Tuesday, January 6, 2026

राजसी_देवात्माएँ उपदेवता कहलाती हैं।

राजसी_देवात्माएँ उपदेवता कहलाती हैं। 

यक्ष, गन्धर्व और किन्नर-- ये तीन वर्ग उपदेताओं के हैं। 16 प्रकार के यक्ष- यक्षिणियां हैं। वे स्वयं सुन्दर होते हैं और सौंदर्य के प्रेमी भी होते हैं। मनुष्य के प्रति इनका विशेष आकर्षण होता है। सुन्दर और आकर्षक स्त्री के प्रति यक्षों की रूचि सर्वाधिक होती है। जहाँ सुन्दर, कमनीय, लावण्यमयी स्त्री को देखते हैं, तुरन्त मोहित हो जाते हैं वे उस पर और विभिन्न प्रकार से वे उसकी सहायता करते हैं अदृश्य रूप से। यक्ष लोग अत्यधिक कामुक और रतिप्रिय होते हैं। वे काम-क्रीड़ा और रति-क्रिया के समस्त गूढ़ रहस्यों से परिचित होते हैं। जो कलाकार काम और रति की विभिन्न मुद्राओं का आश्रय लेकर श्रंगारिक मूर्ति या चित्र का निर्माण करते हैं, उनको बराबर अगोचर सहयोग मिलता है यक्षों का।
     जो लोग आत्माकर्षिणी विद्या की सिद्धि को उपलब्ध हैं, उनको तो इस दिशा में भरपूर सहयोग मिलता है यक्षों का। कभी-कभी तो सुन्दर मानव के रूप में भी प्रकट होकर मनुष्यों की सहायता करते हैं। ऐसी ही यक्षिणियां भी होती हैं। वे भी जहाँ सुन्दर, आकर्षक, युवा व्यक्ति को देखती हैं, तुरंत मोहित हो जाती हैं वे। वे भी कामुक और रतिप्रिया होती हैं। उनकी ऑंखें मोरनी जैसी होती हैं। वे पुरुषों से  संपर्क स्थापित करने के लिए सदैव लालायित रहती हैं। जिसने आत्माकर्षिणी विद्या के द्वारा किसी यक्षिणी को सिद्ध कर लिया है, उसकी प्रत्येक कामना को वे पूर्ण करती हैं। लेकिन साधक को इसका मूल्य चुकाना पड़ता है उसकी काम-पिपासा को शान्त करके। कभी-कभी यक्षिणियां भी सशरीर प्रकट हो जाती हैं और इच्छानुसार रूप धारण कर लेती हैं। वास्तव में यक्षिणियां अति रहस्यमयी होती हैं। जो उनके चंगुल और मायाजाल में एक बार फंस गया, उसका फिर शीघ्र मुक्त होना संभव नहीं।
      इस विश्वब्रह्माण्ड में जितने भी प्रकार के प्राणी होते हैं, वे सभी प्राण तथा उसके विभिन्न आयामों द्वारा संचालित होते हैं। जहां तक आत्माओं का सम्बन्ध है, वे स्वयं की नैसर्गिक ऊर्जा द्वारा होती हैं संचालित और उसी के आधार पर इच्छानुसार रूप धारण कर लेती हैं। ऐसी ही आत्माओं को विशुद्ध आत्मा कहते हैं।
     यक्षों में सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इनमें प्राण-शक्ति और आत्म- शक्ति--दोनों का सामंजस्य है। वे जितने देवताओं के निकट हैं, कहीं उससे अधिक निकट हैं वे मनुष्यों के लिए।
     यजन करने वाली जाति को *यक्ष* कहते हैं। हमें यह बात ज्ञात होनी चाहिए कि ब्रह्मा ने सबसे पहले पंचतत्वों में जल की उत्पत्ति की और उसके पश्चात् अन्य प्राणियों का निर्माण किया। जल का अर्थ है--जीवन देने वाला। इसीलिए इसकी सबसे पहले उत्पत्ति की गयी प्राक्काल में। जिन-जिन प्राणियों का निर्माण हुआ था--वे सब मिलकर ब्रह्माजी के पास गए और कहने लगे कि हम सब भूख-प्यास से व्याकुल हैं। ब्रह्मा ने कहा--जल की रक्षा करो। एकमात्र जल ही जीवन है। कालान्तर में जल तत्व द्वारा ही अन्य पदार्थों का निर्माण होगा, इसलिए उसकी रक्षा करो। 
     यह सुनकर उन समस्त प्राणियों में से अधिकाँश बोल उठे--'वयं रक्षामः' (हम रक्षा करेंगे) और उनमें से कुछ बोल उठे--'वयं यक्षामः' (हम यजन करेंगे अर्थात् यज्ञ करेंगे)। 'वयं रक्षामः' बोलने वाले रक्ष संस्कृति के कारण आगे चल कर राक्षस या दानव कहलाये और 'वयं यक्षामः' कहने वाले यक्ष संस्कृति (यज्ञ-याग) के फलस्वरूप कहलाये--यक्ष। इस प्रकार हम देखते हैं कि मूल रूप से एक समय दो ही जातियां थीं। एक थी--यक्ष और दूसरी थी राक्षस। यक्ष ही आगे चलकर आर्यावर्त में मनु की सन्तान होने के फलस्वरूप मानव कहलाये। इस तरह पृथ्वी पर दानव और मानव दो प्रकार के शरीरधारी प्राणी बने सर्वप्रथम। मानव में प्रकृति प्रदत्त 'मन' की प्रधानता है-इसीलिए उसे मनुष्य कहा गया। जबकि दानव में है बुद्धि चातुर्य की प्रधानता। अग्नि पुराण के अनुसार यक्षों की उत्पत्ति प्रचेता अर्थात् वरुण से हुई। इसलिए जलतत्व का प्रतीक वरुण है। जलतत्व व्यापक काम की स्थिति है और यही कारण है कि यक्ष-यक्षिणियां अत्यधिक कामातुर और कामाचारी होते हैं। मनुष्य से सौ गुना अधिक कामाचारी होते हैं--यक्ष-यक्षिणियां।

