Friday, February 24, 2017

संबंधियो व् सम्बंधित कारक ग्रह

संबंधियो व् सम्बंधित कारक ग्रह                                               

ग्रह किसी न किसी संबंधी का प्रतिनिधित्व करता है।जिन कारक ग्रहो की स्थिति जातक के अनुकूल और बलवान होती है उन संबंधियो की ओर से पूरा सुख और सहयोग मिलता है।जिन संबंधी कारक ग्रहो की स्थिति निर्बल या अशुभ होती है उन कारक संबंधी जनों की और से सुख, सहयोग नही मिल पाता, ऐसे कारक ग्रह कुंडली में अनिष्ट हो तब उन संबंधियो की ओर से जातक को परेशानिया भी हो सकती है।।                                                                                                                    

सूर्य::- सूर्य पिता, सरकारी कर्मचारी, उच्च अधिकारी, सरकार का कारक है।।                                                                                                                

चंद्रमा::- चंद्रमा माँ का मुख्य कारक है।दादी, परदादी आदि का विचार भी चंद्र से किया जाता है।।                                                                              

मंगल::- मंगल छोटे भाई, दोस्त, प्रेमी इसके आलावा जो लोग किसी लड़ाई- झगडे, या समाज में शांति व्यवस्था रखने का करते है जैसे पुलिस आदि उनका कारक भी मंगल होता है।।                                                                

बुध::- संबंधियो में यह कई संबंधियो का कारक होता है।बहन, बुआ, फूफा, मौसी, मौसा, ननिहाल पक्ष, मामा, दोस्त इन्ही सब संबंधियो की ओर से सम्बंधित संबंधियो का विचार भी बुध की स्थिति से किया जाता है।                                                                              

बृहस्पति::- यह दादा, देव, ईश्वर, गुरु मतलब जीवन में जो भी इंसान हमे कुछ सीखाता है कोई सीख देता है उसका कारक गुरु है।इसके आलावा स्त्री के लिए पति का कारक है, ब्राहम्ण, ज्ञानीजनो का कारक भी यही है।।                                                                             

शुक्र::- शुक्र पत्नी, प्रेमिका, अन्य कोई स्त्री का कारक शुक्र है।।यहाँ अन्य स्त्री में माँ और बहन के लिए शुक्र से विचार नही किया जायेगा।माँ के लिए कारक चंद्र और बहन के लिए बुध होगा।।                                                                                                            

शनि::- यह चाचा, ताऊ, नोकर, अपने से नीचे स्थिति पर काम करने वाले लोग, इसके आलावा विदेशी लोग या जिनलोगों का कोई नया विदेश से कोई सम्बन्ध जुड़ता हो उनका कारक भी यही है।।                                                                                                                           

राहु::- कोई विदेशी दोस्त या विदेश से जुड़े संबंधियो का प्रतिनिधित्व राहु करता है।।                                                                              

केतु::- यह भी विदेशी व्यक्ति राहु के सामान कारक तत्व का है।ननिहाल पक्ष का भी यह कही न कही प्रतिनिधित्व करता है।।

