Saturday, March 18, 2017

लग्न कुंडली और चलित कुंडली में क्या अंतर है?

लग्न कुंडली और चलित कुंडली में क्या अंतर है?

लग्न कुंडली का शोधन चलित कुंडली है, अंतर सिर्फ
इतना है कि लग्न कुंडली यह दर्शाती है कि जन्म के
समय क्या लग्न है और सभी ग्रह किस राशि में
विचरण कर रहे हैं और चलित से यह स्पष्ट होता है कि
जन्म समय किस भाव में कौन सी राशि का प्रभाव
है और किस भाव पर कौन सा ग्रह प्रभाव डाल रहा
है। प्रश्न: चलित कुंडली का निर्माण कैसे करते हैं ?
उत्तर: जब हम जन्म कुंडली का सैद्धांतिक तरीके से
निर्माण करते हैं तो सबसे पहले लग्न स्पष्ट करते हैं,
अर्थात भाव संधि और भाव मध्य के उपरांत ग्रह स्पष्ट
कर पहले लग्न कुंडली और उसके बाद चलित कुंडली
बनाते हैं। लग्न कुंडली में जो लग्न स्पष्ट अर्थात जो
राशि प्रथम भाव मध्य में स्पष्ट होती है उसे प्रथम
भाव में अंकित कर क्रम से आगे के भावों में अन्य
राशियां अंकित कर देते हैं और ग्रह स्पष्ट अनुसार जो
ग्रह जिस राशि में स्पष्ट होता है, उसे उस राशि के
साथ अंकित कर देते हैं। इस तरह यह लग्न कुंडली तैयार
हो जाती है। चलित कुंडली बनाते समय इस बात का
ध्यान रखा जाता है कि किस भाव में कौन सी
राशि भाव मध्य पर स्पष्ट हुई अर्थात प्रथम भाव में
जो राशि स्पष्ट हुई उसे प्रथम भाव में और द्वितीय
भाव में जो राशि स्पष्ट हुई उसे द्वितीय भाव में
अंकित करते हैं। इसी प्रकार सभी द्वादश भावों मंे
जो राशि जिस भाव मध्य पर स्पष्ट हुई उसे उस भाव
में अंकित करते हैं न कि क्रम से अंकित करते हैं। इसी
तरह जब ग्रह को मान में अंकित करने की बात आती
है तो यह देखा जाता है कि भाव किस राशि के
कितने अंशों से प्रारंभ और कितने अंशों पर समाप्त
हुआ। यदि ग्रह स्पष्ट भाव प्रारंभ और भाव समाप्ति
के मध्य है तो ग्रह को उसी भाव में अंकित करते हैं।
यदि ग्रह स्पष्ट भाव प्रारंभ से पहले के अंशों पर है तो
उसे उस भाव से पहले वाले भाव में अंकित करते हैं और
यदि ग्रह स्पष्ट भाव समाप्ति के बाद के अंशों पर है
तो उस ग्रह को उस भाव के अगले भाव में अंकित
किया जाता है। उदाहरण के द्वारा यह ठीक से
स्पष्ट होगा। मान लीजिए भाव स्पष्ट और ग्रह
स्पष्ट इस प्रकार हैं: भाव स्पष्ट और ग्रह स्पष्ट से
चलित कुंडली का निर्माण करते समय सब से पहले हर
भाव में राशि अंकित करते हैं। उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत
चलित कुंडली में प्रथम भाव मध्य में मिथुन राशि
स्पष्ट हुई है। इसलिए प्रथम भाव में मिथुन राशि
अंकित होगी। द्वितीय भाव में भावमध्य पर कर्क
राशि स्पष्ट है, द्वितीय भाव में कर्क राशि अंकित
