,जो कार्य जीवन के प्रति उन्नति देने वाले होते है वे आलस की बजह से पूरे नही हो पाते है,वह आंखो को भ्रम में डाल देता है होता कुछ है और वह दिखाना कुछ शुरु कर देता है। जातक के साथ जो भी कार्य चल रहा होता है उसके अन्दर असावधानी पैदा करने के बाद उस कार्य को बेकार करने के लिये अपनी शक्ति को देता है,पलक झपकते ही आंख की किरकिरी बनकर सडक में मिला देता है|
बबारवां  भाव  हमारा  सोये  हुवे  दिमाक  का प्रतीक  होता  है |  अचानक  से नये  विचारों का  उत्पन  होना  इसी  भाव  के कारण  होता  है | ये  हमारे  अंतर्ज्ञान  को  भी  दर्शाता  है  जैसे  की  स्वप्न  में  किसी  चीज का पहले  से आभास  हो जाना इसी भाव पर  निर्भर  करता  है | ये  बारवां  भाव  जो  की  हमारे  व्यय  का माना  जाता  है ये  भाव हमारे मन  में अचानक  से  आये  हुवे  ख्यालात  कल्पना  मोक्ष  आदि  का भी माना  गया  है  | इस  भाव में आया  हुआ  राहू  जातक  को  कल्पनाशील  बहुत  बना  देता  है  | जातक  जीवन  में अनेक  प्रकार  की  योजनाये बनाता  है  लेकिन  अंत  में उन  योजनाओं का  नतीजा  सिवाए  सिर्फ  के जातक को  कुछ  हासिल  नही  होता  \  लाल  किताब में इस  भाव के राहू  को  शेखचिल्ली  की  संज्ञा  दी  गई है  जैसे  की  आप  सभी  जानते  है  की शेखचिल्ली  की कहानियों  को हास्यापद  के  रूप  में लिया  जाता  है  की कैसे वो  एक पैसे  के बारे  में सोचकर  ह  बड़े  व्यापार  और अच्छा खुशहाल  परिवार  की  कल्पना कर  लेता  है  लेकिन  अंत  में उसके  सभी  सपने  बिखर  जाते  है  इसी प्रकार  इस  भाव का राहू भी  जातक  के  सपनों  को  बिखरने  वाला  माना  गया है \  जातक  सोचता  तो  पता  नही  क्या क्या  है लेकिन  अंत  में उसे कुछ हासिल  नही  हो  पाता  है  \
राहू  को  ज्योतिष में धुंवा  ,माना  गया है  और धुंवा  भी  ऐसा  धुंवा  जो  गीली  लकडयों  कन्डो  आदि  से  बना  हो  और  जिसे हम रोटी पकाने  आदि  के कुछ  भी  काम  में नही  ले  सकते  ये धुंवा  हमारे  आँखे के  सामने  सिवाए  अँधेरा करने के  अन्य कुछ  काम  नही  आता  बल्कि हमारी  आँखों को  ही  नुक्सान  पहुंचा  देता  है इसिलिय इस भाव  का राहू जातक  की  आँखों  की  रौशनी  के लिए  भी  उत्तम  फल  नही  देता  और  जातक  के मन  के उपर  एक  तरह  से  भ्रम  रूपी  धुंवा  फैला  देता  है  जिस से  जातक किसी  न किसी  भ्रम  में जीने  लग  जाता है  | जातक  के मन में कई बार ये  भी  भ्रम पैदा  हो  जाता  है  की वो  किसी  देवी  देवता  को  आसानी से  सिद्ध  कर  लेगा  या कोई  ऐसी विद्या  बहुत  जल्द  सिख  लेगा  की  किसी  की शक्ल  देखते  ही  उसके  बारे  में सब में  सब  कुछ  बता  देगा \
इस भाव के राहू वाले जातक  जीवन  के सुखों का  भी  पूर्ण  रूप  से  आनन्द  नही ले पाते  है  उनके  अचेतन  मन में कोई न कोइ समस्या  बनी  रहती  है  जिस  से  वो  जीवन का  पूर्ण आनन्द  नही  ले  पाते  \  आप  इन्हें  मानसिक  रूप  से कमजोर कह  सकते है जिस  से  इन्हें  कोई  न कोई  छोटी मोटी मानसिक  बिमारी  भी  हो  जाती है \
इस  भाव के  राहू  वाले  जातक  की  एक  ख़ास  बात  अवस्य होती  है  की  वो  चाहे  मन  से  बैचेन  रहे  लेकिन  जानबुझकर  किसी अन्य का बुरा नही  करता है  ,  दूसरों का  फला  करने  की  हमेशा कोसिस करता  है  चाहे  उसे  उसकी  नेकी  का फल  मिले  या न  मिले  \
इस  भाव का  राहू  खर्च के  सन्दर्भ में भी  अच्छा नही होता राहू  को  हाथी माना  गया  है  और  जातक का खर्च हाथी  के समान  बड़ा  होता चला  जाता  है  \