बीमारी और ज्योतिष

*बीमारी और ज्योतिष*

मनुष्य के जीवनकाल में उसका स्वास्थ्य और बीमारी इस बात पर निर्भर करती है कि दूसरे घर के ग्रह आठवें घर को बचाने में कितने सक्षम हैं। आठवें घर के ग्रह सदैव वक्र दृष्टि से दूसरे घर को देखते हैं। दूसरा घर आठवें घर का द्वार है। आठवें घर से ही रोग व मृत्यु का निर्धारण किया जाता है,साथ ही साथ दूसरे, छठे, बारहवें घर का भी विश्लेषण किया जाता है।वषर्फल में तीसरे व पांचवे घर में आने वाले ग्रह स्वास्थ्य, फिजूलखर्च, धन की प्राप्ति और मृत्यु को बताते हैं। भले ही दूसरे घर का ग्रह मृत्यु को रोकनेवाला हो फिर भी ग्यारहवे घर का ग्रह धोखा देगा और आठवां मृत्यु का कारक होगा। पांचवां घर टकराव के लिए तथा बारहवां व तीसरा घर बीमारी तथा मृत्यु के फैसले के लिए न्यायाधीश होगा। रक्त से संबंधित जो रोग हैं वे रक्त का प्रवाह असंतुलित होने या
रक्त में प्रदूषण के कारण होते हैं। रक्त से संबंधित रोग हीमोग्लोबिन कम होना, इंसोमेनिया, हाइपरटेंशन, कैंसर, ट्यूमर, हार्टअटैक, हैपेटाइटिस आदि हैं। यहां तक कि मधुमेह भी मंगल व शुक्र का संबंध असंतुलित होने के कारण होता है। जब भी किसी व्यक्ति को इन रोगों के कारण परेशानी होती है, मंगल ग्रह का सही विश्लेषण हम दो स्थिति में कर सकते हैं।कुंडली का पहला घर यानी एक नंबर राशि
में मंगल शुभ होता है और अक्सर राजयोग कारक होता है। पर वृश्चिक राशि यानी आठवीं राशि का मंगल मारक होता है अर्थात मंगल बद होता है। किसी कुंडली में मंगल के साथ, बृहस्पति या चंद्र हो तो मंगल बद नहीं होता है। शुभ मंगल शुभ फल देता है और अगर कुंडली में मंगल शुभ है और उसके साथ बृहस्पति, सूर्य अथवा चंद्र शुभ फल दे रहे हैं तो ऐसा व्यक्ति अक्सर शासक होता है। चंद्र का संबंध मन से है। चंद्र पानी भी है, इसी प्रकार यदि मंगल, चंद्र दोनों में से कोई दूषित है तो निश्चित ही मनुष्य रक्तचाप, हाइपरटेंशन से पीड़ित होगा। सूर्य, बुध की युति व दृष्टि से हो या साथ-साथ होने से वही फल देगी जो अकेला मंगल देता है और सूर्य अथवा बुध इनमें से कोई एक दूषित अथवा अशुभ है और चंद्र से संबंध हो जाता है तो निश्चित ही जातक को मानसिक तनाव,रक्तचाप अथवा हार्टअटैक होगा।इसको दूर करने के लिए कुंडली का पूर्ण विश्लेषण करें और यह देखें कि चंद्र व मंगल में से कौन सा ग्रह अशुभ फल दे रहा हैे। इसी आधार पर सूर्य, बुध की युति से मंगल बन रहा है और उसका चंद्र से संबंध हो गया है तो कहीं ने कहीं दोष होने से उपरोक्त बीमारियां मनुष्य को घेर सकती है।

ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों केअंगों से होकर गुजरता है तो वह उनको नुकसान पहुंचाता है।
नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने
भविष्य को सुखद बना सकते हैं। वैदिक वाक्य है कि पिछले जन्म में किया हुआ पाप इस जन्म में रोग के रूप में सामने आता है।
अग्नि, पृथ्वी, जल,आकाश और वायु इन्हीं पांच तत्वों से यह नश्वर शरीर निर्मित हुआ है। यही पांच तत्व में
मेष, सिंह और धनु अग्नि तत्व
वृष,कन्या और मकर पृथ्वी तत्व
मिथुन, तुला और कुंभ वायु तत्व
कर्क, वृश्चिक और मीन जल तत्व का
प्रतिनिधित्व करते हैं।
कालपुरुष की कुंडली में मेष का स्थान मस्तक, वृष का मुख, मिथुन का कंधे और छाती तथा कर्क का हृदय पर निवास है
जबकि सिंह का उदर (पेट), कन्या का कमर, तुला का पेडू और वृश्चिक राशि का निवास लिंग प्रदेश है। धनु राशि तथा
मीन का पगतल और अंगुलियों पर वास है।बारह राशियों को बारह भाव के नाम से जाना जाता है। इन भावों के द्वारा क्रमश: शरीर, धन, भाई, माता,पुत्र, ऋण-रोग, पत्नी, आयु, धर्म, कर्म, आय और व्यय का चक्र मानव के जीवन में चलता रहता है।जो राशि शरीर के जिस अंग का प्रतिनिधित्व
करती है, उसी राशि में बैठे ग्रहों के प्रभाव के अनुसार रोग की उत्पत्ति होती है। कुंडली में बैठे ग्रहों के अनुसार किसी भी जातक के रोग के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।
कोई भी ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उन अंगों को नुकसान पहुंचाता है। जैसे सिंह राशि में शनि और मंगल चल रहे हैं तो मीन लग्न मकर और कन्या लग्न में पैदा लोगों के लिए यह समय स्वास्थ्यव्की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता।
अब सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली में हृदय, पेट (उदर) के क्षेत्र पर वास करती है तो इन लग्नों में पैदा लोगों को हृदयघात और पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा बना रहेगा। इसी प्रकार कुंडली में यदि सूर्य के साथ पापग्रह शनि या राहु आदि बैठे हों तो जातक में विटामिन ए की कमी रहती है। साथ ही विटामिन सी की कमी रहती है जिससे आंखें और हड्डियों की बीमारी का भय रहता है। चंद्र और शुक्र के साथ जब भी पाप ग्रहों का संबंध होगा तो जलीय रोग जैसे शुगर, मूत्र विकार और स्नायुमंडल जनित बीमारियां होती है। मंगल शरीर में रक्त का स्वामी है। यदि ये नीच राशिगत, शनि और अन्य पाप ग्रहों से ग्रसित हैं तो व्यक्ति को रक्तविकार और कैंसर जैसी बीमारियां होती हैं।