होगी। तृतीय भाव मध्य पर भी कर्क राशि स्पष्ट है।
इसलिए तृतीय भाव में भी कर्क राशि अंकित की
जाएगी। चतुर्थ भाव में सिंह राशि स्पष्ट है इसलिए
चतुर्थ भाव में सिंह राशि अंकित होगी। इसी प्रकार
यदि उदाहरण कुंडली में देखें तो पंचम भाव में कन्या,
षष्ठ में वृश्चिक, सप्तम में धनु, अष्टम में मकर, नवम में
फिर मकर, दशम में कुंभ, एकादश में मीन और द्वादश में
वृष राशि स्पष्ट होने के कारण ये राशियां इन भावों
में अंकित की जाएंगी। लेकिन लग्न कुंडली में एक से
द्वादश भावों में क्रम से राशियां अंकित की जाती
हैं। राशियां अंकित करने के पश्चात भावों में ग्रह
अंकित करते हैं। लग्न कुंडली में जो ग्रह जिस भाव में
अंकित है, चलित में उसे अंकित करने के लिए भाव का
विस्तार देखा जाता है अर्थात भाव का प्रारंभ और
समाप्ति स्पष्ट। उदाहरण लग्न कुंडली में तृतीय भाव
में गुरु और चंद्र अंकित हैं पर चलित कुंडली में चंद्र चतुर्थ
भाव में अंकित है क्योंकि जब तृतीय भाव का
विस्तार देखकर अंकित करेंगे तो ऐसा होगा। तृतीय
भाव कर्क राशि के 150 32‘49’’ से प्रारंभ होकर
सिंह राशि के 120 21‘07’’ पर समाप्त होता है। गुरु
और चंद्र स्पष्ट क्रमशः सिंह राशि के 080 02‘12’’
और 220 55‘22‘‘ पर हैं। यहां यदि देखें तो गुरु के स्पष्ट
अंश सिंह 080 02‘12’’, तृतीय भाव प्रारंभ कर्क 150
32‘49’’ और भाव समाप्त सिंह 210 21‘07’’ के मध्य हैं,
इसलिए गुरु तृतीय भाव में अंकित होगा। चंद्र स्पष्ट
अंश सिंह 220 55‘22’’ भाव मध्य से बाहर आगे की
ओर है, इसलिए चंद्र को चतुर्थ भाव में अंकित करेंगे।
इसी तरह सभी ग्रहों को भाव के विस्तार के अनुसार
अंकित करेंगे। उदाहरण कुंडली में सूर्य, बुध एवं राहु के
स्पष्ट अंश भी षष्ठ भाव के विस्तार से बाहर आगे
की ओर हैं, इसलिए इन्हें अग्र भाव सप्तम में अंकित
किया गया है। प्रश्न: चलित कुंडली में ग्रहों के
साथ-साथ राशियां भी भावों में बदल जाती हंै,
कहीं दो भावों में एक ही राशि हो तो इससे फलित
में क्या अंतर आता है? उत्तर: हर भाव में ग्रहों के
साथ-साथ राशि का भी महत्व है। चलित कुंडली
का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि हमें भावों के
स्वामित्व का भली-भांति ज्ञान होता है। लग्न
कुंडली तो लगभग दो घंटे तक एक सी होगी लेकिन
समय के अनुसार परिवर्तन तो चलित कुंडली ही
बतलाती है। जैसे ही राशि भावों में बदलेगी भाव
का स्वामी भी बदल जाएगा। स्वामी के बदलते ही
कुंडली में बहुत परिवर्तन आ जाता है। कभी
योगकारक ग्रह की योगकारकता समाप्त हो जाती
है तो कहीं अकारक और अशुभ ग्रह भी शुभ हो जाता
है। ग्रह की शुभता-अशुभता भावों के स्वामित्व पर
निर्भर करती है। इसलिए फलित में विशेष अंतर आ