एक ख़ास बात  की  भाव का राहू  रात  के समय  अलामते  भी  बहुत  लाता  है  रात के  समय  कई  बार  ऐसी  बातें  हो जाती है  जिनका  कोई  आधार नही  होता  लेकिन  कुछ समय  के लिए  जातक  को  मानसिक  रूप  से काफी  परेशान  भी  कर  देती  है  \
अब  बात  आती  है उपाय  की  तो इस  भाव के राहू  के लिय  जातक  को अपनी  कमाई  का  एक  हिस्सा  अपनी बहन बुआ  बेटी  पर  खर्च  अवस्य  करते  रहना  चाहिए  जिस  से उसे  धन  को  बचत  करने  में सहायता मिलेगी  और  व्यर्थ  के  खर्च  में कमी  होगी  साथ  ही जातक  को  मंगल  की  सहायता  लेनी  चाहिए  हमेशा चूल्हे  के  पास  बैठकर  रोटी  खानी  चाहिए  और  एक  लाल  रंग  के  कपड़े  की  चोकोर  थैली  में सौंफ  बांधकर  अपने  सिरहाने  रखनी  चाहिए \ ये  भाव  बिर्हस्पती का पक्का  घर  है  इसिलिय यदि जातक  अपने सिर पर  चोटी  कायम  रखता  है  तो  राहू के दुस्प्भाव  से काफी  हद  तक  बच सकता है | ध्यान  रखे  की  गोचर में इस  भाव में आया हुआ राहू  जातक  को बहुत  ज्यादा  कल्पनाशील  बना  देता है  इसिलिय  जब  भी  किसी  भी जातक  के  इस  भाव में राहू  गोचर में आया हुआ हो उसे  कोई  न्या काम  सुरुवात  करने  से  बचना  चाहिए  |

Friday, June 2, 2017

ज्योतिष द्वारा चोरी गयी वस्तू का ज्ञान

ज्योतिष द्वारा चोरी गयी वस्तू का ज्ञान ...

कभी -कभी घरों में छोटी मोटी चोरी की घटना घट जाती है।तब एक छट -पटाहट सी रहती है ,चोर कौन हो सकता है।ज्योतिष द्वारा इसका सटीक पता प्रश्न कुंडली से लगाया
जाता है।
जब भी चोरी का पता लगता है उस समय को नोट कर लीजिये।अगर किसी को जन्मकुंडली देखने का ज्ञान है तो ठीक है नहीं तो किसी भी ज्योतिष के पास समय को बता कर समस्या कासमाधान किया जा सकता है।
चोरी होने की सूचना मिलते ही तुरंत प्रश्न कुंडली बनायें।
इन लग्नो में खोयी वस्तु ,उसके दिखाए गए लग्नो के सामने की दिशा में गयी है
मेष या वृषभ लग्न ----पूर्व दिशा
मिथुन लग्न ----- अग्नि कोण
कर्क लग्न ---- दक्षिण
सिंह लग्न ------------ नैरित्य कोण
कन्या लग्न --------- उत्तर दिशा
तुला और वृश्चिक लग्न -- पश्चिम दिशा
धनु लग्न ------------ वायव्य कोण
मकर और कुम्भ लग्न ---उत्तर दिशा
मीन लग्न ------------इशान कोण
अब सवाल उठता है चोरी करने वाला कौन हो सकता है तो
नीचे लिखे लग्नो के आधार पर पता लगाया जा सकता है।
मेष लग्न ---ब्राह्मण या सम्मानीय भद्र पुरुष
वृषभ लग्न--क्षत्रिय
मिथुन लग्न -----वेश्य
कर्क लग्न -------शुद्र या सेवक वर्ग
सिंह लग्न ------स्वजन या आत्मीय व्यक्ति
कन्या लग्न---- कुलीन स्त्री ,घर की बहू -बेटी या बहन
तुला लग्न ----पुत्र ,भाई या जमाता
वृश्चिक लग्न-- इतर जाति का व्यक्ति
धनु लग्न ---स्त्री
मकर लग्न ---वेश्य या व्यापारी
कुम्भ लग्न---चूहा
मीन लग्न----खोयी घर में ही पड़ी है कहीं ( मिस-प्लेस )
यह सब जानने के बाद यह भी प्रश्न उठता है , जो सामान चोरी हुआ है वह मिलेगा या नहीं ? इसके लिए प्रश्न कुंडली में चंद्रमा की स्थिति देखी जाती है। यहाँ पर चंद्रमा को मालिक और सातवें भाव को चोर माना जाता है।चौथे भाव को धन -प्राप्ति की जगह और लग्न -भाव को चोरी गया सामानमाना जाता है।
1) लग्न -भाव का स्वामी अगर सातवें घर या उसके स्वामी के साथ हो तो कोशिश करने पर चोरी गया धन मिल जाता है।
2)अगर लग्न -भाव का स्वामी अष्ठम में हो तो चोर खुद ही
चोरी की गयी वस्तु लौटा देगा।लेकिन ग्रह अस्त होगा तो