Thursday, February 23, 2017

जन्म तिथि और स्वभाव

जन्म तिथि और स्वभाव

प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक और फ़िर
प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक दो पक्षो की तिथिया होती है,अमावस्या तक कृष्ण पक्ष की तिथिया कहलाती है और प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक की तिथिया शुक्ल पक्ष
की तिथिया कहलाती है। तिथि का प्रभाव
भी जातक पर उसी प्रकार से पडता है जैसे
ग्रह और नक्षत्र का पडता है।

*तिथियों के भी स्वामी होते है*
तिथियों का विवरण इस प्रकार से है-

प्रतिपदा : धनी और बुद्धिमान होना

द्वितीया: मान मर्यादा मे आगे कुल का नाम बढाने वाला विदेशवास और कानून को जानने वाला

तृतीया: धन और सम्पत्ति को ध्यान मे रखने वाला कार्य और राज्य से लाभ लेने वाला सन्तान और पिता के प्रति समर्पित

चतुर्थी : इस तिथि मे पैदा होने वाला जातक यात्रा प्रिय होता है वाहनोका शौकीन होता है कामोत्तेजना अधिक होती है सांस का मरीज होता है

पंचमी: जातक धार्मिक होता है धर्म स्थानो की तरफ़ अधिक लगाव होता है न्याय ऊंची शिक्षा और विदेश के प्रति अच्छी जानकारी होती है

षष्ठी : दिमाग से तेज होता है शरीर मे दुर्बलता होती है बुद्धि से सभी काम निपटाने की हिम्मत रखता है

सप्तमी : जातक मे बीमारी के कई कारण बनते है सत्य बोलने की तरफ़ ध्यान होता है रात मे किये गये काम नही बन पाते है

अष्टमी : जातक धन की तरफ़ अधिक
आकर्षित रहता कर्जा करने और लोगो का धन हडपने की आदत होती है,चिन्ता से
बीमार रहना माना जाता है

नवमी : जातक का रुझान प्रसिद्धि की तरफ़ अधिक होता है राज्य और गुप्त काम के अन्दर माहिर होता है,यौन सम्बन्ध बनाने मे माहिर होता है

दसवीं : जातक अपने चरित्र की तरफ़ अधिक ध्यान रखता है,कठिन समय को पहिचानने वाला होता है जहां भी जाता है लोग कहना मानने लगते है

एकादशी : जातक धनी होता है कानून
को मानने और मनवाने वाला होता है
पूर्वजो की सम्पत्ति और मर्यादा को कायम
रखना चाहता है

द्वादसी : जातक सुन्दर विचारो को ग्रहण करने वाला होता है लोगो को जातक के विचार पसंद आते है और मित्रता से सभी काम पूरे करने वाला होता है

त्रियोदसी: जातक की धन के प्रति अधिक
चाहत होती है लेकिन कितना ही कमाया जाये बचत नही होती है पुरुषों को स्त्रियों के प्रति और स्त्रियों को पुरुषो के प्रति अधिक आकर्षण होता है खेल कूद मनोरंजन और जल्दी से धन कमाने के साधन आदि मे आगे रहता है