जाता है। उदाहरण लग्न कुंडली में एक से द्वादश
भावों के स्वामी क्रमशः बुध, चंद्र, सूर्य, बुध, शुक्र,
मंगल, गुरु, शनि, शनि, गुरु, मंगल और शुक्र और चलित में
एक से द्वादश भावों के स्वामी क्रमशः बुध, चंद्र,
चंद्र, सूर्य, बुध, मंगल, गुरु, शनि, शनि, शनि, गुरु और शुक्र
हैं। इस तरह से देखंे तो लग्न कुंडली में मंगल अकारक है
लेकिन चलित में वह अकारक नहीं रहा। सूर्य लग्न में
तृतीय भाव का स्वामी होकर अशुभ है लेकिन चलित
में चतुर्थ का स्वामी होकर शुभ फलदायक हो गया है।
शुक्र, जो शुभ है, सिर्फ द्वादश का स्वामी होकर
अशुभ फल देने वाला हो गया है। इसलिए भावों के
स्वामित्व और शुभता-अशुभता के लिए भी चलित
कुंडली फलित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रश्न: चलित में ग्रह जब भाव बदल लेता है तो क्या
हम यह मानें कि ग्रह राशि भी बदल गई? उत्तर: ग्रह
सिर्फ भाव बदलता है, राशि नहीं। ग्रह जिस राशि
में जन्म के समय स्पष्ट होता है उसी राशि में रहता है।
ग्रह उस भाव का फल देगा जिस भाव में चलित
कुंडली में वह स्थित होता है। जैसे कि उदाहरण लग्न
कुंडली में सूर्य, बुध, राहु वृश्चिक राशि मंे स्पष्ट हुए
लेकिन चलित में ग्रह सप्तम भाव में हैं तो इसका यह
मतलब नहीं कि वे धनु राशि के होंगे। ये ग्रह वृश्चिक
राशि में रहते हुए सप्तम भाव का फल देंगे। प्रश्न: क्या
चलित में ग्रहों की दृष्टि में भी परिवर्तन आता है?
उत्तर: ग्रहों की दृष्टि कोण के अनुसार होती है।
अतः लग्नानुसार दृष्टि का विचार करना चाहिए।
लेकिन जो ग्रह चलित में भाव बदल लेते हैं उनकी दृष्टि
लग्नानुसार करना ठीक नहीं है और न ही चलित
कुंडली के अनुसार। अतः दृष्टि के लिए ग्रहों के
अंशादि का विचार करना ही उत्तम है। प्रश्न:
निरयण भाव चलित और चलित कुंडली में क्या अंतर
है? उत्तर: चलित कुंडली में भाव का विस्तार भाव
प्रारंभ से भाव समाप्ति तक है और भावमध्य भाव
का स्पष्ट माना जाता है। लेकिन निरयण भाव में
लग्न को ही भाव का प्रारंभ माना जाता है
अर्थात जो भाव चलित कुंडली में भाव मध्य है,
निरयण भाव चलित में वह भाव प्रारंभ या भाव संधि
है। इस प्रकार एक भाव का विस्तार भाव प्रारंभ से
दूसरे भाव के प्रारंभ तक माना जाता है। वैदिक
ज्योतिष मंे चलित को ही महत्व दिया गया है।
कृष्णमूर्ति पद्धति में निरयण भाव को महत्व दिया
गया है। प्रश्न: जन्मपत्री लग्न कुंडली से देखनी
चाहिए या चलित कुंडली से? उत्तर: जन्मपत्री चलित
कुंडली से देखनी चाहिए क्योंकि चलित में ग्रहों और
भाव राशियों की स्पष्ट स्थिति दी जाती है।
प्रश्न: क्या भाव संधि पर ग्रह फल देने में असमर्थ हैं?