योनि मुद्रा (ज्योति मुदा)-योनि का अर्थ है

योनि मुद्रा (ज्योति मुदा)-योनि का अर्थ है

-अधिष्ठान(निवास स्थान)।यही वह अधिष्ठान है जहाँ योगी स्थिर हो कर आदि शक्ति में लीन होता है।आदि शक्ति,ललिताम्बा,त्रिपुरसुंदरी यहाँ अधिष्ठात्री हैं।
"योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिपुराम्बा त्रिकोणगा"

कतिपय साधकों के अनुसार,लाहिड़ी महाशय कहते थे कि योनि मुद्रा का अभ्यास रात्रि में ही करना चाहिए।परंतु इसे सत्य नही माना जा सकता।योनि मुद्रा ध्यान की अवस्था में एक विशिष्ठ सोपान है तथा क्रिया के अभ्यास के पहले तथा बाद में भी माता की कृपा होती है।

योनि मुद्रा एक स्वयम्भू मुद्रा है तथा इस मुद्रा के संदर्भ में,यद्यपि साधक को अभ्यास करना होता है,अभ्यास शब्द उचित प्रतीत नही होता।यही बात महा मुद्रा तथा खेचरी मुद्रा के संदर्भ में भी सत्य है।ये मुद्राएं योगी की उन्नत क्रमविकास की पराकाष्टा की ओर संकेत करती हैं।अंतः अभ्यास शब्द के स्थान पर मै "प्रणाम" शब्द का प्रयोग करता हूँ।

आज्ञा चक्र के माध्यम से भ्रूमध्य में योनि(त्रिकोण) का दर्शन माता की कृपा से ही सम्भव होता है।वर्षों की साधना के बाद ही योगी पात्र हो पाता है।योगी को कूटस्थ ज्योति के दर्शन होते हैं।

विधि-

1-आरम्भ में खेचरी मुद्रा के बिना भी योनि मुद्रा को प्रणाम कर सकते हैं।

2-आँखे तथा मुख बन्द कर क्रिया प्राणायाम की तरह ही प्राण ऊर्जा को मूलाधार से ऊपर खींचना शरू करें तथा बिंदु(मेडुला) तक ले कर आएं।

साथ ही अपने दोनों हाथों की कुहनियों को ऊपर उठाते हुए अँगुलियों को चेहरे के समीप लाएं।यहाँ उद्देश्य है कि हमारी आँखे,मुख, कान तथा नासिकॉ छिद्र अँगुलियों द्वारा पूर्ण रूपेण बन्द किये जाएं।

लेखकों ने नियम भी बना दिए हैं,जैसे कानों को अंगूठों से,होठों को अनामिका से इत्यादि।

मेरा सुझाव है कि आप अपनी सुविधा से अँगुलियों का प्रयोग करें।कालांतर में नासिका छिद्र एवम् होठों के लिए अँगुलियों के प्रयोग की आवश्यकता ही नही पड़ती।संक्षेप में,समस्त द्वार जहाँ से ऊर्जा बाहर जा सकती है,बन्द होने चाहिए।

ध्यान रहे,नासिका छिद्र बन्द करने के पूर्व आपका ऊर्जा आरोहण(inhalation) पूर्ण हो जाना चाहिए।

3-ऊर्जा का आरोहण पूर्ण है;समस्त द्वार बन्द हैं,ऊर्जा मस्तक में घनीभूत है तथा इन्द्रिय संयम का प्रकाश रुपी ओज भ्रूमध्य की ओर जा रहा है।

इस अवस्था में ऊर्जा स्वतः भ्रूमध्य की ओर गमन करेगी।कुछ ही क्षणों में साधक को प्रकाशमयी अखण्ड मंडल के दर्शन होंगे।साधक तब तक उस अवस्था में स्थिर रहे जहाँ तक वह सहज हो।श्वास को रोके रखना है तब तक कि साधक सहज रह सके।कूटस्थ के दर्शन की अवस्था में भ्रूमध्य में ॐ का जप करें।

4-अब साधक को श्वास(प्राण ऊर्जा) छोड़नी है(क्रिया प्राणायाम की तरह मूलाधार तक)।

यह एक प्रणाम हुआ।ऐसे तीन प्रणाम करें।प्रत्येक प्रणाम के पश्चात् साधक अपने हाथों को यथास्थान रख सकता है तथा उन्हें वापस भी ला सकता है।यथास्थान ही रखना श्रेयस्कर होगा जिससे संचित ऊर्जा बाहर न जा सके एवम् साधक अंतर्मुखी बना रहे।

अतः आप योनि मुद्रा में भी तीन क्रिया प्राणायाम करते हैं।

जैसा मैंने कहा कि ये मुद्राएं स्वयम्भू हैं।अतः साधक की अनुभूति जो कुछ भी लिखा गया है,उसकी तुलना में अलग एवम् अद्वितीय हो सकती है।कुछ साधकों को ॐ का नाद भी सुनाई पड़ता है।

प्रणाम के पश्चात् भी कूटस्थ ज्योति ललाट में मंडराती हैं।साधक को पूर्ण निष्ठा के साथ ज्योति को प्रणाम कर अगाध शांति में डूबे रहना चाहिए।यह शांति ध्यान आसन से उठने के बाद भी साधक के हर क्रिया कलाप में परिलक्षित होती है।

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।