चतुर्दशी : जातक को शत्रुता वाले कामो की तरफ़ अधिक ध्यान रहता है गूढ बातो को निकालकर शत्रुता करने की आदत होती है रोजाना के कामो में ब्याज से काम करना किराये से काम करवाने की इच्छा रखना बीमारी से कमाना पुलिस आदि की सहायता लेना और देना आदि बाते देखी जाती है

पूर्णिमा: जातक के अन्दर जो भी इच्छा होती है उसे पूरा करने के लिये साम दाम दण्ड भेद आदि सभी नीतियों से काम
को पूरा करने के लिये उद्धत रहता है
विचारो की श्रेणी मे वह विचार पनप पाते है
जो सकारात्मक होते है,देवी शक्ति पर विश्वास करना और महिने में आठ दिन अपने ही बनाये हुये कष्टो मे जूझना आदि देखा जाता है

अमावस्या: जातक् का ध्यान शिक्षा देने और शिक्षा को प्राप्त करने के
लिये आजीवन रहता है वह
किसी भी काम मे अपने को पूर्ण
नही समझ पाता है जहां भी जाता है
अपनी शिक्षा के अनुसार वाणी का प्रयोग
करने लगता है,लोग गुरु के नाम से जानते है साथ ही अपने पूर्वजो की मर्यादा का भी ध्यान रखता है स्वयं के काम भी जैसे नित्य क्रिया आदि समय से पूर्ण करता है सन्तान भी समय पर सहारा देने वाली होती है तांत्रिक शक्तियों पर विश्वास अधिक होता हे।