उत्तर: कोई ग्रह उसी भाव का फल देता है जिस भाव
में वह रहता है। जो ग्रह भाव संधि में आ जाते हैं वे
लग्न के अनुसार भाव के फल न देकर चलित के अनुसार
भाव फल देते हैं, लेकिन वे फल कम देते हैं ऐसा नहीं है। वे
चलित भाव के पूरे फल देते हैं। प्रश्न: चलित कुंडली में
दो भावों में एक राशि कैसे आ जाती है? उत्तर: हां,
ऐसा हो सकता है। यदि दोनों भावों में भाव मध्य
पर एक ही राशि स्पष्ट हो जैसे द्वितीय भाव में
कर्क 20 08‘40’’ पर है और तृतीय भाव में कर्क 280
56‘58’’ पर स्पष्ट हुई तो दोनों भावों, द्वितीय और
तृतीय में कर्क राशि ही अंकित की जाएगी। प्रश्न:
यदि चलित कुंडली में ग्रह उस भाव में विचरण कर
जाए जहां पर उसकी उच्च राशि है तो क्या उसे उच्च
का मान लेना चाहिए? उत्तर: नहीं। ग्रह उच्च राशि
में नजर आता है। वास्तव में ग्रह ने भाव बदला है,
राशि नहीं। इसलिए वह ग्रह उच्च नहीं माना जा
सकता है। प्रश्न: चलित कुंडली को बनाने में क्या
अंतर है ? उत्तर: चलित कुंडली दो प्रकार से बनाई
जाती है - एक, जिसमें भाव की राशियों को
दर्शित कर ग्रहों को भावानुसार रख देते हैं। दूसरे, दो
भावों के मध्य में भाव संधि बना दी जाती है एवं जो
ग्रह भाव बदलते हैं उन्हें भाव संधि में रख दिया जाता
है। उदाहरणार्थ निम्न कुंडली दी गई है। प्रश्न: यदि
मंगल लग्न कुंडली में षष्ठ भाव में है और चलित में सप्तम
भाव में तो क्या कुंडली मंगली हो जाती है? उत्तर:
चलित कुंडली में ग्रह किस भाव में है इसका महत्व है
और मंगली कुंडली भी मंगल की भाव स्थिति के
अनुसार ही मंगली कही जाती है। इसलिए यदि
चलित में मंगल सप्तम में है तो कुंडली मंगली मानी
जाएगी। प्रश्न: यदि मंगल सप्तम भाव में लग्न कुंडली
में और चलित कुंडली में अष्टम भाव में हो तो क्या
कुंडली को मंगली मानें? उत्तर: मंगल की सप्तम और
अष्टम दोनों स्थितियों से कुंडली मंगली मानी
जाती है, इसलिए ऐसी स्थिति में मंगल दोष भंग नहीं
होता। प्रश्न: ग्रह किस स्थिति में चलायमान होता
है? उत्तर: यदि ग्रह के स्पष्ट अंश भाव के विस्तार से
बाहर हैं तो ग्रह चलायमान हो जाता है। प्रश्न:
किन स्थितियों में चलित में ग्रह और राशि बदलती
है? उत्तर: यदि लग्न स्पष्ट प्रारंभिक या समाप्ति
अंशों पर हो तो चलित में ग्रह का भाव बदलने की
संभावनाएं अधिक हो जाती हैं क्योंकि किसी भी
भाव के मध्य राशि के एक छोर पर होने के कारण यह
दो राशियों के ऊपर फैल जाता है। अतः दूसरी राशि
में स्थित ग्रह पहली राशि में दृश्यमान होते हैं। प्रश्न:
ग्रह चलित में किस स्थिति में लग्न जैसे रहते हैं? उत्तर:
यदि लग्न स्पष्ट राशि के मध्य में हो और ग्रह भी
अपनी राशि के मध्य में अर्थात 5 से 25 अंश के भीतर
हों तो ऐसी स्थिति में लग्न और चलित एक से ही
रहते हैं।

पारद शिवलिंग……

पारद शिवलिंग…………………….