चोरी का पता चलेगा पर वस्तु नहीं मिलेगी।
3)लग्न-भाव का स्वामी दसवें घर के स्वानी के साथ है तो चोर माल सहित पकड़ा जायेगा।
4) अगर लग्नेश की दृष्टि दसवें घर के स्वामी पर नहीं पद रही हो तो चोरी गयी वस्तु नहीं मिलेगी।
5)अगर सातवें घर का स्वामी सूर्य के साथ अस्त हो तो बहुत समय बाद चोर का तो पता चल जायेगा पर वास्तु नहीं मिलेगी।
6)अगर सप्तमेश और लग्नेश साथ में हो तो चोर राज भय से डर कर खुद ही माल को दे देता है।
7)अगर सप्तमेश पर लग्नेश की दृष्टि ना पड़ रही हो तो ना चोर को लाभ लाभ होता है ना मालिक को ,माल को मध्यस्थ ही हड़प लेता है।
8)प्रश्न कुंडली में अष्ठम भाव चोर के धन रखने का स्थान होता है इसलिए अगर धन भाव का स्वामी अष्ठम में ही बैठा हो तो माल नहीं मिलेगा।और अगर धन भाव का स्वामी सप्तम में हो तो भी माल नहीं मिलता क्यूँ कि "चंद्रास्वामी चोर सप्तम " के अनुसार सप्तम भाव स्वयं चोर है।
9) धनेश अगर अष्टमेश के साथ हो तो धन मिल जाता है।
10) अगर अष्टमेश ,दशमेश के साथ हो तो राज-पुरुष चोर का पक्षपाती ही माल नहीं मिलेगा।
अब चोरी हुई वस्तु कहाँ छिपाई गयी है इस पर विचार करते हैं।
1) लग्नेश और सप्तमेश का आपस में परिवर्तन या दोनों एक ही भाव में हो तो वस्तु घर में ही कहीं छुपी या छुपाई गयी है।
2) चंद्रमा अगर लग्न में हो तो वस्तु पूर्व दिशा में होगी और अगर सप्तम में हो तो वस्तु पश्चिम में मिलेगी।चंद्रमा अगर दशम ने हो तो दक्षिण और चतुर्थ में हो तो वस्तु उत्तर दिशा में मिलेगी।
3) अगर लग्न में अग्नितत्व राशि ( मेष ,सिंह ,धनु ) हो तो वस्तु घर के पूर्व,अग्नि -स्थान , रसोई घर में ही मिल जाती है।
4 ) लग्न में अगर पृथ्वी -तत्व राशि ( वृषभ ,कन्या ,मकर ) हो तो वस्तु दक्षिण दिशा में भूमि में दबी मिलेगी।
5 ) अगर लग्न में वायु -तत्व राशि ( मिथुन ,तुला कुम्भ ) हो तो वस्तु पश्चिम दिशा में हवा में लटकाई गयी है।
6 )लग्न में जल-तत्व राशि ( कर्क ,वृश्चिक ,कुम्भ ) हो तो वस्तु जलाशय के पास या उसके आस-पास उत्तर दिशा में मिलेगी।
ग्रहों के हिसाब से चोर कौन है और कितनी उम्र का है ये भी
पता लगाने की कोशिश करते हैं।
1) प्रश्न -कुंडली में यदि लग्न पर सूर्य-चन्द्र दोनों की दृष्टि पड़रही हो तो वस्तु किसी घर के व्यक्ति ने ही चुराई है।और यदि लग्नेश ,सप्तमेश से युक्त हो कर लग्न में हो तो भी चोरी किसी घर के व्यक्ति ने ही की है।
2)लग्न पर सूर्य या चन्द्र किसी एक ही की दृष्टि पड़ रही हो
तो वस्तु किसी आस पास रहने वाले व्यक्ति ने चुराई है।
3)अगर सप्तमेश द्वादश या तृतीय स्थान में हो तो घर के नौकर ने चोरी की है।
4 )अगर सप्तमेश स्वग्रही या अपनी उच्च राशि में हो तो चोरी पेशेवर चोर ने की है। यहाँ पर चोर की शक्ति का ज्ञान
लग्न,सप्तम और दशम भाव के बल के अनुसार करना चाहिए।
5) प्रश्न -कुंडली में अगर सूर्य बलवान हो तो पिता या
पितातुल्य व्यक्ति ,चंद्रमा बलि हो तो माँ या मातातुल्य
महिला ,शुक्र बली हो तो महिला ,वृहस्पति बलि हो तो घर के मालिक ने ,शनि बलि हो तो पुत्र ने और मंगल बलि हो  तो भाई या सगा भतीजा तथा बुध बलवान हो तो मित्र या मित्र -सम्बन्धियों ने चोरी की है।
चोर की उम्र क्या हो सकती है।
लग्न में अगर शुक्र ----युवक
बुध ---बालक
गुरु -----वृद्ध
मंगल--युवक
शनि -वृद्ध चोर है।
लग्न और दशम भाव के मध्य सूर्य है तो चोर बालक है। दशम भाव और सप्तम भाव के मध्य सूर्य हो तो चोर युवक है। लग्न और चतुर्थ भाव के मध्य सूर्य हो तो चोर अत्यंत वृद्ध है।