होली के अदभुत प्रयोग / उपाय

होली के अदभुत प्रयोग / उपाय

होली की पूजा मुखयतः भगवान विष्णु
(नरसिंह अवतार) को ध्यान में रखकर
की जाती है।
घर के प्रत्येक सदस्य को होलिका दहन में
देशी घी में भिगोई हुई दो लौंग, एक
बताशा और एक पान का पत्ता अवश्य चढ़ाना चाहिए।
होली की ग्यारह परिक्रमा करते हुए
होली में सूखे नारियल
की आहुति देनी चाहिए। इससे सुख-
समृद्धि बढ़ती है, कष्ट दूर होते हैं।
होली पर पूरे दिन अपनी जेब में काले कपड़े
में बांधकर काले तिल रखें। रात
को जलती होली में उन्हें डाल दें।
यदि पहले से ही कोई टोटका होगा तो वह
भी खत्म हो जाएगा।
होली दहन के समय ७ गोमती चक्र लेकर
भगवान से प्रार्थना करें कि आपके जीवन में कोई शत्रु
बाधा न डालें। प्रार्थना के पश्चात पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ
गोमती चक्र दहन में डाल दें।
होली दहन के दूसरे दिन
होली की राख को घर लाकर उसमें
थोडी सी राई व नमक मिलाकर रख लें। इस
प्रयोग से भूतप्रेत या नजर दोष से मुक्ति मिलती है।
होली के दिन से शुरु होकर बजरंग बाण का ४० दिन तक
नियमित पाठ करनें से हर मनोकामना पूर्ण होगी।
यदि व्यापार या नौकरी में उन्नति न
हो रही हो, तो २१ गोमती चक्र लेकर
होली दहन के दिन रात्रि में शिवलिंग पर चढा दें।
नवग्रह बाधा के दोष को दूर करने के लिए
होली की राख से शिवलिंग
की पूजा करें तथा राख मिश्रित जल से स्नान करें।
होली वाले दिन किसी गरीब
को भोजन अवश्य करायें।
होली की रात्रि को सरसों के तेल
का चौमुखी दीपक जलाकर पूजा करें व भगवान
से सुख - समृद्धि की प्रार्थना करें। इस प्रयोग से
बाधा निवारण होता है।
यदि बुरा समय चल रहा हो, तो होली के दिन पेंडुलम
वाली नई
घडी पूर्वी या उत्तरी दीवार
पर लगाए। परिणाम स्वयं देखे।
राहु का उपाय - एक नारियल का गोला लेकर उसमे
अलसी का तेल भरकर..उसी में थोडा सा गुड
डाले..फिर उस नारियल के गोले को राहू से ग्रस्त व्यक्ति अपने
शारीर के अंगो से स्पर्श करवाकर
जलती हुई होलिका में डाल देवे. पुरे वर्ष भर राहू से
परेशानी की संभावना नहीं रहेगी…
मनोकामना की पूर्ति हेतु होली के दिन से
शुरू करके प्रतिदिन हनुमान जी को पांच लाल पुष्प चढ़ाएं,
मनोकामना शीघ्र पूर्ण होगी।
होली की प्रातः बेलपत्र पर सफेद चंदन
की बिंदी लगाकर
अपनी मनोकामना बोलते हुए शिवलिंग पर सच्चे मन से
अर्पित करें। बाद में सोमवार को किसी मंदिर में भोलेनाथ
को पंचमेवा की खीर अवश्य चढ़ाएं,
मनोकामना पूरी होगी।
स्वास्थ्य लाभ हेतु मृत्यु तुल्य कष्ट से ग्रस्त
रोगी को छुटकारा दिलाने के लिए जौ के आटे में काले तिल एवं
सरसों का तेल मिला कर मोटी रोटी बनाएं और
उसे रोगी के ऊपर से सात बार उतारकर भैंस को खिला दें।
यह क्रिया करते समय ईश्वर से
रोगी को शीघ्र स्वस्थ करने
की प्रार्थना करते रहें।
व्यापार लाभ के लिए होली के दिन गुलाल के एक खुले
पैकेट में एक मोती शंख और चांदी का एक
सिक्का रखकर उसे नए लाल कपड़े में लाल मौली से
बांधकर तिजोरी में रखें, व्यवसाय में लाभ होगा।
होली के अवसर पर एक एकाक्षी नारियल
की पूजा करके लाल कपड़े में लपेट कर दूकान में
या व्यापार स्थल पर स्थापित करें। साथ ही स्फटिक
का शुद्ध श्रीयंत्र रखें। उपाय निष्ठापूर्वक करें, लाभ में
दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होगी।
धनहानि से बचाव के लिए होली के दिन मुखय द्वार पर
गुलाल छिड़कें और उस पर द्विमुखी दीपक
जलाएं। दीपक जलाते समय धनहानि से बचाव
की कामना करें। जब दीपक बुझ जाए तो उसे
होली की अग्नि में डाल दें। यह
क्रिया श्रद्धापूर्वक करें, धन हानि से बचाव होगा।
दुर्घटना से बचाव के लिए होलिका दहन से पूर्व पांच
काली गुंजा लेकर होली की पांच
परिक्रमा लगाकर अंत में होलिका की ओर
पीठ करके पांचों गुन्जाओं को सिर के ऊपर से पांच बार
उतारकर सिर के ऊपर से होली में फेंक दें।
होली के दिन प्रातः उठते
ही किसी ऐसे व्यक्ति से कोई वस्तु न लें,
जिससे आप द्वेष रखते हों। सिर ढक कर रखें।
किसी को भी अपना पहना वस्त्र या रुमाल
नहीं दें। इसके अतिरिक्त इस दिन शत्रु
या विरोधी से पान, इलायची, लौंग आदि न लें। ये
सारे उपाय सावधानीपूर्वक करें, दुर्घटना से बचाव होगा।
आत्मरक्षा हेतु किसी को कष्ट न पहुंचाएं,
किसी का बुरा न करें और न सोचें।
आपकी रक्षा होगी।
अगर आपके घर में कोई शारीरिक कष्टों से
पीड़ित है - ओर उसको रोग छोड़ नहीं रहे
है - तो 11 अभिमंत्रित गोमती चक्र बीमार
ब्यक्ति के शरीर से 21 बार उसार कर
होली की अग्नि में डाल दे
शारीरिक कष्टों से शीघ्र मुक्ति मिल
जायेगी
अगर बुध ग्रह आपकी कुंडली में संतान
प्राप्ति में बाधा दाल रहा है
तो किसी भी बच्चे
वाली गरीब महिला को होली वाले
दिन से शुरु कर एक महीने तक हरी-
सब्जियाँ दें। माता वैष्णो-देवी से संतान
की प्रार्थना करें।
शीघ्र विवाह हेतु: जो युवा विवाह योग्य हैं और
सर्वगुण संपन्न हैं, फिर
भी शादी नहीं हो पा रही है
तो यह उपाय करें। होली के दिन किसी शिव
मंदिर जाएं और अपने साथ 1 साबूत पान, 1 साबूत
सुपारी एवं हल्दी की गांठ रख
लें। पान के पत्ते पर सुपारी और
हल्दी की गांठ रखकर शिवलिंग पर अर्पित
करें। इसके बाद पीछे देखें बिना अपने घर लौट आएं।
यही प्रयोग अगले दिन भी करें। इसके साथ
ही समय-समय शुभ मुहूर्त में यह उपाय
किया जा सकता है। जल्दी ही विवाह के
योग बन जाएंगे।