पारद  को रसराज कहा जाता है। पारद से बने शिवलिंग की पूजा करने से बिगड़े काम भी बन जाते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार पारद शिवलिंग साक्षात भगवान शिव का ही रूप है इसलिए इसकी पूजा विधि-विधान से करने से कई गुना फल प्राप्त होता है तथा हर मनोकामना पूरी होती है। घर में पारद शिवलिंग सौभाग्य, शान्ति, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए अत्यधिक सौभाग्यशाली है। दुकान, ऑफिस व फैक्टरी में व्यापारी को बढाऩे के लिए पारद शिवलिंग का पूजन एक अचूक उपाय है। शिवलिंग के मात्र दर्शन ही सौभाग्यशाली होता है। इसके लिए किसी प्राणप्रतिष्ठा की आवश्कता नहीं हैं। पर इसके ज्यादा लाभ उठाने के लिए पूजन विधिक्त की जानी चाहिए।
# पूजन की विधि ……………………
सर्वप्रथम शिवलिंग को सफेद कपड़े पर आसन पर रखें।
स्वयं पूर्व-उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठ जाए।
अपने आसपास जल, गंगाजल, रोली, मोली, चावल, दूध और हल्दी, चन्दन रख लें।
सबसे पहले पारद शिवलिंग के दाहिनी तरफ दीपक जला कर रखो।
थोडा सा जल हाथ में लेकर तीन बार निम्न मन्त्र का उच्चारण करके पी लें।
प्रथम बार ॐ मुत्युभजाय नम:
दूसरी बार ॐ नीलकण्ठाय: नम:
तीसरी बार ॐ रूद्राय नम:
चौथी बार ॐशिवाय नम:
हाथ में फूल और चावल लेकर शिवजी का ध्यान करें और मन में ''ॐ नम: शिवाय`` का 5 बार स्मरण करें और चावल और फूल को शिवलिंग पर चढ़ा दें।
इसके बाद ॐ नम: शिवाय का निरन्तर उच्चारण करते रहे।
फिर हाथ में चावल और पुष्प लेकर ''ॐ पार्वत्यै नम:`` मंत्र का उच्चारण कर माता पार्वती का ध्यान कर चावल पारा शिवलिंग पर चढ़ा दें।
इसके बाद ॐ नम: शिवाय का निरन्तर उच्चारण करें।
फिर मोली को और इसके बाद बनेऊ को पारद शिवलिंग पर चढ़ा दें।
इसके पश्चात हल्दी और चन्दन का तिलक लगा दे।
चावल अर्पण करे इसके बाद पुष्प चढ़ा दें।
मीठे का भोग लगा दे।
भांग, धतूरा और बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ा दें।
फिर अन्तिम में शिव की आरती करे और प्रसाद आदि ले लो।
जो व्यक्ति इस प्रकार से पारद शिवलिंग का पूजन करता है इसे शिव की कृपा से सुख समृद्धि आदि की प्राप्ति होती है।
#लाभ……………………..
इसे घर में स्थापित करने से भी कई लाभ हैं, जो इस प्रकार हैं…………………
* पारद शिवलिंग सभी प्रकार के तन्त्र प्रयोगों को काट देता है.
* पारद शिवलिंग जहां स्थापित होता है उसके १०० फ़ीट के दायरे में उसका प्रभाव होता है. इस प्रभाव से परिवार में शांति और स्वास्थ्य प्राप्ति होती है.
* पारद शिवलिंग शुद्ध होना चाहिये, हस्त निर्मित होना चाहिये, स्वर्ण ग्रास से युक्त होना चाहिये, उसपर फ़णयुक्त नाग होना चाहिये. कम से कम सवा किलो का होना चाहिये.
* य़दि बहुत प्रचण्ड तान्त्रिक प्रयोग या अकाल मृत्यु या वाहन दुर्घटना योग हो तो ऐसा शुद्ध पारद शिवलिंग उसे अपने ऊपर ले लेता है. ऐसी स्थिति में यह अपने आप टूट जाता है, और साधक की रक्षा करता है.
* पारद शिवलिंग की स्थापना करके साधना करने पर स्वतः साधक की रक्षा होती रहती है.विशेष रूप से महाविद्या और काली साधकों को इसे अवश्य स्थापित करना चाहिये.
* पारद शिवलिंग को घर में रखने से सभी प्रकार के वास्तु दोष स्वत: ही दूर हो जाते हैं साथ ही घर का वातावरण भी शुद्ध होता है। पारद शिवलिंग की स्थापना करके साधना करने पर स्वतः साधक की रक्षा होती रहती है.विशेष रूप से महाविद्या और काली साधकों को इसे अवश्य स्थापित करना चाहिये.
* पारद शिवलिंग को घर में रखने से सभी प्रकार के वास्तु दोष स्वत: ही दूर हो जाते हैं साथ ही घर का वातावरण भी शुद्ध होता है।
* पारद शिवलिंग साक्षात भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। इसलिए इसे घर में स्थापित कर प्रतिदिन पूजन करने से किसी भी प्रकार के तंत्र का असर घर में नहीं होता और न ही साधक पर किसी तंत्र क्रिया का प्रभाव पड़ता है।
* यदि किसी को पितृ दोष हो तो उसे प्रतिदिन पारद शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए। इससे पितृ दोष समाप्त हो जाता है।
* अगर घर का कोई सदस्य बीमार हो जाए तो उसे पारद शिवलिंग पर अभिषेक किया हुआ पानी पिलाने से वह ठीक होने लगता है।
* पारद शिवलिंग की साधना से विवाह बाधा भी दूर होती है।
# शुद्ध पारद शिवलिंग की पहचान*******
पारद शिवलिंग पारा अर्थात Mercury का बना होता है. आज कल बाजार में पारद शिवलिंग बने बनाए मिलते है. ये सर्वथा अशुद्ध एवं किन्ही विशेष परिस्थितियों में हानि कारक भी होते है. जैसे सुहागा एवं ज़स्ता के संयोग से बना शिवलिंग भी पारद शिवलिंग जैसा ही लगता है. इसी प्रकार एल्युमिनियम से बना शिवलिंग भी पारद शिवलिंग जैसा ही लगता है. किन्तु उपरोक्त दोनों ही शिवलिंग घर में या पूजा के लिए नहीं रखने चाहिए. इससे रक्त रोग, श्वास रोग एवं मानसिक विकृति उत्पन्न होती है. अतः ऐसे शिवलिंग या इन धातुओ से बने कोई भी देव प्रतिमा घर या पूजा के स्थान में नहीं रखने चाहिए.
पारद शिव लिंग का निर्माण क्रमशः तीन मुख्या धातुओ के रासायनिक संयोग से होता है. “अथर्वन महाभाष्य में लिखा है क़ि-“द्रत्यान्शु परिपाकेनलाब्धो यत त्रीतियाँशतः. पारदम तत्द्वाविन्शत कज्जलमभिमज्जयेत. उत्प्लावितम जरायोगम क्वाथाना दृष्टोचक्षुषः तदेव पारदम शिवलिंगम पूजार्थं प्रति गृह्यताम. अर्थात अपनी सामर्थ्य के अनुसार कम से कम कज्जल का बीस गुना पारद एवं मनिफेन (Magnesium) के चालीस गुना पारद, लिंग निर्माण के लिए परम आवश्यक है. इस प्रकार कम से कम सत्तर प्रतिशत पारा, पंद्रह प्रतिशत मणि फेन या मेगनीसियम तथा दस प्रतिशत कज्जल या कार्बन तथा पांच प्रतिशत अंगमेवा या पोटैसियम कार्बोनेट होना चाहिए.ऐसे पारद शिवलिंग को आप केवल बिना पूजा के अपने घर में रख सकते है. यदि आप चाहें तो इसकी पूजा कर सकते है. किन्तु यदि अभिषेक करना हो तो उसके बाद इस शिवलिंग को पूजा के बाद घर से बाहर कम से कम चालीस हाथ की दूरी पर होना चाहिए. अन्यथा इसके विकिरण का दुष्प्रभाव समूचे घर परिवार को प्रभावित करेगा. किन्तु यदि रोज ही नियमित रूप से अभिषेक करना हो तो इसे घर में स्थायी रूप से रखा जा सकता है. ऐसे व्यक्ति बहुत बड़े तपोनिष्ठ उद्भात्त विद्वान होते है. यह साधारण जन के लिए संभव नहीं है. अतः यदि घर में रखना हो तो उसका अभिषेक न करे.