ज्योतिष ओर फल

ज्योतिष ओर फल

फल कथन करते समय देश काल परिस्थतीक का भी महत्व एक लग्न और एक लग्न की डिग्री में महत्वपूर्ण व्यक्ति का जन्म एक स्थान में कभी नहीं होता। यदि किसी दूरस्थ देश में किसी दूसरे व्यक्ति का जन्म इस समय हो भी , तो आक्षांस और देशांतर में परिवर्तन होने से उसके लग्न और लग्न की डिग्री में परिवर्तन आ जाएगा। फिर भी जब जन्म दर बहुत अधिक हो , तो या बहुत सारे बच्चे भिन्न-भिन्न जगहों पर एक ही दिन एक ही लग्न में या एक ही लग्न डिग्री में जन्म लें , तो क्या सभी के कार्यकलाप , चारित्रिक विशेशताएं , व्यवसाय , शिक्षा-दीक्षा , सुख-दुख एक जैसे ही होंगे ?
मेरी समझ से उनके कार्यकलाप , उनकी बौद्धिक तीक्ष्णता , सुख-दुख की अनुभूति , लगभग एक जैसी ही होगी। किन्तु इन जातकों की शिक्षा-दीक्षा , व्यवसाय आदि संदर्भ भौगोलिक और सामाजिक परिवेश के अनुसार भिन्न भी हो सकते हैं। यहॉ लोगों को इस बात का संशय हो सकता है कि ग्रहों की चर्चा के साथ अकस्मात् भौगोलिक सामाजिक परिवेश की चर्चा क्यो की जा रही है ? स्मरण रहे , पृथ्वी भी एक ग्रह है और इसके प्रभाव को भी इंकार नहीं किया जा सकता। आकाश के सभी ग्रहों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है , परंतु भिन्न-भिन्न युगों सत्युग , त्रेतायुग , द्वापर और कलियुग में मनुष्‍यों के भिनन-भिन्न स्वभाव की चर्चा है। मनुष्‍य ग्रह से संचालित है , तो मनुष्‍य के सामूहिक स्वभाव परिवर्तन को भी ग्रहों से ही संचालित समझा जा सकता है , जो किसी युग विशेष को ही जन्म देता है।
लेकिन सोंचने वाली बात तो यह है कि जब ग्रहों की गति , स्थिति , परिभ्रमण पथ , स्वरुप और स्वभाव आकाश में ज्यो का त्यो बना हुआ है , फिर इन युगों की विशेषताओं को किन ग्रहों से जोड़ा जाए । युग-परिवर्तन निश्चित तौर पर पृथ्वी के परिवेश के परिवर्तन का परिणाम है। पृथ्वी पर जनसंख्या का बोझ बढ़ता जाना , मनुष्‍य की सुख-सुविधाओं के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों का तॉता लगना , मनुष्‍य का सुविधावादी और आलसी होते चले जाना , भोगवादी संस्कृति का विकास होना , जंगल-झाड़ का साफ होते जाना , उद्योगों और मशीनों का विकास होते जाना , पर्यावरण का संकट उपस्थित होना , ये सब अन्य ग्रहों की देन नहीं। यह पृथ्वी के तल पर ही घट रही घटनाएं हैं। पृथ्वी का वायुमंडल प्रतिदिन गर्म होता जा रहा है। आकाश में ओजोन की परत कमजोर पड़ रही है , दोनो ध्रुवों के बर्फ अधिक से अधिक पिघलते जा रहे हैं , हो सकता है , पृथ्वी में किसी दिन प्रलय भी आ जाए ,इन सबमें अन्य ग्रहों का कोई प्रभाव नहीं है।