पारद शिवलिंग यदि कोई अति विश्वसनीय व्यक्ति बनाने वाला हो तो उससे आदेश या विनय करके बनवाया जा सकता है. वैसे भी इसका परीक्षण किया जा सकता है. यदि इस शिवलिंग को अमोनियम हाईड्राक्साइड से स्पर्श कराया जाय तो कोई दुर्गन्ध नहीं निकलेगा. किन्तु पोटैसियम क्लोरेट से स्पर्श कराया जाय तो बदबू निकलने लगेगी. यही नहीं पारद शिव लिंग को कभी भी सोने से स्पर्श न करायें नहीं तो यह सोने को खा जाता है.
यद्यपि पारद शिवलिंग एवं इसके साथ रखे जाने वाले दक्षिणा मूर्ती शंख की बहुत ही उच्च महत्ता बतायी गयी है. विविध धर्म ग्रंथो में इसकी प्रशंसा की गयी है.

सूरज और शनि की युति

*सूरज और शनि की युत*

सूरज और शनि की युति की कूछ ज्योतिष के जानकार इस योग को पितृ दोष की श्रेणी मे रखते है.। पर अग्र ये युति सम डिग्री मे हो तो सूरज को पिता तो शनि को उसका बेटा ये दोनो पिता पुत्र की जोड़ी बहूत खतरनाक है दोनो को एक दूसरे का शत्रु मना जाता है।सूरज और शनि मे से जो ज्यादा पावरफुल होगा उसकी स्थिति दूसरे से बढ़िया होगी जैसे मान लो सूरज और शनि मे अग्र सूरज की स्थिति
हुई तो बेटा जब गर्भ मे आयगा बाप की स्थिति सही होनी शुरू हो जाती है और जैसे जैसे बेटा बड़ा होता है
वैसे वैसे पिता की possition बढ़िया होती जाती है पर बेटे की खुद की possition सही नहीँ rehti वो कोई काम सही से नहीँ कर पाता समाज मे उसकी खुद की
कोई possition नहीँ होती लोग उसको उसके बाप के कारण जानते है और वह जातक जीवन मे तब तक कामयाब नहीँ होता जब तक की उसके पिता जी जीवित है और इसके उलट अग्र सूरज और शनि मे शनि ज्यादा powerfull हुआ तो जातक जब गर्भ मे ही होगा तभी से बाप की possition कमजोर होनी शुरू हो जाती है और बाप आर्थिक शारीरिक और मानसिक और घर मे कलेश रहता ही है और बाप कर्जेदार और अपमानित होता है और इसके उलट जातक आपनी लाईने मे कामयाबी के झंडे बुलंद करता रहता है ये योग अग्र सप्तम भाव मे हो तो sure है जातक का
तलाक निश्चित है और जातक के घर मे भी दो शादियां हुई होती है ये पूरी तरह होता है।

दिशा

ईशान दिशा—-
इस दिशा के स्वामी बृहस्पति हैं। और देवता हैं भगवान
शिव। इस दिशा के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए
नियमित गुरू मंत्र ‘ओम बृं बृहस्पतये नमः’ मंत्र का जप
करें। शिव पंचाक्षरी मंत्र ओम नमः शिवाय का 108
बार जप करना भी लाभप्रद होता है।
पूर्व दिशा—–
घर का पूर्व दिशा वास्तु दोष से पीड़ित है तो इसे
दोष मुक्त करने के लिए प्रतिदिन सूर्य मंत्र ‘ओम ह्रां
ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः’ का जप करें। सूर्य इस
दिशा के स्वामी हैं। इस मंत्र के जप से सूर्य के शुभ
प्रभावों में वृद्घि होती है। व्यक्ति मान-सम्मान एवं
यश प्राप्त करता है। इन्द्र पूर्व दिशा के देवता हैं।
प्रतिदिन 108 बार इंद्र मंत्र ‘ओम इन्द्राय नमः’ का
जप करना भी इस दिशा के दोष को दूर कर देता है।
आग्नेय दिशा—-
इस दिशा के स्वामी ग्रह शुक्र और देवता अग्नि हैं। इस
दिशा में वास्तु दोष होने पर शुक्र अथवा अग्नि के
मंत्र का जप लाभप्रद होता है। शुक्र का मंत्र है ‘ओम शुं
शुक्राय नमः’। अग्नि का मंत्र है ‘ओम अग्नेय नमः’।
इस दिशा को दोष से मुक्त रखने के लिए इस दिशा में
पानी का टैंक, नल, शौचालय अथवा अध्ययन कक्ष
नहीं होना चाहिए।
दक्षिण दिशा—-
इस दिशा के स्वामी ग्रह मंगल और देवता यम हैं।
दक्षिण दिशा से वास्तु दोष दूर करने के लिए
नियमित ‘ओम अं अंगारकाय नमः’ मंत्र का 108 बार
जप करना चाहिए। यह मंत्र मंगल के कुप्रभाव को भी
दूर कर देता है। ‘ओम यमाय नमः’ मंत्र से भी इस दिशा
का दोष समाप्त हो जाता है।
नैऋत्य दिशा—
इस दिशा के स्वामी राहु ग्रह हैं। घर में यह दिशा
दोषपूर्ण हो और कुण्डली में राहु अशुभ बैठा हो तो
राहु की दशा व्यक्ति के लिए काफी कष्टकारी हो
जाती है। इस दोष को दूर करने के लिए राहु मंत्र ‘ओम
रां राहवे नमः’ मंत्र का जप करें। इससे वास्तु दोष एवं
राहु का उपचार भी उपचार हो जाता है।
पश्चिम दिशा—
यह शनि की दिशा है। इस दिशा के देवता वरूण देव हैं।
इस दिशा में किचन कभी भी नहीं बनाना चाहिए।
इस दिशा में वास्तु दोष होने पर शनि मंत्र ‘ओम शं
शनैश्चराय नमः’ का नियमित जप करें। यह मंत्र शनि के
कुप्रभाव को भी दूर कर देता है।
वायव्य दिशा—–
चन्द्रमाँ इस दिशा के स्वामी ग्रह हैं। यह दिशा
दोषपूर्ण होने पर मन चंचल रहता है। घर में रहने वाले
लोग सर्दी जुकाम एवं छाती से संबंधित रोग से
परेशान होते हैं। इस दिशा के दोष को दूर करने के लिए
चन्द्र मंत्र ‘ओम चन्द्रमसे नमः’ का जप लाभकारी
होता है।
उत्तर दिशा—–
यह दिशा के देवता धन के स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा
बुध ग्रह के प्रभाव में आता है। इस दिशा के दूषित होने
पर माता एवं घर में रहने वाले स्त्रियों को कष्ट होता
है। आर्थिक कठिनाईयों का भी सामना करना
होता है। इस दिशा को वास्तु दोष से मुक्त करने के
लिए ‘ओम बुधाय नमः या ‘ओम कुबेराय नमः’ मंत्र का
जप करें। आर्थिक समस्याओं में कुबेर मंत्र का जप अधिक
लाभकारी होता है।