ग्रहों के प्रभाव से मनुष्‍य की चिंतनधाराएं बदलती रहती हैं , किन्तु पृथ्वी के विभिन्न भागों में रहनेवाले एक ही दिन एक ही लग्न में पैदा होनेवाले दो व्यक्तियों के बीच काफी समानता के बावजूद अपने-अपने देश की सभ्यता , संस्कृति , सामाजिक , राजनीतिक और भौगोलिक परिवेश से प्रभावित होने की भिन्नता भी रहती है। संसाधनों की भिन्नता व्यवसाय की भिन्नता का कारण बनेगी  समुद्र के किनारे रहनेवाले लोग , बड़े शहरों में रहनेवाले लोग , गॉवो में रहनेवाले संपन्न लोग और गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले लोग अपने देशकाल के अनुसार ही व्यवसाय का चुनाव अलग-अलग ढंग से करेंगे। एक ही प्रकार के आई क्यू रखनेवाले दो व्यक्तियों की शिक्षा-दीक्षा भिन्न-भिन्न हो सकती है , किन्तु उनकी चिंतन-शैली एक जैसी ही हो  इस तरह पृथ्वी के प्रभाव के अंतर्गत आनेवाले भौगोलिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस कारण एक ही लग्न में एक ही डिग्री में भी जन्म लेनेवाले व्यक्ति का शरीर भौगोलिक परिवेश के अनुसार गोरा या काला हो सकता है। लम्बाई में कमी-अधिकता कुछ भी हो सकती है , किन्तु स्वास्थ्य , शरीर को कमजोर या मजबूत बनानेवाली ग्रंथियॉ , शारीरिक आवश्यकताएं और शरीर से संबंधित मामलों का आत्मविश्वास एक जैसा हो सकता है। सभी के धन और परिवार विशयक चिंतन एक जैसे माने जा सकते है सभी में पुरुषार्थ-क्षमता या शक्ति को संगठित करने की क्षमता एक जैसी होगी सभी के लिए संपत्ति , स्थायित्व और संस्था से संबंधित एक ही प्रकार के दृष्टिकोण होंगे। सभी अपने बाल-बच्चों से एक जैसी लगाव और सुख प्राप्त कर सकेंगे। सभी की सूझ-बूझ एक जैसी होगी। सभी अपनी समस्याओं को हल करने में समान धैर्य और संघर्ष क्षमता का परिचय देंगे। सभी अपनी जीवनसाथी से एक जैसा ही सुख प्राप्त करेंगे। अपनी-अपनी गृहस्थी के प्रति उनका दृष्टिकोण एक जैसा ही होगा। सभी का जीवन दर्शन एक जैसा ही होगा , जीवन-शैली एक जैसी ही होगी। भाग्य , धर्म , मानवीय पक्ष के मामलों में उदारवादिता या कट्टरवादिता का एक जैसा रुख होगा। सभी के सामाजिक राजनीतिक मामलों की सफलता एक जैसी होगी। सभी का अभीष्‍ट लाभ एक जैसा होगा। सभी में खर्च करने की प्रवृत्ति एक जैसी ही होगी।
किन्तु शरीर का वजन , रंग या रुप एक जैसा नहीं होगा। संयुक्त परिवार की लंबाई , चौड़ाई एक जैसी न  वास्तव में कुंडली में बनते योग को बांच कर उसे ही 100% मानने की भूल ही इस विवाद का कारण बनती है.जातक के जीवन में इस योग को 20% उसके सामाजिक व् पारिवारिक दशा पर निर्भर होना पड़ता है.20% जातक से जुड़े रक्त सम्बन्धियों का रोल इस योग में होता है ,20% उसका स्वयं का प्रयास अर्थात कर्म यहाँ प्रभावित करने वाला कारक बनता है,बाकि का 20% हम हासिल शाश्त्रों के सुझाये उपायों(जिनमे ज्योतिष आदि सामिल हैं) द्वारा इसे प्रभावित करते हैं.तब जाकर योग का वास्तविक प्रतिशत प्राप्त होने की गणना करना बेहतर निर्णय देने में सहायक बनता है. सामान योग में जन्मा जातक अफ्रीका के जंगलों में आदिवासी कबीले का मुखिया बनता है.यही योग अमेरिका में उसे बराक ओबामा भी बना सकता है.सरकारी विभाग से धन प्राप्ति का योग एक चपरासी की कुंडली में भी विराजमान होता है व् अधिकारी की भी.अत यह सव वाते फलकथन करते समय जरुर देखना चाहिए।